श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कोल्हू का बैल”।)
जय प्रकाश के नवगीत # १५४ ☆
☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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निरंतर एक ही पथ पर
घूमता रहता है
आँखों पर बँधी होती है पट्टी
बस इसी आशा में
कि एक दिन निश्चित ही
पा जाऊँगा अपनी मंजिल
और नियति है जो घुमाती रहती है
आदमी भी घूमता रहता है
अपने द्वारा रचे गए चक्रव्यूह में
अभिमन्यु की जिसे
घुसना तो आता था चक्रव्यूह में
निकलना नहीं सीखा था
इसलिए मारा गया
मनुष्य भी कोल्हू का बैल
और अभिमन्यु की तरह ही
अपने आपको बेबस और लाचार
पाकर अभिशप्त है मरने को
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
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