हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 55 ☆ बेबसी ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “बेबसी”। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 55 ☆

☆  बेबसी ☆

 

मालगाड़ी के उन डब्बों को

धीरे-धीरे पीछे की ओर जाते देख रही थी,

बिलकुल वैसे जैसे वो रेंग रहे हों…

 

रेंग तो सभी रहा है-

वो मजदूर, जो दो जून का खाना नहीं जुगाड़ पाते,

वो व्यापारी, जिनका व्यापार ठप्प सा पडा है,

देश की अर्थव्यवस्था, जो रुक सी गयी है,

वो डॉक्टर, जो थक गए हैं अब काम करते-करते-

कहीं भी तो किसी को कोई ऐसा स्टेशन आते नहीं दिखता

जहां बेंच पर लेटकर,

कुछ पल को आराम से पैर पसारकर

सुस्ता लें!

 

कहाँ सोचा था किसी ने कि प्रलय यूँ इस कदर

सारी दुनिया को निष्क्रिय कर देगी?

सब हताश से आसमान की ओर यूँ देख रहे हैं

जैसे कोई मसीहा आएगा और उनको कर देगा रिहा

उनकी सारी मुश्किलों से!

 

चलो, अच्छा ही है,

आदमी अब भी आकाश की ओर देख रहा है,

उसने बायीं ओर पलटकर अपनी आँख बंद नहीं कर ली-

वरना वो मान ही लेता कि मर चुका है वो

और उसे इंतज़ार भी नहीं रहता कि कोई उसे दफना ही दे

या फिर दे दे आग उसकी चिता को!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 42 ☆ व्यंग्य संग्रह – वे रचना कुमारी को नहीं जानते – श्री शांतिलाल जैन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़  सकते हैं ।

आज प्रस्तुत है  श्री शंतिलाल जैन जी  के  व्यंग्य  संग्रह   वे रचना कुमारी को नहीं जानते” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा। संयोग से  इस व्यंग्य संग्रह को मुझे भी पढ़ने का अवसर मिला। श्री शांतिलाल जी के साथ कार्य करने का अवसर भी ईश्वर ने दिया। वे उतने ही सहज सरल हैं, जितना उनका साहित्य। श्री विवेक जी ने भी उसी सहज सरल भाव से पैंतालीस कॉम्पैक्ट व्यंग्य रचनाओं परअपने सार्थक विचार रखे हैं। यह तय है कि एक बार प्रारम्भ कर आप भी बिना पूरी पुस्तक पढ़े नहीं रह सकते।)

साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 42 ☆ 

पुस्तक – वे रचना कुमारी को नहीं जानते

व्यंग्यकार – श्री शांतिलाल जैन

प्रकाशक – आईसेक्ट पब्लिकेशन , भोपाल

पृष्ठ – १३२

मूल्य – १२०० रु

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य  संग्रह  – वे रचना कुमारी को नहीं जानते– व्यंग्यकार – श्री शांतिलाल जैन

किताबों की दुनियां बड़ी रोचक होती है. कुछ लोगों को ड्राइंगरूम की पारदर्शी दरवाजे वाली आलमारियों में किताबें सजाने का शौक होता है. बहुत से लोग प्लान ही करते रहते हैं कि वे अमुक किताब पढ़ेंगे, उस पर लिखेंगे. कुछ के लिये किताबें महज चाय के कप के लिये कोस्टर होती हैं, या मख्खी भगाने हेतु हवा करने के लिये हाथ पंखा भी.

मैं इस सबसे थोड़ा भिन्न हूँ. मुझे रात में सोने से पहले किताब पढ़ने की लत है. पढ़ते हुये नींद आ जाये या नींद उड़ जाये यह भी किताब के कंटेंट की रेटिंग हो सकता है.  अवचेतन मन पढ़े हुये पर क्या सोचता है, यह लिख लेता हूँ और उसकी चर्चा कर लेता हूँ जिससे मेरे पाठक भी वह पुस्तक पढ़ने को प्रेरित हो सकें.

श्री शांति लाल जैन जी अन्य महत्वपूर्ण सम्मानो के अतिरिक्त प्रतिष्ठित डा ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य सम्मान २०१८ से सम्मानित सुस्थापित व्यंग्यकार हैं . “वे रचना कुमारी को नहीं जानते” उनका चौथा व्यंग्य संग्रह है . लेखन के क्षेत्र में बड़ी तेजी से ऐसे लेखको का हस्तक्षेप बढ़ा है, जिनकी आजीविका हिन्दी से इतर है. इसलिये भाषा में अंग्रेजी, उर्दू का उपयोग, सहजता से प्रबल हो रहा है. श्री शान्तिलाल जैन जी भी उसी कड़ी में एक बहुत महत्वपूर्ण नाम हैं, वे व्यवसायिक रूप से बैंक अधिकारी रहे हैं.

