हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 28 – व्यंग्य – टेलीफोन के कुछ खास फायदे ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं।  कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है.  आज का व्यंग्य  है  टेलीफोन के कुछ खास फायदे।  टेलीफोन के कुछ ख़ास फायदे तो आपको भी मालूम हैं किन्तु, डॉ परिहार जी की भेदी दृष्टी ने जो कुछ देखा और शोध किया है उससे आपको निश्चित ही ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा जिसकी कल्पना मात्र से आपके होश उड़ जायेंगे । ऐसे सार्थक व्यंग्य के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को नमन। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 28 ☆

☆ व्यंग्य – टेलीफोन के कुछ खास फायदे ☆

इस बात से भला कौन इनकार करेगा कि टेलीफोन आज के ज़माने की नेमत है। आदमी दुनिया में कहीं भी बैठा हो,तत्काल बात हो जाती है। यह आज के युग का चमत्कार है।

लेकिन टेलीफोन के जो फायदे अमूमन सबको दिखाई पड़ते हैं उनके अलावा भी कुछ फायदे हैं जिनको मेरी भेदी दृष्टि ने पकड़ा है।

टेलीफोन आज इसलिए वरदान है क्योंकि आज आदमी आदमी का मुँह नहीं देखना चाहता। अब आपसे सटा हुआ पड़ोसी भी आपसे टेलीफोन पर बात करता है। शहरों में यह हाल है कि पड़ोसी पड़ोसी को न पहचानता है, न पहचानना चाहता है। बाहर कहीं पार्टी वार्टी में मिल जाएं तभी परिचय होता है। पड़ोसी को कोई पीटे या लूटे तो संभ्रान्त जन खिड़की नहीं खोलते। ऐसे में जब पड़ोसी की सूरत देखना गवारा न हो तो मजबूरन बात करने के लिए टेलीफोन से बेहतर क्या हो सकता है?बात भी हो जाए और मनहूस सूरत भी न देखना पड़े।

पहले आदमी की तबियत ऐसी थी कि आसपास आदमियों को देखे बिना कल नहीं पड़ती थी। किसी के भी घर कभी भी पहुँच गये—‘मियाँ, क्या हो रहा है?’ मेरे एक मित्र के पिताजी के दोस्त उनके घर पंद्रह बीस साल तक लगातार  नाश्ता करने आते रहे और किसी को कभी कुछ अटपटा नहीं लगा। नाश्ता करने के बाद वे इत्मीनान से अखबार पढ़कर विदा होते थे। ऐसे लोगों को टेलीफोन की दरकार नहीं थी। अब हालत यह है कि घर में कोई दो दिन रुक जाए तो घर की चूलें हिलने लगती हैं। इसलिए संबंध रखने के लिए टेलीफोन ही भला।

टेलीफोन से दूसरा फायदा यह है कि अब दूसरे के घर पहुँचने पर होने वाली अड़चनों से बचा जा सकता है। किसी के घर पहुँच जाओ तो उसे लोकलाज के लिए चाय वाय के लिए पूछना पड़ता है। अ  जैसे जैसे रिश्ते दुबले हो रहे हैं, चाय पिलाना फालतू काम बन रहा है।चाय पिलाने के भी तरह तरह के नमूने देखने को मिलते हैं, जैसे एक जगह सुनने को मिला, ‘हमने अभी अभी चाय पी है, आप पियें तो बनवा दें।’ दूसरी जगह सुना, ‘हम तो चाय पीते नहीं, आप कहें तो आपके लिए बनवा दें।’ एक जगह ऐसा हुआ कि एक घंटे तक कोरे पानी पर वार्तालाप चलने के बाद जब उठने लगे तब गृहस्वामी ने फरमाया, ‘अरे आपको चाय वाय के लिए तो पूछा ही नहीं, थोड़ा और बैठिए न।’ ऐसे रिश्तों के लिए टेलीफोन बढ़िया संकटमोचन है।

