सूचना /Information – ☆ हिंदी आंदोलन परिवार – रजतजयंती समारोह, पुणे ☆

☆ सूचना/Information ☆

 ☆ हिंदी आंदोलन परिवार – रजतजयंती समारोह के अंतर्गत
*निमंत्रण*
आप सादर आमंत्रित हैं।
*हिंदी आंदोलन परिवार के रजतजयंती समारोह के अंतर्गत*
*हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई और महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी*
*हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा*
शनि  दि. 14 दिसम्बर 2019
समय- प्रात: 10 बजे
स्थान- लकाकी सभागृह, मराठा चेंबर ऑफ कॉमर्स, स्वारगेट कॉर्नर, पुणे
*पंजीकरण एवं जलपान*
प्रातः 9:30 से 10:00
*उद्घाटन सत्र*
 प्रातः 10:00 बजे
*उद्घाटनकर्ता- डॉ. सदानंद भोसले*
(हिंदी विभागाध्यक्ष, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय)
*अध्यक्ष*- *डॉ. सुशीला गुप्ता*
(उपाध्यक्ष, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई)
*वक्तव्य*- 
*श्री ज. गं. फगरे*  
(संचालक, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे)
*श्री संजय भारद्वाज*
(अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे)
*संचालन- सौ.स्वरांगी साने*
*प्रथम सत्र*
11.45  से 1.45 बजे तक
*अध्यक्ष- डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय*
(हिंदी विभागाध्यक्ष, मुंबई विश्वविद्यालय)
*विशेष अतिथि- डॉ. दामोदर खडसे*
(प्रसिद्ध साहित्यकार)
*वक्तव्य-*
*डॉ. नीला बोर्वणकर* 
( पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, आबासाहेब गरवारे महाविद्यालय)
*डॉ. शशिकला राय* 
(एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय)
*डॉ. राजेन्द्र श्रीवास्तव*
सहायक महाप्रबंधक (हिंदी), बैंक ऑफ महाराष्ट्र
*श्री महेश अग्रवाल*
( ट्रस्टी एवं संरक्षक, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई)
*संचालन- डॉ. अनंत श्रीमाली*
*भोजनावकाश*
 अपराह्न 1.45 से 2.30 बजे
*द्वितीय सत्र*
 अपराह्न 2.30 से 3.30 बजे
*मेरी भाषा के लोग*
( ‘क्षितिज’ द्वारा साहित्यिक रचनाओं की प्रस्तुति।)
*समापन सत्र*
*प्रतिनिधि प्रतिक्रियाएँ एवं प्रश्नोत्तर*
*चायपान-* 
संध्या 4:45 बजे
*विनीत*
*सुधा भारद्वाज*
(कार्यकारिणी संयोजक, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे)
*डॉ. अनंत श्रीमाली*
(महासचिव, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई)
*ज. गं फगरे*
(संचालक, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे)
सम्पर्क- 
संजय भारदाज *9890122603*
*नोट-* 
1) पंजीकरण पहले आएँ, पहले पाएँ के आधार पर। आसनक्षमता पूरी हो जाने पर पंजीकरण की प्रक्रिया रोक दी जाएगी।
2) कुछ आसन आरक्षित हैं।
 3) विद्यार्थियों के लिए आई कार्ड लाना अनिवार्य है।
4) कार्यक्रम को सुचारू रखने के लिए समयपालक की व्यवस्था की गई है।

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (19) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( भक्ति योग का विषय )

 

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।।19।।

 

सारा जग परवश सा यह बनता मिटता रोज

सृजन प्रलय का चक्र यह चलता बिना विरोध।।19।।

      

भावार्थ :  हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है।।19।।

 

This same multitude of beings, born again and again, is dissolved, helplessly, O Arjuna, (into the unmanifested) at the coming of the night, and comes forth at the coming of the day!।।19।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 26 ☆ज़िन्दगी की शर्त…संधि-पत्र ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “ज़िन्दगी की शर्त…संधि-पत्र”.    नतमस्तक हूँ  डॉ मुक्ता जी की लेखनी का जो  नारी की पीड़ा  जैसे संवेदनशील तथ्यों  पर सतत  लिखकर ह्रदय को उद्वेलित करती हैं ।  चाहे प्रसाद जी की कालजयी रचना  ‘कामायनी ‘ की पंक्तियों हों या समाज में हो रही  वीभत्स घटनाएं  उनका संवेदनशील ह्रदय और लेखनी उनको लिखने से रोक नहीं सकती। यदि मैं उन्हें नारी सशक्तिकरण विमर्श की प्रणेता  कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मैं निःशब्द हूँ और इस ‘निःशब्द ‘ शब्द की पृष्ठभूमि को संवेदनशील और प्रबुद्ध पाठक निश्चय ही पढ़ सकते हैं. डॉ मुक्त जी की कलम को सदर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 26 ☆

