हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 56 ☆ शांति और प्रशंसा ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय एवं प्रेरक आलेख शांति और प्रशंसा।  मौन एवं ध्यान का हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जिसका  आध्यात्मिक अनुभव हमें उम्र तथा अनुभव के साथ ही मिलता है अथवा किसी अनुभवी व्यक्ति के मार्गदर्शन से मिलता है ।  यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 56 ☆

☆ शांति और प्रशंसा

मानव जीवन का प्रमुख प्रयोजन है– शांति प्राप्त करना, जिसके लिए वह आजीवन प्रयासरत रहता है। शांति बाह्य परिस्थितियों की गुलाम नहीं है, बल्कि इसका संबंध तो हमारे अंतर्मन व मन:स्थिति से होता है। जब हम स्व में स्थित हो जाते हैं, तो बाह्य परिस्थितियों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और हम सत्, चित्, आनंद अर्थात् अलौकिक आनंद को प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में मानव हृदय में दैवीय गुणों-शक्तियों का विकास होता है और वह निंदा, राग-द्वेष, स्व-पर, आत्मश्लाघा आदि दुष्प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है। आत्म- प्रशंसा करना व सुनना संसार में सबसे बड़ा दोष है, जिसका कोई निदान नहीं। यह मायाजाल युग- युगांतर से निरंतर चला आ रहा है और वह ययाति जैसे तपस्वियों को भी अर्श से फर्श पर गिरा देता है।

ययाति घोर तपस्या के पश्चात् स्वर्ग पहुंचे, क्योंकि  उन्हें ब्रह्मलोक में विचरण करने का वरदान प्राप्त था; जो देवताओं की ईर्ष्या का कारण बना। एक दिन इंद्र ने ययाति  की प्रशंसा की तथा उस द्वारा किए गये जप-तप के बारे में जानना चाहा। ययाति आत्म- प्रशंसा सुन फूले नहीं समाए और अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने लगे। इंद्र ने ययाति को आसन से उतर जाने को कहा, क्योंकि उसने ऋषियों, गंधर्वों, देवताओं व मनुष्यों की तपस्या का तिरस्कार किया  और वे स्वर्ग से नीचे गिर गए। परंतु उसके अनुनय- विनय पर इन्द्र ने उसे सत्पुरुषों की संगति में रहने की अनुमति प्रदान कर दी।

सो! आत्म-प्रशंसा से बचने का उपाय है मौन, जो प्रारंभ में तो कष्ट-साध्य प्रतीत होता है। परंतु धीरे- धीरे श्वास व शब्द को साधने से हृदय की चंचलता समाप्त हो जाती है और चित्त शांत हो जाता है। आती-जाती श्वास को देखने पर मन स्थिर होने लगता है और मानव को उसमें आनंद आने लगता है। यह वह दिव्य भाव है, जिससे चंचल मन की समस्त वृत्तियों पर अंकुश लग जाता है। मानव अपना समय निरर्थक संवाद व तेरी-मेरी अर्थात् पर-निंदा में समय नष्ट नहीं करता। मौन की स्थिति में मानव आत्मावलोकन करता है तथा वह संबंध- सरोकारों से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में अपेक्षा-उपेक्षा के भाव का भी शमन हो जाता है। जब व्यक्ति को किसी से अपेक्षा अथवा उम्मीद ही नहीं रहती, फिर विवाद कैसा? उम्मीद सब दु:खों की जननी है। जब मानव इससे ऊपर उठ जाता है, तो भाव-लहरियां शांत हो जाती हैं; संशय व अनिर्णय की स्थिति पर विराम लग जाता है। परिणामत: मानसिक द्वंद्व को विश्राम प्राप्त होता है और दैवीय गुणों स्नेह, करूणा, सहानुभूति, त्याग आदि के भाव जाग्रत होते हैं। उसे संसार में हम सभी के तथा सब हमारे नज़र आते हैं तथा ‘सर्वेभवन्तु सुखीनाम्’ का भाव जाग्रत होता है।