टेलीफोन का एक बड़ा फायदा यह है कि वह हमें मेज़बान के कुत्तों से बचाता है, जो मेहमानों के स्वागत के लिए हमेशा आतुर रहते हैं। कई घरों में घंटी बजाने पर आदमी से पहले कुत्ता जवाब देता है।गेट खुला हो तो कुत्ते का मधुर स्वर दिल की धड़कनें बढ़ा देता है।भीतर बैठिए तो वह पूरे समय सूँघता हुआ आसपास घूमता रहेगा और मेहमान का पूरा वक्त टाँगें सिकोड़ते और पहलू बदलते ही जाता है। इसीलिए बहुत से लोग किसी घर में घुसने से पहले भयभीत स्वर में आसपास के लोगों से पूछते देखे जाते हैं—–‘घर में कुत्ता तो नहीं है?’

अब गाँव में भी टेलीफोन पहुँच गया। गाँव में टेलीफोन सस्ता पड़ता है, इसलिए सब खाते-पीते घरों में टेलीफोन मिल जाएगा। इससे नुकसान यह हुआ कि गाँव में जो मिलना जुलना होता रहता था वह कम हो गया।वहाँ टेलीफोन का उपयोग ऐसे कामों के लिए होता है जैसे, ‘आम का अचार हो तो थोड़ा सा भेज देना’ या ‘तीन चार टमाटर पड़े हों तो भेज देना, शाम को खेत से मँगवा लेंगे।’

टेलीफोन और दृष्टियों से भी उपयोगी है।आज हैसियत वाले घरों में कार खरीदने की होड़ मची है, भले ही वह महीने में एक ही बार चले। कार खरीदने के बाद उसकी सुरक्षा में नींद हराम होती है। कार खरीदने के बाद याद आता है कि उसे रखने के लिए घर में माकूल जगह नहीं है। ऐसे में आधी रात को थाने में फोन बजता है, ‘पुलिस स्टेशन से बोल रहे हैं?’

उधर से अलसायी आवाज़ आती है, ‘हाँ जी, फरमाइए।’

जवाब मिलता है, ‘देखिए जी, हमारे घर की चारदीवारी फाँदकर तीन चार लोग अन्दर आकर कार के पहिये खोल रहे हैं। फौरन आ जाइए। हम खिड़की से उन पर नज़र रखे हैं।’

दस मिनट बाद फिर फोन बजता है, ‘भाई साब, उन्होंने दो पहिये खोल लिये। आप कब आओगे?’

जवाब मिलता है, ‘आपने पता तो बताया नहीं। कहाँ पहुँचें?’

फोन करनेवाला पता बताता है।पुलिसवाले सलाह देते हैं, ‘आप फोन पर हमसे जोर जोर से बोलिए।वे सुनकर भाग जाएंगे।’

जवाब मिलता है, ‘हम तो जोर से ही बोल रहे हैं, लेकिन वे तो अपने काम में लगे हैं।उन पर कोई असर नहीं हो रहा है।’

थोड़ी देर में थाने में फिर फोन बजता है, ‘भाई साहब, आप आये नहीं?वे चारों पहिये लेकर भाग गये।’

जवाब मिलता है, ‘अब भाग ही गये तो हम आधी रात को भटक कर क्या करेंगे?सबेरे आकर रिपोर्ट लिखा देना।’

इस तरह  बदलते समय में टेलीफोन के नये नये फायदे उजागर हो रहे हैं।इस सिलसिले में और इजाफा होने की पूरी संभावना है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य ☆ कविता ☆ बेटी के नाम पिता की पाती ☆ डॉ. राकेश ‘चक्र’

डॉ. राकेश ‘चक्र’

 

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक लाख पचास हजार के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’आज प्रस्तुत हैं  उनकी एक भावप्रवण एवं संदेशात्मक कविता  “बेटी के नाम पिता की पाती”.)

