श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई...”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३० ☆
☆ बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(समांत—- पदांत -आना, मात्रा भार-16, (चौपाई छंद))
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सोते को है सरल जगाना।
पर जगते को कठिन उठाना।।
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जीवन दाँव लगाया फिर भी।
मात-पिता का लुटा खजाना।।
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बरगद बनकर छाँव बनाई।
चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।
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उँगली थामे बड़े हुए पर।
सबल पैर का नहीं ठिकाना।।
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उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।
पर मुखड़े को है हर्षाना ।।
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प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।
कैसा आया नया जमाना।।
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संस्कृति और सभ्यता रूठी।
जागो मानव क्यों पछताना।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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