श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर ? ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

पत्थर पर खींची गयी लकीर, और पिता की कही गयी बात कभी मिथ नही हो सकती l ऐसा कह कर वह बुजुर्ग सो गया l इस बात को जिस विश्वास के साथ उसने कहा था, बुजुर्ग को अपने इस विश्वास के अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा था l बुजुर्ग सोया, मगर इस सोच और मंथन के साथ सोया कि इस पंक्ति में मजबूती कितनी है, यह तो आगे देखने वाली चीज होंगी l

नींद में भी लम्बे अनुभव और युवा के अतिआत्मविश्वास मे द्वन्द बढ़ता गया था l युवा पुत्र को बुजुर्ग बाप से यह कहना बड़ा आसान था कि आप कुछ नही जानते है l आपको कुछ सही समझ मे आता ही कहां है l आप तो गलतियाँ करते ही करते है l अब ऐसी गलती बर्दास्त भी नही होंगी ।

बुजुर्ग बाप की लम्बी उम्र, पके बाल, और मंद होती आँखे स्वप्न में भी इसी सोच मे पड़ी रहीं कि क्या उसका पुत्र सही कह रहा था और उसकी बात गलत है ।

बुजुर्ग आँखे अपनी बत्ती बुझने से पहले पहले अपने इस प्रश्न का सटीक उत्तर ढूढ़ रही थी l अचानक मानव जीवन के यथार्थ का बोध कराने वाली पुस्तक श्रीरामचरितमानस उसके आगे खुली थी l वह लगातार पन्ने पलटते जा रहा था कि..अचानक ये पंक्तियाँ उसके मानस पटल से टकराई l

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें।

चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥

राहत की बात यह थी कि नींद खुलने से पहले उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया था l

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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