☆  बेटी के नाम पिता की पाती ☆ 

 

बेटी

मैं तुम्हें नहीं बनाना चाहता

चाँद की तरह

बल्कि बनाना चाहता हूँ तुम्हें

सूर्य-सा

ताकि कुदृष्टि डालनेवालों की

झुक जाएँ नजरें

झुलस जाए चेहरा

 

मैंने नहीं है किया

तुम्हारा कन्यादान

दान तो किसी वस्तु

को है दिया जाता

तुम नहीं हो वस्तु

बल्कि हो मेरे ह्रदय

का एक अंश

मैं तोड़ रहा हूँ भ्रम

बल्कि है दिया मैंने

प्यार से उपहार में

प्रेम के बंधन में

बैठाया है चंदन की डोली में

अपना पूरा जीवन अर्पण

समर्पण करके

ताकि तुम जी सको

खुशियों से

युगों-युगों तक

 

निभाती रहना सम्बन्धों को

सहजता

और शांति से

अब हैं तुम्हारे दो घर

एक पति का

दूसरा पिता का

जिसका दरवाजा सदा खुला रहेगा

जब चाहे

तब आना-जाना

बेरोकटोक

 

असहाय

बेचारी

और अबला

समझने की भूल से भी भूल न करना

तुम जीना अन्नपूर्णा बनकर

शक्ति दुर्गा सीता बनकर

न उदास होना

न घुट-घुट के जीना

सबको अपना बनाना

प्यार बरसाना

हँसना-मुस्कराना

 

मुस्कराना भी

जैसे फूल हैं मुस्कराएते

गुनगुना भी

जैसे भौंरे हैं गुनगुनाते

हमेशा खड़ा रहेगा

तुम्हारा पिता

छाँव और

दीवार बनकर अंतिम श्वांसों तक

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी,  शिवपुरी, मुरादाबाद 244001, उ.प्र .

मोबाईल –9456201857, e-mail –  rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 2 ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

 

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

 

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 2 – सुहागरात ☆

(आपने अब तक पढ़ा – जन्म लेने के बाद सोलहवां बसंत आते आते पगली का विवाह हो गया, पगली की डोली  ससुराल की तरफ बढ़ चली।  अब आगे पढ़े——–)

जब पगली की डोली मायके से चली तो वह कल्पना लोक के  सतरंगी इन्द्रधनुषी संसार में खोई हुई थी। जहाँ एक तरफ घर गाँव माँ-बाप का साथ छूटने की पीड़ा थी तो दूसरी तरफ ससुराल में नवजीवन के सुखों की कल्पना उसके मन के किसी कोने से झांक रही थी। लेकिन उसने अपने भविष्य की कोई कल्पना नही की थी कि भविष्य के गर्भ में पल रहा दुर्भाग्य रूपी अजगर उसकी खुशियाँ लीलने की ताक में बैठा है। उसकी डोली सर्पीली पगडंडियों से होती हुई ससुराल पहुँच कर गाँव के बाहर बने एक मंदिर परिसर में जा कर रूक गई थी। और उस परिसर के अगल बगल छोटे छोटे बच्चे-बच्चियाँ नई नवेली दूल्हन देखने की चाह में डोली के आसपास मंडरा रहे थे। नई दूल्हन का चेहरा देखने की चाह दिल में मचल रही थी।

कभी कभी कोई बच्चा या बच्ची शरारतवश डोली का पर्दा हटाता तो पगली शर्मो हया  से लाज की गठरी बन डोली के कोने में सिमट जाती।

अब गाँव घरों की महिलाओं ने उसे देवी माई के दर्शन कराये, दूधों नहाओ पूतों फलो का आशीर्वाद दिया, अरमानों के सागर में गोते लगाती पगली की डोली उसके ससुराल में आ लगी थी। जहाँ पगली का भविष्य उसका ही इंतजार कर रहा था।

उस दिन नई बहू का स्वागत बुजुर्ग महिलाओं तथा नव यौवनाओं ने हर्षोल्लाष के साथ मंगल गीतों से किया था।

उस समय पगली अपने भाग्य पर इतरा उठी थी, वह अपनी कर्मनिष्ठा मृदुल व्यवहार से ससुराल में सबकी आंखों का तारा बन बैठी थी। गाँव की महिलायें उसके रूप सौन्दर्य तथा प्रेम व्यवहार की कायल हो गई थी वे उस का गुणगान तथा सास ससुर के भाग्य की सराहना करते थकती नहीं थी। उसने अपने स्नेह व्यवहार से सबका मन जीत लिया था, वह बच्चों की प्यारी मीठी बातों से खिलखिलाती हंस पड़ती, तो मानो वह अपने बचपने के दिनों में वापस चली जाती।