मानव हरि चरणों में सर्वस्व समर्पित कर मीरा की भांति ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूजो न कोय’ अनुभव कर सुक़ून पाता है। इस स्थिति में सभी भाव- लहरियों को अपनी मंज़िल प्राप्त हो जाती है तथा अहं का विगलन हो जाता हो, जो सभी दोषों की जड़ है। अहं हमारे अंतर्मन में सर्वश्रेष्ठता का भाव उत्पन्न करता है, जो आत्म- प्रशंसा का जनक है। अपने गुणों के बखान करने के असाध्य रोग से वह चाह कर भी मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता। वह न तो दूसरे की अहमियत स्वीकारता है; न ही उसके द्वारा प्रेषित सार्थक सुझावों की ओर ध्यान देता है। सो! वह गलत राहों पर चल निकलता है। यदि कोई उसके हित की बात भी करता है, तो वह उसे शत्रु-सम भासता है और वह उसका निरादर कर संतोष पाता है। उसके शत्रुओं की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा होता जाता है। एक लम्बे अंतराल के पश्चात् जब उसका शरीर क्षीण हो जाता है और वह एकांत की त्रासदी झेलता हुआ तंग आ जाता है, तो उसे अपने घर व परिवार-जनों की स्मृति आती है। वह लौटना चाहता है, अपनों के मध्य… परंतु उसके हाथ निराशा ही लगती है और उसे प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नज़र नहीं आता। वह सांसारिक ऊहापोह व मायाजाल से निज़ात पाना चाहता है; चैन की सांस लेना चाहता है, परंतु यह उसके लिए संभव नहीं होता। उसे लगता है, वह व्यर्थ ही धन कमाने हित उचित- अनुचित राहों पर चलता रहा, जिसकी अब किसी को दरक़ार नहीं। वह न पहले शांत था, न ही उसे अब सुक़ून प्राप्त होता है। वह शांति पाने का हर संभव प्रयास करता रहा, परंतु अतीत की स्मृतियां ग़ाहे-बेग़ाहे उसके हृदय को उद्वेलित-विचलित करती रहती हैं। वह चाह कर भी इनके शिकंजे से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अंत में इस जहान से रुख्स्त होने से पहले वह सबको इस तथ्य से अवगत कराता है कि सुख-शांति अपनों के साथ है। सो! संबंधों की अहमियत स्वीकारो…आत्म-प्रशंसा की भूल-भुलैया में फंस कर अपना अनमोल जीवन नष्ट न करो। सच्चे दोस्त संजीवनी की तरह होते हैं, उनकी तलाश करो। वे हर आकस्मिक आपदा व विषम परिस्थिति में आपकी अनुपस्थिति में भी आपकी ढाल बन कर खड़े रहते हैं।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ कहानियाँ मरती नहीं! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ कहानियाँ मरती नहीं!

पुराकथाओं में-

अपवादस्वरूप

आया करता था

एक राक्षस…,

बच्चों की भागदौड़

भगदड़ में बदल जाती

सिर पर पैर रखने की

कवायद सच हो जाती,

कई निष्पाप

पैरों तले कुचले जाते

सपनों के साथ

सच भी दफन हो जाते,

न घर-न बार

न घरौंदा, न संसार

आतंकित आँखें

विवश-सी देखतीं

नियति के आगे

चुपचाप सिर झुका देती,

कालांतर में-

एक प्रजाति का अपवाद

दूसरी की परंपरा बना,

अब रोज आते हैं मनुष्य,

ऊँचे वृक्षों पर बसे घरौंदे

छपाक से आ गिरते हैं

धरती पर…,

चहचहाट, आकांक्षाएँ, अधखुले पंख

लोटने लगते हैं धरती पर,

आसमान नापने के हौसले

तेज रफ्तार टायरों की

बलि चढ़ जाते हैं,

सपनों के साथ

सच भी दफन हो जाते हैं,

डालियों को

छाँट दिया जाता है

या वृक्ष को समूल उखाड़ दिया जाता है,

न घर-न बार

न घरौंदा, न संसार

आतंकित आँखें

विवश-सी देखती हैं

नियति के आगे

चुपचाप सिर झुका देती हैं,

मनुष्यों की पुराकथा

पंछियों की

अधुनतन गाथा है।

 

©  संजय भारद्वाज

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ समकालीन गीत – घाव बहुत गहरे हैं !! ☆ प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

(प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे जी का  ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है।  म.प्र.साहित्य अकादमी के अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी  पुरस्कार से पुरस्कृत प्रो शरद नारायण खरे जी का हिंदी साहित्य में विशेष स्थान है। आप वर्तमान में शासकीय महिला महाविद्यालय, मंडला (म.प्र.) में प्राध्यापक/प्रभारी प्राचार्य हैं। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे जी की संक्षिप्त साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

आज प्रस्तुत है आपका एक समकालीन गीत – घाव बहुत गहरे हैं !!

