हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ खोज ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ खोज 

ढूँढ़ो, तलाशो,

अपना पता लगाओ,

ग्लोब में तुम जहाँ हो

एक बिंदु लगाकर दिखाओ,

अस्तित्व की प्यास जगी

खोज में ऊहापोह बढ़ी,

कौन बिंदु है, कौन सिंधु है..?

ग्लोब में वह एक बिंदु है या

ग्लोब उसके भीतर एक बिंदु है..?

©  संजय भारद्वाज 

 रात्रि 10:11बजे, दि. 25 नवंबर 2015

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 19 ☆ आज की पत्रकारिता ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “आज की पत्रकारिता)

☆ किसलय की कलम से # 19 ☆

☆ आज की पत्रकारिता ☆

निज कबित्त केहि लाग न नीका

सरस होउ अथवा अति फीका

अपना काम, अपना नाम, अपना व्यवसाय किसे अच्छा नहीं लगता। वकील अपने व्यवसाय और अपनी जीत के लिए कितनी झूठी-सच्ची दलीलें देते हैं, हम सभी जानते हैं। डॉक्टर और दूकानदार अपने लाभ के लिए क्या झूठ नहीं बोलते?

तब पत्रकार बंधु कोई अलग दुनिया के तो हैं नहीं। इन्हें भी लाभ की आकांक्षा है, सारी दुनिया में लोग रोजी-रोटी से आगे भी कुछ चाहते हैं।

बस यही वह चाह है जो हमें ईमानदारी के मार्ग पर चलने से रोकती है। आज मैं कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो कुछ पत्रकार बंधुओं  को अच्छी नहीं लगेंगी। दूसरी ओर ये वो बातें हैं जो समाज में  पत्रकारों के लिए आये दिन कही भी जाती हैं।

मेरा सभी बंधुओं से निवेदन है कि वे इन बातों एवं तथ्यों को व्यक्तिगत नहीं लेंगे।

आज के बदलते वक्त और परिवेश में पत्रकारिता के उद्देश्य एवं स्वरूप में जमीन-आसमान का अंतर हो गया है। अकल्पनीय परिवर्तन हो गए हैं।आईये, हम कुछ कड़वे सच और उनकी हक़ीक़त पर चिंतन करने की कोशिश करें।

सर्वप्रथम, यदि हम ब्रह्मर्षि नारद जी को पत्रकारिता का जनक कहें तो उनके बारे में कहा जाता है कि वे एक स्थान पर रुकते ही नहीं थे. आशय ये हुआ कि नारद जी भेंटकर्ता एवं घुमंतू प्रवृत्ति के थे.

आज की पत्रकारिता से ये गुण लुप्तप्राय हो गये हैं. इनकी जगह दूरभाष, विज्ञप्तियाँ और एजेंसियाँ ले रहीं हैं. सारी की सारी चीज़ें प्रायोजित और व्यावसायिक धरातल पर अपने पैर जमा चुकी हैं.

आज की पत्रकारिता के गुण-धर्म और उद्देश्य पूर्णतः बदले हुए प्रतीत होने लगे हैं. आजकल पत्रकारिता, प्रचार-प्रसार और अपनी प्रतिष्ठा पर लगातार ध्यान केंद्रित रखती है.

पहले यह कहा जाता था कि सच्चे पत्रकार किसी से प्रभावित नहीं होते, चाहे सामने वाला कितना ही श्रेष्ठ या उच्च पदस्थ क्यों न हो, लेकिन अब केवल इन्हीं के इर्दगिर्द आज की पत्रकारिता फलफूल रही है.

आज हम सारे अख़बार उठाकर देख लें, सारे टी. वी. चेनल्स देख लें. हम पत्र-पत्रिकाएँ या इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री देख लें, आपको हर जगह व्यावसायिकता तथा टी. आर. पी. बढाने के फार्मूले नज़र आएँगे. हर सीधी बात को नमक-मिर्च लगाकर या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का चलन बढ़ गया है. बोला कुछ जाता है, समाचार कुछ बनता है. घटना कुछ होती है, उसका रूप कुछ और होता है.

कुछ समाचार एवं चेनल्स तो मन माफिक समाचारों के लिए एजेंसियों की तरह काम करने लगे हैं. इससे भी बढ़कर कुछ धनाढ्य व्यक्तियों अथवा संस्थानों द्वारा बाक़ायदा अपने समाचार पत्र और टी. वी. चेनल्स संचालित किए जा रहे हैं. हमें आज ये भी सुनने को मिल जाता है कि कुछ समाचार पत्र और चेनल्स काला बाज़ारी पर उतर आते हैं.