☆ ज़िन्दगी की शर्त…संधि-पत्र

हर पल अहसास दिलाती हैं मुझे/ प्रसाद जी की दो पंक्तियां…

‘तुमको अपनी स्मित रेखा से

यह संधि पत्र लिखना होगा’

… और मैं खो जाती हूं अतीत में, आखिर कब तक यह संधि पत्र…जो विवाह की सात भांवरों के समान अटल है, जिसे सात जन्म के बंधन के रूप में स्वीकारा जाता है…लिखा जाता रहेगा। परंतु यह आज के ज़माने की ज़रूरत नहीं है। समय बदल चुका है।भले ही चंद महिलाएं अब नकार चुकी है, इस बंधन को…और पुरुषों की तरह स्वतंत्र जीवन जीने में विश्वास रखती हैं, उन्मुक्त भाव से अपनी ज़िंदगी बसर कर रही हैं…परंतु क्या वे स्वतंत्र हैं … निर्बंध हैं? क्या उन्हें सामाजिक भय नहीं, क्या उन्हें अपने आसपास भयानक साये मंडराते हुए नहीं प्रतीत होते? क्या उन्हें सामाजिक व पारिवारिक प्रताड़ना को नहीं झेलना पड़ता? परिवारजनों का बहिष्कार व उससे संबंध-विच्छेद करने का भय उन्हें हर पल आहत नहीं करता? जिस घर को वह अपना समझती थीं, उसे त्यागने के पश्चात् उन्हें किसी भयंकर व भीषण आपदा का सामना नहीं करना पड़ता? कल्पना कीजिए, कितनी मानसिक यातना से गुज़रना पड़ता होगा उन्हें? क्या किसी ने अनुभव किया है उस मर्मांतक पीड़ा को…शायद! किसी ने नहीं। सब के हृदय से यही शब्द निकलते हैं… ‘ऐसी औलाद से बांझ भली।’ अच्छा था वह पैदा होते ही मर जाती, तो हमारे माथे पर कलंक तो न लगता। देखो! कैसे भटक रही है सड़कों पर…क्या कोई अपना है उसका…शायद इस जहान में वह अकेली रह गई है। सुना था, खून के रिश्ते, कभी नहीं टूटते। परंतु आज कल तो ज़माने का चलन ही बदल गया है।

प्रश्न उठता है…आखिर उसके माता-पिता ने इल्ज़ाम लगा कर उसे कटघरे में क्यों खड़ा कर दिया? उन्होंने उसे उसकी प्रथम भूल समझ कर, उसे अपने घर में पनाह क्यों नहीं दी? परंतु ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि उन्हें अपनी औलाद से अधिक, अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा व मान-मर्यादा की परवाह थी, कि ‘लोग क्या कहेंगे’…शायद इसी लिये वे पल भर में उसे प्रताड़ित कर,घर से बेदखल कर देते हैं ताकि समाज में उनका रुतबा बना रहे और उन्हें वहां वाह-वाही मिलती रहे। क्या उन्हें उस  यह ध्यान आता है कि वह निरीह बालिका आखिर जायेगी कहां…क्या हश्र होगा उस की ज़िंदगी का…एक प्रताड़ित बालिका को कौन आश्रय देगा…यह सब बातें उन्हें बेमानी भासती हैं।

आखिर कौन बदल सका है तक़दीर किसी की… इंसान क्यों भुला बैठता है…बुरे कर्मों का फल सदैव बुरा ही होता है। सो! बेटियों को कभी भी घर की चारदीवारी को नहीं लांघना चाहिए। यह उपदेश देते हुए वे भूल जाते हैं कि वह मासूम निर्दोष भी हो सकती है…शायद  किसी मनचले ने उसके साथ ज़बरदस्ती दुष्कर्म किया हो? वे उस हादसे की गहराई तक नहीं जाते और अकारण उस मासूम पर दोषारोपण कर उसे व उनके माता-पिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।

