श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – देखें हैं पतझड़…।)
☆ हेमंत साहित्य # ५८ ☆
देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
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सब्ज़ थे, अब ये ज़र्द होने लगे हैं
पत्तों के रंग, अब बदलने लगे हैं
देखें हैं पतझड़, बहारें भी इन ने
उमंगों के दिन अब ढलने लगे हैं
शजर संजीदा ओ गुमसुम खडे हैं
पतझड के डर से सहमने लगे हैं
सुक़ूं से था मैं, हसरते थी ग़ाफ़िल
नज़र आये वो अरमां सुलगने लगे हैं
मैख़ाना था बन्द हम प्यासे खडे थे
साक़ी के आते ही बहकने लगे हैं
खौफ़ ए सैय्याद अब बाकी रहा ना
परिंदों के बच्चे अब चहकने लगे हैं
ग़ुंचे तो हसीं थे पर ख़ुशबू नदारद
आते ही उनके ग़ुल महकने लगे हैं
कुछ तो हुआ है ‘हेमन्त’ यहां पर
अपने भी अब तो परखने लगे हैं
© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





