आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (10) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पुरूषोत्तम योग

(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

(जीवात्मा का विषय)

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ ।

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ।।10।।

फॅसे मो हमें मूढ जनमन से रहे अजान

ज्ञानी जन सब देखते, रखते मन पर ध्यान ।।10।।

 

भावार्थ :  शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं॥10॥

 

The deluded do not see Him who departs, stays and enjoys; but they who possess the eye of knowledge behold Him.।।10।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ भस्मारति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ भस्मारति ☆

कब तक लिखोगे मनुज?

गला सुखा दूँगा

हाथ थरथरा दूँगा

बैठना मुश्किल हो जायेगा,

फिर एक दिन

शरीर भस्मसात हो जायेगा..,

समय की

दहाड़ पड़ रही है,

यम की आँख में

दृश्यावली बुन रहा हूँ,

काल मेरी देह की

भस्म से खेल रहा है

महाकाल की

भस्मारती की मैं

घंटियाँ सुन रहा हूँ।

©  संजय भारद्वाज

# आपका दिन सृजनशील हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (9) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पुरूषोत्तम योग

(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

(जीवात्मा का विषय)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।

अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ।।9।।

जीव इन्द्रियो और मन का करके उपयोग

विषयो का इंन्द्रियो से करता है उपभोग।।9।।

 

भावार्थ :  यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है।।9।।

 

Presiding over the ear, the eye, touch, taste and smell, as well as the mind, he enjoys the objects of the senses.।।9।।

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – ई-अभिव्यक्ति संवाद ☆ अतिथि संपादक की कलम से ……. अब तक 365 !….✍️ ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

मैं अत्यंत कृतज्ञ हूँ सम्माननीय श्री संजय भरद्वाज जी का जिन्होंने जाने अनजाने में मेरे ह्रदय में ज्ञान एवं अध्यात्म को ज्योति को प्रज्ज्वलित किया। मैंने सन्देश दिया था कि ई- अभिव्यक्ति के अंक का प्रकाशन अगले 7 दिनों तक व्यक्तिगत एवं तकनीकी कारणों से स्थगित रहेगा किन्तु, श्री संजय भारद्वाज जी की एक आत्मीय पोस्ट ने मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया और ईश्वर ने एवं आपके स्नेह ने मुझे इसे गतिशील बनाने रखने हेतु साहस प्रदान किया। मैंने निर्णय लिया कि जब तक सब कुछ व्यवस्थित नहीं हो जाता तब तक निम्न तीन  ब्लॉग पोस्ट सतत जारी रखूंगा

  1. गुरुवर प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित  – श्रीमद्भगवद्गीता पद्यानुवाद  ( जीवन का सार ) 
  2. श्री संजय भारद्वाज जी के अध्यात्म से परिपूर्ण प्रेरक संजय दृष्टि एवं संजय उवाच ( जीवन जीने की  अद्भुत दृष्टि )
  3.  महाभारत के सुविख्यात चरित्र परम आदरणीय भीष्म पितामह के चरित्र पर आधारित धारावाहिक उपन्यास “युगांत” ( जीवन का अद्भुत प्रेरक चरित्र ) 

सम्माननीय श्री संजय भारद्वाज जी की आत्मीय पोस्ट एक  रचना ही नहीं अपितु ऐसी सम्पादकीय ओजस्वी एवं प्रेरक रचना है जिसे संभवतः मेरी लेखनी भी उस ऊंचाई को स्पर्श नहीं कर पाती।  अतः सादर प्रस्तुत है  आदरणीय श्री संजय भारद्वाज जी की लेखनी से अतिथि सम्पादकीय……

-हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति संवाद -अतिथि संपादक की कलम से ……. अब तक 365 !….✍️  ☆ 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

प्रसंग यह है कि गत लगभग दो-अढ़ाई वर्ष से लेखन नियमित-सा रहा है। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही। जून 2019 में ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया।

फिर सम्पादक आदरणीय बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?”

‘संजयकोश’ में यों भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप ठीक एक वर्ष पहले अर्थात 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इस एक वर्ष ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकंपा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर किल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं।

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरम्भ कर दिया है। अनेक मित्रों ने इसका श्रेय दिया तो अनेक कंजूसी भी बरत गए। लेकिन ‘ नो हार्ड फीलिंग्स।’ जाकी रही भावना जैसी..! हाँ इतना अवश्य है कि रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता की यात्रा के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय हेमंत जी इस नियमितता का कारण और कारक बने। उन्हें हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद। नियमित रूप से अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभार। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

दो हाथोंवाला
साधारण मनुष्य था मैं मित्रो!
तुम्हारी आशा और
विश्वास ने
मुझे सहस्त्रबाहु कर दिया!