☆ समकालीन गीत – घाव बहुत गहरे हैं !! ☆

रोदन करती आज दिशाएं, मौसम पर पहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो, घाव बहुत गहरे हैं !!

बढ़ता जाता दर्द नित्य ही,
संतापों का मेला
कहने को है भीड़, हक़ीक़त,
में हर एक अकेला

रौनक तो अब शेष रही ना,बादल भी ठहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे वो, घाव बहुत गहरे हैं !!

मायूसी है,बढ़ी हताशा,
शुष्क हुआ हर मुखड़ा
जिसका भी खींचा नक़ाब,
वह क्रोधित होकर उखड़ा

ग़म,पीड़ा औ’ व्यथा-वेदना के ध्वज नित फहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं !!

व्यवस्थाओं ने हमको लूटा,
कौन सुने फरियादें
रोज़ाना हो रही खोखली,
ईमां की बुनियादें

कौन सुनेगा,किसे सुनाएं, यहां सभी बहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे है वो घाव बहुत गहरे हैं !!

बदल रहीं नित परिभाषाएं,
सबका नव चिंतन है
हर इक की है पृथक मान्यता,
पोषित हुआ पतन है

सूनापन है मातम दिखता, उड़े-उड़े चेहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं !!

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे 

विभागाध्यक्ष इतिहास, शासकीय महिला महाविद्यालय, मंडला(म.प्र.)-481661
(मो.-9425484382)
mail-khare.sharadnarayan@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 9 ☆ हमारा दुर्भाग्य है रिश्तों की टूटती कड़ियाँ ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

`डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं अनुकरणीय आलेख  हमारा दुर्भाग्य है रिश्तों की टूटती कड़ियाँ।)

☆ किसलय की कलम से # 9 ☆

☆ हमारा दुर्भाग्य है रिश्तों की टूटती कड़ियाँ ☆

रिश्ता अथवा बंधन शब्द दो या दो से अधिक समान या भिन्न-भिन्न जीवों, वनस्पतियों, पदार्थों आदि की उत्पत्ति का एक ही स्रोत होना, अति निकट आना, परस्पर मिश्रित अथवा समाहित होने का परिणाम है। एक ही प्रजाति के परिवार में परस्पर समानता के गुण पाए जाते हैं। यह समानता मनुष्यों में इसलिए स्पष्ट समझ में आ जाती है क्योंकि मनुष्य एक दूसरे के दैहिक, चारित्रिक, बौद्धिक गुणों के साथ-साथ नृत्य, संगीत, गायन जैसी कलाओं को आसानी से परखने की सामर्थ्य रखता है। वैसे भी एक वंश में उत्पन्न संतति में  प्रायः अनेक समानताएँ हम सब देखते चले आ रहे हैं। ये अनुवांशिक गुण खून के रिश्तों में ही पाए जाते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे परिलक्षित होते रहते हैं। फिर बात आती है दो अलग-अलग परिवारों के रिश्तों की, जो वैवाहिक बंधन से बनते हैं। इसमें एक परिवार की लड़की और दूसरे परिवार का लड़का होता है और वह सदा के लिए पति-पत्नी कहलाते हैं। अगले क्रम के रिश्ते इन्हीं दो अलग-अलग परिवारों के शेष सदस्यों से बन जाते हैं, जिन्हें फूफा, मौसी, मामा, नाना, नानी आदि का नाम दिया जाता है। तत्पश्चात मानव विभिन्न कारणों से भी रिश्तों में बँधता-बिखरता रहता है। मालिक-नौकर, दुकानदार-ग्राहक, समान गुण, कला, संगीत, साहित्य, पड़ोस, व्यवसाय आदि में भी रिश्ते कायम होते हैं। एक और  रिश्ते को पृथक से वर्गीकृत करना आवश्यक है और वह है मित्रता का रिश्ता। प्रमुखतः ये दो तरह के होते हैं।  प्रथम किसी हेतुवश की गई मित्रता और द्वितीय निःस्वार्थ मित्रता। आज निःस्वार्थ मित्रता के रिश्ते बड़े दुर्लभ व कहानियों तक सीमित हो गए हैं। आधुनिक युग में इसे पागलपन कहा जाता है और ये पागलपन भला आज कोई क्यों करेगा?

