(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है अप्रतिम रचना – जोगी जी।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुम्हार का गधा…“।)
अभी अभी # ९३० ⇒ आलेख – कुम्हार का गधा श्री प्रदीप शर्मा
एक समय था जब गधा इतना अकेला नहीं था। सबसे बड़ा बोझ अकेलेपन का होता है। क्या दिन थे वे भी, जब एक गधा भी पीठ पर बोझा लादे शान से कुम्हार के साथ चलता था। लेकिन समय का फेर देखिए। आज कुम्हार भी उसका साथ छोड़ गया। एक कुत्ते की तरह वह भी न कुम्हार के घर का रहा, न ईंट के भट्टे का। एक कुत्ते के तो फिर भी दिन बदल गए, लेकिन बेचारे गधे को तो किसी ने घास तक नहीं डाली।
अगर आपकी याददाश्त अच्छी हो तो आपने भी यदाकदा एक गधे को कुम्हार के मटकों के साथ सजा धजा सड़कों पर निकलते देखा होगा। गधे की पीठ पर एक रस्सियों की जाल में ठंडे पानी के मटके लदे हुए रहते थे। कुम्हार पति पत्नी दोनों मटके बेचने, गधे के साथ ही निकलते थे। कुम्हार पति मटकों की होम डिलीवरी करता और कुम्हार की पत्नी गधे और मटकों की रखवाली करती हुई आवाज लगा लगाकर मार्केटिंग करती थी।।
गधा शुरू से ही मेहनती रहा है। गधा हम्माली के लिए तो वह अभिशप्त है ही, लेकिन आज उसके नसीब में बोझा ढोना भी नहीं लिखा है। जो पूछ परख उसकी गांव में कभी थी, वह आज शहरों में कहां। बेचारी गऊ माता तक को इन शहरियों ने आवारा पशु समझ गोशाला में पहुंचा दिया तो उसकी क्या औकात। उसकी हालत तो एक कुत्ते और सुअर से भी गई बीती हो गई है। कुछ कस्बे टाइप जिलों में उसे आज भी सड़कों पर विचरने की छूट मिली हुई है, लेकिन वह कोई गाय या कुत्ता नहीं, जो कोई उस पर तरस खाकर दो रोटी ही डाल दे। वह तो पूरी तरह से घास पर ही निर्भर है। सबका मालिक एक होगा, लेकिन आज एक गधे का कोई मालिक नहीं।
जब आज मजदूर को ही मजदूरी नहीं मिल रही है तो बड़े बड़े डंपर, और आइशर वाहन छोड़, कौन गधे की पीठ पर ईंटें लादेगा। कुम्हार ने भी एक चार पहिए वाला ठेला खरीद लिया है, ऐसे में यह चार पांव वाला गधा किस काम का।
एक गधे से तो टट्टू और खच्चर अच्छा जो किसी काम तो आता है। एक व्यस्त घोड़ा भले ही घास से यारी ना करे, लेकिन एक उपेक्षित गधे के पास तो घास से यारी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। सरकार को सबके रोजगार की चिंता है, एक गधा कहां का मतदाता है जो सरकार उसके भी रोजगार की घोषणा करे।।
केवल एकमात्र कृश्न चंदर ही ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने न केवल एक गधे की आत्मकथा लिख इस प्राणी को अमर किया, अपितु उसे संसद तक में प्रवेश दिलवा दिया।
ईश्वर की इस सृष्टि में कोई प्राणी अनुपयोगी नहीं। अतः कोई आश्चर्य नहीं अगर पुस्तक मेले की तरह गधों का भी मेला लगता हो, उनकी भी खरीद फरोख्त होती हो। अजी गधों की तो बोली भी लगती है। जरूर गधों में भी कुछ श्रेष्ठ गधे होंगे, जो पारखी निगाहों से बच नहीं पाते होंगे।।
गधा न तो किसी सम्मान का भूखा है तथा न ही इसमें अस्मिता बोध ही है। एक कुम्हार शायद इसके मनोविज्ञान से वाकिफ हो, वैसे किसी कुत्ते अथवा गाय की तरह इसे इसके नाम से पुकारा जाए, तो भी यह किसी को ज्यादा भाव नहीं देता।
काश इसे यह पता होता कि इसकी कुछ खूबियों के कारण कुछ इंसानों की इस प्राणी से तुलना की जाती है। अगर इसे यह बात पता भी चल जाए, तो भी शायद इसके मुंह से ये शब्द तो फिर भी कतई ना निकले ;
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (2 मार्च से 8 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
मैं पंडित अनिल पाण्डेय ने आपसे वादा किया था कि मैं हर सप्ताह आपको श्री हनुमान चालीसा के चौपाइयों के संपुट पाठ से होने वाले होने वाले मंत्रवत फल के बारे में आपको बताऊंगा। इसी श्रेणी में आज की चौपाई है।
“राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।। “
हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने पर हनुमत कृपा से आत्मिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती है।
अगली चौपाई के संपुट पाठ से प्राप्त होने वाले फल के बारे में इस वीडियो के अंत में बताया जाएगा।
अब मैं आपको इस सप्ताह ग्रहों की स्थिति के बारे में बताऊंगा। इस पूरे सप्ताह सूर्य, मंगल, राहु और वक्री बुध कुंभ राशि में रहेंगे। वक्री गुरु मिथुन राशि में और शनि मीन राशि में गोचर करेंगे। शुक्र प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेगा तथा एक तारीख के 11:46 रात से मीन राशि में प्रवेश करेगा। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह सावधानी पूर्वक कार्य करने पर आपको कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ नरम-गरम संबंध रहेंगे। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता दायक है। चार तारीख के दोपहर के बाद से पांच और 6 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। थोड़े से प्रयास से ही आपके पास धन आ सकता है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह मिश्रित फल वाला होगा। आपको अपने साथियों का सहयोग कम मिलेगा। आपके कार्यालय में सावधान भी रहना चाहिए। भाई और बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए मददगार है। 7 और 8 तारीख को आपको बहुत सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मिथुन राशि
अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहने की संभावना है। पिताजी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। माता जी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपका आपके माता जी और पिताजी का तथा जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा भाग्य से आपको मदद मिलेगी दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करें धन आनंद धन आने की उम्मीद है भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे इस सप्ताह आपके लिए साथ और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए फलदायक है सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है इस सप्ताह आपको चाहिए कि आपका दिन प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से सामान्य मदद ही मिल पाएगी। थोड़े बहुत धन की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में कोई विशेष प्रगति नहीं होगी, अर्थात जैसे संबंध चल रहे हैं वैसे ही रहेंगे। कर्मचारियों को उनके सहकर्मियों की मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा यकीन करना पड़ेगा। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो, तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि एवं नए प्रेम संबंध बनना भी संभव है। आपके माता-पिता और जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से थोड़ी मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में ध्यानपूर्वक कार्य करने से सफलता मिल सकती है। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी खराबी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। दो-तीन और चार के दोपहर तक का समय सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह आपका, आपके जीवन साथी का और माता जी तथा पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिल सकती है। आपको इस सप्ताह अपने पुत्र पर ध्यान देना चाहिए। छात्रों की पढ़ाई में काफी उथल-पुथल रहेगी। शत्रुओं से संधि करने का यह सबसे अच्छा समय है। अगर आपके कोई शत्रु हैं तो आपको इस समय संधि के लिए प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में कोई भी रिस्क ना लें। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए परिणाम दायक हैं। चार-पांच और 6 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
वृश्चिक राशि
यह सप्ताह आपके पुत्र के लिए काफी अच्छा रहेगा। उसको तरक्की मिल सकती है। छात्रों की पढ़ाई उत्तम चलेगी। कर्मचारीयों और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको अपने साथियों और अधिकारियों से सहयोग प्राप्त होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनके प्रतिष्ठा में कमी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 2-3 और 4 तारीख कार्यों को करने के लिए शुभ हैं। सात और 8 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सजगता पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनका जन सम्मान बढ़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ऊंच नीच के चलेंगे। भाग्य इस सप्ताह आपका साथ देगा। लंबी यात्रा का भी योग बन सकता है। कर्मचारीयों और अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 मार्च लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। मात्र थोड़ी कम हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। पेट के रोग में आराम मिल सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाग्य से कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। दो-तीन और चार तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
आपके थोड़े से प्रयासों से ही इस सप्ताह आपके पास धन अच्छी मात्रा में आ सकता है। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख के दोपहर तक का समय परिणाम दायक है। चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक तथा रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास काफी अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। अपने आत्मविश्वास के कारण आप कई स्थानों पर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आपका और आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। जीवनसाथी को थोड़ी परेशानी हो सकती है। कचहरी के काम कार्यों में बहुत सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
आईये अब हम श्रीहनुमान चालीसा के आज की दूसरी चौपाई के बारे में चर्चा करते हैं।
आज की दूसरी चौपाई है:-
“महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। “
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से व्यक्ति की मानसिक स्थिति ठीक होती है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
भाषा ही कोणत्याही मानवी सामाजिक जीवनाचा आधार आहे. ते परस्पर संवादाचे जसे प्रभावी माध्यम आहे तसेच ते ज्ञानसंचय, ज्ञानप्रदानाचे ही महत्त्वाचे माध्यम आहे. संस्कृती, इतिहास, आचार-विचाराचे महत्त्वाचे साधन म्हणून भाषेकडे पाहिले जाते. मराठी हि महाराष्ट्राची राजभाषा आहे. महाराष्ट्राची ती मातृभाषा आहे..
मराठी भाषेला साधारणतः लिखित साहित्याचा बाराशे वर्षांचा इतिहास लाभला आहे. महाराष्ट्रात आणि जगात पंधरा कोटी लोक मराठी भाषा बोलतात. प्राचीन कालखंडापासून अतिशय दर्जेदार साहित्याची निर्मिती मराठी भाषेतून झालेली आहे. ज्ञानेश्वर-लीळाचरित्र, तुकारामांची गाथा, नामदेवांची-अभंगवाणी, बखर, पोवाडे ही प्राचीन मराठी भाषेची खरी ओळख असून त्यांची ख्याती सातासामुद्रांपलीकडे पोहोचली असून यांचा अनेक भाषांत अनुवादही झाला आहे. आधुनिक युगात निबंध, कथा, कविता, कादंबरी, नाटक व ललित गद्य तसेच दलित, ग्रामीण, स्त्रीवादी आणि आदिवासी साहित्यातून देशभर आणि जगभर मराठीची स्वतंत्र अशी ओळख निर्माण झाली आहे.
