श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)
☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—
“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”
सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।
भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।
शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,
“बेटी, ये क्या कर रही हो?”
बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—
“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”
शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।
तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—
“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”
उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।
उन्होंने देखा—
धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।
“प्रकृति बदला नहीं लेती,
बस समय आने पर हर कटे हुए वृक्ष का हिसाब
सूखे खेतों और प्यासे होंठों से वसूल करती है।”
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