संबंध या रिश्तों की बात आते ही हम राम-लक्ष्मण, यशोदा-कृष्ण, रावण-विभीषण, देवकी-कंस, अर्जुन-कृष्ण, सीता-राम, पांडव-कौरवों के रिश्तों में स्वयं का किरदार नियत करने की सोचने लगते हैं, लेकिन हम स्वयं की तुलना इनमें से किसी के साथ नहीं कर पाते, क्योंकि आज के युग में हम न लक्ष्मण जैसे भाई बन सकते, न ही यशोदा जैसी माँ और न ही सीता जैसी आदर्श पत्नी, लेकिन हम स्वार्थवश रावण, कंस अथवा कौरवों से भी आगे वाले किरदारों की जरूर सोच लेंगे।

एक समय था जब कबीले का मुखिया सबका ध्यान रखता था, उनके उदर-पोषण का दायित्व सम्हालता था। फिर संयुक्त परिवारों का मुखिया समान रूप से व्यवहार व सुरक्षा करने लगा। एकाध सदी पूर्व का संयुक्त परिवार माँ-बाप, पति-पत्नी और बच्चों तक सिमट गया। पिछले कुछ ही दशकों में हमें अपने माँ-बाप या सास-श्वसुर भी बोझ लगने लगे। वर्तमान में इसका कारण आवश्यकता कम स्वच्छंदता की चाह ज्यादा समझ में आती है। हम अपने ही बूढ़े माँ-बाप या सास-श्वसुर की सेवा नहीं करना चाहते। आखिर हमारी सोच इतनी निम्न क्यों होती जा रही है?

यह बात इतनी सीधी व सरल नहीं है। हम माँ-बाप से अलग रहने पर विवश क्यों हो जाते हैं?

गंभीर चिंतन व मनन से कुछ प्रमुख कारण सामने जरूर आएँगे। सबसे प्रमुख बात है हमारी संस्कृति, संस्कार, परंपराओं और सोच में बदलाव की। अपनी संतानों को हम अपने धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों में निहित सीख व उपदेशों के साथ-साथ नाना-नानी की प्रचलित रहीं दिशाबोधी कथा-कहानियों से लगातार दूर रखने लगे। वैसे भी गुरुकुल प्रथा की समाप्ति के पश्चात व्यवसाय केंद्रित शिक्षा ने हमारे सारे आदर्शों को हाशिए पर डाल दिया है। रही शेष बचे प्रेम-भाईचारे, त्याग-समर्पण, सरलता, परोपकार जैसे कर्त्तव्यों की बात, तो इनके दूसरे घृणित पहलुओं पर केंद्रित चलचित्र, टीवी शो, टीवी धारावाहिकों के साथ अब सोशल मीडिया ने भी भारतीय संस्कारों और परंपराओं के विरुद्ध पूरे समाज की सोच और परिवेश तक बदलने की ठान ली है।

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात बिना हिंसा, सौदेबाजी, लूटमार, शोषण और वैमनस्यता के पूरी होती ही नहीं है। चूँकि सच्चाई कभी बदली नहीं जा सकती, इसीलिए श्रोताओं व दर्शकों के भय से दस-बीस प्रतिशत सच्चाई को दिखाना इन की विवशता होती है, परंतु हमारी संतानें बार-बार, लगातार यही देखते और सुनते रहने से क्या भ्रमित होने से बच पाएँगी? आज घर के ही सदस्यों के मध्य द्वेष, घृणा, स्वार्थ, अनैतिक संबंधों के दृश्य दिखाने की अनियत सीमा नई पीढ़ी को अमानवीय व तथाकथित आधुनिकता के रंग में रँगना चाहती है। निर्माताओं तथा लेखकों की पैंतरेबाजी, कानून की लचर धाराओं और देश के कर्णधारों का भी इस ओर ध्यान न दिया जाना, वर्तमान के साथ ही भावी पीढी के लिए भी घातक बनता जा रहा है।