प्रश्न उठता है…क्या उस पीड़िता ने अपना अपहरण कराया स्वयं करवाया होगा? क्या उसे दुष्कर्मियों का  निवाला बनने का शौक था?क्या उसने चाहा था कि उसकी अस्मत लूटी जाए और वह दरिंदगी की शिकार हो?नहीं… नहीं… नहीं, यह असंभव है। उसके लिए तोउस घर के द्वार सदा के लिए बंद हो जाते हैं।अक्सर उसे बाहर से ही चलता कर दिया जाता है कि अब उनका उस निर्लज्ज से कोई रिश्ता- नाता नहीं। यदि उसे घर में प्रवेश पाने की अनुमति प्रदान कर दी जाती है, तो उसके साथ मारपीट की जाती है, उसे ज़लील किया जाता है और किसी दूरदराज़ के संबंधी के यहां भेजने का फ़रमॉन जारी कर  दिया जाता है, ताकि किसी को कानों-कान खबर न हो कि वह अभागिन बालिका दुष्कर्म की शिकार हुई है।

अब उसके सम्मुख विकल्प होता है… संधिपत्र का, हिटलर के शाही फ़रमॉन को स्वीकारने का…अपने  भविष्य को दांव पर लगाने का… अपने हाथों मिटा डालने का… जहां उसके अरमान,उसकी आकांक्षाएं, उसके सपने पल भर में राख हो जाते हैं और उसे भेज दिया जाता है दूर…कहीं बहुत दूर, अज्ञात- अनजान स्थान पर, जहां वह अजनबी सम अपना जीवन ढोती है। यहां भी उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता… उसे सौंप दिया जाता है, किसी दुहाजू, विधुर पिता-दादा समान आयु के व्यक्ति के हाथों, जहां उसे हर पल मरना पड़ता है। वह चाह कर भी न अपनी इच्छा प्रकट कर पाती है,न ही विरोध दर्ज करा पाती है, क्योंकि वह अपराधिनी कहलाती है,भले ही उसने कोई गलत काम याअपराध न किया हो।

भले ही उसका कोई दोष न हो,परंतु माता-पिता तो पल्ला झाड़ लेते हैं तथा विवाह के अवसर पर खर्च होने वाली धन-संपदा बचा कर, फूले नहीं समाते। सो! उनके लिए तो यह सच्चा सौदा हो जाता है। आश्चर्य होगा आपको यह जानकर कि संबंध तय करने की ऐवज़ में अनेक बार उन्हें धनराशि की पेशकश भी की जाती है, वे अपने भाग्य को सराहते नहीं अघाते। यह हुआ न आम के आम,गुठलियों के दाम। अक्सर उस निर्दोष को उन विषम परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है, जो उसके माता-पिता विधाता बन उसकी ज़िंदगी के बही-खाते में लिख देते हैं।

आइए दृष्टिपात करें, उसके दूसरे पहलू पर… कई बार उसे संधिपत्र लिखने का अवसर भी प्रदान नहीं किया जाता। उसे ज़िदगी में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाता है, जहां कोई भी उसकी सुध नहीं लेता। वह हर दिन नई दुल्हन बनती हैं…एक दिन में चालीस-चालीस लोगों के सम्मुख परोसी जाती हैं। यह आंकड़े सत्य हैं… के•बी•सी• के मंच पर,  एक महिला कर्मवीर, जिसने हज़ारों लड़कियों को ऐसी घृणित ज़िंदगी अर्थात् नरक से निकाला था, उनसे साक्षात्कार प्रस्तुत किए गये कि किस प्रकार उन्हें उनके बच्चों का हवाला देकर एक-एक दिन में, इतने लोगों का हम-बिस्तर बनने को विवश किया जाता है…और यह समझौता उन्हें अनचाहे अर्थात् विवश होकर करना ही पड़ता है। ऐसी महिलाओं के समक्ष नतमस्तक है पूरा समाज,जो उन्हें आश्रय प्रदान कर, उस नरक से मुक्ति दिलाने का साहस जुटाती हैं।