समाजातील दिन-दलित, वंचित, उपेक्षित घटकांच्या मनोव्यथेचा पहिला हुंकार मराठी साहित्यातूनच उमटला. अभिजनांच्या साहित्य जाणिवांपेक्षा बहुजनांच्या जीवन वेदनेला स्थान देणारे मराठी साहित्यच आहे.
शिक्षणाची प्रक्रिया अधिक गतिमान करण्यासाठी मातृभाषेसारखे दुसरे साधन असूच शकत नाही म्हणूनच महाराष्ट्रात उच्चशिक्षण मराठी भाषेतून
दिले जावे…. मराठी भाषेत अकराव्या शतकापासून संतानी सातत्याने ज्ञानाची क्रांती केली आहे. मराठीतील लोकवाङ्मय व लोकसंस्कृतीच्या खुणा मराठीतून विविधतेने नटलेल्या दिसतात… अनेक श्रेष्ठ संत मंडळींनी आपल्या बोलीतून मराठी भाषेला सजविले, फुलविले व मोठे केले.. विसाव्या एकविसाव्या शतकातील अनेक थोर लेखक,कवींनी आपल्या
शब्दसामर्थ्यामधून मराठी भाषा समृध्द केली पण हीच आपली मातृभाषा कुठेतरी मागे पडते आहे हे विधान सर्वत्र ऐकायला मिळते आणि ह्या मागे एक आर्त कळकळ असते ती आपल्या मातृभाषेवरील प्रेमाची, आस्थेची… मुळात भाषा कशासाठी तर संवाद साधण्यासाठी, भावना, विचार मांडण्यासाठी, ते जतन करून ठेवण्यासाठी, विकासासाठी… आणि मग जेव्हा हीच भाषा मागे पडते तेव्हा फक्त भाषा नाही तर एक संपूर्ण मानव समुह , एक संस्कृती मागे पडते.
जागतिकीकरणाच्या युगात मराठी भाषा नवनव्या आव्हानांना सामोरी जाऊन, कधी त्यात सामावून तर कधी सामर्थ्याने अनेक क्षेत्रात प्रभावीपणे पदार्पण करताना दिसते आहे. या भाषिक संक्रमणाच्या युगातही मराठीने आपले स्वतंत्र अस्तित्व टिकवून ठेवले आहे. कला, संस्कृती, क्रीडा, न्यायालयीन व वैधक कामकाज, गणित, विज्ञान, उपयोजीत मराठी, संगणक, वृतपत्रे, आकाशवाणी, दूरदर्शन, मोबाईल इत्यादी अनेक क्षेत्रांत मराठी भाषा आपले स्वतंत्र अस्तित्व टिकवून आहे. नव्या क्षेत्राची परिभाषा मराठीने आत्मसात केली आहे. या पुढेही मराठी भाषेला नव्या नव्या क्षेत्रात पदार्पण करण्यासाठी सजग रहावे लागणार आहे हे नक्की..
!!लाभले आम्हास भाग्य बोलतो मराठी
जाहलो खरेच धन्य ऐकतो मराठी !!
खरंच हे दिवस महाराष्ट्रात आहेत का? मातृभाषा आहे म्हणून मराठीचं कौतुक आहेच. पण बऱ्याचदा असं होतं की मुलं मराठी कुटुंबातून आलेली असली तरी त्यांच्यावर इंग्रजीचा प्रभाव जास्त असतो. अगदी उलट परिस्थिती जेव्हा इतर भाषिक लोक एकत्र येतात तेव्हा असते. तेव्हा खंत वाटते की आपलं आपल्या मातीशी असलेलं नातं तुटतंय का? महाराष्ट्राच्या मातीशी असलेले घट्ट ऋणानुबंध टिकवून ठेवणारी आपली मातृभाषा आहे. जिचा गोडवा अवीट आहे जिने राष्ट्रीय ख्यातीचे पुरस्कारविजेते लेखक-कवी घडवले जिने बॉलीवूडकरांनाही भुरळ घातली ती भाषा बोलण्यात कमीपणा वाटण्याचं काही कारणच नाही. दुसऱ्याची वाट न पाहता स्वतःपासून सुरुवात केली पाहिजे असे मनापासून नमूद करीन.. तसंच कॉलेजच्या मराठी वाङ्मयमंडळांची ही व्याप्ती वाढली पाहिजे तरच जास्तीत जास्त मराठी साहित्य जनमानसांत पोहोचेल व मराठी केवळ कागदापूर्तीच मर्यादित न राहता सगळ्यांच्या मनामनात राहील. मातृभाषेमधून जे संस्कार मनावर, बुद्धीवर होतात ते कुठेतरी आत्म्यात रुजत असावेत.. मातृभाषेत विचारांची जडणघडण झाली तर माणूस प्रत्येक गोष्टीचा विचार करायला लागतो आणि हळूहळू सगळ्या समाजाचीच
विचारसरणी बदलते. त्यामुळे मराठीचा अभिमान बाळगणे हा संकुचितपणा असा विचार करणारे आम्ही भाषेच्या डबक्यातच अस्तित्व असणारे बेडूक नसून एका विचारी आणि सर्वसमावेशक राज्याचे नागरीक आहोत हे सांगायला नकोच.
आमच्या मराठीची पीछेहाट होण्यामागे दुसरं तिसरं कोणी जबाबदार नसून आम्हीच आहोत. आम्हीच मराठी बोलायला टाळायला लागलो. अश्याने बाकीच्या भाषा बोकाळल्या आणि आम्ही त्यांचा उदो उदो करत रहिलो.