संयुक्त परिवार तो अब अंतिम साँसें गिन ही रहे हैं। एकल परिवार का रुझान अब एक आम प्रक्रिया हो चली है। तन-मन-धन खपाने वाले माँ-बाप की त्याग-तपस्या आज मूल्यहीन मानी जाती है। बचपन से जवानी तक किया गया सब कुछ अपनी आँखों से देखने वाली संतान जब स्वयं अपने माँ-बाप को महत्त्व न दे। नवागत वधु अपने सास-श्वसुर की सेवा-सुश्रूषा तथा चिंता की बात तो दूर महत्त्व ही न दें और खुद का बेटा विवश होकर उसका साथ दे, तो क्या होगा उन असहाय बुजुर्ग माँ-बाप का। कोई बाहरी व्यक्ति तो उनकी मदद करने से रहे। बेटे की विवशता और उसकी दुविधा अपने माता-पिता के साथ पत्नी के हितों से भी जुड़ी होती है। स्वभावतः अथवा माता-पिता द्वारा उचित शिक्षा, संस्कार व कर्त्तव्य निर्वहन के गुण सीखकर न आने वाली वधुएँ भी आज केवल पति और अपने बच्चों के साथ एकल परिवारों को बढ़ाने में अहम भूमिका का निर्वहन कर रही हैं। वैसे अविवाहित रहते उनके माँ-बाप द्वारा सिखाने का भी एक समय होता है। आचार-व्यवहार व सलीके स्वयं सीखना भी उनका दायित्व है, लेकिन जब इन बातों की अनदेखी होगी तो परिवार में टूटन के साथ खून के रिश्तो में दरार पड़ने से कोई भी नहीं रोक पायेगा।  अपने माता-पिता की छत्रछाया के अनगिनत लाभों को नजर अंदाज कर कुछेक स्वार्थों की पूर्ति हेतु एकल परिवारों की बाढ़ आना आज के युग की सबसे बड़ी विडंबना कही जाएगी। ये पारिवारिक रिश्तों की टूटती कड़ियाँ हमारा दुर्भाग्य ही हैं।

आजकल महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता आंदोलनों के अधूरे सच ने भी विकट स्थितियाँ निर्मित की हैं। जिस उद्देश्य को लेकर महिला मोर्चा और नारी आंदोलन शुरू किए गए थे उनका मूल उद्देश्य नारी का सम्मान, समानता का भाव और शोषण से मुक्त होना था, लेकिन आज इनकी आड़ में यदा-कदा बहुत कुछ ऐसा भी होने लगा है, जिससे समाज में किंचित असहजता तथा रिश्तों में गाँठें भी दिखाई देने लगी हैं। नारी हितार्थ बने कानूनों का भी दुरुपयोग होते देखा गया है। आज मित्रता हो, संपत्ति बँटवारा हो, वर्चस्व की बात हो अथवा राजनीतिक बात हो, ये लगभग सभी रिश्ते स्वार्थ के सहारे ही अग्रसर होने लगे हैं। गिरते नैतिक मूल्य, निजी स्वार्थों का टकराव और अपनों के प्रति त्याग-समर्पण तथा आत्मीयता की कमी आज आदर्श रिश्तों के अंत के प्रमुख कारकों में गिने जायेंगे।

उपरोक्त सभी तथ्यों पर आदिकाल से ही पढ़ा, सुना और देखा जा रहा है। आज भी यही सब हो रहा है, लेकिन कोई भी इसे स्वीकारने हेतु तैयार नहीं है। आज अधिकांश लोग खून के रिश्तों तक का निर्वहन करना भूलते जा रहे हैं। हम सभी जानते हैं मानव जीवन क्षणभंगुर है, जग में आपकी उपलब्धियों और आपके आचार-व्यवहार के अतिरिक्त कुछ भी याद नहीं किया जायेगा। यह भी परम सत्य है कि रिश्तों तथा अपनों के प्रति किए गए दुर्व्यवहार व अनैतिक कृत्यों की अंतःपीड़ा से कोई जीवन पर्यंत भी नहीं उबर पाता। अतः मानव की श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर सद्व्यवहार, सत्कर्म, परोपकार तथा रिश्तों के उचित निर्वहन में स्वयं समर्पित होना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है और यही सच्चे अर्थों में रिश्तों की कड़ियों को टूटने से बचाना भी कहलायेगा।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 55 ☆ सावन ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  समसामयिक गीत  “सावन । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 55 – साहित्य निकुंज ☆

☆ सावन ☆

 

सावन में मनवा बहक बहक जाए।

पिया की याद मोहे बहुत ही सताए ।

हरे भरे मौसम में मनवा गीत गाए।

पिया की याद मोहे बहुत  ही सताये।

 

कंगना भी बोले,  झुमका भी डोले।

पायल भी बोले, बिछुआ भी बोले।

हिया मोरा तुझसे मिलने को तरसे।

मन मोरा पिया बस डोले ही डोले।

 

पिया की याद मोहे बहुत ही सताये।

 

रिमझिम -रिमझिम वो  बूंदे बौछारे ।

मनवा में छाई उमंग की फुहारें ।

बावरा मन मोरा मिलने को तरसे।

प्रीत का रंग छाया मन के ही द्वारें।

 

