डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “फल धीरज का…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४०
कविता – फल धीरज का… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
दूजों के मामले में, टाँग मत अड़ाइये
पराये माल पे न आँख यूँ गड़ाइये
=2=
दिल है उसका भी,इंसान है वो भी
देख उसको त्यौरियाँ न यूँ चढ़ाइए
=3=
दूजों के मामले में दखल काए को देना
बनिये न ट्रम्प दूजों को न यूँ लड़ाइए
=4=
साँसों की चहलकदमी है जीवन का ये सफ़र
पाना है अगर मंज़िल, मत लडखड़ाइये
=5=
ज़ोरू के आगे ज़ोर से न बोलना कभी
सुविधा ये है कि नींद में बस बड़बड़ाइये
=6=
पूछ-परख ज्ञान की होती है हर तरफ़
जाइये मंचों को शिखर पर चढ़ाइये
=7=
इश्क़ के मकां में मेरे दिल के द्वार पर
नजाकत से कुंडी आप खड़खड़ाइये
=8=
आप हैं नगीना मेरा दिल है अँगूठी
इश्क़ का हसीन एक नग जड़ाइए
=9=
धीरज का फल है मीठा ‘राजेश’आप भी
इत्मीनान रखिये यूँ न हड़बड़ाइये
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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