किताब की लम्बी भूमिका में डा ज्ञान चतुर्वेदी जी ने उन्हें एक बेचैन व्यंग्यकार लिखा, और तर्को से सिद्ध  भी किया है. लेखकीय आभार अंतिम पृष्ठ है.  मैं श्री शांति लाल जैन जी को पढ़ता रहा हूँ, सुना भी है . “वे रचना कुमारी को नहीं जानते ” पढ़ते हुये मेरी मेरी नींद उचट गई, इसलिये देर रात तक बहुत सारी किताब पढ़ डाली. मैने पाया कि उनका मन एक ऐसा कैमरा है जो जीवन की आपाधापी के बीच विसंगतियो के दृश्य चुपचाप अंकित कर लेता है. मैं डा ज्ञान चतुर्वेदी जी से सहमत हूं कि वह दृश्य लेखक को बेचैन कर देता है, छटपटाहट में  व्यंग्य लिखकर वे स्वयं को उस पीड़ा से किंचित मुक्त करते हैं . वे प्रयोगवादी हैं.

लीक से हटकर किताब का नामकरण ही उन्होंने “ये तुम्हारा सुरूर” व्यंग्य की पहली पंक्ति “वे रचना कुमारी को नहीं जानते” पर किया है , अन्यथा इन दिनो किसी प्रतिनिधि व्यंग्य लेख के शीर्षक पर किताब के नामकरण की परंपरा चल निकली है. इसलिये संग्रह के लेखो की पहली पंक्तियो की चर्चा प्रासंगिक है.  कुछ लेखो की पहली पंक्तियां उधृत हैं जिनसे सहज ही लेख का मिजाज समझा जा सकता है. पाठकीय कौतुहल को प्रभावित करती लेख की प्रवेश पंक्तियो को उन्होंने सफल न्यायिक विस्तार दिया है.

वाइफ बुढ़ा गई है … , ” मि डिनायल में नकारने की अद्भुत प्रतिभा है” कार्यालयीन जीवन में ऐसे अनेको महानुभावो से हम सब दो चार होते ही हैं, पर उन पर इस तरह का व्यंग्य लिखना उनकी क्षमता है. इसी तरह आम बड़े बाबुओ से डिफरेंट हैं हमारे बड़े बाबू ,हुआ यूं कि शहर में एक्स और वाय संप्रदाय में दंगा हो गया …

उनके लेखन में मालवा का सोंधा टच मिलता है “अच्छा हुआ सांतिभिया यहीं पे मिल गये आप” मालगंज चौराहे पर धन्ना पेलवान उनसे कहता है . ….

या पेलवान की टेरेटरी में मेंढ़की का ब्याह …

वे करुणा के प्रभावी दृश्य रचने की कला में पारंगत हैं ..

बेबी कुमारी तुम सुन नही पातीं, बोल नही पाती, चीख जरूर निकल आती है, निकली ही होगी उस रात. बधिर तो हम ठहरे दो दो कान वाले . …

राजा, राजकुमार, उनके कई व्यंग्य लेखो में प्रतीक बनकर मुखरित हुये हैं. गधे हो तुम .. सुकुमार को डांट रहे थे राजा साहब …. , या बादशाह ने महकमा ए कानून के वजीर को बुलाकर पूछा ये घंटा कुछ ज्यादा ही जोर से नही बज रहा ?

मुझे नयी थ्योरी आफ रिलेटिविटी रिलेटिंग माडर्न इंडिया विथ प्राचीन भारत पढ़कर मजा आ गया. इसी तरह छीजते मूल्य समय में विनम्र भावबोध की मनुहार वादी कविताएं वैवाहिक आमंत्रण पत्रो पर मुद्रित पंक्तियो का उनका रोचक आब्जरवेशन है. इसी तरह समय सात बजे से दुल्हन के आगमन तक भी वैवाहिक समारोहो पर मजेदार कटाक्ष है.

वे लोकप्रिय फिल्मी गीतों का अवलंबन लेकर लिखते मिलते हैं, जैसे महिला संगीत में बालीवुड धूम मचा ले से शुरूकरके, जस्ट चिल तक पहुँचता गुदगुदाता भी है, वर्तमान पर कटाक्ष भी करता है.

मैं पाठको को अपनी कुछ विज्ञान कथाओ में अगली सदियो की सैर करवा चुका हूँ इसलिये आँचल एक श्रद्धाँजंली पढ़कर हँस पड़ा, रचना यूँ  शुरू होती है “३ जुलाई २०४८ … आप्शनल सब्जेक्ट हिंदी क्लास टेंथ . …

पैंतालीस काम्पेक्ट व्यंग्य लेख. वैचारिक दृष्टि से नींद उड़ा देने वाले, सूक्ष्म दृष्टि, रचना प्रक्रिया की समझ के मजे लेते हुये, खुद के वैसे ही देखे पर अनदेखे दृश्यो को याद करते हुये जरूर पढ़िये.