पिया की याद मोहे बहुत ही सताये।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 46 ☆ अपनी सेना बड़ी महान ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है प्रेरक एवं देशभक्ति से सराबोर भावप्रवण रचना  “अपनी सेना बड़ी महान ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 46 ☆

☆ अपनी सेना बड़ी महान ☆

 

अपनी सेना बड़ी महान

रखना याद सदा बलिदान

 

सियाचीन की सर्द पहाड़ी

उस पर भी ये खूब दहाड़ी

 

जयति जयति जाँबाज जवान

अपनी सेना बड़ी महान

 

जैसलमेर की तपती गरमी

फिर भी तनिक न इसमें नरमी

 

साहस देख शत्रु  हैरान

अपनी सेना बड़ी महान

 

बड़ी कारगिल की पटखनी

बनी पाक सेना की चटनी

 

सारा जग करता गुणगान

अपनी  सेना बड़ी महान

 

साहस भरा हुआ रग -रग में

चपला सी फुर्ती डग -डग में

 

क्या भूला दुश्मन नादान

अपनी सेना बड़ी महान

 

शिला खंड से डटे खड़े हैं

दुश्मन से निर्भीक  लड़े हैं

 

झुके नहीं दे दी पर जान

अपनी सेना बड़ी महान

 

करें न मौसम की परवाह

देश भक्ति की मन में चाह

 

रक्षा की है हाथ कमान

अपनी सेना बड़ी महान

 

होता सैनिक से “संतोष”

दुश्मन पर आता है रोष

 

सदा सैनिकों से है  शान

अपनी सेना बड़ी महान

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

Please share your Post !

Shares

English Literature – Poetry ☆ Fear ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry  “भय ” published previously as ☆ संजय दृष्टि  ☆  भय  We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation.)

☆ Fear… ☆

There’s a great

fear of snakes in the

minds of humans,

On its very sight

It’s  butchered mercilessly…

While snake,

soon as it senses

the presence of humans,

it beats a hasty retreat,

There’s great fear of the

humans in the snakes…!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Please share your Post !

Shares

हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ डॉ लता अग्रवाल की हिन्दी लघुकथा ‘अर्धांगिनी’ एवं मराठी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। )

आज प्रस्तुत है  सर्वप्रथम डॉ लता अग्रवाल जी  की  मूल हिंदी लघुकथा  ‘अर्धांगिनी’ एवं  तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  द्वारा मराठी भावानुवाद ‘अर्धांगिनी

❃❃❃❃❃❃❃❃❃❃

डॉ लता अग्रवाल

(सुप्रसिद्ध हिंदी वरिष्ठ साहित्यकार  एवं शिक्षाविद डॉ लता अग्रवाल जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है । आप महाविद्यालय में प्राचार्य पद  पर सेवारत हैं । प्रकाशन शिक्षा पर – 16 पुस्तकें, कविता संग्रह –4,  बाल साहित्य – 5, कहानी संग्रह – 2, लघुकथा संग्रह – 5, साक्षात्कार संग्रह –1, उपन्यास – 1, समीक्षा – 3, लघुरूपक – 18 । पिछले 10 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित | )

☆ अर्धांगिनी 

“अच्छा ! माँ –बाबा ! मैं चलता हूँ।”

“कितनी बार कहा है चलता हूँ नहीं आता हूँ कहते हैं बेटा।” मां ने गंभीर चेहरे पर बनावटी शिकायत का भाव लाते हुए कहा।

“ओह हां ! आता हूं माँ –बाबा।” अभी 8 ही दिन हुए हैं अवधेश के विवाह को, पूरे 1 माह की छुट्टी लेकर आया था, विवाह के पश्चात पत्नी को कहीं मनोरम स्थान पर घुमाने ले जायेगा …दोनों एक दूसरे के मन के भाव जानेंगे, मगर अटारी बॉर्डर पर हुए सैनिक हमले में कई सैनिक मारे गए अतः हेड ऑफिस से कॉल आया,

‘लेफ्टिनेंट अवधेश ! इमीजियेट ज्वाइन योर ड्यूटी।’ आदेश पाते हैं अवधेश ने जब अपनी नवविवाहित पत्नी से सकुचाते हुए कहा,

“सीमा ! हेड क्वार्टर से बुलावा आया है मुझे अर्जेंट ही जाना होगा।”

“क्या कल ही चले जायेंगे ?”