मैं ऐसा नहीं कहता कि ये कृत्य हर स्तर पर है, लेकिन आज इस सत्यता से मुकरा भी नहीं जा सकता.

आज की पत्रकारिता कैसी हो? तो प्रतिप्रश्न ये उठता है कि पत्रकारिता कैसी होना चाहिए?

पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सामाजिक घटनाओं और गतिविधियों को समाज के सामने उजागर कर जन-जन को उचित और सार्थक दिशा में अग्रसर करना है.

हमारी ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराओं के साथ ही उनकी कार्यप्रणाली से भी अवगत कराना पत्रकारिता के कर्तव्य हैं.

हर अहम घटनाओं तथा परिस्थिजन्य आकस्मिक अवसरों पर संपादकीय आलेखों के माध्यम से समाज के प्रति सचेतक की भूमिका का निर्वहन करना भी है.

एक जमाने की पत्रकारिता चिलचिलाती धूप, कड़कड़ाती ठंड एवं वर्षा-आँधी के बीच पहुँचकर जानकारी एकत्र कर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत करने को कहा जाता था,

लेकिन आज की पत्रकारिता वातानुकूलित कक्ष, अंतर-जाल, सूचना-तंत्र, ए. सी. वाहनों और द्रुतगामी वायुयान-हेलिकॉप्टरों से परिपूर्ण व्यवस्थाओं के साथ की जाने लगी है, लेकिन बावज़ूद इसके लगातार पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है.

आज आपके मोहल्ले की मूलभूत समस्याओं को न्यूज चेनल्स या समाचार पत्रों में स्थान नहीं मिलता, लेकिन निरुद्देशीय किसी नेता, अभिनेता या किसी धार्मिक मठाधीश के छोटे से क्रियाकलाप भी  प्रमुखता से छापे या दिखाये जाएँगे. ऐसा क्यों है? इसके पीछे जो कारण हैं वे निश्चित रूप से विचारणीय हैं? यहाँ पर इसका जिम्मेदार आज की  उच्च जीवन शैली, लोकप्रियता एवं महत्त्वाकांक्षा की भावना को भी माना जा सकता है.

हर छोटा आदमी, बड़ा बनाना चाहता है और बड़ा आदमी, उससे भी बड़ा.

आख़िर ये कब तक चलेगा ? क्या शांति और सुख से मिलीं घर की दो रोटियों की तुलना हम फ़ाइव स्टार होटल के खाने से कर सकते हैं?

शायद कभी नहीं.

हर वक्त एक ही चीज़ श्रेष्ठता की मानक नहीं बन सकती. यदि ऐसा होता तो आज तुलसी, कबीर, विनोबा या मदर टेरेसा को इतना महत्त्व प्राप्त नहीं होता.

जब तक हमारे जेहन में स्वांतःसुखाय से सर्वहिताय की भावना प्रस्फुटित नहीं होगी, पत्रकारिता के मूल्यों में निरंतर क्षरण होता ही रहेगा.

आज हमारे पत्रकार बन्धु निष्पाप पत्रकारिता करके देखेंगे तो उन्हें वो पूँजी प्राप्त होगी जो धन-दौलत और उच्च जीवन शैली से कहीं श्रेष्ठ होती है.

आपके अंतःकरण का सुकून, आपकी परोपकारी भावना, आपके द्वारा उठाई गई समाज के आखरी इंसान की समस्या आपको एक आदर्श इंसान के रूप में प्रतिष्ठित करेगी.

आज के पत्रकार कभी आत्मावलोकन करें कि वे पत्रकारिता धर्म का कितना निर्वहन कर रहे हैं.

कुछ प्रतिष्ठित या पहुँच वाले पत्रकार स्वयं को अति विशिष्ट श्रेणी का ही मानते हैं. ऐसे पत्रकार कभी ज़मीन से जुड़े नहीं होते, वे आर्थिक तंत्र और पहुँच तंत्र से अपने मजबूत संबंध बनाए रखते हैं.

लेकिन यह भी वास्तविकता है कि ज़मीन से जुड़ी पत्रकारिता कभी खोखली नहीं होती, वह कालजयी और सम्मान जनक होती है.