अहो या मराठीने तिचं गाऱ्हाणं सांगावं तरी कोणाला ? झोपेचं सोंग घेतलेल्यांना की खरंच या विषयाचं गांभीर्यच न उमगणा-यांना ? मराठीचं बोलण कळेल तरी का या इंग्रजाळलेल्या मराठी फकिरांना ?
मराठीच मराठी राहिली नहिये. तिची कक्षा रुंदावी, तिची प्रगती व्हावी असं तिलाही वाटत असणारचं ना ? पण मग काय कुठलीही भेसळ सहन करावी का तिने ? मराठीचं शुद्धीकरण करायला प्रत्येक पिढीत सावरकर जन्माला येतीलच असं नाही ना..! सावरकरांनी मराठीला इंग्रजी राजवटीत वाचवलं, सावरलं आणि पुन्हा उभं केलं. मराठीत कित्येक शब्द सावरकरांनी रुजू केले. पण ते इंग्रजीतून अथवा इतर प्रांतीय भाषांमधून नाही तर तिचं मूळ जिच्यात होतं अशा संस्कृतमधून..
किती श्रीमंत ही मराठी.. ज्ञानदेव तुकोबारायांसारखे संत मराठीच्या छायेत वाढले. तर या मराठीच्या अंगाखांद्यावर माडगुळकर, कुसुमाग्रज, शांता शेळके, सुरेश भट, भा.रा तांबे, आरती प्रभू अश्या अनेक महान कवींची कविता खेळली, बागडली. व. श्री. ना. पेंडसे, पु. काळे, जी. ए. कुलकर्णी, शं. ना. नवरे, अशा कित्येक कथाकारांच्या गोष्टीचं कथेत रुपांतर झालं. भारुड, जात्यावरच्या ओव्या, गोंधळ असे गेय साहित्य प्रकार, ज्ञानेश्वरी, दासबोध, गाथा असे ग्रंथ या मराठीने प्रत्येक मराठी
मनापर्यंत पोहोचवले. हे साहित्य पुढल्या पिढीला सांगण्याचा प्रयत्न केला तर त्यांना कुठपर्यंत झेपेल हे कोणास ठाऊक?.. . कारण हे समजायला मराठी गाभा लागतो. आणि हे साहित्य श्रुती, स्मृती या माध्यमांमधून जर पुढे गेलं नाही तर हे सगळं कुठेतरी लुप्त होण्याची फार दाट शक्यता आहे .. मनाला लागलेली एक रूखरूख..
कुठलीही भाषा शिकायला फारसा काळ लागत नाही. त्या भाषेत प्रभुत्व मिळविण्याची इच्छा असेल तरीही नाही… त्यासाठी मुलांना इंग्रजी शाळांमध्येच शिकविण्याचा आग्रह का ? या सगळ्या अट्टाहासात मुलांचा आत्मविश्वास तर बळी पडत नाहीये ना? न्यूनगंड तर निर्माण होत नाहीये ना ? असा विचार या पालकांनी वेळीच केलेला बरा.
मराठीच्या उत्कर्षासाठी झगडणं हा आमचा मराठी धर्म. महाराष्ट्रात मराठी बोलून जर समोरच्याला कळत नसेल तर आम्ही मराठी सोडण्याची नाही तर समोरच्याने मराठी शिकण्याची गरज आहे असं माझ्यासारख्या मराठी माणसाचं ठाम मत आहे. यातून मराठीचं अस्तित्व टिकून राहील आणि त्या निमित्ताने एक नवीन भाषा शिकण्याचं भाग्यही शिकविणा-याला लाभेल असे मला वाटते..सध्या इंग्रजी आणि हिंदी ची लाट आहे. पण जेंव्हा प्रयत्नांती मराठीच पारडं जड होईल ना तेव्हा हेच इंग्रजाळलेले मराठी पुन्हा मराठीच्या लाटेत निर्विकारपणे का होईना सामील होतील अशी आशा मनी आहे.
नुकत्याच झालेल्या मराठी भाषा गौरव दिनाच्या निमित्ताने बरेच काही चांगले, विनोदी वाचायला मिळाले. आणि मराठी भाषेवरच्या प्रेमाच्या लाटेने थोडी उसळी घेतली…
आणि बोलतांना मराठीत असलेले, लपलेले, लपवलेले, आणि गैरसमज करून घेतलेले अर्थ व त्यामुळे होणारी गंमत लक्षात आली.
घरात बोलत असतानांच साध वाक्य, तुम्ही चहा आधी घेणार, कि भांडी घासून झाल्यावर. आता सांगा यात चहा घेणार… म्हणजे मिळणार का आपल्या हाताने घेणार… आदर आणि स्वावलंबन दोन्ही अर्थ यात काठोकाठ भरलेले आहेत. कदाचित हे अर्थ जितके काठोकाठ भरलेेेले आहेत तेवढा चहा पण कपात भरलेला नसतो. त्यातही आपण थोडी कपात करतो. या बरोबरच भांडी कोण घासणार… याचा उल्लेख नसला तरी बरोबर समजत. पण वाक्यात गंमत आहे.