“हां ! अलसुबह निकलना होगा।”

“कुछ दिन और नहीं रुक सकते।” सीमा ने आत्मीय भाव से पूछा।

“नहीं सीमा उधर बॉर्डर पर मेरी आवश्यकता है …मेरा इंतजार हो रहा होगा। पता नहीं मेरे कौन-कौन साथी …।” अपने अनजाने खोये साथियों के शोक की कल्पना में अवधेश के स्वर डूब गये।

“फिर कब लौटना होगा ?”

“कह नहीं सकता …जब तक सीमा पर शांति बहाल ना हो या …शायद ……।”

“बस आगे कुछ मत कहिए, अच्छा सोचिये सब शुभ होगा।” सीमा ने पति के होठों पर प्यार से उंगली रखते हुए कहा।

“मैं जानता हूँ सीमा यह सप्ताह तुम्हारा रीति रिवाजों की औपचारिकता और मेहमान नवाजी के बीच बीत गया और अब हमें अपना हनीमून भी कैंसिल करना होगा मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाया उल्टे अब घर की मां -बाबा की देखभाल भी तुम्हें सौंपे जा रहा हूं। ” अवधेश ने सीमा को सीने से लगाते हुए कहा।

“आप चिंता मत कीजिए जी, हम सैनिकों की पत्नियों को ईश्वर अतिरिक्त साहस और धैर्य देकर भेजता है। आप निश्चिंत रहें आपके लौटने तक मैं मां -बाबा का पूरा ख्याल रखूंगी और आपका इंतजार करूंगी।” पत्नी ने अवधेश के मन का बोझ उतार दिया। अत: आज जाते हुए अवधेश स्वयं को  हल्का महसूस कर रहा था अपना प्रतिनिधि मां -बाबा की सेवा के लिए जो छोड़े जा रहा था। जाते हुए घर के बाहर गांव के कई लोग जमा थे बुजुर्ग कह रहे थे,

‘गांव के अपने इस लाड़ले पर हमें नाज है।’ युवा, बच्चे सभी अवधेश को सैल्यूट देते हुए,

‘जय हिन्द अवधेश भैय्या’ कह रहे थे।  दूर दहलीज पर पर्दे की ओट में खड़ी सीमा की ओर देखते हुए आंखों में कृतज्ञता का भाव लिए अवधेश ने एक जोरदार सैल्यूट दिया,

‘थैंक्स अर्धांगिनी, सही मायने में सैनिक तो तुम हो जो अपने जीवन के अमूल्य पल हंसते- हंसते हम पर कुर्बान कर देती हो।’ भाव सीमा तक पहुंच गये थे, उसके मुट्ठी के कसाव ने पर्दे  को जोर से भींच लिया ।

© डॉ लता अग्रवाल

भोपाल, मध्यप्रदेश मो – ९९२६४८१८७८

❃❃❃❃❃❃❃❃❃❃

☆ अर्धांगिनी 

(मूळ  रचना –  डॉ लता अग्रवाल भोपाल  अनुवाद – उज्ज्वला केळकर  )

 ‘अच्छा! आई-बाबा मी जातो.’

‘किती वेळा सांगितलं, जातो, नाही येतो, म्हणावं रे!’ आई गंभीर चेहर्‍याने  खोट्या तक्रारीच्या सुरात म्हणाली.

‘ओह! येतो!’

अवधेशाच्या विवाहाला अद्याप आठ दिवससुद्धा झाले नव्हते. चांगली एक महिन्याची सुट्टी घेऊन आला होता तो. विवाहानंतर पत्नीला एखाद्या निसर्गरम्य ठिकाणी तो घेऊन जाणार होता. दोघांना एकमेकांच्या मनातले भाव नीटपणे जाणून घेता येतील. पण अटारी बॉर्डरवर सैनिकांवर आक्रमण झाले. अनेक सैनिक मारले गेले. हेड ऑफिसमधून त्याला कॉल आला, ’लेफ्टनंट अवधेश, ताबडतोब तुमच्या ड्यूटीवर हजार व्हा.’ आदेश मिळताच अवधेश आपल्या नवपरिणीत पत्नीला संकोचत म्हणाला, ‘सीमा, हेडक्वार्टरवरून आदेश आलाय, मला लगेचच निघायला हवं!’

‘उद्याच निघणार?’

‘हो! उद्या पहाटेच निघायला हवं’

‘आणखी काही दिवस नाही थांबू शकणार?’ सीमानं आत्मीयतेने विचारलं .

