मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – फिर एक बार उसके शहर में…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
बहुत दिन बाद आया हूँ
उसके शहर में
उन्हीं गलियों और झरोखों को
धुंधली नज़रों से ताकता
किसी बुज़ुर्गाना चेहरे में
ढूढ़ता हूँ शक्ल तेरी
हां, शायद यही घर तो था
स्मृतियों पर ज़ोर डालते
गुज़र रहा था वहां से
तभी एक पुकार- सी पीछे से सुनाई दी
ठिठक गया, सुनिश्चित करने लगा कि
यह वहम था या हक़ीक़त
फिर अनमना-सा चल पड़ा
और चलता गया बहुत दूर
शहर के बाहर तक
वहाँ तक, जहाँ हर कोई बिछड़ा मिल ही जाता है
लेकिन सब़्ज़ घास के नर्म बिस्तर में सोता हुआ
चिरकालीन मौन धारण किये हुए …!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