असंच दुसरं वाक्य. काही कळलं का. आता यात विचारणा, प्रश्न, आणि असलेल्या बुध्दी बद्दल शंका… सगळ्या भावना यात आहेत. मग ते वाक्य आपल्यासाठी असेल, किंवा आपण म्हंटल असेल. पण प्रसंग, परिस्थिती, शब्दावर दिलेला जोर, आणि अर्थातच चेहर्यावर असणारा भाव यामुळे काय म्हणायचं ते लक्षात येतच. याच धर्तीवर असणारं आणखीन एक वाक्य, काही गरज नाही. यात राग आणि सौजन्य दोन्ही आहे. पण हे वाक्य सौं. च असेल, तर सौजन्य असेलच असही नाही. परिस्थितीनुसार याचा अर्थ आपण आपला लावायचा असतो. जमेल का हे पण याच अर्थाने ऐकायला येणारं वाक्य. यात क्षमतेवर विश्वास जाणवतच नाही. काहीवेळा काळजी, तर काहिवेळा उपरोध जाणवतो.
लक्ष कुठे आहे तुमचं हे तर लक्ष्यवेधी वाक्य आहे. यात आपण काय सांगतो या कडे लक्ष नाही. किंंवा ज्याची गरज आहे ते सोडून नेमकं कशाच निरीक्षण चाललं आहे हे लक्षात आणून दिल जातं. यावेळी लक्ष आणि लक्ष्य दोन्ही विचलित झालेलं लक्षात येत.
तुम्ही काय देणार यात अपेक्षा, कौतुक, आनंद, आश्चर्य याच बरोबर अपेक्षित असलेल काहि मिळणार नाही याची जवळपास खात्रीच असते. फक्त वेेळ, व शब्दांच्या सुरावरुन यात काय आहे ते समजून घ्याव लागतं.
एखादं काम पूर्ण केल्यावर आपण सहज म्हणतो, झालं. यात काम पूर्ण केल्याचा आनंद किंवा समाधान असतं. पण हे काम मी करु का… अशी विचारणा आपणहून केली, आणि त्यावर झालं… अस उत्तर आल, तर मात्र त्या झालं याचा अर्थ आपल्याला वेगळा सांगावा लागतच नाही. यात आनंद किंवा समाधान सापडणारच नाही. जाणवेल ती फक्त निराशा…
आपण मराठीत बोलत असलो तरी काही इंग्रजी शब्द आपण आपलेच म्हणून सर्रास वापरतो. कदाचित एकदा आपलं म्हंटल की दूर लोटायच नाही हा मराठी बाणा यात असेल. किस हा शब्द मराठीत आणि इंग्रजीत लिहितांना वेगळा आणि अर्थही वेगळा असला तरी, व आपण बोलतांना किस याचा मराठी अर्थच घेतला तरी वाक्य कस ऐकतो त्यावरून ऐकतांना गंमत वाटते.
आज दोन्ही वेळेस ऊपवास आहे. मग… किस सकाळी करु कि रात्री चालेल… अस विचारल तर… गंमत वाटणारच. आणि समजा ऊत्तर दिल… सकाळीच कर. रात्रीच रात्री बघू… तर… किंवा एखाद्या गोष्टीबद्दल नको तितकी चर्चा सुरु असेल तरी म्हणतो, बास आता… किती किस पाडायचा…
बोलीभाषा मराठीच असली तरी पुणं, मुंबई, कोल्हापूर, नागपूर, मराठवाडा, नाशिक, खान्देश इथली वेगळी आहे. आमच्याकडे काहि लोकांना ळ चा उच्चार ड असा करायची सवय आहे. लिहीतांना ळ लिहीला तरी उच्चार ड असा करतात. यात काही चूक आहे अस वाटत नाही. आमच्या वर्गात नेमाडे, भोळे, काळे अशी आडनांव असणारे होते. या सगळ्यांनाच एक जण बोलवत होता. पण तो म्हणाला नेमाडे, भोडे, काडे. सगडेच्या सगडे संध्याकाडी या. समजल तरी ऐकतांना गंमत वाटायची. एक म्हण आहे. उथळ पाण्याला खळखळाट फार. आता हिच म्हण याने म्हंटली तर ती उथड पाण्याला खडखडाट फार अस म्हणेल. खळखळाट आणि खडखडाट किती विरुद्ध अर्थ आहे. पण हिच गंमत आहे.
अशा खूप गोष्टी असतील. पण भाषेत प्रेम, ओलावा, गंमत आहे कारण ती माझी आहे.
“आई निनाईच्या नावानं चांगभलं! ”गर्दीनं जोरात गजर केला आनि पालकी उचालली. आज भंडारा, पालकी प्रदक्षणा होनार आनि आरती, निवद झाला की प्रसाद वाटप. जो तो उत्साहात वावरत हुता. गावचा पाटील झ्याकवानी फेटा घालून सूचना देत हुता. “आरं पोरांनो, देवीनं लई कल्याण केलं हाय आपलं. तिच्या कृपेनं गावाला पानी कदी कमी पडलं नाय. जिकडं तिकडं हिरी भरल्यात. शिवार फुललं परत्येक वरसाला. लाईटीचं डांब आलं. मोबाईलचं टावरबी आलं. आता घरातून मोबाईल वर बटन दाबूनश्यान आपुन पानी देतोय शिवाराला. आनि काय पायजे? समदं गाव सुखात नांदतया. कवा बी भांडान बखेडा नाय. पोरांनो, शेवा करा आईची. तीच आपल्याला आधार हाय” एवढं बोलला पाटील पन डोळं भरुन आलं त्याचं. त्याच्या मनात आई निनाईबद्दल भाव दाटून आला. कायतरी मनात ईचार येत हुता. त्यानं भक्तीभावानं देवीला हात जोडलं.
