श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है हेमन्त बावनकर द्वारा लिखित  अभिमन्यु कौन?पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९१ ☆

☆ “अभिमन्यु कौन?” – लेखक – हेमन्त बावनकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – अभिमन्यु कौन?”

लेखक – हेमन्त बावनकर 

प्रकाशक – किताब राइटिंग पब्लिकेशन, मुंबई 

मूल्य – रु १४९ 

हेमन्त बावनकर का कथा-संग्रह ‘अभिमन्यु कौन?’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह पुस्तक मध्यमवर्गीय जीवन की यथार्थवादी चित्रण के साथ नैतिक मूल्यों को स्थापित करने वाली आठ कहानियों का संग्रह है। यह प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा की याद दिलाता है जहाँ सामाजिक विसंगतियाँ पात्रों के संवादों से उभरती हैं तथा सकारात्मक समाधान की ओर इशारा करती हैं।

हेमन्त बावनकर

संग्रह पारिवारिक अनुशासन, कार्यालयी चालबाजियाँ, दहेज-कानून का दुरुपयोग, सोशल मीडिया की विडंबनाएँ तथा अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को सरल भाषा में कहानियों में बुनता है।

‘शुभ विवाह’ में कठोर अनुशासनप्रिय पिता के माध्यम से मध्यमवर्गीय विवाह की आर्थिक बाधाएँ चित्रित हैं। रिश्तेदार त्रिपाठी से पैसों का बजट पूछते हुए पाठक का प्रश्न समाज की दहेज को लेकर धारणाओ को उजागर करता है। अंत में विधवा गायत्री के साथ मितव्ययी विवाह तथा संयुक्त फिक्स्ड डिपॉजिट का प्रस्ताव पिता की दूरदर्शिता प्रकट करता है। यह सब मुंशी प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ जैसी कहानी में भाईचारे की याद दिलाता है।

‘हाथी की सवारी’ कार्यालयीन खानापूर्ति का व्यंग्यपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती है। बड़े बाबू रमेश इंजीनियर के टूलकिट को छिपाकर कहते हैं कि यदि टूलकिट लाए हैं तो यहीं कहीं होगा। मैनेजर को “हाथी की सवारी” कहकर स्पष्टवादिता रेखांकित होती है। यह हरिशंकर परसाई की व्यंग्य परंपरा के समानांतर लगता है।

शीर्षक कहानी ‘अभिमन्यु कौन?’ में प्रोफेसर श्रीधर कुलकर्णी तथा पत्नी उषा जर्मनी पहुँचते ही पुत्र अरुण के गुप्त विवाह की सूचना पाते हैं। जर्मन पुत्रवधू मारिया के संस्कारपूर्ण व्यवहार से गिले-शिकवे मिट जाते हैं तथा पोते अभिमन्यु की घोषणा पारिवारिक एकता का प्रतीक बनती है। यह भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी ‘पिता’ जैसी भावुकता से युक्त वैश्विक भारतीयता को दर्शाती है।

संग्रह की संवाद-प्रधान शैली तथा सकारात्मक समाधान के साथ कहानी का समापन हिंदी कहानी के मान्य मूल्यों,  यथार्थवाद, सामाजिक सुधार तथा भावनात्मक गहराई को प्रतिबिंबित करते हैं। जो रचनात्मक साहित्य का मूल सिद्धांत है। प्रस्तावना में विजय तिवारी ‘किसलय’ तथा आमुख में शेर सिंह द्वारा सराही गई सार्थकता इस कथा संग्रह को चिंतनोद्दीपक बनाती है। कुल मिलाकर, यह संग्रह भावी पीढ़ियों के लिए धरोहर सिद्ध होगा, यह स्पष्ट है। कथाकार हेमंत जी ई अभिव्यक्ति के संस्थापक प्रधान संपादक हैं, वे नियमित विपुल  साहित्य पढ़ते और गम्भीर लेखन करते हैं, जो इस संग्रह की कहानियों में स्पष्ट दिखता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों न्यूयार्क में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Kundan Singh Parihar
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बावनकर जी को संग्रह की बधाई।