स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१
खेत,
खलिहान
नदी,
पर्वत
नगर, गाँव और आदमी
सब बेहाल हैं
सबके एक से हाल हैं
सबकी मुट्ठियों में
जलते हुए सवाल हैं।
सवालों का न तन होता है
न मन होता है
सवालों की उम्र नहीं
केवल वजन होता है।
और/ ये वजन
घन की तरह घिरता है
गिरता है
सपना बिखरता है
मैं/
‘तुम/ये/ वे
सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे
हमारे
प्यारे घर
बाढ़ में बह गये हैं
हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।
बाढ़/नदी की होती
तो सब सह लेते
किसी तरह रह लेते
लेकिन…
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






