श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री सुमति कुमार जैन जी द्वारा संपादित पुस्तक – “लघु की विराटताकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक- लघु की विराटता

संपादक-  सुमति कुमार जैन

प्रकाशक- दीपज्योति ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन, महावीर मार्ग, अलवर- 301001 (राज) मोबाइल नंबर 94148 93120

पृष्ठ संख्या- 444

मूल्य- 500

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ लघु की विराटता को दर्शाती पुस्तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

लघु में कथा समेटे हो वह लघुकथा होती है। इसमें निदान होता है। समस्या के समाधान से दूर रहती है। बस ! अपने में एक तीक्ष्णता और व्यंग्यता को समाए रखती है। प्रारंभ में इसे लघु कथा कहा जाता था। इस मायने में भारतेंदु हरिश्चंद्र को लघुकथा का जनक माना जाता है। इन्होंने इसी पैमाने पर खरी उतरने वाली लघुकथाएं लिखी थी।

इसके पश्चात कई रचनाकारों ने इसे पुष्पित व पल्लवित किया है। इसमें मुख्य रूप से प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, वजाहत, जगदीश कश्यप, विष्णु नागर, यशपाल, चंद्रभान शर्मा गुलेरी, राजेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, सतीशराज पुष्करणा सहित अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इसे विकसित व स्थापित किया है।

वहीं वर्तमान में अनेक रचनाकार इसे गति प्रदान कर रहे हैं। ये नवोदित रचनाकारों को प्रशिक्षित करते हुए अपने रचनाकर्म में भी लिप्त हैं। इनमें मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, रूप देवगुण, राजकुमार निजात, अनिल शूर आजाद, रामकुमार घोटड़, मधुकांत, अशोक भाटिया, अशोक जैन, बलराम, सतीश दुबे  सुभाष नीरव, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा, संतोष सुपेकर, कांताराय, चंद्रेश कुमार छतलानी आदि अनेक नामों को प्रमुखता से लिया जा सकता है।

लघुकथा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं और संकलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्तुत समीक्ष्य लघुकथा संकलन- लघुकथा की विराटता, उसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। इसका संपादन- जगमग दीप ज्योति, मासिक पत्रिका के संपादक सुमति कुमार जैन ने किया है। जो अनेक वर्षों से संपादनकर्म में संलग्न है।

प्रस्तुत संकलन में लघुकथा की विराटता को रचनाओं की गुणवत्ता में समेटने का प्रयास किया गया हैं। इसमें अनेक लघुकथाएं प्रतिष्ठित रचनाकारों की सम्मिलित की गई है। लघुकथा के चमकते नामों में से प्रमुख- कमल चोपड़ा, माधव नागदा, मधुकांत, पूरणसिंह,  प्रबोधकुमार गोविल, राजकुमार निजात, रामकुमार घोटड़, रामचरण यादव, रमेश मनोहरा, रामेश्वर कांबोज, रामरतन यादव, रूप देवगुण, शराफत अली खान, मुकेश साहनी, त्रिलोकसिंह ठकुरेला सहित अनेक लघुकथाकारों को इसमें सम्मिलित किया गया है।

इसके अलावा इस पुस्तक में कई नवोदितों को स्थान देकर प्रोत्साहित किया गया है। मगर, इसी के साथ ही संपादक ने रचनाधर्मिता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। इस प्राथमिकता के आधार पर जनजीवन के संघर्ष, उसके यथार्थ स्वरूप और उत्थान-पतन पर प्रश्नचिन्ह लगाती कथाओं को प्राथमिकता के साथ सम्मिलित किया है।

चार सौ छिय्यासी पृष्ठों के इस विराट संकलन में कुल मिलाकर एक सौ दस रचनाकारों की लघुकथाएं संकलित की गई है। मुख्य पृष्ठ इसकी सांकेतिकता को प्रदर्शित करता है। साज-सज्जा व छपाई उत्तम है । पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य वाजिब है। साथ ही सभी लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी है। इस संकलन का लघुकथा के क्षेत्र में हार्दिक स्वागत किया जाएगा। ऐसा समीक्षक का विश्वास है।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

24-09-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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