श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है किरण लता वैद्य ‘कठिन’ जी द्वारा लिखित “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०७ ☆
☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक .. खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)
लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’
प्रकाशक: माय बुक्स
मूल्य : २५० रु
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
खिड़की से झाँकता चेहरा समकालीन हिंदी कहानी की उस परंपरा का संग्रह है , जिसमें कथा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं, मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विडंबनाओं और जीवन मूल्यों को पाठक तक पहुँचाना है। इस संग्रह की कहानियाँ किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि जीवन के साधारण से दिखने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे असाधारण मानवीय अनुभवों को उजागर करती हैं।
लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल सामाजिक प्रश्नों को सहज और संप्रेषणीय भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
संग्रह की चौदह कहानियाँ रिश्तों, संघर्षों, स्त्री जीवन, सामाजिक असमानताओं और मानवीय करुणा के विविध रंगों को समेटती हैं।
संग्रह की पहली कहानी वीरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह कहानी अपराध, दंड और पुनर्वास जैसे गंभीर विषय को नवाचारी मानवीय दृष्टि से देखती है। एक किशोर की भूल उसके पूरे जीवन को अंधकार में धकेल सकती थी, किंतु कहानी स्थापित करती है कि मनुष्य को उसके एक अपराध से नहीं, बल्कि उसके परिवर्तन की स्वीकार्यता क्षमता से भी पहचाना जाना चाहिए। वीरा का तबला वादक के रूप में स्थापित होना केवल व्यक्तिगत सफलता की कथा नहीं, बल्कि समाज द्वारा दिए गए दूसरे अवसर की सार्थकता का प्रमाण है। कहानी में करुणा, आत्मग्लानि, संघर्ष और पुनर्जन्म की भावनाएँ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में लेखिका सफल हैं।
शीर्षक कहानी , खिड़की से झाँकता चेहरा संग्रह की प्रभावी मार्मिक रचनाओं में है। खिड़की यहाँ केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्त्री जीवन की सीमाओं और उसकी आकांक्षाओं का प्रतीक बन जाती है। कंचन का चरित्र उस भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो घर की चारदीवारी में कैद होकर भी बाहर की दुनिया को लालसा के साथ देखती है।
लेखिका बिना आक्रोश की भाषा के इस्तेमाल किए , स्त्री की मौन यातना को पाठक के मन तक पहुँचा देती हैं।
कृतज्ञ , कहानी मानवीय संबंधों में स्मृति और ऋण स्वीकार की दुर्लभ भावना को रेखांकित करती है। आज के स्वार्थ प्रधान समय में जब सफलता अक्सर व्यक्ति को उसकी जड़ों से दूर कर देती है, यह कहानी बताती है कि जीवन में आगे बढ़ने के बाद भी उन हाथों को याद रखना कितना आवश्यक है जिन्होंने कठिन समय में सहारा दिया था। कहानी का भावपक्ष अत्यंत सशक्त है और पाठक के भीतर मानवीय विश्वास को पुनर्जीवित करता है।
कथनी और करनी , वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कहानी है। थर्ड जेंडर के प्रश्न को केंद्र में रखकर लेखिका समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करती हैं जहाँ समानता की बातें तो बहुत की जाती हैं, किंतु व्यवहार में स्वीकार्यता का अभाव दिखाई देता है। कहानी अपने शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करती है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है।
संग्रह की शक्ति इसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता है। लेखिका ने जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखा, बल्कि उसके बीच उतरकर अनुभव किया है। इसलिए पात्र कृत्रिम नहीं लगते और घटनाएँ बनावटी प्रतीत नहीं होतीं।
भाषा सरल है, किंतु उसमें भावों की ऊष्मा बनी है। कहीं-कहीं कथानक आदर्शवादी मोड़ लेते हैं, फिर भी वे पाठक को अस्वाभाविक नहीं लगते क्योंकि उनके पीछे लेखिका का मानवीय विश्वास सक्रिय रहता है।
खिड़की से झाँकता चेहरा उन कहानी संग्रहों में है जिन्हें पढ़कर केवल कथाएँ याद नहीं रहतीं, बल्कि उनके पात्र मन में बस जाते हैं। यह संग्रह पाठक को निराशा के अंधेरे में भी आशा की किरण दिखाता है और यही इसकी साहित्यिक उपलब्धि है।
मानवीय मूल्यों, रिश्तों की गरिमा और सामाजिक संवेदना को केंद्र में रखने वाला यह संग्रह समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति है। मेरी शुभेच्छा लेखिका के साथ हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक, समालोचक)
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





