श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित  “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०४ ☆

☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’

लेखक : इंद्रजीत सिंह

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग

मूल्य : 330 रु

आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।

ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।

इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।

लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।

लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।

लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,

गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।

डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।

1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।

लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।

पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।

पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।

कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।

संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।

इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।

‘न भूतो न भविष्यति’

संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।

इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:

स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,

भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।

रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,

तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।

बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,

बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।

सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,

भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।

तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता

… विवेक रंजन श्रीवास्तव

आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।

मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”

डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक , कहानीकार , नाट्य लेखक ,समालोचक

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के हिंदी संपादक

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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