रेटिंग – मेरे अधिकार से ऊपर

समीक्षक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ दृष्टि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ दृष्टि ☆

तुम्हारी आँख में भविष्य के सपने हैं।

…मैं आशान्वित हुआ।

 

तुम्हारी आँख में भविष्य का मानचित्र है।

…मैं उत्साहित हुआ।

 

तुम्हारी आँख में भविष्य के लिए संघर्ष और श्रम की ललक है।

…मैं आनंदित हुआ।

 

तुम्हारी आँख में तुम्हारा भविष्य साफ-साफ दिखता है।

…मैं धन्य हुआ।

 

©  संजय भारद्वाज 

7 अगस्त 2020, संध्या 6:13 बजे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिव्यक्ति # 25 ☆ कविता – आजमाइश ☆ हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को नियमित स्वरूप देने के प्रयास में इस स्तम्भ के माध्यम से आपसे संवाद भी कर सकूँगा और रचनाएँ भी साझा करने का प्रयास कर सकूँगा।  आज प्रस्तुत है  एक कविता  “आजमाइश”। )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 25

☆ आजमाइश ☆

 

बचपन से मिली थी

कागज-स्याही की

बेशकीमती अमानत,

अब

कागज सदन में

स्याही चेहरों पे

उड़ाने लगे हैं लोग।

 

बचपन से पढ़ा था

मजहब नहीं सिखाता

आपस में बैर रखना,

अब

किससे बैर रखना है

सिखाने लगे हैं लोग।

 

गांधी के बंदरों में

कलम थामे

यह चौथा कौन है?

अब

उसकी आजमाइश को

आजमाने लगे हैं लोग।

 

बसी है देशभक्ति

हमारी रगों  में जन्म से

फिर क्यों

कौन भक्त, कौन देशभक्त है?

बताने लगे हैं लोग।

 

बेहद मुश्किल है लिखना

अब पैगाम अमन का,

गर लिख दिया

तो खामियाँ

दिखाने लगे हैं लोग।

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

25 अक्टूबर  2020

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 67 – कन्याभोज ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर लघुकथा  “कन्याभोज।  निश्चित ही धर्मकर्म और भेदभाव से ऊपर निश्छल हृदय और भावनाएं होती हैं / शिक्षाप्रद लघुकथाएं श्रीमती सिद्धेश्वरी जी द्वारा रचित साहित्य की विशेषता है। इस सार्थक  एवं  भावनात्मक लघुकथा  के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 67 ☆

☆ लघुकथा – कन्याभोज ☆

कल्लो बाई एक बड़े सेठ मारवाड़ी के यहाँ घर का सारा काम करती थी। यूँ कह लीजिए कि सभी कल्लो बाई की टेर लगाते रहते थे।

सफाई, बर्तन, कपड़े और बाजार से क्या लाना है, धोबी के यहाँ कपड़े कितने गए, सभी का हिसाब कल्लो बाई के पास होता था। कभी- कभी घर में मेम साहिबाओं के सिर में तेल लगाने का भी काम बड़े प्रेम से कर दिया करती थी। बदले में कुछ ज्यादा पैसे मिल जाते थे। जिससे उसकी अपनी  बिटिया का शौक पूरा करती थी।

अपनी बेटी रानी को बहुत  प्यार से रखी थी। ईश्वर का रुप मानती थी। गरीबी से दूर रखना चाहती थी। पर गरीबी के कारण कुछ कर नहीं पाती थी।

छोटा सा झोपड़पट्टी का घर नशे की आदत से पति का देहांत हो चुका था।

नवरात्रि की नवमीं के दिन सेठ जी के यहां कन्या भोज का आयोजन था। कल्लो की बिटिया भी जिद्द कर उसके साथ वहाँ चली गई।

मोहल्ले में घूम-घूम कर कल्लो ने अपने सेठ जी के घर के लिए कन्याएं एकत्रित किए।

परंतु उनके घर से किसी ने भी उनकी नन्हीं सी बिटिया को नहीं देखा। किसी ने कहा भी तो घर की महिलाएं बोली… उसको गिनती में नहीं लेंगे उसको अलग से प्रसाद दे दिया जाएगा।

कन्याओं का पूजन कर भोजन कराया गया। बच्ची देखती रही और अपनी माँ से पूछा… मुझे क्यों नहीं बिठाया जा रहा। इनके साथ क्या मैं कन्या नहीं हूँ ?? क्या? मैं इन से अलग बनी हूँ । मां के पास कोई जवाब नहीं था। आंखों से अश्रु की धार बह निकली और बस इतना ही बोली… हम लोग गरीब है।