आप सबके ऋण से उऋण होना भी नहीं चाहता। घोर स्वार्थी हूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक लिखता रहूँ। चाहता हूँ कि समय के अंत तक हज़ार हाथों से रचता रहूँ।

 

संजय भारद्वाज

(लिखता हूँ सो जीता हूँ।)

writersanjay@gmail.com

24 जुलाई 2020, रात्रि 1:31 बजे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पुरूषोत्तम योग

(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

(जीवात्मा का विषय)

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।

गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ।।8।।

जीव जब भी पाता शरीर या करता है त्याग

पुष्पगंध का वायु सा, ले जाता निज साथ ।।8।।

 

भावार्थ :  वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है।।8।।

 

When the Lord obtains a body and when He leaves it, He takes these and goes (with them) as the wind takes the scents from their seats (flowers, etc.).।।8।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 57 ☆ लफ़्जों के ज़ायके ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय एवं प्रेरक आलेख लफ़्जों के ज़ायके।  यह बिलकुल सच है कि लफ़्जों के ज़ायके होते हैं । आदरणीय गुलज़ार साहब के मुताबिक़ परोसने के पहले चख लेना चाहिए। इस गंभीर विमर्श  को समझने के लिए विनम्र निवेदन है यह आलेख अवश्य पढ़ें। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 57 ☆

☆ लफ़्जों के ज़ायके

‘लफ़्जों के भी ज़ायके होते हैं। परोसने से पहले चख लेना चाहिए।’ गुलज़ार जी का यह कथन महात्मा बुद्ध के विचारों को पोषित करता है कि ‘जिस व्यवहार को आप अपने लिए उचित नहीं मानते, वैसा व्यवहार दूसरों से भी कभी मत कीजिए’ अर्थात् ‘पहले तोलिए, फिर बोलिए’ बहुत पुरानी कहावत है। बोलने से पहले सोचिए, क्योंकि शब्दों के घाव बणों से अधिक घातक होते हैं; जो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। सो! शब्दों को परोसने से पहले चख लीजिए कि उनका स्वाद कैसा है? यदि आप उसे अपने लिए शुभ, मंगलकारी व स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हैं, तो उसका प्रयोग कीजिए, अन्यथा उसका प्रभाव प्रलयंकारी हो सकता है, जिसके विभिन्न उदाहरण आपके समक्ष हैं। ‘अंधे की औलाद अंधी’ था…महाभारत के युद्ध का मूल कारण…सो! आपके मुख से निकले कटु शब्द आपकी वर्षों की प्रगाढ़ मित्रता में सेंध लगा सकते हैं; भरे-पूरे परिवार की खुशियों को ख़ाक में मिला सकते हैं; आपको या प्रतिपक्ष को आजीवन अवसाद रूपी अंधकार में धकेल सकते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए और तभी बोलिए जब आप समझते हैं कि ‘आपके शब्द मौन से बेहतर हैं।’ समय, स्थान अथवा परिस्थिति को ध्यान में रखकर ही बोलना सार्थक व उपयोगी है, अन्यथा वाणी विश्राम में रहे, तो बेहतर है।

मौन नव-निधि के समान अमूल्य है। जिस समय आप मौन रहते हैं… सांसारिक माया-मोह, राग-द्वेष व स्व-पर की भावनाओं से मुक्त रहते हैं और आप अपनी शक्ति का ह्रास नहीं करते; उस प्रभु के निकट रहते हैं। यह भी ध्यान की स्थिति है; जब आप  निर्लिप्त भाव में रहते हैं और संबंध सरोकारों से ऊपर उठ जाते हैं… यही जीते जी मुक्ति है। यही है स्वयं में स्थित होना; स्वयं पर भरोसा रखना; एकांत में सुख अनुभव करना… यही कैवल्य की स्थिति है; अलौकिक आनंद की स्थिति है; जिससे मानव बाहर नहीं आना चाहता। इस स्थिति में यह संसार उसे मिथ्या भासता है और सब रिश्ते-नाते झूठे; जहां मानव के लिए किसी की लेशमात्र भी अहमियत नहीं होती।