हम देखते हैं, आज के अधिकांश पत्रकार कब काल कवलित हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता और न ही कोई उन्हें याद रखने की आवश्यकता महसूस करता।

आज पत्रकारिता की नयी नयी विधियाँ जन्म ले चुकीं हैं. डेस्क पर बैठ कर सारी सामग्री एकत्र की जाती है, जो विभिन्न आधुनिक तकनीकि, विभिन्न एजेंसियों एवं संबंधित संस्थान के नेटवर्क द्वारा संकलित की जाती हैं. इनके द्वारा निश्चित रूप से विस्तृत सामग्री प्राप्त होती है,

लेकिन डेस्क पर बैठा पत्रकार / संपादक प्रत्यक्षदर्शी न होने के कारण समाचारों में वो जीवंतता नहीं ला पाता, समाचारों में वो भावनाएँ नहीं ला पाता, क्योंकि वो दर्द और वो खुशी समाचारों में आ ही नहीं सकती, जो एक प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार की हो सकती है.

आज के कुछ प्रेस फोटोग्राफर पीड़ित, शोषित अथवा आत्मदाह कर रहे इंसान की मदद करने के बजाय फोटो या वीडियो बनाने को अपना प्रथम कर्त्तव्य मानते है और दूसरे प्रेस फोटोग्राफर्स को कॉल करके बुलाते हैं। वह दिन कब आएगा जब वे कैमरा फेंककर मदद को दौड़ेंगे? जिस दिन ऐसा हुआ वह दिन पत्रकारिता के स्वर्णिम युग की शुरुआत होगी।

मेरी धारणा है कि यदि आपने पत्रकारिता को चुना है तो समाज के प्रति उत्तरदायी भी होना एक शर्त है अन्यथा आपका जमीर और ये  पीड़ित समाज आपको निश्चिंतता की साँस नहीं लेने देगा।

हम अपने ज्ञान, अनुभव, लगन तथा परिश्रम से भी वांछित गंतव्य पर पहुँच सकते हैं, बस फर्क यही है कि आपको अनैतिकता के शॉर्टकट को छोड़कर नैतिकता का नियत मार्ग चुनना होगा। पत्रकारिता को एक बौद्धिक, मेहनती, तात्कालिक एवं कलमकारी का जवाबदारी भरा कर्त्तव्य कहें तो गलत नहीं होगा।

धन तो और भी तरह से कमाया जा सकता है, लेकिन पत्रकारीय प्रतिष्ठा का अपना अलग महत्त्व होता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और लोकतंत्र के इस स्तम्भ की हिफाजत करना हम सब का दायित्व है।

अंततः निष्कर्ष यह है कि पत्रकारिता यथा संभव यथार्थ के धरातल पर चले, अपनी आँखों से देखे, अपने कानों से सुने और पारदर्शी गुण अपनाते हुए समाज को आदर्शोन्मुखी बनाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे, आज विकृत हो रहे समाज में ऐसी ही पत्रकारिता की ज़रूरत है।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 65 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 65– साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

करते हैं आराधना,

तुम ईश्वर प्रति रुप।

मन मंदिर में रचे बसे,

हो श्रद्धा स्वरूप।।

 

झर झर कर बह अब रही,

आयु वेग की धार।

संबंधों को जीत लो,

पड़े न कभी दरार।।

 

शब्द शब्द के योग से,

बढ़ा शब्द परिवार।

शब्दों की दुनिया बढ़ी,

हुआ अर्थ भंडार।।

 

झूम झूम के नाचता,

मन मयूर चहुं ओर।

पूरी होती चाह अब,

बचा न कोई छोर।।

 

जीवन में सब कुछ मिला,

मिला सकल संसार।

मन से करते अर्चना,

मिले सभी का प्यार।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 57 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं  “संतोष के दोहे। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 57☆

☆ संतोष के दोहे ☆

जप तप अरु आराधना, करिये सतत अनित्य

नवरात्रि में कीजिए, माँ की पूजा नित्य

 

आयु फिसलती रेत-सी, रहते खाली हाथ

कौन जानता कब किधर, छूटे किसका साथ

 

सावन की काली घटा, जब छाती घनघोर

अपने मोहक नृत्य से, मन हरता है मोर

 

सिमट रहे हैं आजकल, यह अपने परिवार

साथ वक्त के बदलते, सामाजिक संस्कार

 

