श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)
☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।
कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”
नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।
अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”
उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।
वह पलटा।
सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।
नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।
“पिहू… तुम?”
पिहू ने काँपते स्वर में कहा—
“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”
नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।
“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”
पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—
“मुझे विश्वास था।”
नीर ने पूछा—
“कैसे?”
पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—
“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”
कुछ पल दोनों मौन रहे।
फिर पिहू ने धीरे से पूछा—
“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”
नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—
“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”
“और अगर मैं चल भी न सकी?”
“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”
पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।
उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।
सूरज डूब चुका था।
नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।
और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बहुत उम्दा।