सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २९ ☆
आलेख – परशुराम जी – ५ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
साधना के मार्ग
ग)- कर्म योग:-कर्म योग बिना किसी स्वार्थ के, परिणाम की चिंता किये बिना अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना सिखाता हैl फिर हम उसमे सफल हो या असफलl इस बात की चिंता किये बगैर अपने कर्मो को पूरा करना होता हैl अर्थात अपना प्रत्येक काम उस प्रभु की आज्ञा समझ कर करना होता हैl एसा करने से अहं की समाप्ति हो जाती हैl
घ) ध्यान योग:- ध्यान योग हमें अपने मन को इस मिथ्या रूपी संसार से हटाकर स्वमुखी होना सिखाता हैl स्व से परिचय करना सिखाता हैl इस तरह मन को एकाग्रचित करने में ये बहुत सहायक होता हैl मैं आत्मा हूँ इसका सतत स्मरण रखना, कार्य में कुशल होना और मन स्थिर रखकर उस परमसत्ता से एकाकार होने में मदद करता हैl इस तरह हम अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करते हैंl अपने मन को अपने आपे में रख सकते हैंl
च) तांत्रिक साधना:- यह मार्ग पूर्ण रूप से अपने गुरु पर केंद्रित होता हैl इस साधना का मार्ग बहुत पुराना है, बहुत रहस्यमई है और बहुत ही गहन हैl इस साधना में चेतना और ऊर्जा अर्थात शिव और शक्ति के मिलन को प्राधान्य दिया जाता हैl इस साधना के दो मार्ग हैंl 1- दक्षिण मार्ग 2- वाम मार्ग
1) दक्षिण मार्ग:- दक्षिण मार्ग के साधक पूर्णतः सात्विक होते हैंl इस मार्ग में मंत्र, यंत्र, ध्यान, योग एवं अपने शरीर के अंदर के चक्रो द्वारा कुंडलिनी को जागृत करने की पूर्णतः कोशिश होती हैl
2) वाम मार्ग:- वाम मार्ग की साधना अत्यंत कठिन साधना होती हैl इसमें साधक पंचमकार वाली बाह्य क्रियाओं के साथ अपनी इन्द्रियों को, उनसे उत्पन्न हुई वासनाओं को अपने वश में करता हैl ये साधना सिर्फ या तो सुनसान जगह या स्मशानो में की जाती है क्यूंकि इसे करने से पहले साधक को स्वयं के तन और मन पर नियंत्रण रखना जरूरी होता हैl
इस तंत्र साधना को करने के भी चार चरण हैंl
1-ज्ञान, 2-चर्या, 3- क्रिया, 4- योग
1) ज्ञान:- इसके अनुसार जो जड़ है वह शिव हैl जो क्रियाशील है या जो ऊर्जा है वह शक्ति हैl अहं के कारण मानव अपना असली स्वरूप कि मैं आत्मा हूँ इसे भूल जाता है और वह माया के पाश में बंधता चला जाता हैl इसी माया के पाश से निकलने साधक को सतत स्मरण कराया जाता है कि वह शिव का अंश हैl साथ ही गुरु की दीक्षा प्राप्त करना जरूरी होता हैl
2) चर्या:- चर्या अर्थात दैनिक जीवन का अनुशासनl . प्रतिदिन स्नान करना, धुले वस्त्र पहनना एवं सात्विक भोजन गृहण करनाl अपने गुरु की आज्ञा का बिना संशय पालन करनाl अपने षडरिपु अर्थात काम, क्रोध, मोह, माया, मत्सर को अपने नियंत्रण में रखनाl इसमें पूजा एक निश्चित समय, निश्चित स्थान पर ही की जाती हैl पूजा से पहले धूप, दिया और मंत्रो के उच्चारण से उस स्थान का शुद्धिकरण किया जाता हैl