दुनिया सबको मोहती, मायावी संसार

माया से बच कर रहें, इसके रंग हजार

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नवरात्रि विशेष☆ देवी गीत – मोरि नैया लगा दो पार मैया …….. ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित नवरात्रि पर्व पर विशेष  देवी गीत मोरि नैया लगा दो पार मैया……..। ) 

☆ नवरात्रि विशेष  ☆ देवी गीत – मोरि नैया लगा दो पार मैया …….. ☆

 

मोरि नैया लगा दो पार मैया जीवन की

है विनती बारंबार मैया दुखिया मन की

 

तुम हो आदिशक्ति हे माता

सबका तुमसे सच्चा नाता

सब पर कृपा तुम्हारी जग में

महिमा अपरम्पार तुम्हारे आंगन की

हम आये तुम्हारे द्वा , कामना ले मन की

 

कोई न किसी का संग सँगाती

जलती जाती जीवन बाती

घट घट की माँ तुम्हें खबर सब

अभिलाषा एक बार तुम्हारे दर्शन की

दे दो माँ आधार , शरण दे चरणन की

 

झूठे जग के रिश्ते नाते

कोई किसी के काम न आते

करुणामयी माँ तुम जग तारिणी

झूठा है संसार चलन जहाँ अनबन की

माँ नैया है मझधार भँवर में जीवन की

कौन करे उस पार नैया जीवन की

मोरि नैया लगा दो पार मैया जीवन की

है विनती बारंबार मैया दुखिया मन की

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 11 – कविता ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 11 ☆

☆ कविता ☆

आपण समजतो तेवढी सोपी नसते कविता

भावनांचा उद्रेक होतो तेव्हा जन्म घेते कविता

तुम्ही नाहीयेत तिचे जन्मदाते बाबांनो

उलट तिच्यामुळे तुमचा होतो जन्म  कवी म्हणून मित्रांनो

कविता म्हणजे असतं एखाद्याचं जिवंतपणे जळणं

कविता म्हणजे काळजातला खंजीर स्वतः ओढून मरणं

कविता असते बाणासारखी रुतणारी

छातीत घुसून पाठीतून आरपार निघणारी

कविता म्हणजे पायातला न दिसणारा काटा

कविता म्हणजे भावनांना हजार लाख वाटा

कविता म्हणजे असतो काळजावरला घाव

कविता म्हणजे असतो एक मोडलेला डाव

 

© शेखर किसनराव पालखे 

पुणे

17/05/20

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे – श्रीचामुण्डेश्वरी चरणावली – ७ ☆ श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

 

☆ केल्याने होतं आहे रे ☆

???श्रीचामुण्डेश्वरी चरणावली -७ ?

!!श्रीराम समर्थ!!

नवरात्री शुक्रवारी

सण आला मांगल्याचा

ओटी भरा सवाष्णींची

थाट माट सौभाग्याचा !!

 

घालू सवाष्ण भोजन

अहो शिजवू पुरण

पुरणाच्या दिव्यातुनी

करु देवीस औक्षण !!

 

मागू जोगवा अंबेचा

मांडू अष्टमी जागर

माता रेणुका भवानी

फुंकू भक्तीची घागर

 

अंबा प्रगट हो झाली

घटामध्ये विसावली

नवधान्ये समृद्धीची

आनंदाने उगवली !!

 

अंबा माय तू भवानी

कृपादृष्टी तुझी मोठी

षडरिपू केले चूर

भक्तांच्या कल्याणासाठी !!

 

बोध संबळ घेऊन

ज्ञानज्योती पाजळल्या

हाती ज्ञानाच्या दिवट्या

गोंधळाने जागवल्या

 

कामक्रोध हे राक्षस

सत्वगुण तलवार

केले अंबेने मर्दून

असुरांचे हो संहार !!

 

छत्रपती शिवरायांना

तलवार भेट दिली

धर्म रक्षणाच्या साठी

माय भवानी धावली !!

 

छत्रपती शिवरायांना

आशीर्वाद द्यावयाला

आली तुळजाभवानी

किल्ले प्रतापगडाला !

 

उदे गं अंबे उदे…

उदे गं अंबे उदे….

क्रमश:. ….

