डॉ सत्येंद्र सिंह
(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “राम और कृष्ण एक ही हैं… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆
कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
राम नाम में श्याम बसे हैं,
श्याम में रघुनाथ।
मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,
दोनों मेरे साथ॥
कभी अयोध्या में राम बने वो,
कभी गोकुल के श्याम।
एक ने धनुष उठाया जग में,
एक ने बजाई बांसुरी मधुर नाम॥
रूप बदलकर आए जग में,
एक ही उनकी बात।
मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,
दोनों मेरे साथ॥
राम बने मर्यादा पुरुषोत्तम,
श्याम प्रेम अवतार।
एक ने रावण का संहार किया,
एक ने कंस संहार॥
धर्म की रक्षा करने वाले,
दोनों दीनानाथ।
मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,
दोनों मेरे साथ॥
सीता-राम की पावन महिमा,
राधे-श्याम का प्यार।
एक में त्याग और तपस्या,
एक में रस की धार॥
भक्तों के हित दोनों दौड़े,
पकड़ कर प्रेम का हाथ।
मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,
दोनों मेरे साथ॥
राम कहूँ या कृष्ण पुकारूँ,
दोनों सुनते पुकार।
नाम अलग पर ज्योति वही है,
एक ही पालनहार॥
सत्येंद्र मन हरि में रमे तो,
मिट जाएँ सब घात।
मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,
दोनों मेरे साथ॥
☆
© डॉ सत्येंद्र सिंह
सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046
मोबाइल : 99229 93647
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