कन्या भोजन के बाद घर की महिलाओं ने बचा हुआ और थोड़ा सा प्रसाद मिलाकर बाँधकर थाली में जो कुछ छूट गया था उसकी लड़की को देकर कहा यह ले जाओ घर में खा लेना।

बच्ची ने झट पकड़ लिया। माँ काम निपटा कर अपनी बेटी को लेकर घर आई और वह प्रसाद  घर के बाहर दरवाजे पर रखकर चली आई।

घर आकर साफ-सुथरा भोजन बनाकर वह अपनी बिटिया को पटे पर बिठा माँ  ने पूजन कर तिलक लगा आरती उतार कहने लगी… मैं अपनी कन्या का पूजन खुद करुँगी । इतने भीड़ में मेरी कन्या का पूजन अच्छा थोड़ी होगा।

बिटिया भी समझदार थी दुर्गा की कहानियाँ हानियां टी वी से देखती सुनती और समझती  थी। शक्ति का अवतार माँ भगवती दुर्गा नारी शक्ति माँ ही होती है। उसने अपनी माँ  को अपने पास बुला कर बिठाया और तिलक लगाकर बोली माँ मेरी रक्षा के लिए आपकी पूजन होना बहुत जरूरी है।

दोनो माँ बेटी की इस तरह की बातों को सेठ जी के घर से उनका लड़का जो सामान देने घर आया हुआ था देख रहा था।  वह अत्यन्त अत्यंत भावुक उठा और हाथ जोड़कर बोला….. सच में यही कन्या पूजन और यही शक्ति पूजन है। जाने अनजाने हमारे घर वालों से बहुत बड़ी गलती हुई हैं। मैं घर जाकर अभी सभी को बताता हूं। और भाव विभोर हो घर की ओर बढ़ चला।

माँ और बिटिया प्रसन्नता पूर्वक अपना प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। सच में आज मां शक्ति और कन्या भोज दोनों का पूजन एक साथ हो रहा था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 69 ☆ तरी म्हणे बायको.. ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 69 ☆

☆ तरी म्हणे बायको.. ☆

 

घरासाठी तीच राबराब राबते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

सगळ्यांना उठताच हवा आहे चहा

घरी माणसं दोनच वा असोत दहा

सगळ्यांचा चहा टेबलावर ठेवते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

झाडलोट जन्मजात मिळते ही कला

घाम करी फरशिचा बोळा हा ओला

घर नीटनेटकं नि साफसुफ ठेवते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

नाष्टा प्रत्येकाला वेगळाच हवा

कुणी म्हणे थालिपीठ कुणी म्हणे रवा

दोन तलवारीनेच युद्ध ती लढते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

खाली आहे आग वर ठेवला तवा

तिचा अग्निहोत्राशी रोज खेळ नवा

हात अन् भाकरी दोन्हीही भाजते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

चपळता यावी म्हणून टाकते कात

कमी नाही कुठे ही बाईची जात

संकटांना साऱ्या ती पुरून उरते

तरी म्हणे बायको कुठे काय करते

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भूल ☆ श्री मुबारक उमराणी

श्री मुबारक बाबू उमराणी

☆ कवितेचा उत्सव :  भूल  ☆ श्री मुबारक उमराणी ☆

फुलपाखराचे गुज

फुल ऐकत बसले

रंग पंखात बघून

देवावरच रुसले

 

पंख दोन पाखराचे

छान कसे गिरविले

रंग पतंग होऊनी

दोरीविना फिरविले

 

माझ्या पाकळ्या पंखात

एक दोन दिले रंग

उडताही हो येईना

मनचित्र झाले भंग

 

वारा झुलवितो मला

वाटे मला पंख आले

देठातच माझे सारे

मन ओले दुःखी झाले

 

सारे मला समजवी

गंध सुगंध सुवास

फुलपाखरात नसे

तुला दिले गंध खास

 

मनोमनी हसे फुल

आत्मशक्ती होई भूल

गंध मकरंद हर्ष

चढविले देवा झुल

 

© श्री मुबारक बाबू उमराणी

शामरावनगर, सांगली

मो.९७६६०८१०९७.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ कथा – पाऊस-2 ☆ श्री आनंदहरी