‘नाही सीमा, तिकडे बॉर्डरवर माझी वाट बघत असतील. कुणास ठाऊक माझे कोण कोण साथी…’ आपल्या अज्ञात हरवलेल्या साथिदारांच्या शोकाच्या कल्पनेने अवधेशचा स्वर भिजून गेला.

‘परत कधी येणं होईल?’

‘काही सांगता येत नाही. जोपर्यंत सीमेवर शांतीचा वातावरण… किंवा मग…’

‘बस… बस .. पुढे काही बोलू नका. चांगला विचार करा. सगळं शुभ होईल. सीमा पतीच्या ओठांवर बोट ठेवत म्हणाली.’

‘सीमा, हा आठवडा रीती-रिवाजांची औपचारिकता आणि पाहुण्यांचे आदरसत्कार करण्यात निघून गेला॰ आता तर आपल्याला आपला हनीमूनही कॅन्सल करावा लागतोय. मी तुला काहीच देऊ शकलो नाही. उलट आई-बाबांना सांभाळण्याची जबाबदारी तुझ्यावर सोपवून चाललोय.’ सीमाला छातीशी कवटाळत अवधेश म्हणाला.

‘आपण काळजी करू नका. आम्हा सैनिकांच्या पत्नींना ईश्वर अतिरिक्त साहस आणि धैर्य देऊन पाठवत असतो. आपण निश्चिंत रहा. आपण येईपर्यंत आई-बाबांची मी नीट काळजी घेईन आणि आपली वाट पाहीन.’ सीमाने अवधेशच्या मनावर असलेला भार  हलका केला. त्यामुळे आज घरातून बाहेर पडताना अवधेशला अगदी हलकं हलकं वाटत होतं॰ आपल्या आई-बाबांची सेवा करण्यासाठी तो आपला प्रतिनिधी मागे ठेवून जात होता. तो घराबाहेर पडला, तेव्हा बाहेर किती तरी लोक त्याला निरोप देण्यासाठी जमा झाले होते. ज्येष्ठ मंडळी म्हणत होती, ‘गावाच्या या लाडक्या मुलाचा आम्हाला अभिमान आहे.’ तरुण , मुले सगळे अवधेशला सॅल्यूट देत म्हणत होते, ‘जय हिंद अवधेशभैय्या!’ दूर उंबरठ्यावर पडद्याआड उभ्या असलेल्या सीमाकडे बघताना त्याच्या डोळ्यात कृतज्ञता होती. अवधेशने तिला एक जोरदार सॅल्यूट देत, तो डोळ्यांनीच म्हणाला , ‘थॅंक्स अर्धांगिनी खर्‍या अर्थाने तूच सैनिक आहेस. आपल्या जीवनातले अमूल्य क्षण तू हसत हसत आमच्यावरून ओवाळून टाकतेस.’

त्याच्या मनातले भाव सीमापर्यंत पोचले. तिच्या मुठीने पडद्याची कड घट्ट धरून ठेवली.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – पंढरी माहेर . . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  एक भावप्रवण रचना “पंढरी माहेर . . . ! )

☆ विजय साहित्य – पंढरी माहेर . . . ! ☆

मुराळी होऊन

घेतसे विसावा

माये तुझ्या नेत्री

विठ्ठल दिसावा. . . . !

 

पंढरीची वारी

ऊन्हात पोळते

गालावरी माये

आसू ओघळते.. . . !

विठ्ठलाची वीट

उंबरा घराचा

ओलांडून येई

पाहुणा दारचा.

पंढरीची वारी

भेटते विठूला

आठवांची सर

आलीया भेटीला. . . . !

विठू दर्शनाची

घरा दारा आस

परी सोडवेना

प्रपंचाची कास.

पंढरीची वारी

हरीनाम घेई

माय लेकराला

दोन घास देई. . . . !

पंढरीची वारी

रिंगण घालते

माय शेतामधी

माया कालवते.. . . !

पंढरीची वारी

माऊलींच्या दारा

माय पदराचा

लेकराला वारा. . . . !

म्हणोनीया देवा

पंढरी माहेर

आसवांचे मोती

करती आहेर.

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

Please share your Post !

Shares

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (1) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।।27।।

शाश्वत धम सदैव सुख की तू प्रतिष्ठत जान

अपर औं अचयय ब्रह्म का मैं हू सुख स्थान ।।27।।

 

भावार्थ :  क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ।।27।।

 

For I am the abode of Brahman, the immortal and the immutable, of everlasting Dharma and of absolute bliss .।।27।।

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः॥14॥

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares