श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कागज की पतंग”।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४६ ☆
☆ कागज की पतंग ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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पेड़ पर लटकी हुई है
एक काग़ज़ की पतंग।
डोर कच्ची थी
समय ने तोड़ दी
हवाओं ने दिशा
उसकी मोड़ दी
राह से भटकी हुई है
एक उच्छल सी उमंग।
उछलता बचपन
बजाता तालियाँ
हँसी फूलों सी
विचरती तितलियाँ
आस में अटकी हुई है
साँस भर उठती तरंग।
हौसले सबके
नचें इक डोर पर
होड़ बादल से
रुके सब छोर पर
जिंदगी बहकी हुई है
उम्र के उड़ते विहंग।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
२८.१.२६
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