सो! ऐ मानव, स्वयं को अपना साथी समझ। तुमसे बेहतर न कोई तुम्हें जानता है, न ही समझता है। इसलिए अन्तर्मन की शक्ति को पहचान; उसका सदुपयोग कर; सद्ग्रन्थों का निरंतर अध्ययन कर, क्योंकि विद्या व ज्ञान मानव का सबसे अच्छा व अनमोल मित्र है, सहयोगी है; जिसे न कोई चुरा सकता है; न बांट सकता है; न ही छीन सकता है और वह खर्च करने पर निरंतर बढ़ता रहता है। इसका जादुई प्रभाव होता है। यदि आप निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करते हैं, तो मन कभी भी भटकेगा नहीं और उसकी स्थिति ‘जैसे उड़ि-उड़ि जहाज़ का पंछी, उड़ी-उड़ी जहाज़ पर आवै’ जैसी हो जाएगी। उसी प्रकार हृदय भी परमात्मा के चरणों में पुनः लौट आएगा। माया रूपी महाठगिनी उसे अपने मायाजाल में नहीं बांध पायेगी। वह अहर्निश उसके ध्यान में लीन रहेगा और लख चौरासी से जीते जी मुक्त हो जाएगा, जो मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है…  और उसकी मुख्य शर्त है; ‘जल में कमलवत् रहना अर्थात् संसार में जो हो रहा है, उसे साक्षी भाव से देखना और उसमें लिप्त न होना।’ इस परिस्थिति में सांसारिक माया-मोह के बंधन व स्व-पर के भाव उसके अंतर्मन में झांकने का साहस भी नहीं जुटा पाते। इस स्थिति में वह स्वयं तो आनंद में रहता ही है, दूसरे भी उसके सान्निध्य व संगति में आनंद रूपी सागर में अवगाहन करते हैं, सदा सुखी व संतुष्ट रहते हैं। इसलिए ‘कुछ हंस कर बोल दो,/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां तो बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ अर्थात् जीवन को आनंद से जियो, क्योंकि सुख-दु:ख तो मेहमान हैं, आते-जाते रहते हैं। इसलिए दु:ख में घबराना कैसा…खुशी से आपदाओं का सामना करो। यदि कोई अप्रत्याशित स्थिति जीवन में आ जाए, तो उसे वक्त पर टाल दो, क्योंकि समय बड़े से बड़े घाव को भी भर देता है।

मुझे स्मरण हो रही हैं, गुलज़ार जी की यह पंक्तियां ‘चूम लेता हूं/ हर मुश्किल को/ मैं अपना मान कर/ ज़िदगी जैसी भी है/ आखिर है तो मेरी ही’ अर्थात् मानव जीवन अनमोल है, इसकी कद्र करना सीखो। मुश्किलों को अपने जीवन पर हावी मत होने दो। जीवन को कभी भी कोसो मत, क्योंकि ज़िंदगी आपकी है, उससे प्यार करो। उन्हीं का यह शेर भी मुझे बहुत प्रभावित करता है… ‘बैठ जाता हूं/ मिट्टी पर अक्सर/ क्योंकि मुझे अपनी औक़ात अच्छी लगती है।’ जी! हां, यह वह सार्थक संदेश है, जो मानव को अपनी जड़ों से जुड़े रहने को प्रेरित करता है और यह मिट्टी हमें अपनी औक़ात की याद दिलाती है कि मानव का जन्म मिट्टी से हुआ और अंत में उसे इसी मिट्टी में मिल जाना है। सो! मानव को सदैव विनम्र रहना चाहिए, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। सो! इसे अपने जीवन में कभी भी प्रवेश नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि अहं हृदय को पराजित कर मस्तिष्क के आधिपत्य को स्वीकारता है। इसलिए मस्तिष्क को हृदय पर कभी हावी न होने दें, क्योंकि यह मानव से गलत काम करवाता है। स्वयं का दर्द महसूस होना जीवित होने का प्रमाण है और दूसरों के दर्द को महसूस करना इंसान होने का प्रमाण है। सो! मानव को आत्म- केन्द्रित अर्थात् निपट स्वार्थी नहीं बनना चाहिए; परोपकारी बनना चाहिए। ‘अपने लिए जिए, तो क्या जिए/ तू जी ऐ दिल/ ज़माने के लिए।’ औरों के लिए जीना व उनकी खुशी के लिए कुर्बान हो जाना…यही मानव जीवन का उद्देश्य है अर्थात् ‘नेकी कर, कुएं में डाल’ क्योंकि शुभ कर्मों का फल सदैव अच्छा व उत्तम ही होता है।

‘कबिरा चिंता क्या करे/ चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करें/ मोहे चिंता न होए।’ कबीरदास जी का यह दोहा मानव को चिंता त्यागने का संदेश देता है कि चिंता करना निष्प्रयोजन व हानिकारक होता है। इसलिए सारी चिंताएं हरि पर छोड़ दो और आप हर पल उसका स्मरण व चिंतन करो। कष्ट व दु:ख आप से कोसों दूर रहेंगे और आपदाएं आपके निकट आने का साहस नहीं जुटा पाएंगी। ‘सदैव प्रभु पर आस्था व विश्वास रखो, क्योंकि विश्वास ही एक ऐसा संबल है, जो आपको अपनी मंज़िल तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है’– स्वेट मार्टन की यह उक्ति मानव को ऊर्जस्वित करती है कि सृष्टि-नियंता पर अगाध विश्वास रखो और संशय को कभी हृदय में प्रवेश न पाने दो। इससे आप में आत्मविश्वास जाग्रत होगा। विश्वास सबसे बड़ा संबल है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचा देता है। इसलिए सपने में भी संदेह व शक़ को जीवन में दस्तक न देने दो। जीवन में खुली आंखों से सपने देखिए; उन्हें साकार करने के लिए हर दिन उनका स्मरण कीजिए और अपनी पूरी ऊर्जा उन्हें साकार करने में लगा दीजिए। स्वयं को कभी भी किसी से कम मत आंकिए… आपको सफलता अवश्य प्राप्त होगी।

जीवन में हर कदम पर हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं। सो! मानव को जीवन में नकारात्मकता को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि हमारी सोच, हमारी वाणी के रूप में प्रकट होती है और हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-विधाता होते हैं। इसलिए कहा गया है कि बोलने से पहले चख लेना श्रेयस्कर है। सो! अपनी वाणी पर नियंत्रण रखिए। सदैव सत्कर्म कीजिए। लफ़्ज़ों के भी ज़ायके होते हैं… चख कर उनका सावधानी-पूर्वक प्रयोग करना ही उपयोगी, कारग़र व सर्वहिताय है।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 10 ☆ वर्तमान परिदृश्य में आदर्श प्रेम और मानव प्रवृत्ति ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं अनुकरणीय आलेख  वर्तमान परिदृश्य में आदर्श प्रेम और मानव प्रवृत्ति।)

☆ किसलय की कलम से # 10 ☆

☆ वर्तमान परिदृश्य में आदर्श प्रेम और मानव प्रवृत्ति ☆

प्रेम समस्त ब्रह्मांड का एकमात्र बहुआयामी, व्यापक व परम् पावन ऐसा शब्द है, जिसे मानव के साथ समग्र प्राणी जगत भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अनुभव करता है। प्रेम की बोली, प्रेम प्रदर्शन, प्रेमिल क्रियाकलापों की अनुभूति सबके हृदय व चेतना को सकारात्मकता से ओतप्रोत कर देती है। ऐसा माना जाता है कि प्रेम पूर्व में एक निश्छल तथा सत्यपरक परम् कर्त्तव्य परायणता का आदर्श रूप माना जाता था। सर्वोत्कृष्टता के आधार पर राधा-कृष्ण के प्रेम से सम्पूर्ण जनमानस परिचित है। प्रेमान्त अथवा वियोग की परिणति मृत्यु का भी कारण बन जाती है। मनुष्य व पशु-पक्षियों के ऐसे अनेकानेक उदाहरण हम में से अधिकांशों ने देखे होंगे, जब एक निश्छल प्रेमी अपने प्रिय के वियोग में कुछ पल भी जीवित नहीं रहे। हमारी भारतीय संस्कृति व हमारे भारतीय इतिहास में ऐसे विविध उदाहरण व लेख हैं। ऐसे आदर्श प्रेम के बारे में यह सत्य ही कहा गया है कि प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है। उभय पक्षों का परस्पर प्रेम तभी सफलता की ऊँचाई पर पहुँचता है, जब प्रेम क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ, अहंकार, लोभ, मोह, आसक्ति, असमानता, भय, संशय, असत्य, घृणा जैसे नकारात्मक भावों की तिलांजलि न दे दी जाए। इनमें से एक भाव भी प्रेम के मध्य विद्यमान होने पर उसकी विराटता कलंकित हो जाती है। प्रेम किसी जाति-पाँति, रंग-रूप, लिंगभेद, उम्र, आदि का भेद नहीं करता। प्रेम देश, धर्म अथवा संस्कृति से भी हो सकता है, प्रेम मीरा, सूर, तुलसी के समान भी किया जा सकता है। प्रेम मानव की विचारधारा बदल देता है। प्रेम में डूबे मानव को आसपास के परिवेश में कुछ भी पराया नहीं लगता। प्रेम तो वह व्यापक और निष्कलंक धर्म के सदृश है जो हर किसी से किया जा सकता है। यह ईश्वर, प्रकृति, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, माता-पिता, भाई-बहन, पिता-पुत्र, माँ-बेटी, पति-पत्नी अथवा स्त्री-पुरुष किसी से भी हो सकता है। पूर्वकाल में नैतिक व मानवीय मूल्यों की सर्वोच्च महत्ता थी, तत्पश्चात ही अर्थ-स्वार्थ की बात आती थी, इसी कारण प्रेम को आदर्श स्थान प्राप्त था। प्रेम किसी पूजा-आराधना से कमतर नहीं होता। शनैःशनैः स्वार्थ, ऐशोआराम व धन के मोह ने हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त तो किया लेकिन अनैतिक कृत्यों व अवांछित स्वार्थगत गतिविधियों के क्रम को अंतहीन बना दिया।

