सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – क्रंदन…।
रचना संसार # १०९
☆ गीत – क्रंदन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
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शूलों की क्यों करते खेती,
होती निशदिन ही अनबन।
घर रण का मैदान बना अब,
गूँज रहा नभ में क्रंदन।।
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धन-दौलत की चाह बुरी यह,
आज कहाँ हमको लाई।
हुआ मरूथल है ये जीवन,
सूखी घर की अँगनाई।।
भोगें फल अपनी करनी का,
बना शिला यह कोमल तन।
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विपदाओं के इस जमघट में,
चैन जगत् भी खोता है।
नीयत में भी खोट छिपा है,
प्यासा पनघट रोता है।।
रुकने को भी ठाँव कहाँ अब,
ताप बढ़ा है भारी मन।
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बाँहों में जो साँप पले थे,
उनको दूध पिलाया है।
मारा था उसने ही ख़ंजर,
जिससे हाथ मिलाया है।।
कंटक के पादप को सींचा,
पुष्ष खिलें कैसे उपवन।
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आशाऐं सब धूल मिलीं हैं,
हँसने पर पाबंदी है।
पिस जाता है घुन गेहूँ सँग,
बाजारों में मंदी है।।
ओढ़ मुखौटे चालें चलती,
नित कौरव की यह पलटन।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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