©️®️ साधक- उर्मिला इंगळे

सातारा

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ स्पंदन ☆ सुश्री शिल्पा मैंदर्गी

सुश्री शिल्पा मैंदर्गी

☆ कवितेचा उत्सव ☆ स्पंदन ☆ सुश्री शिल्पा मैंदर्गी ☆ 

(पूर्ण अंध असूनही अतिशय उत्साही. साहित्य लेखन तिच्या सांगण्यावरून लिखीत स्वरूपात सौ.अंजली गोखले यांनी ई-अभिव्यक्ती साठी सादर केले आहे.)

असं एक अवकाश असावं जिच्यात उंच भरारी मारता यावी ।

असे एक ध्येयाचे शिखर असावे

जे गाठताना देहभान हरपून जावे ।

असा एक सूर मिळावा

ज्यामुळे जीवनाचे गाणच बनून जावं ।

असे सोबती भेटावेत

ज्यांच्या साथीनं सारी मैफिलच रंगून जावी ।

अशी एक मैत्री असाव जिचा हात हातात येताच,

काट्याकुट्यांची आणि भयानक वाटणारी वाट हिरव्यागार वनराईच्या गालीच्या प्रमाणे वाटावी ।

आयुष्य म्हणजे असा एक सामना असावा

की शेवटच्या बॉलमध्ये पण मॅच जिंकता यावी ।

एक विचार मनात यावा की ज्यामुळे जादुगाराने फिरवलेल्या काठी प्रमाणे सारे आयुष्यच बदलून जावे ।

असे एक संवेदनशील मन हवे , ज्याने मुंगीचेही मनोगत जाणता यावे । असा एक भूतकाळ असावा,

त्याच्या रम्य आठवणीत रमताना, रोमांचित होताना भविष्यातलया सगळ्या चिंता विसरून जाव्या ।

असा एक वर्तमानकाळ हवा, की ज्याच्यात भूतकाळ आणि भविष्य काळाचा सुंदर संगम साधता यावा ।

असे एक जिंकण्याचे स्वप्न हवे, की जे साकारताना

पराभवाचे आणि अपयशाचे बळ संपून जावे ।

असं एक कर्तृत्व हवं, की ज्याच्याकडे बघताना

आई वडिलांना अभिमान वाटावा ।

 

© सुश्री शिल्पा मैंदर्गी

दूरभाष ०२३३ २२२५२७५

 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ओळख ☆ सौ अंजली गोखले

☆ जीवनरंग ☆ ओळख ☆ सौ अंजली गोखले  ☆

बघता बघता लिली दिड वर्षाची झाली. ती सहा महिन्यांची झाली आणि आईचे ऑफिस सुरु झाले. त्यामुळे लिलीचा ताबा आजी कडेच. आताही आजीनं तिला छानसा फ्रॉक घातला, पावडर तीट लावली आणि दोघी देवा समोर आल्या. “हं’ म्हण, देवा, मला चांगली बुद्धी दे. “लिलीन आपले इवलेसे हात जोडले आणि म्हणाली, “देवा, आजीला च्यांग्ली बुदी दे.” आजीला हसू आवरल नाही. “सोनुली ग माझी म्हणत आजीनं तिच्या गालावरून हात फिरवला. हा रोजचाच कार्यक्रम झाला होता .

आज आजीनी एका ताटलीत पंधरा पणत्या लावल्या. लिलीला तो चमचमता प्रकाश दाखवत म्हणाल्या, “लिली, ही बघ गंमत ” लुटूलुटू चालत लिली आली. ताटलीतले ते दिवे बघून डोळे मोठ्ठाले करून पहायला लागली. आपले इटुकले हात गालावर धरून आजीकडे आणि त्या पणत्यांकडे पहायला लागली.

भिंतीवरील आजोबांच्या हार घातलेल्या फोटोकडे पहात आज देवाकडे बुद्धी मागायची विसरून गेल्या. त्या ज्योतींच्या प्रकाशात त्यांना आजोबां बरोबरच्या सहवासाच्या आठवणी आठवायला लागल्या . आजचा हा दिवस खास त्या आठवणींसाठीच होता. लिलीला मांडीवर घेऊन तिच्या पाठीवरून प्रेमानं हात फिरवीत त्या तिथेच बसल्या. आजोबांना छकुल्या नातीची ओळख करून दिली. आजोबा फोटोमधून समाधानानं हसले.

