स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२ ✍

ये बाढ़ / अनोखी है / अजब है

अछोर महत्वाकाँक्षाओं की

क्षुद्र स्वार्थी और

सर्वनाशी बाढ़

में

मनुष्य और प्रकृति

दोनों घिर गये हैं

गिर गये हैं

इरादे

आदमी के ।

हम / ढो रहे हैं

आजादी का दंभ

और आम आदमी

आज भी बेबस है, मजबूर है

चन्द्रमा भले पास आ गया हो

रोटी अभी भी दूर है

जाने कितने शिशुमन

दफन हो जाते है

किसी नदी के तट पर

या किसी स्कूल के अहाते में

बहुत कम जगह है

सुविधा के छाते में।

है

मेरे खाते में

जमा है

कुछ 

घुटने चलती यादें

और कुछ असफल फरियादें

क्या करेंगें आप

और क्या करूँगा मैं

संकटों / यादों और फरियादों का

सिलसिला

अशेष है, असमाप्त है,

कविता अमर है

कविता समाप्त

है।

✍

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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