☆ जीवनरंग ☆ कथा – पाऊस-2 ☆ श्री आनंदहरी ☆

तिने चुलीवर चहाचं आदण ठेवलं होतं. सासू आल्यावर संगं संगं चहा घ्यायचा आणि स्वैपाकाच्या तयारीला लागायचं असा विचार तिने केला होता.. पण तिच्या आदमासापेक्षा सासूला यायला जास्तच उशीर झाला तशी मनात दाटू लागलेली काळजी.. ‘भेटलं असेल कुणीतरी..बसल्या असतील पारभर..’ असा विचार करत तिने चुलीतील राख बाजूला सारावी तशी बाजूला सारत चहाचे भुगुनं चुलीवरून उचलून वैलावर ठेवलं आणि चुलीवर तवा ठेवत, बसल्या जागेवरूनच फडताळाजवळचा भाकरीच्या पिठाचा डबा आणि परात जवळ ओढली..परातीत पीठ घेऊन तवलीतले पाणी घेऊन पीठ मळायला सुरवात केली.. चुलीतील जाळ कमी झालेला पाहताच फुंकणीने जाळ केला आणि भाकरी थापायला घेतली..

पहिली भाकरी तव्यात टाकून दुसरी मळायला घेतली. तेवढ्यात बाहेर कसलातरी गलका ऐकू आला.. कसला गलका झाला ते  सुरू असलेल्या पावसामुळे नीट ऐकू येईना.. नकळत तिचं काळीज हरणीवानी झाले तशी परात बाजूला सारून ती उठली.  सोप्यावर आली.. पण नेमका कशाचाच अंदाज येईना. उगा काळजी मनाला पोखरू लागली. जीव काही राहिना.. ती मागे परतली तोवर तव्यातली भाकरी करपली होती.. तिने तवा खाली उतरून ठेवला..चुलीतील लाकडं इस्तू झाडून बाजूला सारली आणि कसेबसे दार लोटून घेत पळतच गलक्याच्या दिशेने धावतच सुटली.  मारुतीच्या देवळाकडनं गलका ऐकू येत होता. तिचं घर गावाच्या एका टोकाला तर मारुतीचे देऊळ दुसऱ्या टोकाला होतं. ती जसजशी देवळाजवळ जात होती तसे गलका जास्तच ऐकू येऊ लागला होता पण पावसानं नीटसं ऐकू येत नव्हतं. पळता पळता मध्येच कुठून तरी  ‘ पान लागलं..’ असे शब्द तिच्या कानावर आले.. तिचं काळीज लख् कन हाललं… गावंदरीच्या रानात नाग-सापाचा वावर होता हे तिला ठाऊक होतं.. मनातल्या शंका-कुशंकांनी तिच्या पायातले त्राणच गेले होते… पण तरीही ती जिवाच्या करारावर पळत राहिली होती.

मारुतीच्या देवळाजवळ सारा गाव गोळा झाल्यागत दिसत होता. ती पावसात चिंब निथळतच देवळाजवळ आली.. तिला पाहताच दोघी तिघी बायका तिच्या जवळ आल्या तिला थोपवलं. तिला जवळ धरतच हळूहळू देवळाच्या मंडपाकडे सरकू लागल्या.. तिला नेमकं काय होतंय तेच समजेना.. तेवढयात एकीने विचारलं..

“रामा कुनीकडे गेलाय ?”

ही बाई नवऱ्याची चौकशी का करतेय ? आपल्या हातांना असे का धरलंय ? तिला काहीच समजत नव्हतं.. पण त्यामुळे तिच्या मनाला पुन्हा आशंकांनी घेरलं. तिला पुढं जायचे होते..पण तिला थांबवत एक म्हातारी  पाणावल्या डोळ्यानं म्हणाली,

“आगं, रखमीला पान लागलं..”

आपल्या सासूला पान लागलंय हे ऐकून तिच्या पायातील त्राणच गेले. ती मटकन तिथंच खाली बसली.

तोवर मंडपाच्या दाराशी असणारी गर्दी हटवण्यासाठी पाटील ओरडले,

“ये चला रं, सरका बाजूला.. आन कुणीतरी रामा कुठाय ती बघून त्येला म्होरं घालून तेच्या घरला घेऊन या जावा..”

गर्दी मागं सरली.. रखमा गेली ते जाणत्या बाया माणसांनी ओळखले होते. त्यातली एक तिच्या भोवतीच्या बायकांना म्हणाली,

“हिला घरला जावा घिऊन..”

बायका तिला घरी घेऊन निघाल्या..पण एवढ्या सगळ्या बायकांत तिला तिची सासू दिसली नव्हती.. तिला रडावं, ओरडावं, आक्रोश करावा असे वाटत होतं पण ती स्तब्ध होती.. दगडाच्या मूर्ती सारखी, भान हरपल्यासारखी.. बायका तिला घेऊन घराकडे निघाल्या होत्या.  त्यांच्या डोळ्यात पाणी होतं… पण तिचे डोळे ठक्क कोरडे होते. नाही म्हणायला पावसाचा जोर वाढला होता. पावसाचे थेंब तिच्या चेहयावरून ओघळत होते…कुणीतरी छत्री धरली होती तरीही..