वैसे भी आजकल ज़िंदगी शर्तों पर चलती है। बचपन में ही माता-पिता बच्चों को इस तथ्य से अवगत करा देते हैं कि यदि तुम ऐसा करोगे, हमारी बात मानोगे, परीक्षा में अच्छे अंक लाओगे, तो तुम्हें यह वस्तु मिलेगी…यह पुरस्कार मिलेगा।इस प्रकार बच्चे आदी हो जाते हैं, संधि-पत्र लिखने अर्थात् समझौता करने के और अक्सर वे प्रश्न कर बैठते हैं,यदि मैं ऐसा कर के दिखलाऊं, तो मुझे क्या मिलेगा…इसके ऐवज़ में? इस प्रकार यह सिलसिला अनवरत जारी रहता है। हां! केवल नारी को मुस्कुराते हुए अपना पक्ष रखे बिना, नेत्र मूंदकर संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने लाज़िम हैं। वैसे भी औरत में तो बुद्धि होती ही नहीं, तो सोच-विचार का तो प्रश्न ही कहां उठता है? उदाहरणत: एक प्रशासनिक अधिकारी, जो पूरे देश का दायित्व बखूबी संभाल सकती है, घर में मंदबुद्धि अथवा बुद्धिहीन कहलाती है। उसे हर पल प्रताड़ित किया जाता जाता है, सबके बीच ज़लील किया जाता है…अकारण दोषारोपण किया जाता है। यहां पर ही उसकी दास्तान का अंत नहीं होता, उसे विभिन्न प्रकार की शारीरिक व मानसिक यंत्रणाएं दी जाती हैं…ऐसे मुकदमे हर दिन महिला आयोग में आते हैं, जिनके बारे में जानकार हृदय में  ज्वालामुखी की भांति आक्रोश फूट निकलता है और मन सोचने पर विवश हो जाता है,आखिर यह सब कब तक?

हम 21वीं सदी के बाशिंदे…क्या बदल सके हैं अपनी सोच…क्या हम नारी को दे पाए हैं समानाधिकार… क्या हम उसे एक ज़िंदा लाश या रोबोट नहीं समझते … जिसे पति व परिवारजनों के हर उचित-अनुचित आदेश की अनुपालना करना अनिवार्य है… अन्यथा अंजाम से तो आप बखूबी परिचित हैं।आधुनिक युग में हम नये-नये ढंग अपनाने लगे हैं… मिट्टी के तेल का स्थान, ले लिया है पैट्रोल ने, बिजली की नंगी तारों व तेज़ाब से जलाने व पत्नी को पागल करार करने का धंधा भी बदस्तूर जारी है।भ्रूणहत्या के कारण, दूसरे प्रदेशों से खरीद कर लाई गई दुल्हनों से, तो उनका नाम व पहचान भी छीन ली जाती है और वे अनामिका व मोलकी के नाम से आजीवन संबोधित की जाती हैं। मोलकी अर्थात् खरीदी हुई वस्तु… जिससे मालिक मनचाहा व्यवहार कर सकता है और वे अपना जीवन बंधुआ मज़दूर के रूप में ढोने को विवश होती हैं।अक्सर नौकरीपेशा शिक्षित महिलाओं को हर दिन कटघरे में खड़ा किया जाता है। कभी रास्ते में ट्रैफिक की वजह से, देरी हो जाने पर, तो कभी कार्यस्थल पर अधिक कार्य होने की वजह से, उन्हें कोप-भाजन बनना पड़ता है।अक्सर कार्यालय में भी उनका शोषण किया जाता है। परंतु उन्हें अनिच्छा से वह सब झेलना पड़ता है क्योंकि नौकरी करना उनकी मजबूरी होती है। वे यह जानती हैं कि परिवार व  बच्चों के पालन-पोषण व अच्छी शिक्षा के निमित्त उन्हें यह समझौता करना पड़ता है। यह सब ज़िंदगी जीने की शर्तें हैं, जिनका मालिकाना हक़ क्रमशः पिता,पति व पुत्र को हस्तांतरित किया जाता है। परंतु औरत की नियति जन्म से मृत्यु पर्यंत वही रहती है, उसमें लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं होता।

‘औरत दलित थी,दलित है और दलित रहेगी’ कहने में अतिशयोक्ति नहीं है। वह सतयुग से लेकर आज तक 21सवीं सदी तक शोषित है, दोयम दर्जे की प्राणी है और उसे सदैव सहना है,कहना नहीं…यही  एकतरफ़ा समझौता ही उसके जीने की शर्त है। उसे आंख, कान ही नहीं, मुंह पर भी ताले लगाकर जीना है। वैसे उसकी चाबी उसके मालिक के पास है, जिसे वह बिना सोच-विचार के, अकारण किसी भी पल घुमा सकता है। हर पल औरत के ज़हन में प्रसाद की पंक्तियां दस्तक देकर अहसास दिलाती हैं…जीने का अंदाज से सिखलाती हैं… उसकी औकात दर्शाती हैं  और उसके हृदय को सहनशीलता से आप्लावित करती हैं और वह अपने पूर्वजों की भांति आचार- व्यवहार व ‘हां जी’ कहना स्वीकार लेती हैं क्योंकि नारी तो केवल श्रद्धा है! विश्वास है! उसे आजीवन सब के सुख,आनंद व समन्वय के लिए निरंतर बहना है ताकि जीवन में सामंजस्य बना रहे।

