मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – विरासत के गवाह…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
इमारतें और स्मारक
चाहे किसी शहर की हों
समेटे रहती हैं अतीत का
” बहुत कुछ “
बहुत कुछ यानि
वास्तुकला की भव्यता के संग
तत्कालीन गतिविधियां, प्रसंग, संस्मरण
स्मृतियाँ, और अतीत की तमाम धरोहर
जहाँ कभी रौनकें इतिहास बनाती थी
आज पुरातत्व के अवशेष के रूप में
मूक स्तंभों, दीवारों और मेहराबों में
खामोशी को दफ़्न किये हुए
आधुनिकीकरण की चक्की में पिसतीं
या नेस्तनाबूद होने की कगार पर खड़ीं
अपने गौरवशाली गुज़रे कल पर
सूखे आंसू बहातीं
” बहुत कुछ ” कहती-सुनतीं है
जो न हम, तुम और ” वो ” ( प्रशासन और जनप्रतिनिधि)
समझ सके कभी … !!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