तिची सासू, रखमा पान लागून गेली होती तेंव्हापासून रात्रभर पाऊस नुसता कोसळत होता.

क्रमशः ——–  भाग 3

© श्री आनंदहरी

इस्लामपूर, जि. सांगली

भ्रमणध्वनी:-  8275178099

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ ‘ हाव ‘. . . एक बांडगूळ. . ! ☆ श्री अरविंद लिमये

श्री अरविंद लिमये

☆ विविधा ☆  ‘ हाव ‘. . . एक बांडगूळ. . ! ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

हाव. दिसायला दोन अक्षरी एक साधा शब्द, पण त्यात नकारात्मक अर्थांचे विविध छटांचे रंग ठासून भरलेले. . ! कांही हवं असणं आपण समजू शकतो, पण अंत नसलेलं ‘आणखी हवं’ ही उध्वस्ततेची सुरुवात ठरते. आणखी हवं असणं म्हणजे हव्यास. हव्यास म्हणजे विध्वंसाची ठिणगीच जणू. कारण कोणत्याही हव्यासाचं असणं परोपकारासाठी, जनसुखाय -जनहिताय कधीच नसतं. ते तसं असूच शकत नाही. ते असतं स्वत:साठी, . . स्वार्थासाठी. ! म्हणूनहव्यासाची परिणती अर्थातच विनाश हेअपरिहार्यच. खरं तर विश्व निर्माण झालं तेव्हाच निसर्गनियमही अस्तित्वात आले. हे नियम निसर्गातले सर्व घटक काटेकोरपणे पाळत असतात. अपवाद फक्त माणसाचा.  पैसा, पद, प्रतिष्ठा, सुख यांच्या हव्यासापायी निसर्गाचे सगळे नियम धाब्यावर बसवण्याच्या सुरुवातीचा पहिला क्षणच विनाशकाले विपरीत बुध्दी ठरला.  आपलं जगण्याचं निसर्गाला अपेक्षितच नव्हे तर अभिप्रेतही असलेलं प्रयोजनच माणूस विसरुन गेला आणि विनाशाच्या दिशेने त्याचा प्रवास सुरु झाला.

निसर्गाने माणूस निर्माण केला आणि त्याला बुध्दीचं वरदान दिलं. त्या बुध्दीचा  सर्व निसर्गघटकांच्या हितासाठी त्याने योग्य उपयोग करणे अपेक्षित होते. पण हव्यासाच्या अतिरेकामुळे सुखासमाधानाच्या मृगजळामागे धावता धावता निसर्गानेच दिलेलं बुध्दीमत्तेचं कोलीत हातात घेऊन सर्वाना प्रकाश दाखवणे अपेक्षित असताना अतिरेकी हव्यासामुळे माणूस ते क़ोलीत घेऊन सगळा निसर्गच जाळत सुटलाय.

माणसाचं हे अनैसर्गिक जगणंच त्याला आज विनाशाच्या अखेरच्या वाटेवर घेऊन आलंय.

निसर्गाला अपेक्षित असणारं  माणसाचं ‘ जगणं’ हे एका अतिशय सुखी, समाधानी, समृध्द,  सुंदर अशा जगाच्या निर्मितीला निमित्त झालं असतं.  एरवी अगदी सहज वास्तवात येऊ शकलं असतं असं ते सुंदर जग आज माझ्या मनात मला स्वच्छ दिसतंय, पण. . स्वप्नवतच.  म्हणूनच ते रुखरूख वाढवणारं ठरतंय. काहीतरी निसटून गेल्याची रुखरुख.  निसर्गाला अभिप्रेत असलेल्या त्या सुंदर जगाचं दर्शन   तुमच्याही मनात ती रुखरुख निर्माण करेल आणि कदाचित नव्या वाटा शोधण्याची असोशीही. . . . !