आज इक्कीसवीं सदी के आते-आते वह आदर्श प्रेम गहन अंधकार की गहराई में विलुप्त होने को है। आज मात्र ‘प्रेम’ नामक शब्द ही शेष रह गया है, इसके मायने पूर्णरूपेण बदल चुके हैं। आज ऐसी कोई  मिसाल अथवा उदाहरण नजर नहीं आते, जिसे हम वास्तविक प्रेम कह सकें। ‘मैं उससे प्रेम करता हूँ’। ‘हम प्रेम की बातें करेंगे’। ऐसे वाक्य प्रेम को व्यक्त करने हेतु कदापि सक्षम नहीं हैं। प्रेम प्रदर्शित नहीं किया जाता, वह स्वयमेव अनुभूत होता है। युवक-युवती का किसी उद्यान में अकेले वार्तालाप करना प्रेम हो, यह आवश्यक नहीं है। यह आसक्ति हो सकती है, मोह भी हो सकता है। यह जरूरी नहीं है कि नौकर का मालिक के हितार्थ कार्य अथवा सेवा करना प्रेम की श्रेणी में आए, क्योंकि इसमें स्वार्थ हो सकता है, भय भी हो सकता है। मेरी दृष्टि में यह तथाकथित प्रेम का अनुबंध ही आज की परिपाटी बन गई है। आज तो किसी भी प्रकार से दूसरे पक्ष को खुश रखना, उसके हितार्थ काम करना, उसकी हाँ में हाँ मिलाना, उसकी प्रशंसा करना अथवा अपना स्वार्थ सिद्ध करना भी प्रेम की श्रेणी में गिना जाने लगा है। आज प्रायः एक पुत्र अपने पिता से प्रेम इसलिए करता है कि उसे माँ-बाप के रूप में अवैतनिक नौकर और उनके जीवन भर की कमाई तथा अचल-संपत्ति की चाह होती है। प्रेमी अथवा प्रेमिका के मध्य मोह, स्वार्थ व आसक्ति के भाव ही प्रमुख रूप से रहते हैं। मित्रता में भी परस्पर हित व अवसरवादिता ही दिखाई देती है। लाभपूर्ति के पश्चात अथवा अहम के आड़े आते ही यह मित्रता रूपी प्रेम फुर्र से उड़ जाता है। पड़ोसी या मोहल्ले वाले स्वार्थ, लाभ, लालच जैसे अनेक कारणों से छद्म प्रेम प्रदर्शित करते हैं। यह हमारी विवशता ही कहलाएगी कि हम यदि किसी से आदर्श प्रेम करना भी चाहें तो सामने वाला बदले में हमें वही प्रेम दे, आज की परिस्थितियों में ये संभव ही नहीं है। एक अहम बात यह भी है कि जब हमारे पास खाने को नहीं रहता, तब हम कमाने की होड़ में शामिल हो जाते हैं और जब हमारे पास अकूत धन-संपत्ति और खाने को रहता है, तब हम स्वास्थ्य कारणों से खा नहीं पाते। स्वास्थ्य, शांति, सुख व प्रेम की तलाश करते-करते हम पुनः पूर्ववत जीवन अपनाने हेतु बाध्य हो जाते हैं। निश्चित रूप से ये कमाई की होड़ ही हमें लालची, स्वार्थी, भ्रष्टाचारी व अचारित्रिक बनाती है, इसलिये ही यहाँ प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं बचता। तत्पश्चात बुढ़ापे में जब मानव इस प्रेम की तलाश करता है, तब तक अधिकांश हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं। आशय यह है कि जब एक अवधि के बाद हम अपने ही कमाए धन का उपयोग नहीं कर पाएँगे, तो हम वे सारे अनैतिक कार्य करते ही क्यों हैं? उतना धन एकत्र करते ही क्यों हैं, जिसे दान, धर्मशालाओं, चैरिटेबल आदि को देकर बुढ़ापे में शांति की कामना करना पड़े। प्रारम्भ में ही हमारे मानस में यदि प्रेम और सौहार्दभाव का बीजारोपण कर दिया गया होता तो हमारी स्वार्थलिप्तता हमें इतनी भावहीन न कर पाती। हम निश्छल प्रेम को बखूबी समझ गए होते।

प्रेम के कारक समाज में आपकी राह देख रहे हैं। संतोष, सदाचार व अपरिग्रह के भाव अपने हृदय में अंकुरित होने दें। मानव के प्रति प्रेमभाव जागृत करें। आपका जीवन कुछेक कठिनाईयों को छोड़कर शेष प्रेममय, आनंदमय व शांतिमय बीतने लगेगा। वृद्धावस्था में तनाव के स्थान पर शांति व प्रसन्नता का अनुभव होगा। हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है, कलयुग में अनैतिकता बढ़ेगी, बुराई, ईर्ष्या और द्वेष की वृद्धि होगी, प्रेम का पूर्ण अंत होगा, लेकिन अपने किये गए कर्मों से अपना वर्तमान तो सुधारा ही जा सकता  है। जैसा कि कहा गया है ‘हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा’। हो सकता है आपका प्रयास एक आंदोलन बने, आंदोलन एक अभियान बने और वह अभियान प्रेम को आदर्श दिशा की ओर मोड़ने में सफल हो।

