श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा आशीर्वाद के अक्षत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐

आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।

इन चीजों को परे हट कर  देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।

एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।

आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??

तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।

व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।

मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।

व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?

हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।

मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।

जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।

जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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