वैसे भी हमारे संविधान निर्माताओं ने सारे कर्त्तव्य अथवा दायित्व नारी के लिए निर्धारित किए हैं और अधिकार प्रदत्त हैं पुरुष को,जिनका वह साधिकार, धड़ल्ले से प्रयोग कर रहा है… उसके लिए कोई नियम व कायदे-कानून निर्धारित नहीं हैं।

पराधीन तो औरत है ही…जन्म लेने से पूर्व, भ्रूण रूप में ही उसे  दूसरों की इच्छा को स्वीकारने की आदत-सी हो जाती है और अंतिम सांस तक वह    अंकुश में रहती है। ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं ‘ अर्थात्  गुलामी में वह कैसे सुख-चैन की सांस ले सकती है? उसकी ज़िंदगी उधार की होती है, जो दूसरों की इच्छा पर आश्रित है,निर्भर है।

अंततः नारी से मेरी यह इल्तज़ा है कि उसे हंसते- हंसते जीवन में संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने होंगे…मौन रहकर  सब कुछ सहना होगा।यदि उसने इसका विरोध किया तो भविष्य से वह अवगत है,जो उसके स्वयं के लिए, परिवार व समाज के लिए हितकर नहीं होगा। आइए! इस तथ्य को मन से स्वीकारें,  ताकि यह हमारे रोम-रोम व सांस-सांस में बस जाए और आंसुओं रूपी जल-धारा से उसका अभिषेक होता रहे।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – व्याकरण निरपेक्ष होता है.. ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – व्याकरण निरपेक्ष होता है..,☆

वह मिला था।

वह मिली थी.!

वह आया था।

वह आई थी..!

वह हँसा था।

वह हँसी थी…!

वह सोया था।

वह सोई थी….!!

कर्ता का लिंग बदलने से

नहीं बदलता क्रिया का अर्थ,

व्याकरण निरपेक्ष होता है..,

कर्ता का लिंग बदलते ही

कर देता है सारे अर्थ वीभत्स,

आदमी मनोरोग से ग्रस्त होता है…!

स्वस्थ समाज निर्माण के मिशन में स्वयंसेवी बनें। 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 5.01बजे,  11.12.19

 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 16 ☆ चीखती दीवारें..!!! ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है – उनका एक अत्यंत संवेदनशील, मार्मिक, गंगा जमुनी  तहजीब की मिसाल प्रस्तुत करती मानवीय दृष्टिकोण पर लिखा शिक्षाप्रद  सामयिक आलेख   “चीखती दीवारें !!!”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़  सकते हैं। ) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 16 ☆

☆ चीखती दीवारें..!!! ☆

 

9 दिसम्बर स्थान अनाज मंडी दिल्ली में सुबह का सूरज एक नई रोशनी ले के आने ही वाला था कि सुबह होने के पूर्व ही अनाज मंडी स्थित एक बैग फैक्ट्री की दीवारों से एक साथ तमाम चीखें सुनाई देने लगीं..! दीवारों की खिड़कियों से बड़ी तेजी से लगातार धुआं निकल रहा था..!! सुबह सुबह ये नजारा देख आस पास के लोगों में दहशत फैल गई.!!किसी ने आनन फानन में पुलिस को इतला दी..!!

