सुश्री निर्देश निधि

आज प्रस्तुत है हिंदी साहित्य की सशक्त युवा हस्ताक्षर सुश्री निर्देश निधि  जी की एक और कालजयी रचना  “नदी नीलकंठ नहीं होती”।  मैं निःशब्द हूँ और स्तब्ध भी हूँ। इस रचना को तो सामयिक भी नहीं कह सकता। सुश्री निर्देश निधि जी की रचनाओं के सन्दर्भ में कुछ लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। उनके एक-एक शब्द इतना कुछ कह जाते हैं कि मेरी लेखनी थम जाती है। आदरणीया की लेखनी को सादर नमन।

ऐसी कालजयी रचना को हमारे विश्वभर के पाठकों  तक पहुंचाने के लिए हम आदरणीय  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के सहयोग के लिए ह्रदय से आभारी हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी न केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रवीण हैं, बल्कि उर्दू और संस्कृत में भी अच्छा-खासा दखल रखते हैं. उन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए इस कालजयी रचना का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध कराया है जिसे आज के अंक में आप निम्न लिंक पर भी पढ़ सकते हैं। )

आप सुश्री निर्देश निधि जी की अन्य  कालजयी रचनाएँ निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं :

  1. सुनो स्त्रियों
  2. महानगर की काया पर चाँद
  3. शेष विहार 

☆ नदी नीलकंठ नहीं होती ☆

 

नदी नीलकंठ नहीं होती

कभी वह थी चंचला नदी,

और मैं बेलगाम अरमानों वाली अल्हड़,

मैं उसके पावन जल का आचमन करती

सब तृष्णाओं, कुंठाओं को सिराती उसकी उद्दाम उर्मियों में

खड़ी थी उसके दाहिने किनारे पर

बनकर सतर चट्टान

मैं खुश थी, नदी के किनारे की चट्टान होकर

एक दिन तुम आए और

मेरी देह का परिरम्भ कर, लांघ गए सब सीमाएं

तुम्हारा वह गंदला स्पर्श,

भाया नहीं था मुझे

मैं झर गई थी पल में, कण – कण रेत सी

जा पसरी थी नदी की सूनी छाती पर

तब जानी थी मैं कि नदी,

नहीं थी सिर्फ बहता पानी

वह तो थी इतिहास लिपिबद्ध करती निपुण इतिहासकार,

संस्कृतियां रचकर, परम्पराएं सहेजती जिम्मेदार पुरखिन,

अपनी मर्ज़ी से रास्ते बदलती सशक्त आधुनिका भी थी वह

और थी धरती का भूगोल साधती साधक

वह तो थी सदेह रचयिता ममतामयी माँ,

तभी तो जानी थी मैंने पीड़ा नदी की

उसकी देह से कोख, अंतड़ियों और दिल के साथ

निकाल ली थी तुमने मास – मज्जा तक उसकी

कई बार महसूस की थीं मैंने उसकी सिसकिया अट्टालिकाओं में

देखी थी कई बार मैंने

सड़कों की भीतरी सतह में आँसू बहाती, वह नदी

वह बिखर जाना चाहती थी होकर कण – कण

ठीक मेरी तरह

बचकर तुम्हारे गंदले स्पर्शों से

पर जाती किधर, समाती कहाँ ?

उसके पास नहीं थी कोई नदी, खुद उसके जैसी

मैं उसकी सूनी छाती पर निढाल पड़ी

चुपचाप देखती उसके मुंह पर मैला कपड़ा रख

उसकी नाक का दबाया जाना

देखती उसका तड़पना एक – एक सांस के लिए

मेरे कण – कण रेत हो जाने से

कहीं दुखकर थी उसकी वह तड़पन

नदी, जो सदियों छलकती रही थी किनारों से

पर इस सदी, शेष थीं बस चंद सांसें उसमें

दुर्गंध भरी, हाँफती, अंतिम, चंद सांसें

मैंने कितनी मिन्नतें की थीं तुमसे

भर दो कुछ सांस उसके सीने में

अपने अधर रखकर उसके अधरों पर

लौटा दो उसकी सकल सम्पदा

जो बलात छीन ली थी तुमने

जो चाहो मेरे कणों तक का शेष रह जाना

तो खींच लो सिंगियां लगाकर

उसकी देह में फैला, सारा का सारा विष

सुनो,

नदी जी नहीं सकती विष पीकर

क्योंकि,

नदी नीलकंठ नहीं होती

नदी शिव नहीं होती ।

 

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – [email protected]

image_print
0 0 votes
Article Rating

Please share your Post !

Shares
Subscribe
Notify of
guest

4 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
अरुण कुमार डनायक

नारी की मनोदशा पर अच्छी अभिव्यक्ति। सही है नदी और नारी एक ही है। पृकृति का स्वरुप है जिसे पुरुष रुपी समाज पुरातन काल से शोषित कर रहा है। अब तो नदी को खरोंच खरोंच कर नष्ट भ्रष्ट किया जा रहा है।

Nirdesh Nidhi

हार्दिक आभार आपका अरुण जी

Animesh shrivastava

अद्भुत ???

Mukta Mukta

संवेदनाओं को झकझोरती,कटु यथार्थ का दिग्दर्शन कराती बहुत उम्दा कविता।