गाव हुतं सातारा जिल्ह्यातील बहुलं. हेच माजं गाव. गावाच्या तीन वाड्या हावळंवाडी, जरंवाडी आनि पाळंकरवाडी. यापैकी पाळंकरवाडीच्या शेजारी डोंगराच्या पायथ्याला पन जरा दरीतच निनाई देविचं मंदिर हाय. तिथली ही कथा. कायमची लक्षात रहान्याजोगी.
भंडारा झाला. प्रसादवाटप झालं. जो तो आपापल्या घरला गेला. पाटील तिथंच बसून हुता. आज देवी तेजस्वी दिसत हुती. सूर्व्याची किरनं तिच्या चेहऱ्यावर पडल्यामुळे ती हसत आहे असं वाटत हुतं. पाटलाच्या मनात मात्र खंत हुती. तो सादंसुदं पत्र्याचं मंदिर न्याहाळत हुता. भिंती पत्र्याच्या, छत पत्र्याचं, पायऱ्या नीट नव्हत्या. गावात मस्त बंगले बांदले हुते लोकांनी. गावाला मंदिर बांदणं काय जड नव्हतं. मंदिर पाहून आपण बंगल्यात रहातोय ही खंत, अपराधीपणा पाटलाला सतावित हुता. मंदिर न हुयाला कारन बी तसंच ठोस हुतं. देवीनं दृष्टांत दिलेला, पूर्वीच्या पिढ्यांनी सांगितला हुता.
मागील चार पिढ्यांनी दोन तीनदा मंदिर बांदायचा प्रयत्न केला हुता पन काय तरी कारणानं रहायचं. सुरूवातच होत नव्हती. मागील पिढीत प्रयत्न केला गेला पन तेंव्हाच्या गुरवाला देवीनं सपनात येऊन सांगितलं, “एका रात्रीत मंदिर होयाला पाहिजे तरच हुनार” हे कसलं सपान? गुरवानं सांगितलं समद्यांना. हे घडनार नाही म्हनून आजपातुर मंदिर राहिलं हुतं.
गावातील जुनी म्हातारी मानसं सांगत की देवी डोंगरावरच हुती म्हने. एका भक्तानं देवीची खूप सेवा केली हुती. म्हातारपनी त्याला डोंगरावर जायाला ईना म्हनून त्यानं देवीला हात जोडले आनि आता येत नाही म्हनून सांगितलं. त्यावर देवी म्हनली, “तू फुडं बघून चाल. मी मागून घरापातुर येते पन मागं वळून बगू नको. नायतर मी हाय तिथंच थांबणार. ” भक्त निगाला चालत. डोंगराचा पायथा सुरू झाला आन् त्याला इच्छा झाली मागं वळून पहान्याची. त्यानं मागं पाहिलं आन् देवी तिथंच थांबली. गुप्त झाली. मग त्याच जागेवर एक खोली एवडं पत्र्याचं मंदिर केलं. दगडाचीच देवी केली. गेल्या चार पिढ्या ते तसंच हुबं हाय.
आज भंडाऱ्याच्या वक्ताला आरती चालू असताना घंटा, ढोल ताशा वाजू लागला. भुलाबाईच्या अचानक अंगात आलं. ती हात वर करून घुमाया लागली. आयाबाया तिच्या भवतंनं घुटमळत हुत्या. “आई, काय मागनं हाय बोल. आमी तू म्हनशील ती शेवा करू. ”आसं म्हनत नमस्कार करत हुत्या. भुलाबाईनं घुमण्याचा हुंकार टाकला.
“हुं हुं…पाटलाच्या मनात आलंय मंदिराचं…. पन नीट शेवा केल्या बिगर हुनार नाय…उगाच एका रात्रीत बांदायचा इचार बी करू नगासा. हुनार नाय मंदिर तसं. हुं.. हुं.. ”
बाया बापड्यांनी “व्हय व्हय”म्हनत वटी भरली. ती शांत झाली पन पाटील अशांत झाला. देवी मंदिर बांदा पन म्हनतीय, बांदू नगा बी म्हनतीय. काय करायचं आता…या विचारातच तो घरला परतला.
पाटलीन तुळशी फुडं दिवा लावत हुती. तिनं पाटलाचा चेहरा पाह्यला. “आवं काय हुतंया.? समदं नीट पार पडलं नव्हं? ”
“व्हय गं, देवीच्या मनात काय हाय कळना बग”असं म्हनून त्यानं समदी हकिकत सांगितली. पाटलीन बी इचारात पडली.
“बर, बर, बगू नंतर, चला हातपाय धुवून या जेवाया. मी तयारी करते. ”असं म्हनून ती आत गेली पानं घ्यायला.
दिसामागून दिस सरले. सुगी झाली. गावची जत्रा जवळ आली. जत्रेत कथा किर्तनाची रेलचेल हुती. ग्रामदैवत जोतिबा बरोबर पुन्हा एकबार निनाईदेवीची पालखी निगाली. पुन्हा मागील इषयाला उजाळा मिळाला. रातच्याला समदी मंडळी पाटलाच्या वाड्यात जमली. यात्रेमुळं संतमंडळी पन कथा किर्तनासाठी आली हुतीतं.