अब पगली की जिंदगी में वह दिन भी आया, जिस का  इंतजार हर नई नवेली दूल्हन करती है। उसके ससुराल में सुहाग रात की तैयारियां जोर शोर से चल रही थी, और पगली पिया मिलन की आस मन में लिए अपने भविष्य का ताना बाना बुनने मे व्यस्त थी। सारे घर आंगन को गाय के गोबर से लीपा पोता गया था। आंगन मेंजौ  के आटे से चौक पूरा गया, तुलसी और चंद्रमा की पूजा के साथ भगवान सत्यनारायण की कथा भी हुई। गाँव की नव वधुओं ने ढोलक की थाप पर मंगल गीत भी गाये, उस दिन मित्रों, रिश्तेदारों तथा समाज के लोगों को सुस्वादु भोजन के साथ बहू भोज भी दिया गया, लोगों ने उसके मंगल भविष्य की मंगल कामना भी की, महिलाओं ने पुत्रवती अखंड सौभाग्यवती  होने का आशीर्वाद दिल से दिया, उस समय उसके ससुराल में संपन्नता अपनी चरम सीमा पर थी, उसकी ननदों  तथा भाभियों ने उसकी सुहाग सेज को बेला और गुलाब की लड़ियों से सजाया, सुहाग सेज पर बिछी बेला और गुलाब की पंखुड़िया कोमल स्पर्श  नर्म एहसास दिलानें को आतुर थी।  उसमें सबके अरमानों की खुश्बू समाहित थी।

अब दिन ढलता जा रहा था।  शाम होने को आई।  उसको उस पल का पल-पल इंतजार था जिसकी कामना हर दुल्हन करती है।  अपने दिल में अरमानों की माला लिए तथा आंखों मे रंगीन सपने सजाये सुहाग सेज के निकट जमीन पर बैठी पगली अपने साजन के आने का इंतजार नींद से बोझिल आंखों से कर रही थी।

दरवाजे पर होने वाली हर आहट पर उसकी धड़कन बढ़ जाती, उसका इंतजार खत्म नही हुआ, बल्कि उसकी घड़ियाँ लम्बी होती चली गई। रात आधी बीतते। उसका मन किसी अज्ञात भय आशंका से कांपने लगा था। वह पिंजरे में कैद मैंना पक्षी की तरह छटपटा उठी थी।

एक तरफ वह भय आशंका से ग्रस्त हो छटपटा  रही थी।  दूसरी तरफ उसका पती सुहागरात रंगीन बनाने के लिए मित्रों के साथ जाम पे जाम टकराये जा रहा था।  इसकी पगली को भनक भी नही लगी थी। वह जब भी उठने का प्रयास करता मित्र मंडली आग्रही बन उसे रोक लेती और फिर एक बार पीने पिलाने का नया दौर शुरू हो जाता।  नशा हर पल गहरा होता जा रहा थ।  आधी रात के बाद पति महोदय ने नशे में झूमते झामते सुहाग कक्ष में दस्तक दी। लेकिन, सुहाग कक्ष की देहरी पार नही कर सके थे।  नशे की अधिकता से भहरा कर देहरी पर ही गिर पड़े थे।  यह सब देख पगली का हृदय दुख और पीड़ा से हाहाकार कर उठा था।  वह आने वाले भविष्य की दुखद कल्पना कर रो उठी थी। फिर भी अपनी कोमल बाहों से सहारा दे अपने पति को सुहाग सेज तक लाने का असफल प्रयास किया था।

लेकिन भारी शरीर संभालने में खुद गिरते-गिरते बची थी।  नशे की अधिकता से एक बार वह फिर लड़खड़ाया था और गिर गया था।  देहरीं पर पंहुच कर सुहाग सेज तक, नशे में बंद अधखुली आंखों से उसे सुहाग सेज मीलों दूर नजर आ रही थी, जिसे वह हाथ बढ़ा कर छूना चाहता था।

