श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – सर चढ़कर अब गर्मी बोले  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०५ ☆

कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले ☆ श्री संतोष नेमा ☆

सर चढ़कर अब गर्मी बोले |

सबकी सहनशीलता तोले ||

आँख तरेर दिवाकर कहता |

अब झेलिए आग के गोले ||

*

युद्ध छिड़ा खाड़ी में भीषण|

संकट में है जन साधारण||

जिसकी लम्बी नाक यहाँ पर |

बढ़ चढ़कर कर रहा आक्रमण ||

बढ़ती खूब युद्ध की गर्मी |

बरस  रहे  बारूदी शोले |

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

व्याकुल सब इंसान यहाँ हैं |

पशु पक्षी हैरान जहाँ हैं ||

किसे खबर है यहाँ जीव की |

शांति दूत अब बुद्ध कहाँ है |

कोई करता बात शांति की |

कोई बातों से विष घोले||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

लगते सभी खून के प्यासे |

सर्वनाश के  घिरे  कुहासे ||

धधक रही बदले की ज्वाला |

नेता  देते  झूठ  दिलासे ||

रंग  बदलते जैसे गिरगिट |

चंचल मन  जैसे है डोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

आँखों में अब नीर कहाँ है |

सबके मन अब धीर कहाँ है ||

टूट रहा विश्वास सभी का |

अब पहले से वीर कहाँ हैं ||

लादी  जैसे  अब  बेशर्मी |

कहता समय बनो मत भोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

युद्ध तेल को ताप रहा है |

असंतोष अब व्याप रहा है ||

मानव घातक शस्त्र बन रहा |

विकट तबाही  नाप रहा है ||

युद्धों  में  संतोष  खोजता |

दृश्य देख लगता है रो ले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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