कसं आहे हे हवंहवंस जग?हे जग आणि अर्थातंच इथलं जगणंही अतिशय निरामय

आणि  सुंदर आहे. या जगात माणुसकी हा एकच धर्म अस्तित्वात आहे. ॐकार हाच प्रत्येकाचा देव आहे. घरं मंदिरासारखी पवित्र आहेत आणि त्या घरांऐवजी प्रत्येकाच्या मनामधे देव्हारे आहेत. त्या देव्हार्यात ॐकाराची पूजा नित्यनेमाने होते. नीतिनियमांनुसार आचार हे प्रत्येकाचे व्रत, आणि त्यातून मिळणारं समाधान हा पूजेचा प्रसाद. . !निसर्गाचे सर्व नियम इथे सर्वानी मनापासून स्विकारलेत. त्यामुळे निसर्गालाही कृतकृत्य वाटतेय. त्यामुळे निसर्ग छान खुललाय. फुललाय. निसर्गचक्राचा स्वत:चा ताल, वेग सर्वांसाठीच हवाहवासा, आनंददायी ठरतो आहे. निसर्ग प्रसन्न आहे, त्यामुळे माणसेच नव्हे, तर मनुष्येतर प्राणीही अतिशय समाधानी आहेत. माणसांनी त्याना अभयारण्यांऐवजी अभयच देऊ केल्यामुळे मानवाचा अधिकार त्यानीही मनापासून स्विकारलाय आणि स्वत:च्या अरण्यकक्षेत ते आनंदाने जगतायत. माणसांचं नागरी जीवन त्यामुळे भयमुक्त आणि श्वासोच्छवासासारखं सहजसुंदर आहे. पृथ्वीच्या अंगाखांद्यावरचं जनसंख्येचं अतिरिक्त ओझं आता कमी झालंय. त्यामुळे पृथ्वीसुध्दा निरोगी आणि नीतिमान माणसांचं आस्तित्व अलंकारांसारखं मिरवतेय. . . !

या जगात प्रत्येकजण सुखी आहे आणि समाधानीही. . !

प्रत्येकाला स्वत:च्या कुटुंबाचं असं घर आहे. ते एकमजलीच आहे. घरापुढे प्रशस्त अंगण आहे आणि फुललेली हसरी बागही. त्या बागेतल्या गोड,  रसाळ फळांसारखाच प्रत्येकाचा संसार आहे.

रस्तेआहेत आणि ते स्वच्छ, चकचकीत आहेत. पादचार्यांसाठी खास अभयरस्ते आहेत. वाहनांसाठी अर्थातच वहातुकीचे वेगळे रस्ते. त्यामुळे रस्त्यातून चालणं आणि वहान चालवणंही आनंददायी आणि निश्चिंत आहे.

एकमजली बैठ्या घरांमुळे सूर्यही प्रसन्न आहे. त्याच्या आनंदप्रकाशी किरणांतून पसरणार्या प्रकाशाची कोणत्याही अडसरावीना आता मुक्त उधळण होऊ शकतेय. त्यामुळे या वातावरणात भरुन राहिलेल्या सौरशक्तीवरच सर्व वाहने चालतायत. त्यामुळे संपूर्ण निसर्गच प्रदूषण, धुराचा वास, आणि सहवास यापासून पूर्णपणे मुक्त आहे. शाळा आहेतच, त्याना प्रशस्त पटांगणेही आहेत. घरांसारख्या शाळाही नैसर्गिक संस्कारकेंद्रे आहेत. मुलं फुलांसारखी सुंदर आहेत. त्याना शाळा घरांइतक्याच प्रिय आहेत. . !

कौटुंबिक पार्श्वभूमीवर श्रमविभागणी आहे. नेमून दिलेली सर्व कामे प्रत्येकालाच आळीपाळीने करावी लागतात. तिथे स्त्री, पुरुष, मुलगा, मुलगी याऐवजी प्रत्येकाचा एक व्यक्ती म्हणूनच विचार होत असल्याने सर्वानाच सर्वप्रकारच्या कामांचं कौशल्य अंगी बाणवणं शक्य होतं. या जगात वृध्दांचं वार्धक्य तरुणांच्या निगराणीखाली कृतार्थ आहे. . !इथे मरणही आहेच, आणि ते  जगण्याइतकंच सुंदरही आहे. कारण ते भयमुक्त आहे. निसर्गनियमांनुसार योग्यवेळी येणारा हा मृत्यू अट्टाहासाने कांहीही करून जगण्याचा हव्यास नसल्याने कृतार्थही आहे. आणि म्हणूनच पुन्हा सळसळत्या जीवनाचा उपभोग घेण्यासाठी टाकल्या जाणार्या कातीसारखि तो सहजसुंदर आहे.

हे स्वप्नवत वाटेल सगळं, पण हे वास्तवात उतरणं अशक्य नसणारं स्वप्न आहे. मात्र सर्व स्तरांवर फोफावलेल्या हव्यासांची बांडगुऴं हाच यातला एकमेव अडसर आहे. . !त्या बांडगुळाचा नाश करायचा की फक्त जिवंत रहाण्यासाठी घुसमटत जगायचं या प्रश्नाचं योग्य उत्तर शोधता आलं,  तरच स्वप्न आणि वास्तवातली सीमारेषा पुसली जाईल. . !