अंदर धुंए और आग से लोगों का दम घुटने लगा था कुछ लोग आग की लपेट में भी आ चुके थे.! पुलिस जब तक उस तंग गली में स्थित फैक्ट्री तक पहुँचे इस बीच अंदर फंसे व्यक्तियों की मनोदशा अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी.!! बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था,चारों तरफ़ धुआं ही धुआं आग और घुटन बढ़ती ही जा रही थी..!! मुसर्रफ अली भी उन व्यक्तियों में से एक था..!! उसे अहसास हो चला था कि वह अब मौत के दरवाजे पर खड़ा है.!!उसे एक एक कर बीते वर्षों की हर एक बात बड़ी तेजी से याद आ रही थी अभी छह माह पूर्व ही उसके वालिद का इंतक़ाल हो गया था तब वो घर बिजनोर गये थे.! अपनी माँ की गोद में सिर रखने पर मिलता सुकून,दो नन्हे से बच्चे और अपनी प्यारी सी बीबी की याद बड़ी बेसब्री से आ रही थी..!!! फिर अचानक उसे अपने अज़ीज़ दोस्त मोनू अग्रवाल का ख्याल आया और तुरंत उसने उसे मोबाइल से काल लगाया.!! ये एक ऐसा वक्त था जब मुसर्रफ अपने दिल की हर बात अपने अज़ीज़ दोस्त मोनू को जल्द से जल्द बता देना चाहता था,और हुआ भी वही..!! दूसरी तरफ फोन पर मोनू की आवाज़ सुन मुसर्रफ बड़ी ही संजीदगी से बोला यार सुन अब मेरे पास वक्त बहुत कम है,यहाँ फैक्ट्री में आग लगी हुई है चारों तरफ धुआं ही धुआं और गर्द है मुझे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही है मोनू ने रोक कर कहा यार तू किसी तरीके से बाहर निकल अल्लाह सब ठीक करेगा तू फिक्र न कर यह सुन मुसर्रफ ने कहा सुन भाई मैं जो कहना चाहता हूँ मुझे बात करने में भी खासी तकलीफ हो रही है बमुश्किल बात कर पा रहा हूँ, तू मेरे बीबी बच्चों का ख्याल रखना जब तक वो बड़ें न हों जाएँ, पैरों पर खड़े न हों जाएँ अब तू ही एक सहारा है भाई.. मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है भइया, उसकी आवाज़ में लड़खड़ाहट और मौत का ख़ौफ़ नज़र आ रहा था !! और हाँ भइया मैंने कुछ दिन पूर्व इमामुद्दीन से पांच हजार रुपये लिए थे उसके ये पैसे भी आप याद से लौटा देना भइया..! मोनू दूसरी तरफ से सांत्वना देते हुए बोला अरे सब लौटा देंगे तू काहे टेंसन ले रहा है सब ठीक होगा मुसर्रफ.!! एक बात और सुन मेरे भाई मेरे मरने की बात एक दम से न बताना परिवार बर्दास्त न कर सके इसलिए धीरे समय देख बड़ों जैसे समझदारी से बताना.!! ये कहते हुए उसकी आवाज़ थम सी रही थी अंत में सिर्फ ये सुनाई दिया या अल्लाह मेरे घर की देख रेख करना मोनू ने यह सुन उसे फिर आवाज दी हेलो मुसर्रफ पर दुबारा उसकी आवाज सुनाई नहीं दी..!!

तभी अग्निशामक दल की गाड़ियां आ चुकीं थीं जो दूर से ही पाइप डाल कर आग बुझाने में लग गई..!!,दिल्ली पुलिस आस पास के लोगों से पूछताछ में लग गई..!! मीडिया टी आर पी बढ़ाने में लग गया..!! जांच अधिकारी आग के कारणों को खोजने,और फैक्ट्री मालिक की गिरफ्तारी में लग गए..!! कई सवाल उठने लगे कि आखिर तंग गलियों में फैक्ट्री की इजाज़त क्यों..? लेकिन इस बीच अग्निशामकों द्वारा जब 43 लाशें बाहर निकाली गईं तो स्थितियाँ बहुत ही मार्मिक एवं ह्रदय विदारक थीं.!

बहरहाल कारण जो भी हों पर इस अग्निकांड ने 43 लोग बे समय काल कलवित हुए..!! घटनाओं के बाद जैसे प्रायः होता आया है वही मजिस्ट्रेटियल जांच के आदेश, मुआवजा, देकर xइन वीभत्स कांडो पर पर्दा डालने के कुत्सित प्रयास भी नजर अंदाज नहीं किये जा सकते..!!  नगरीय प्रशासन,राज्य स्तरीय,और केंद्रीय प्रशासन संयुक्त रूप से दोषियों के खिलाफ कार्यवाही और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसका हल खोजने के बजाय एक दूजे को दोषारोपण देने में ही व्यस्त रहे ..!!

यह अग्निकांड तमाम सवाल अपने पीछे छोड़ गया है, जिनका जबाब हमें खोजना है..!! जैसे तंग गलियों में फैक्ट्री की इजाजत कैसे,बिजली कनेक्शन,पानी,अन्य अग्नि से निपटने के उपकरण, आपातकालीन दरवाजे आदि आदि पर एक बहुत बड़ा संदेश भी इस अग्निकांड से हमें मिला है वो है सामाजिक समरसता, सौहार्द, आपसी भाईचारा, परस्पर प्रेम, ईमानदारी और विस्वास का..!! उस ख़ुदा के नेक वंदे ने अपने आखिरी वक्त में जो बातें कहीं वो पूरे समाज के लिए चिंतनीय, सोचनीय, और अनुकरणीय हैं.!! अल्लाह उनको जन्नत नसीब करें.! जहाँ आज चौतरफा एक दूजे को शक की निगाह से देखा जा रहा है आपसी सौहार्द खतरे में हो,इन हालातों में समाज के बीच ये खिंची हुई दीवारें भी चीख चीख कर मानो हमसे कह रही हों हमें गिरा दो..!! इन चीखती दीवारों की व्यथा न जाने कब सुनेगा ये तथा कथित सभ्य समाज…???

