श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पहरुए ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

अब उनको समझाना क्या है

सब जाना, अनजाना क्या है।

 *

घोर अराजकता का दलदल

इसमें भला ठिकाना क्या है ।

 *

वो चलता है चालें टेढ़ी

बचना और बचाना क्या है।

 *

अरे पहरुए जागो भाई

हाथ मले पछताना क्या है।

 *

जीवन रिसता एक घड़ा सा

उम्र का ताना-बाना क्या है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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