आज ऐसे ही चिंतन की महती आवश्यकता है, जो समाज में आदर्श प्रेम को बढ़ावा दे सके एवं स्वयं को निश्छल, निःस्वार्थ तथा कल्याणकारी प्रेमपथ का अनुगामी बना सके।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ तिलिस्म ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ तिलिस्म ☆

….तुम्हारे शब्द एक अलग दुनिया में ले जाते हैं। ये दुनिया खींचती है, आकर्षित करती है, मोहित करती है। लगता है जैसे तुम्हारे शब्दों में ही उतर जाऊँ। तुम्हारे शब्दों से मेरे इर्द-गिर्द सितारे रोशन हो उठते हैं। बरसों से जिन सवालों में जीवन उलझा था, वे सुलझने लगे हैं। जीने का मज़ा आ रहा है। मन का मोर नाचने लगा है। लगता है जैसे आसमान मुट्ठी में आ गया है।  आनंद से सराबोर हो गया है जीवन।

…सुनो, तुम आओ न एक बार। जिसके शब्दों में तिलिस्म है, उससे जी भरके बतियाना है।जिसके पास हमारी दुनिया के सवालों के जवाब हैं, उसके साथ उसकी दुनिया की सैर करनी है।…..कब आओगे?

लेखक जानता था कि पाठक की पुतलियाँ बुन लेती हैं तिलिस्म और दृष्टिपटल उसे निरंतर निहारता रहता है। तिलिस्म का अपना अबूझ आकर्षण है लेकिन तब तक ही जब तक वह तिलिस्म है। तिलिस्म में प्रवेश करते ही मायावी दुनिया चटकने लगती है।

लेखक यह भी जानता था कि पाठक की आँख में घर कर चुके तिलिस्म की राह उसके शब्दों से होकर गई है। उसे पता था अर्थ ‘डूबते को तिनके का सहारा’ का। उसे भान था सूखे कंठ में पड़ी एक बूँद की अमृतधारा से उपजी तृप्ति का। लेखक परिचित था अनुभूति के गहन आनंद से। वह समझता था महत्व उन सबके जीवन में आनंद की अनुभूति का। लेखक समझता था महत्व तिलिस्म का।

लेखक ने तिलिस्म को तिलिस्म बने रहने दिया और वह कभी नहीं गया, उन सबके पास।

 

©  संजय भारद्वाज

# आपका दिन सृजनशील हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 56 ☆ जवाब ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता  “जवाब। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 56 – साहित्य निकुंज ☆

☆ जवाब ☆

क्या आप जानते हैं

हमें मिलते नहीं

कुछ सवालों के जवाब

सदियां बीत जाती है

युगों युगों तक

ढूंढते रह जाते हैं जवाब

पीढ़ी दर पीढ़ी

बढ़ती चली जाती है

अपना रूप रंग परिवर्तन

होता जाता है

और सवाल

बन जाते हैं एक धरोहर

सवाल खो जाते हैं

किसी भीड़ के साए में

खामोशी ओढ़ लेते हैं

और यहां से वहां

कुछ सवालों के जवाब

रेत की तरह ढह जाते हैं

नदिया में बह जाते हैं

समंदर में मिल जाते हैं.

सब

अपने के बहाव में बहते रहते हैं

इन्हीं सारे सवालों

की गुत्थी पर खड़ा होता है

समाज

तब फिर नए सवालों का जन्म होता है

नित नित

युगों युगों तक

सवाल उपजते हैं

तब भी

नहीं मिलता है उनका जवाब .।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ पिता का पत्र पुत्री के नाम ☆ – श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

हम आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  के हृदय  से आभारी हैं जिन्होंने  अभिभावकों एवं विद्यार्थियों के मार्गदर्शक के रूप में एक ऐतिहासिक पत्र हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने का अवसर दिया है। लगभग 87 वर्ष पूर्व लिखा यह पत्र  मात्र पत्र  ही नहीं अपितु एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जो आज भी प्रासंगिक है, जिसे राजनीतिक नहीं अपितु सामाजिक उत्थान के दृष्टिकोण से पढ़ा जाना चाहिए। इन पत्रों एवं पुस्तकों से सम्बंधित स्व पंडित जवाहरलाल नेहरू जी एवं स्व श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के कई चित्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं किन्तु उन्हें कॉपीराइट कारणों से नहीं दे रहे हैं। 

