श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपके “कुछ दोहे” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १५६ ☆
☆ कुछ दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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सावन रिमझिम लिख रहा, बूँदों का दीवान।
खेत सरोवर बन गए, डूबे सभी मचान।।
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नदी उठाए घाघरा, पहुँची चढ़कर घाट।
बाढ़ बहा कर ले गई, घर की जूनी खाट।।
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आँगन को दिखला रही, छानी घायल पाँव ।
छप्पर के नीचे छिपा, बैठा बेबस गाँव।।
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जलधर वारधि मेघ घन, सब बादल के रूप ।
वारिश से भरते सभी, नदिया सरवर कूप।।
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बादल बैठा मेड़ पर, देह उघारे खेत।
बूँद बूँद की आस में, नदी हो गई रेत ।।
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विरही मन की पीर को, हरो मेघ बन दूत।
रातें जोगन हो गईं, दिन हो गए भभूत ।।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
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