मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – प्रारब्ध…! ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

प्रारब्ध को लेकर

व्यथित क्या होना,

चिंतित क्यों होना

मेरा “आज” मेरी मुट्ठी में है,

यही बहुत है

माथे की लकीरों को

मैं मेहनत के पसीने से और

हाथ की लकीरों को,

श्रम से मिले छालों से

स्थानापन्न करूँगा

भटकाव का रास्ता नहीं चुनना है मुझे

मैं किसी भ्रम में नहीं हूँ

मैं अपने कर्मों पर संकल्पित हूँ,

अपनी भूमिका के निर्वहन के प्रति

जो प्रारब्ध था ,

जो भाग्य की लिखावट रहा

मैने ताक पर रख दिया है

प्रयासों की अमिट स्याही से,

“वर्तमान” को गढ़ना सीखा है

मुझे अडिग विश्वास है

यह सीख मुझे,

जीवन की वैतरणी को,

इस महासागर को

सहज ही पार करा देगी…!!!!!

(प्रारब्ध = भाग्य, नियति,पूर्व के कर्मों का फल)

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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