संतोष

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हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 25 ☆ कविता ☆ कराह ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है उनकी एक सामयिक कविता  ‘कराह ’। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 25  साहित्य निकुंज ☆

☆ कराह

 

क्यों तुमने उसे

अपना शिकार बनाया

क्यों तुमने उसे

गिद्ध चील की तरह

नोच – नोच के खाया।

क्या सोच कर उसे जलाया

तुमने उसकी नहीं सबकी

अंतरात्मा को जलाया।

वह देश की बेटी थी

मिलेगा उसे इंसाफ

नहीं करेंगे माफ

देश में मच रहा है हाहाकार

है तुम्हें धिक्कार

अपराधी तुम्हें फांसी

मिलते ही

तुम्हें मिल जायेगी मुक्ति

तब होगा न तुम्हें अपने

कर्मों का अहसास

तुम्हारी इज्जत सरे बाज़ार उतारे

बना दें तुम्हें नामर्द

तब शायद होगा तुम्हें

उस दर्द का अहसास

शायद

ये सजा करे कुछ असर

थम जाए बलात्कार।

निर्भया से प्रियंका तक

न जाने कितनों  की चीखें

समाहित है इस धरा पर

चल रहा है सिलसिला

अभी तक नहीं हुआ है फैसला

जाने कब होगा इंसाफ….?

सुनो

अंतर्मन में

सुनाई दे रही

उनकी  कराह

बस निकलती है आह…….

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

wz/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व ), नई दिल्ली –110056

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (18) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( भक्ति योग का विषय )

 

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ।।18।।

 

सब अव्यक्त स्वरूप ले जगते दिन के साथ

हो जाते जो विलय सब जब होती है रात।।18।।

 

भावार्थ :  संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं।।18।।

 

From the unmanifested all the manifested (world’s) proceed at the coming of the “day”; at the coming of the “night” they dissolve verily into that alone which is called the unmanifested.।।18।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 10 ☆ लघुकथा – दुःख में सुख ☆ – डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है.  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं.  अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है उनकी एक  सामयिक, सार्थक एवं  मानसिक रूप से विकृत पुरुष वर्ग के एक तबके को स्त्री शक्ति से सतर्क कराती  सशक्त लघुकथा “दुःख में सुख”. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को ऐसी रचना रचने के लिए सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 10 ☆

☆ लघुकथा – दुःख में सुख ☆ 

 

माँ की पीठ पहले की अपेक्षा अधिक झुक गयी थी । डॉक्टर का कहना है कि माँ को पीठ सीधी रखनी चाहिए वरना रीढ़ की हड्डी पर असर पड़ता है साथ ही याददाश्त भी कमजोर हो जाती है।

गर्मी की छुट्टियों में मायके गयी तो देखा कि माँ थोड़ी ही देर पहले कही बात भूल जाती है। आलमारी की चाभी और रुपए पैसे रखकर भूलना तो हर समय की बात हो गयी थी। कई बार परेशान होकर वह खुद ही कह उठती- पता नहीं क्या हो गया है ? लगता है मैं पागल होती जा रही हूँ। कुछ याद ही नहीं रहता- कहाँ- क्या रख दिया ?

झुकी पीठ के साथ माँ दिन भर काम में लगी रहती। सुबह की एक चाय ही बस आराम से पीना चाहती। उसके बाद झाड़ू, बर्तन, खाना, कपड़े-धोने का जो सिलसिला शुरू होता वह रात ग्यारह बजे तक चलता रहता। रात में सोती तो बिस्तर पर लेटते ही कराह उठती। झुकी पीठ में टीस उठती। फिर वही सिलसिला दूसरे दिन का……..