श्री अरुण डनायक जी  के ही शब्दों में 

यह पत्र आज से कोई 87 वर्ष पहले एक पिता ने अपनी चौदह वर्षीय पुत्री को जेल से पत्र लिखा। उन्होंने और भी बहुत सारे पत्र लिखे पर यह पत्र महत्वपूर्ण है, इसलिए कि बच्चे इस उम्र मे अपरिपक्व होते हैं और उन्हें अपने भविष्य की योजनाएँ बनाने हेतु मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। यह पत्र आज भी प्रासंगिक है क्योंकि आज भी इस उम्र के बच्चों को क्या पढ़ा जाय और कैसा व्यवसाय चुना जाय, भविष्य की क्या योजना हो, बताने वाला शायद  कोई नहीं है। मैंने जब इस पत्र को पढ़ा , जोकि मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया था, तो सोचा कि इसे सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित करूँ और साथ ही उन चौबीस स्कूलों के शिक्षकों को भी प्रेषित करूँ, जहाँ मेरे स्टेट बैंक के सेवानिवृत साथियों व अन्य मित्रों  के सहयोग से स्मार्ट क्लास शुरू की गई हैं, ताकि उन हज़ारों बच्चों को कुछ मार्गदर्शन मिल सके जिनके माता पिता उनसे बड़ी उम्मीदें पाल बैठे हैं।

☆ पिता का पत्र पुत्री के नाम ☆

देहरादून जेल

23 जनवरी 1933

प्यारी इंदु

साढ़े सात महीने के बाद होनेवाली हमारी मुलाक़ात आई और गई, तुम फिर बहुत दूर पूना में हो। तुम्हे तंदुरुस्त और खुश देखकर  मुझे अच्छा लगा। लेकिन ऐसी मुख्तसिर मुलाक़ात से क्या  फ़ायदा  जब हर बातचीत के लिए जल्दी करनी पड़े और बारबार घड़ी पर निगाह रखनी पड़े ? जो बहुत सी बातें मैं तुमसे कहना और दरियाफ्त करना चाहता था, उनमे से बहुत थोड़ी ही उस वक्त मुझे याद आ सकी। अब फिर मैं कई महीनों तक तुम्हे नहीं देख सकूंगा।

मैंने ख़त लिखकर मिस्टर वकील को यह सुझाव दिया है कि मैट्रिकुलेशन के बजाय तुम सीनिअर कैम्ब्रिज के लिए तैयारी करो। आगे अगर तुम्हे यूरोप में पढ़ना है तो सीनियर गालिबन ज्यादा मुनासिब रहेगा। आगे तुम कहाँ पढ़ोगी, यह मैं नहीं जानता। कभी मिलने पर इस पर गौर करना होगा। कोई जल्दी नहीं है। बहुत कुछ इस पर मुनहसिर होगा कि तुम क्या बनना चाहती हो। तुमने कभी इस बारे में सोचा है ? पिछले साल तुमने एक बार मुझे लिखा था कि तुम शिक्षक बनना चाहती हो। दूसरों को पढ़ाना बहुत बढ़िया काम है, लेकिन बेशक पढ़ाया तभी जा सकता है जब खुद बहुत सा सीख लिया गया हो। दुनिया में और बहुत से दिलकश काम हैं लेकिन अच्छी तरह से कुछ भी करने के लिए बहुत काफी ट्रेनिंग की जरूरत होती है। हिन्दुस्तान में लड़कों या लड़कियों के सामने रोज़गार या काम के बहुत से रास्ते नहीं खुले रहते। लड़कों की बड़ी तादाद वकील बनना या नौकरी करना चाहती है। लडकियाँ भी उसी ढर्रे पर चलने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यह तो पैसा कमाने का एक रास्ता हैI पैसा कमाना ही काफी अच्छी बात नहीं है, हालांकि मौजूदा दुनिया में कुछ पैसा कमाना ही पड़ता है। ज्यादा महत्व इस बात का है कि कुछ उपयोगी काम किया जाय, जिससे उस बड़े समाज का हित हो जिसमें हम रहते हैंI अपने पुराने पेशे वकालात को मैं निहायत नापसंद करता हूँ। मैं इसे असमाजिक पेशा कहता हूँ, क्योंकि इससे समाज को कोई फायदा नहीं होता। यह लोगों को लालची बना देता है और सिर्फ होशियार बनाता है कि दूसरों का खून चूसा जा सके। इस वास्ते मैं वकालात को अच्छा नहीं कह सकता। वह न कोई चीज पैदा करता है और न दुनिया की अच्छी चीजों में बढ़ोतरी करता है। वह तो महज दूसरों की चीजों का हिस्सा ले लेता है।

वकील के पेशे की तरह कुछ दूसरे असमाजिक धंधे भी हैं। दरअसल आज भी हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा इज्जत उन्ही लोगों को हासिल है जो खुद कुछ नहीं करते और उनके पुरखे उनके लिए जो कुछ छोड़ गए हैं, उसी के सहारे ऐशो इशरत की जिन्दगी बसर करते हैं। हमें इन सारे असमाजिक लोगों का ख्याल नहीं करना चाहिए।

