सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मानव अब तो जाग. )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ ☆
☆ मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
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नभ से हर पल गिर रही, लपटें बनकर आग।
जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।
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दिनकर निकले भोर में, मोहक लगता रूप।
भरी दुपहरी में लगे, लपट बनी यह धूप।।
शहर सकल वीरान यह, मनुज रहे सब भाग।
जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।
०
सघन वनों को काट कर, बनते खूब मकान।
बढ़ता पारा देख अब, विकल हुए इंसान।।
सब जन मिलकर गा रहे, गहन तपन का राग।
जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।
०
बचना है यदि ताप से, जन-जन करे प्रयास।
तरुवर हर इक द्वार हो, हरी-भरी सी घास।।
रिम-झिम प्रभु बरसात कर, मिट जाए यह आग।
जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।
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© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”
झालरापाटन राजस्थान
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