© श्री अरविंद लिमये

सांगली

मो ९८२३७३८२८८

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ जीवन गाणे -2 ☆ सौ. अंजली गोखले

☆ मनमंजुषेतून ☆  जीवन गाणे -2 ☆ सौ. अंजली गोखले ☆

आपल्यालासुद्धा आनंद देणारा.  उत्साह वर्धक असाच तो कार्यक्रम आहे असे मला वाटले.पण आपल्याकडे त्यापेक्षा विरुद्ध परिस्थिती आहे असे मला जाणवले.आत्ता या घडीला साठे च्या पुढचे.  पंच्याहत्तरी पर्यंतच्या लोकांनाहे म्हणणे पटेल.हे लोक तरुण असताना.  तरुणां सारखे वागायला मिळाले का त्यांना?सतत वयाने मोठ्यांचा मान राखायचा.  त्यांचे सांगणे ऐकायचे आणि त्याच प्रमाणे वागायचे.अश्या जबरदस्त पगड्याखाली.  रहावे लागल्या कारणाने.  सतत एक प्रकारचा दबाव त्यांच्यावर होता.त्यामुळे मनमुराद हसणे.  गप्पा मारणे.  सहकाऱ्यांबरोबर फिरणे अशा साध्या साध्या आनंदापासून ही मंडळी वंचित राहिली.घरचे काय म्हणतील?त्यांना आवडणार नाही.  त्यांनी एकदा नको म्हटले ना.  मग नको.अशा दबावाखाली त्यां चं तरुण पण संपलं .

विशेष करून महिलावर्ग या बाबतीत जास्तच दबला गेला .एखादी डिग्री मिळाली की त्यांचे पंख छाटले जायचे .संशोधन सुरू .मग इतरांच्या म्हणण्याला होकार देऊन.  माहेरचा मोकळा.  आनंदी स्वच्छंदी उंबरा ओलांडून.  टिपिकल वर्चस्वाचा दुसरा उंबरा ओलांडून. दुसऱ्या घरी जायचे. तिकडे गेल्यावर आपल्या आवडीनिवडी बाजूला ठेवायच्या.  स्वभाव बदलायचा.  पदरी पडले पवित्र झाले.  या नात्याने नवीन पण रटाळ आयुष्याला मन मारून सुरुवात करायची.खुर्चीत एखादी चे मत विचारले जायचे.  पण ते म्हणणेविचारात घेतले जाईल असे नाही .मग अशा सगळ्या वातावरणात तरुणपणीच.  मनाचे वृद्धत्व जाणवायला लागायचे.उडणाऱ्या पक्षाला पिंजऱ्यात कोंड्यावर तो लवकर म्हातारा होणारच ना!मग किती का गोड-धोड.  चांगले चांगले खायला घाला.  मानसिक वृद्धत्व आले किती घालवणे अवघड.

कोणालाही त्या त्या वयामध्ये.  जे येते.  जे करायला आवडते.  रुचते.  ते थोड्या प्रमाणात का होईना.  पण करायला मिळाले पाहिजे.सचिन तेंडुलकरच्या हातातून पंधराव्या वर्षी बॅट काढून घेतली असती.  तर त्याचे खेळणे फुलले असते का?त्याने इतके उत्तुंग ध्येय गाठले असते का?लता मंगेशकर ना मधुर गळ्यातून गायची संधी न देता.  दोन वेळेच्या भाकऱ्या बडवायला लावल्या असत्या.  तर आपल्याला अविट गाणी ऐकायला मिळा लीअस ती का?

आवडीचे काम करायला मिळाल्यावर शरीर हे सुदृढ राहते.  मन प्रसन्न राहते.  काम करायला उत्साह येतो आणि आनंदी आनंद उपभोगायला मिळतो.अशी व्यक्ती स्वतःही आनंदी राहते आणि दुसऱ्यालाही आनंद वाटते.असे हे सरळ वागणे .   फार थोड्यांच्या वाट्याला येते .बहुतेकांच्या बाबतीमध्ये सुरवंटाचे फुलपाखरू होण्याऐवजी फुलपाखराचे सुरवंट होते .

आयुष्याच्या प्रत्येक टप्प्यावर गरज आहे.  ती सुरवंटाचे फुलपाखरू होऊ द्यायची.फुलपाखराचे गुन्हा सुरवंट न होऊ देण्याची.बाल्यावस्थेपासून वृद्ध अवस्थेपर्यंत प्रत्येकाला या संक्रमण आम मधून जावेच लागते.गरज आहे ती सावरण्याची !अशा कठीण प्रसंगी आपले मनोबल ढळू न देण्याची .कुणीतरी येईल आपल्याला मदत करेल.  या आशेवर न राहण्याची. विं.दा. नीसांगितल्याप्रमाणे “माझ्या मना बन दगड”ही अवस्था अनुभवण्याची.प्रसंगी मन कणखर बनवले.  तरच त्या व संतुलित अवस्थेत मधून संतुलन मिळू शकतो.

© सौ. अंजली गोखले

मो ८४८२९३९०११

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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