 

©️ सौ अंजली गोखले 

मो ८४८२९३९०११

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडि

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ घट…. ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक

श्रीमती अनुराधा फाटक

 ☆ विविधा ☆ घट….. ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक  ☆ 

नवरात्रातील महत्वाची गोष्ट घटस्थापना ! घटस्थापना म्हणजे आपण मांडलेली पंचमहाभूतांची पूजा !मातीचा घट आणि घटाभोवती नवधान्य पेरण्यासाठी वापरलेली माती हे पृथ्वीच्या सृजनाचे प्रतिक,घटातील पाणी म्हणजेच आप,सतत तेवणारा दिवा तेजाचे प्रतिक,त्यातून निर्माण होतो चैतन्याचा वायु जो सारा आसमंत( अवकाश) उजळून टाकतो.घटस्थापनेच्यावेळी केलेल्या या पंचमहाभूतांच्या पूजेने देवीचे दिवसेदिवस देवीचे तेज वाढते तेअष्टमीला पूर्णत्वाला जाते.त्या पूर्णत्वात घागर( घट)फुंकून आपण देवीला अंतर्मन अर्पण करण्याचा प्रयत्न करतो.घटाच्या अंतरात, पोकळीत जाण्याचा प्रयत्न करतो.तो करतानाजे समाधान मिळते हे समाधान म्हणजेच नवरात्रीचा घटाशी असणारा अन्यसाधारण संबंध!अलिकडे घटस्थापनेसाठी ऐश्वर्याप्रमाणे वेगवेगळ्या धातूचे घट वापरले जातात पण मातीच्या घटाचे ऐश्वर्य कशालाच नाही हे तितकेच खरे!

घट हा शब्द फार पुरातन असून तो आजही आपले अस्तीत्व टिकवून आहे.

आदिमानवाने शेती सुरु केली आणि त्याला मदत करणारे बलुतेदार तयार झाले कुंभार हा त्यापैकीच एक! मातीचे घट बनविणारा कुंभार ! फिरत्या चाकावर कुंभार कौशल्याने वेगवेगळ्या आकाराचे घट बनवितो.अगदी लहानशा बोळक्यापासून मोठ्या रांजणापर्यंत असे हे घट असतात.आकारमान आणि उपयोगाप्रमाणे यांची नावेबदललेली दिसतात.लहान मुलींच्या चूल बोळक्यापासून रांजणापर्यंतचा घटाचा हा प्रवास फार पूर्वीपासून चालू आहे.सुरवातीच्या काळात हेच घट सर्व कामासाठी वापरले जात.

घट म्हणजेच घडा!

मानवाच्या जन्मापासून त्याच्या मृत्युनंतरही ज्याची गरज लागते तो घट मानवी जीवनाचा अविभाज्य भाग बनून राहिला आहे. चूल बोळक्याचा खेळ खेळणारी लग्नमंडपात उभी रहते ती बोळक्यासहीतच फक्त तेथे असतो घट! नवरीने पुजावयाचा गौरीहर !लग्नानंतर संक्रांतीला सुवासिनी सुगड पूजतात ते घटाचेच वेगळे रूप.त्या पूजेतलेच एक रथसप्तमीला सूर्यपूजेसाठी वापरले जाते.असा घट,घडा माणसाने पुण्याचा साठा भरण्याकरिता म्हणजे परोपकाराकरिता वापरला तर योग्य नाहीतर पाप मार्गाने वागणाऱ्या वाल्ह्या कोळ्याप्रमाणे पापाचा घडा कधी ना कधी भरतोच!

पूर्वी ‘घट डोईवर, घट कमरेवर,’ म्हणत बायका नदीवरून पाणी आणत आता नळाचेपाणी घटात,माठात भरले जाते.अगदी घरात फ्रिज असला तरी माठातले पाणी पिणारे आजही आहेत.

पंचमहाभूतानी बनलेला आपला देहही एक घटच आहे.’ घटाघटाचे रूप आगळे,प्रत्येकाचे दैव निराळे’ असे कै.माडगूळकरांनी त्या अर्थाने म्हटले आहे.

आता लोकांना मातीच्या घटाचे पर्यावर्णीय महत्ल समजल्याने पुन्हा मातीचे घट स्वयंपाकघरात घरात अग्रस्थान मिळवू लागलेले दिसतात.कितीही निर्लेप आले तरी मातीच्या घटाचे स्थान शेवटपर्यंत अढळच रहाणार !

© श्रीमती अनुराधा फाटक

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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