श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा रह जाना…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३७ ☆
कविता – तेरा रह जाना… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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हर रंग धूमिल पड़ जाते हैं,
ताजा से बदल, फीके पड़ जाते हैं…
हर पल बदल कर, बीता हुआ बन जाता है…
हर सांस…. जीवन कम कर जाता है,
बूंद बूंद टपक कर सागर रीता जाता है…
सुबह हुई और सांझ ढली,
दिन यूं ही ढलता जाता है…
मनुज रूप का जीवन दुर्लभ,
बेकार ही बीता जाता है…
उठ जाग मुसाफिर.. अब तो गुन ले,
तू रह जाए” याद” वह राह पकड़ ले !!!!!,
कुछ ऐसे रंग भी होते हैं,
जो कभी ना फीके पड़ते हैं…
मेहनत कह लो, भक्ति कह लो,
ज्ञान कहो या दान ही कह लो…
परहित को जीवन आनंद बना लें,
दूजे होठों को मुस्कान थमा दें…
त्याग करें स्वार्थ का और सद्गुण को व्यवहार बना लें,
निश्चित फिर ये हो पाएगा,
अनंत काल तक रह जाएगा…
चला जाएगा… फिर भी तू “रह जाएगा”
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