काम के सामाजिक और उपयोगी स्वरुप क्या हैं? वे इतने सारे हैं कि मैं एक सूची तक नहीं बना सकताI हमारी आज की दुनिया ऐसी पेचीदा है कि इसे चालू रखने के लिए हज़ारों किस्म के कामों के जरूरत है। ज्यों ज्यों तुम बड़ी होती जाओगी और पढ़ोगी और तुम्हारी जानकारी का दायरा बढेगा , तुम्हे तरह तरह के इन कामों की कुछ झाँकी मिलेगी–दुनिया के मुख्तलिफ हिस्सों में करोड़ों लोग सामान तैयार कर रहे हैं-खाना, कपड़ा और बेशुमार दीगर चीजें। करोड़ों आदमी इन चीजों को दूसरों तक पहुंचा रहे हैं और बाँट रहे हैं। किसी दूकान पर तुम कोई चीज खरीदती हो। दूकान के पीछे सब तरह की फैक्टरियां और मशीने और मजदूर और इंजीनियर हैं। और फैक्टरियों के पीछे खेत हैं और खानें हैं, जिनसे कच्चा माल मिलता है। यह सब बहुत पेचीदा और दिलकश है। और करने लायक काम यह है कि हममें से हर किसी को इस उपयोगी काम में हाथ बँटाना चाहिए।

हम वैज्ञानिक बन सकते हैं, क्योंकि आज हर चीज के पीछे विज्ञान है ; या फिर हम इंजीनियर हो सकते हैं या वे जो विज्ञान का उपयोग आदमी की रोजाना जरूरतों के लिए करते हैं; या डाक्टर हो सकते हैं , जो इंसान की तकलीफ कम करने के लिए विज्ञान का उपयोग करते हैं और सफाई वगैरह के तरीकों और दीगर रोक-थाम के उपायों से बीमारियों को जड़ से उखाड़ते हैं; शिक्षक और शिक्षाविद हो सकते हैं, जो सब उम्र के बच्चों से लेकर बालिग़ मर्द-औरतों तक को पढ़ाते हैं ; या नए जमाने की जानकारी वाले किसान बनकर नए वैज्ञानिक उपायों से पैदावार बढ़ा सकते और इस तरह देश की दौलत बढ़ा सकते हैंI इसी तरह के बहुतेरे काम हो सकते हैं।

मैं तुमसे जो कहना चाहता हूँ वह यह है कि हम उस बहुत बड़ी जीती जागती चीज के हिस्से हैं, जिसे समाज कहते हैं, जिसमे सब तरह के मर्द-औरतें और बच्चें हैं। हम इस बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकते और अपनी मर्जी के मुताबिक़ जो चाहें वही नहीं करते रह सकते। यह तो वैसा ही होगा जैसे हमारी एक टांग बाकी जिस्म की परवाह किये बिना चलने का फैसला कर ले। इसलिए हमें अपने काम का डौल इस तरह बैठाना पड़ता है कि समाज को अपना काम निबटाने में मदद मिले, हिन्दुस्तानी होने की वजह से हमें हिन्दुस्तान में काम करना होगा। हमारे मुल्क में तरह तरह के तब्दीलियाँ होने जा रही हैं और कोई नहीं कह सकता की कुछ बरसों में इसकी शक्ल क्या होगी। लेकिन जिसे कुछ उपयोगी काम करने के ट्रेनिंग मिल चुकी है वह समाज का एक बेशकीमती सदस्य होता है।

मैंने यह सब सिर्फ इसलिए लिखा है कि तुम इसके बारे में सोच सको। बेशक मैं चाहता हूँ कि जब तुम बड़ी हो जाओ तो मजबूत बनो, अपने पैरों पर खडी हो सको और उपयोगी काम करने के लिए अच्छी तरह तालीम पा चुकी होओI तुम दूसरों पर मुनहसिर नहीं रहना चाहती। फैसला करने की अभी कोई जल्दी नहीं है।

अगर अपनी पढ़ाई के लिए तुम यूरोप जाना चाहो तो तुम्हे फ्रांसीसी भाषा अच्छी तरह से जाननी चाहिएI मैं यह भी चाहूँगा कि तुम जर्मन भी जान जाओ क्योंकि बहुत सी बातों के लिए यह काफी फायदेमंद है। लेकिन उसकी जल्दी नहीं है। उम्र जितनी कम होती है , भाषाएं सीखना उतना ही आसान होता है।

क्या तुम जानती हो कि अब तुम लगभग ठीक उसी उम्र की हो जो मेरी थी, जब मैं पहली बार दादू के साथ इंग्लैंड गया था और हैरो स्कूल में भर्ती कराया गया था। यह बहुत पुरानी बात है, 28 साल पहले की !

आज यहाँ बर्फ गिरी है और सारे पहाड़ बर्फ से फिर ढक गए हैं। इस खुशनुमा नज़ारे को देखने की खुशकिस्मती तुम्हे हासिल नहीं हो सकी।

मेरा ढेर सारा प्यार,

तुम्हारा प्यारा

पापू

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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