आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८९ ☆
☆ सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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जी लिए लम्हे
विवश हो
जिंदगी गिरवी रखी।
आबे जमजम
चाहते थे
जहर की बूँदें चखी।।
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सात जन्मों के लिए
हों साथ हम
वादा किया।
चंद दिन में जुदा हो,
बतला उसे
जुमला दिया।
कह रहा मन चा
हिए तन नवल नूतन
नित सखी।
जी लिए लम्हे
विवश हो
जिंदगी गिरवी रखी।
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कह रहा काक्रोच
पीड़ित को
अकड़ काजी जहाँ।
कहो कैसे राहतें
पाए दलित-पीड़ित वहाँ।
अशिक्षा ने भूख सह
शिक्षा गही
अब है दुखी।
जी लिए लम्हे
विवश हो
जिंदगी गिरवी रखी।
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देश-हित को गौड़,
दल-हित को
प्रथम माना सदा।
अहंकारी वृत्ति
पद-मद, खुदी पर
खुद हैं फिदा।
लड़ पड़ोसी से
परेशां रात-दिन
मिथ्या मुखी।
जी लिए लम्हे
विवश हो
जिंदगी गिरवी रखी।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१९.११.२०२५
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