बेटियों के मायके आने पर माँ की झुकी पीठ कुछ तन जाती। अपनी आयु और स्वास्थ्य भूलकर वह और तेजी से काम में जुट जाती। उसे चिंता होती कि बेटे-बहू का कोई कड़वा बोल बेटियों के कानों में न पड़ जाए। उपेक्षा का भाव बेटियों को नजर ना आ जाए। माहौल खुशनुमा बनाने के लिए और खुद को प्रसन्न दिखाने के लिए वह गुनगुनाती, नाती-नातिन के साथ हँसती, खेलती, खिलखिलाती…….. ?

वह गर्मी की रात, थकी-हारी माँ छत पर लेटी थी। इलाहबाद की गर्मी, हवा का नाम नहीं। माँ नाती-पोतों से घिरी लेटी है। हवा चले, इसके लिए वह बच्चों से जोर-जोर से बुलवा रही है-  चिडिया ,कौआ ,तोता  सब उड़ो, उड़ो, उड़ो, हवा चलो, चलो, चलो बच्चे चिल्ला- चिल्लाकर बोल रहे थे। बच्चों के लिए अच्छा खेल था। माँ मानों अपने-आप से बोलने लगी- बेटी खुश रहा करो। बातों को भूलने की कोशिश किया करो। हम औरतों के लिए बहुत जरुरी है यह। जब से हर बात भूलने लगी हूँ मन बड़ा शांत है। किसी की तीखी कड़वी बात थोड़ी देर असर करती है फिर कुछ याद ही नहीं रहता। किसने क्या कहा, क्यों कहा, क्या ताना मारा……. कुछ नहीं। यह कहकर माँ ने लंबी साँस भरी।

बोलते-बोलते माँ कब सो गयी पता नहीं चला। चाँदनी उसके चेहरे पर पसर गयी थी। माँ के विश्वास ने ठंडी हवा भी चला दी थी। मुझे डॉक्टर की कही बात याद आ रही थी लेकिन माँ ने दु:ख में भी सुख ढूंढ लिया था।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 19 – The Phenomenon ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

 

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “The Phenomenon .)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 19

☆  The Phenomenon ☆

 

It was October again,

Time when the clouds

Had been bidding adieu,

Year after year

To the Earth.

 

“Do you love me?”

The earth, couldn’t resist

Asking the cloud.

Since long,

No words had been spoken

Between them,

But she had always felt

That it was because of love

And the special bondage

That they both shared,

The clouds had been coming

And bathing her with affection.

 

The cloud coughed,

“What’s love?

I sprinkle raindrops

Since I become overladen-

It’s just a scientific process!”

And he vanished unhesitatingly.

 

The Earth stared for long

At the retreating cloud,

And despite the wetness spread

By the cloud a few moments ago,

She felt dry and barren.

 

She knew that

The clouds will come back again next year,

But neither will she long for them,

Nor await their arrival;

Getting soaked in the rains

Will just be another heartless phenomenon!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 4 ☆ गीत –  रौनक मिटी मकानों में ☆ – डॉ. राकेश ‘चक्र’

डॉ. राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक लाख पचास हजार के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि डॉ राकेश ‘चक्र’ जी ने  ई- अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से अपने साहित्य को हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं उनका एक अतिसुन्दर गीत   “ रौनक मिटी मकानों में.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 4 ☆

☆   रौनक मिटी मकानों में  ☆ 

 

झूठे रिश्ते ढोए हमने

प्यार कहाँ मेहमानों में

आँखों ने क्या-क्या देखा है

सुना रोज ही कानों में

 

अर्थों की डोली में झूलें

बिना बात के यों ही फूलें

अर्थहीन बातों पर सब ही

खूब हिलाते मन की चूलें

 

इधर-उधर की सुनते -सुनते

उम्र कटी है तानों में

 

बौराई है अमराई भी

रोज दिखाए चतुराई

बिछुवे बदले पायल बदलीं

बदले भाई -भौजाई

 

कोयल -बुलबुल के स्वर बदले

रौनक मिटी मकानों में

 

उड़ते हैं कुछ नीलगगन में

कहाँ दीखते पंख कटे

चौराहों पर बाज झपटते

दर्शक भी सब बँटे-बँटे

 

बंदूकें अड़ियल शेरों पर

चीख उठीं मैदानों में

 

मोबाइल है सोनचिरैया

टीवी प्रेम पुजारी – सा

सुविधाएं सब भोग -भोग कर

मन है खाली खाली सा

 

आँखें सूखीं, तालू सूखा

रस कब रहा जुबानों में

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी,  शिवपुरी, मुरादाबाद 244001, उ.प्र .

मोबाईल –9456201857

e-mail –  rakeshchakra00@gmail.com

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