वारकरी संत एकनाथ बाबा पन हुतं. बाबांनी सर्व हकिकत आयंकली आनि विचार करून ध्यानाला बसले. बाबा विठ्ठल भक्त हुते. तपश्चर्या लई हुती. अध्यात्मिक जीवन जगत हुते. कथा, कीर्तनात मग्नच जनू. अर्ध्या तासाने बाबांचं ध्यान संपलं. ते ध्यानातून उठून आले. समद्यांना उद्देशून म्हनले, “म्यां देवीला साकडं घातलं हाय. तुजं मंदिर टप्प्याटप्प्याने पुरं करतो. त्यासाठी दरवरसाला आट दिसाचं पोथीचं पारायन सुरू करतो. तू करवून घेशील तेंव्हा हुईल. आता नगं म्हनू नकोस. आई, असाच आशीर्वाद असू दे. ”यांवर देवीनं आशीर्वाद दिला, पन म्हनली, “ स्त्रियांकडे समाजाचे अजूनबी लक्ष नाय. त्यांना आदर नाय म्हनून स्त्री ही आतून सहनशील राहिली नाय. ती पुरूषांवर जमल तेवडी दादागिरी करती. स्त्री-पुरूष समतोल गावात तरी असावा म्हनून एका आदर्श स्त्रिची पोथी शोधा. ज्या स्त्रिने संसारात सहनशीलता दाखवून आदर्श ठिवलाय तिच्याच पोथीचं पारायन केलं पाहिजे कारन आपली संस्कृती सांगती की, “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता||. ” बाबांनी “नमस्कार”करून ध्यान संपविलं. बाबांची भाकणूक झाली. सर्वांनी माना डोलावल्या आनि महिन्याभरातच पोथीचं पारायन सुरू करू आसं समद्यांनी ठरविलं.
आता पेचप्रसंग असा होता कुनाचं पारायन करायचं? ज्ञानेश्वरी, भगवद्गीता, गुरूचरित्र काहीच उपेगाचं नाय. अनेक संत स्त्रिया हुत्या की पन संसारी लई कमी हुत्या. संत जनाबाई, मुक्ताबाई, कान्होपात्रा हुत्या पन संसारी नव्हत्या. स्त्रिची पोथी हवी ते पन सहनशील आनि संसारी हवी. बाबा स्वतः च या कामाला लागले.
आले पंढरपुरात. समदे मठ, पुस्तकांच्या दुकानात मानसं पाटवली. असाच आटवडा गेला. एक दिवशी रघू विठ्ठल मंदिरात किर्तन ऐकताना पळत पळत आला. “बाबा, बाबा म्यां आत्ताच एका स्त्रिची कथा ऐकून आलोय. आक्षी आपल्याला पायजे तशीच कथा हाय. पन तिची पोथी हाय का बघावं लागंल. ”किर्तनात महाराजांनी कथा लावली हुती एका स्त्रीची. अत्यंत सहनशील, अध्यात्मिक आनि संसारी. नाव हुते ‘संत बहिणाबाई ‘त्यांचे आख्यान ऐकूनच रघू पळत आला अन् बाबांना सर्व सांगू लागला. बाबा उठले. कुठल्या महाराजांनी कथा सांगितली ते शोधलं. ते हुतं महाराष्ट्रातील लई मोट्टं ‘संत धुंडामहाराज देगलूरकर. ’किर्तन संपलं..
बाबांनी महाराजांना वाकून नमस्कार केला, “जरा थोडं बोलायचं हुतं”
महाराज म्हणाले, ”“बसा बसा. बोला की. काय शंका हाय का? ”
“शंका न्हाय पन आपन कथा सांगितलेल्या संत बहिणाबाईंची पोथी हाय का? ”
“ हाय की. पन जरा जीर्ण अवस्थेत हाय ”महाराज म्हणाले.
बाबांना खूप आनंद झाला. देविच्या मनात बी आलंय मंदिराचं काम पूर्न व्हावं याची पक्की खूण बाबांना पटली. ते म्हणाले, ”असू द्या. थोडं दिवस आमाला द्या. आमी पुना लिहून काढतो. काय आडलं तर तुमास्नी इचारतो. ”चला पोथीचा प्रश्न सुटला. रघूचा उत्साह वाढला. बरोबर आलेल्या गन्यानं इचारलं, “ आरं रघू, ह्या संत बहिणाबाई मंजी त्या पुस्तकात कविता असत्यात त्याच व्हय रं? ”
रघू म्हनाला, ” आरं त्या बी लई सोशिक हुत्या आनि ज्ञानानं, अनुभवानं तर लई बेस हुत्या बग. ह्या त्या नव्हंत पन त्यांची बहीनंच जनू. ह्यांनी हाल सोसत सोसत नवऱ्याबर आयुष्य काढलं आनि कुनी त्यांचा छळ केला माहित हाय का? आरं नवऱ्यानंच. त्यांनी सर्व सोसलं. त्यांना मारन्याच्या नादात वासरालाबी मारलं. वासरू गेलं. त्या आजारी हुत्या, काय बी लक्ष दिलं नाही. पन गंमत म्हनजे नवरा घरातून निघून लांब जायला बगायचा. गेला की त्योच आजारी पडायचा. असं तीन चारदा झालं.