अब एक बेटी अपने अरमानों का गला घोंटे जाने  पे रोने के सिवा कर ही क्या सकती थी? ऐसे में उसकी पीड़ा समझने वाला सिवाय गोविन्द के और कौन हो सकता था।

 – अगले अंक में पढ़ें  – पगली माई – भाग -3 – सुहागरात

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 13 – क्या खोया क्या पाया ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर रचना क्या खोया क्या पाया अब आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़ सकेंगे. )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 13 – विशाखा की नज़र से

☆ क्या खोया क्या पाया   ☆

 

फिर एक साल बीत रहा

गणना का अंक जीत रहा

इस बीतते हुए वर्ष में

जीवन की उथल -पुथल में

ऐ ! मेरे मन तूने

क्या खोया ,क्या पाया …

 

नव विचारों का घर बनाया

पुराने को दूर भगाया

उघड़े चुभते बोलों से

सच को समक्ष लाया

सच के इस भवन में

ऐ ! मेरे मन तूने ,

क्या खोया ,क्या पाया ….

 

फिर से दिन वही आएंगे

क्रम से त्यौहार चले आएँगे

इतने रंग-बिरंगी उत्सवों में

अपने रंग -ढंग छुपाए

ऐ ! मेरे मन तूने

क्या खोया ,क्या पाया ..

 

इमारते गढ़ती जाए

आसमां को छू वो आए

नए परिधान में लिपटे हम

हर जगह घूम कर आएँ

इस घूम -घुम्मकड़ जग में

इन भूलभुलैया शहर में

सपनों की उठती लहर में

गोते लगाए मन तूने

क्या खोया क्या पाया

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – ☆ दीपिका साहित्य # 3 ☆ कविता – अप्सरा . . . ☆ – सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

( हम आभारीसुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  के जिन्होंने ई- अभिव्यक्ति में अपना” साप्ताहिक स्तम्भ – दीपिका साहित्य” प्रारम्भ करने का हमारा आगरा स्वीकार किया।  आप मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर कविता  अप्सरा . . . । आप प्रत्येक रविवार को सुश्री दीपिका जी का साहित्य पढ़ सकेंगे।

 ☆ दीपिका साहित्य #3 ☆ कविता – अप्सरा . . .☆ 

बादलो से झांकती  धूप सी लगती हैं ,

जंगल में नाचते मोर सी लगती हैं ,

जब भी मिलती है शरमाया करती हैं ,

अपने आँचल में तारों को रखती हैं ,

चंचल चितवन चंचल सा मन रखती हैं ,

आँखों से जैसे शरारत झलकती हैं ,

गलियों से जब भी गुजरती हैं ,

खुशबू से आँगन भरती हैं ,

जब भी मुझसे बातें करती हैं ,

कानों में जैसे रस घोलती हैं ,

हर झरोखे से झांकती नज़र ,

बस उसको ही देखा करती हैं ,

हाँ वो अप्सरा सी लगती हैं ,

पर ख्वाबों में ही आया करती हैं ,

बादलो से झांकती धूप सी लगती हैं ,

जंगल में नाचते मोर सी लगती हैं . . .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (20) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( भक्ति योग का विषय )

 

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।।20।।

 

सब भूतों से भिन्न पर है अव्यक्त एक भाव

जो न नष्ट होता कभी, सब से बिना प्रभाव।।20।।

 

भावार्थ :  उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।।20।।

 

But verily there exists, higher than the unmanifested, another unmanifested Eternal who is not destroyed when all beings are destroyed.।।20।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कविता – (जापानी काव्य विधा तांका) ☆ चंद चंद्र तांका  ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  जापानी काव्य विधा  तांका  में एक अतिसुन्दर रचना चंद चंद्र तांका। उनके ही शब्दों में – “जापानी काव्य विधा तांका बहुत उत्तम होती है। इसमें पांच-सात पांच सात सात शब्दों में अपनी मुकम्मल बात की जाती है।  हर पंक्ति का अपना अर्थ होता है।”)

 

चंद चंद्र तांका ☆

 

प्रकृति वधू

चंद्रिम मेखला धारे

पुलक उठी

मयंक ना निरखें

हुलसे  घूंघट में

 

