श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े।)

☆ हेमंत साहित्य # ६७ ☆

✍ बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे  

दिल ने कहा था

जिस दिन उमड़ेंगे बादल,

घिरेंगे घनघोर,

बरसेंगे झमाझम,

उसी दिन तलेंगे पकौड़े

और होगी चाय के साथ

कुछ जुगत, कुछ चुहल

और नई पुरानी यादों की जुगाली

 

बेसन, हरी मिर्च, धनिया, प्याज़, आलू

सभी को कर दिया ताकीद

कि

हो जाए मुस्तैद,

एक आवाज पर कटने

खौलते तेल में गिरने के लिए

 

बादल आए भी कई बार,

काले-काले,

रोबदार,

सूरज की रोशनी को कर गए गटक,

और माहौल बनाया ऐसा

कि बस अब बरसे

कि तब बरसे।

 

मैंने भी खिड़की से पूछा—

भाई साहब, शुरू करें?

बादल गरजे

हाँ… हाँ… अभी आते हैं।

और फिर…

हो गए लापता यूं

कि ढूंढो हमे, गर खाना है पकौडे

 

बारिश भी नेताओं से कम नही,

घोषणा जोरदार,

अमल नदारद!

पकौड़ों का सामान

मुँह ताकता रहा,

तेल बेचारा ठंडा पड़ा रहा,

और मेरा मन

बारिश की राह देखता रहा।

 

लेकिन आज

दिल और दिमाग—

दोनों की छुट्टी कर दी मैंने।

 

सोचा,

बारिश आए तो भी पकौड़े,

न आए तो भी पकौड़े!

आखिर पकौड़ों का

बारिश से क्या लेना-देना?

और तभी याद आई

हुकूमत में बैठे

उस नेता की वह

अमर अर्थव्यवस्था,

जिसमें नौकरी न मिले,

काम न मिले,

तो नौजवानों से कहा गया था

पकौड़े तलो!

 

तेल चढ़ाया,

बेसन घोला,

प्याज़ डाला,

आलू मिलाए,

हरी मिर्च ने थोड़ी बहादुरी दिखाई

और मैंने…

 

तल डाले पकौड़े.

 

आज पहली बार

उस महान दर्शन की

गहराई समझ में आई।

बारिश नहीं आई

कोई बात नहीं,

रोजगार, हाथ न आए

कोई बात नही

पकौड़े तलो और

कर लो जुगाड

लल्ला – लल्ली के दूध की

मेहरारू की बिंदी, टिक्की लाली की

 

आज तल लिये हैं पकौड़े मैंने

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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