आपण चंदन असल्याची घोषणा चंदनाला कधीच करावी लागत नाही. त्याचा गंध वाऱ्याबरोबर आपोआप पसरत जातो. त्यामुळे आपण कोण आहोत हे दुसर्यांना सांगण्याची गरज नाही, फक्त चांगले कर्म करत रहा.
वरील मजकूर मला व्हाट्सअप वर आला होता. अशा प्रकारचे सुविचार अनेक येतात. यासारख्या बऱ्याच गोष्टींबद्दल सविस्तरपणे सांगावेसे वाटते. वस्तुतः चंदनाचे झाड हे लक्षात येत नाही. गावाकडे आमच्या बागेत काही चंदनाची झाडे उगवली होती. परंतु आम्हाला ती झाडे चंदनाची आहेत हे समजलेच नव्हते. कोणीतरी आम्हाला हे झाड चंदनाचे आहे हे सांगितले तेव्हा समजले. झाडे थोडी मोठी झाल्यावर त्याचा गवगवा होऊन चोरीला जाण्याची शक्यता कोणीतरी व्यक्त केली म्हणून गावाकडच्यांनी ती विकून टाकली. घरात चंदनाचे खोड असेल तर घरात त्याचा सुगंध पसरलेला आम्ही तरी कधी अनुभवला नाही. पूर्वी पूजेसाठी चंदनाचे खोड प्रत्येकाच्या घरी असायचं. चंदनाचे खोड जेव्हा उगाळले जाते तेव्हा त्यातून सुगंध पसरतो त्यामुळे चंदनाला, कुणीतरी हे चंदन आहे हे सांगावेच लागते. आमच्या गावाकडचे घर विकल्यानंतर तेथील सामान देऊन टाकणे व विकून टाकणे ही प्रोसेस चालू असताना चंदनाचे खोड हे वेस्टेज मध्ये टाकले गेले होते. कोणीतरी हे चंदनाचे खोड आहे म्हणून उचलून आणले. हिरा सुद्धा पैलू पाडल्याशिवाय हिरा आहे हे कुणालाही समजत नाही. तसे पाहता पैलू पाडल्यानंतर सुद्धा खरा हिरा आणि खोटा हिरा हे कोणाला समजते?
… असे तुकाराम महाराजांनी सुद्धा सांगितले आहे. त्यामुळे अज्ञानी किंवा फारसा विचार न करणाऱ्या लोकांना एखादा चुकीचा मुद्दा सुद्धा पटवून देण्यासाठी अशा प्रकारच्या चुकीच्या मजकुरांचा किंवा चुकीच्या दृष्टांतांचा उपयोग केला जातो. लोकांना आपला मुद्दा पटवून देण्यासाठी दृष्टांतांची परंपरा कीर्तनकारांनी फार पूर्वीपासून आपल्या समाजात रुजवली आहे. कीर्तनकाराला स्वतःचा मुद्दा पटवून देण्यासाठी काही दृष्टांत द्यावयाचे असतात. परंतु ते दृष्टांत किती योग्य आहेत याचा विचार केला जात नाही. फारसा विचार न करणाऱ्या लोकांसमोर अशा दृष्टांतांचा उपयोग होतो. सध्या व्हाट्सअप वर असे दृष्टांत देऊन एखादी चुकीची गोष्ट सुद्धा पटवून देण्याची स्पर्धा लागलेली आहे. त्यामुळे कोणतेही उदाहरण किंवा दृष्टांत याबाबत आपण सजग पणे आणि विचारपूर्वक पाहिले पाहिजे.
कुणीतरी गुड मॉर्निंग साठी असे काहीही सुविचार व्यावसायिकपणे तयार करून पाठवतात. ज्याला खरोखरीचा तर्क लावून तपासून पाहिले तर तो विचार योग्य आहे असे वाटत नाही. परंतु कट पेस्ट संस्कृती आणि आलेले फॉरवर्ड करा विचार करू नका. या प्रवृत्तीमुळे अनेक चुकीचे नॅरेटिव्ह सेट करण्यासाठी आपला उपयोग काही लोक करून घेतात. त्यामुळे अविचाराने फॉरवर्ड करणे किंवा आला मजकूर की कट पेस्ट करणे ही सवय चांगली नाही. या गोष्टी शक्यतो टाळाव्यात जी गोष्ट विचारपूर्वक आपल्याला पटली असेल, विचारपूर्वक म्हणजे खरोखरच त्यावर विचार करून मान्य झाली असेल तरच ती पुढे पाठवावी. ही सवय स्वतःच्या अंगी बाणवण्याचा प्रयत्न मी सुरू केला आहे. आपणही सर्वांनी अशा पद्धतीने करावे आणि दुसऱ्याचा विचार फॉरवर्ड करण्यापेक्षा जे फॉरवर्ड कराल तो तुमचा विचार असला पाहिजे. निदान तुम्हाला सर्वतोपरी विचार करून पटलेला तरी असला पाहिजे. तो मान्य असला पाहिजे. ‘फॉरवर्ड ॲज रिसिव्हड’ अशा पद्धतीने करणे टाळावे, नव्हे, करूच नये!
पहा जमते का? आपण सर्वच हे जमवूया. अर्थात आपणास विचार करायची सवय असेल तर! नसेल तर अशी सवय लावून घ्यायला काही हरकत आहे का? सुशिक्षित आहात ना? शिक्षित नसला तरी सुविचारी तरी आहात ना? असाल तर करा करा प्रयत्न करा माझ्याबरोबर!