3) क्रिया:- क्रिया द्वारा अदृश्य शक्तियों को जागृत किया जाता है एवं उनपर नियंत्रण भी किया जाता हैl यंत्र बनाकर मंत्र उच्चारण क्रिया में करते हैंl क्रिया में जो यन्त्र बनाया जाता है उसकी अलग आकृति होती है जिसे अपने गुरु की फोटो के पास रखा जाता है और उसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती हैl जब साधक साधना के लिये बैठता है उससे पूर्व वह मंत्रो द्वारा और हाथों की भिन्न भिन्न मुद्राओं द्वारा अपने शरीर को तैयार करता हैl तत्पश्चात् हवन करके वह साधना में बैठता हैl
4) योग:- योग अर्थात जोड़, योग अर्थात मिलनl इस साधना में कुंडलिनी जागृत की जाती हैl मंत्र उच्चारण से जो ध्वनि उत्पन्न होती है जो अनहद नाद उत्पन्न करने में मदद करती हैl
ध्यान:- ध्यान से मन को एकाग्र करने में मदद होती हैl जिससे मन शांत होता हैl विचारों के प्रति सजगता आती हैl ध्यान हमारे मन को, हमारे विचारों को इधर उधर दौड़ने से बचाता हैl यह वैज्ञानिक प्रक्रिया हैl हमारे मन से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मकता उसकी जगह ले लेती हैl
ध्यान के प्रकार:-
1) सचेतन ध्यान:- इसमें साधक ध्यान में बैठने से पहले सजकता जरूर रखता हैl साधक को साधना में बैठने पर अपने आसपास के सारे आवाजों के प्रति सजग होना होता है, अपने सांसों के प्रति सजग होना होता हैl शरीर की हलचल के प्रति भी सजग होना होता हैl
2) एकाग्र ध्यान:- इस ध्यान में साधक अपने विचारों को, अपने शरीर में हो रही हलचल को एक बिंदु पर लाकर एकाग्र करता हैl ध्यान एकाग्र करने हेतु कुछ साधक जलती हुई मोमबत्ती की लौ पर ध्यान एकाग्र करते हैंl
3) मंत्र ध्यान:- मंत्र उच्चारण द्वारा साधक अपनी साधना करता हैl मंत्र उच्चारण द्वारा एक ध्वनि उत्पन्न होती है और वही ध्वनि मन को साधना करने में सहायक होती हैl
4) विपशयना:- इस ध्यान प्रक्रिया में साधक अपने शरीर के किसी हिस्से में हो रहे दर्द के प्रति सजग रहता हैl यह ध्यान की सबसे पुरानी विधा हैl इस साधना में साधक को मौन रखना होता हैl मन को सांसों पर केंद्रित करना होता हैl शरीर में हो रही हलचलों के प्रति समभाव रखना जरूरी होता हैl
5) योग निद्रा:- इसमें साधक अपने शरीर के हर अंग पर मन को ले जाता है और उसे आराम करवाता हैl यह साधना साधक अपने गुरु की बातों को ध्यान से सुनकर करता हैl इस साधना का नाम योग निद्रा है पर वास्तविकता में साधक सोता नहीं हैl
6) मेट्टा ध्यान:- इसे अनुकम्पा ध्यान के नाम से भी जाना जाता हैl इस ध्यान मे साधक अपने साथ साथ दूसरों के लिये भी दया, करुणा, प्रेम की भावना मन मे रखता हैl इस ध्यान मे साधक ब्रम्हाण्ड के हर प्राणी, चेतन, अचेतन के लिये मंगल भावना की कामना करता हैl
7) सगुण ध्यान:- इस ध्यान मे साधक अपने ईष्ट के रूप को उनके गुणों को ध्यान मे रख साधना करता हैl
8) निर्गुण ध्यान:- इस ध्यान मे साधक निराकार रूप पर मन केंद्रित कर साधना करता हैl इसमें साधक स्व अर्थात आत्मा पर ध्यान केंद्रित करता हैl वह अहं ब्रम्हास्मी इस मंत्र पर ध्यान केंद्रित करता हैl
– क्रमशः
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