उनींदा चांद

मनुहाया शर्माया

चांदनी छेडे़

आसमान चितेरा

चंद्र उर्मि उकेरे

 

मुंडेर पर

महके रात रानी

हंसी ठिठोली

सोन चिरैया उड़ी

ले चोंच भर खुशी।।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मुक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – मुक्ति ☆

 

देह चाहती है मुक्ति

और आत्मा को

परमात्मा से मोह है,

यूँ देखूँ हर पग सीधी राह

यूँ सोचूँ तो ऊहापोह है!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 21 – अनसुलझा सच ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “अनसुलझा सच।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 21 ☆

☆ अनसुलझा सच 

 

रामायण के विषय में सोचने, उसे दर्शाने और भगवान राम के जीवन ने शिक्षा प्राप्त करने के अनंत तरीके है । जीवन के दर्शन के रूप में रामायण की एक व्याख्या निम्न है :

‘रा’ का अर्थ है ‘प्रकाश’, और ‘म’ का अर्थ है ‘मेरे भीतर, मेरे दिल में’ । तो, राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश।

राम दशरथ और कौशल्या से पैदा हुए थे।

दशरथ का अर्थ है ‘दस रथ’। दस रथ, ज्ञानेन्द्रियाँ (पाँच ज्ञान के अंग) और कर्मेन्द्रियाँ (क्रिया के पाँच अंग) का प्रतीक है। कौशल्या का अर्थ है ‘कौशल’ । दस रथों के कुशल सवार ही भगवान राम को जन्म दे सकते हैं।

जब दस रथों का कुशलता से उपयोग किया जाता है, तो प्रकाश या आंतरिक चमक का जन्म होता है। भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या का अर्थ है ‘वह जगह जहाँ कभी कोई युद्ध ना हुआ हो और ना होगा’ जब हमारे मस्तिष्क में कोई संघर्ष या युद्ध नहीं होता है, तो आंतरिक चमक अपने आप आ जाती है।

रामायण सिर्फ एक कहानी ही नहीं है जो बहुत पहले सुनी सुनाई या घटी हो।

इसमें दार्शनिक, आध्यात्मिक महत्व और इसमें एक गहरी सच्चाई है। ऐसा कहा जाता है कि रामायण हर समय हमारे शरीर में घटित हो रही है। भगवान राम हमारी आत्मा है, देवी सीता हमारा मस्तिष्क है, भगवान हनुमान हमारे प्राण (जीवन शक्ति) है, लक्ष्मण हमारी जागरूकता है, और रावण हमारी अहंकार है।

जब मन (देवी सीता) अहंकार (रावण) द्वारा चुराया जाता है, तो आत्मा (भगवान राम) बेचैन हो जातेहैं। जिससे आत्मा (भगवान राम) अपने मन (देवी सीता) तक नहीं पहुँच सकते हैं। प्राण (भगवान हनुमान), और जागरूकता (लक्ष्मण) की सहायता से, मस्तिष्क  (देवी सीता) आत्मा (भगवान राम) के साथ मिल जाता है और अहंकार (रावण) मर जाता है।

हकीकत में रामायण हर समय घटित होती एक शाश्वत घटना है।

 

© आशीष कुमार  

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 19 ☆ वैश्विक धर्म समभाव ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

((सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “वैश्विक धर्म समभाव”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 19 ☆

☆ वैश्विक धर्म समभाव
जुदा जुदा हैं रंग यहाँ
जुदा जुदा हैं भेस
कोई हिन्दू, मुस्लिम है
कोई सिख, ईसाई वेश।सब रंग की छटाओं से
बनता है हिन्दुस्तान
एकता ही विशालता में
रहता एक है भगवान।

एक रास्ते से चलते हैं
जैसे जुड़ता इंद्रधनुष
आँधी या तूफान हो
हमारा अखंड कल्पवृक्ष।

हरा, नीला या केसरिया हो
रंगे मानवता के रंग से
आओ मिलकर बनाते हैं
वैश्विक धर्म समभाव से।

© सुजाता काळे,

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684

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