मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 20 ☆ मामाचा गाव ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है  उनकी एक भावप्रवण कविता   “मामाचा गाव“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 20 ☆

☆ मामाचा गाव

माह्या मामाचा थ्यो गांव

हाये लई लई दूर

मायले याद आली

चाल बापू लवकर।।

 

बापू पायटं निंगाला

माय व्हती संग संग

सुर्वे माथ्यावर आला

गांव किती दूर सांग।।

 

जरा धिरानं घे बाप्पा

पल्ला न्हायी हाये लांब

दम लागला मले गा

उली झाडाखाली थांब।।

 

माह्या भावाच्या गावाले

लई थंडगार वारा

तसा भावाचा माह्यावर

बापू लई रे जिव्हारा।।

 

आला गांव एकडाव

बरं वाटलं जिवाले

आंगणात  जवा गेलो

न्हायी कोणीच पुसाले।।

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (2) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पुरूषोत्तम योग

(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ।।2।।

 

विषद पल्लवों से भरी गुण पोषित शाखाये

उपर नीचे चहूं दिषि फैली गुंथी दिखाये।

कर्मबंदे की जकड में विकसित जड जंजाल

नीचे मानव लोक में फैला हुआ विशाल ।।2।।

भावार्थ :  उस संसार वृक्ष की तीनों गुणों रूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की ‘कोंपलों’ के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ (मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ ‘शाखाओं’ के रूप में वर्णन किया है) नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है) कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। ॥2॥

 

Below and above spread its branches, nourished by the Gunas; sense-objects are its buds; and below in the world of men stretch forth the roots, originating action.

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ दो रंग: करुणा के ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  आत्मीय लघुकथाएं  – दो रंग:करुणा के।  समाज के अनगढ़ त्याज्य अंग पर इन आत्मीय एवं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत रचनाओं के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन।)

 ☆  आत्मीय लघुकथाएं  – दो रंग:करुणा के ☆ 

(कोरोना की विडम्बना के चलते कुछ अनगढ़ त्याज्य जगहों पर सहायता पहुंचाने हेतु पाले पडे़—सामाजिक साहित्यिक अंतर्राष्ट्रीय अग्नि शिखा मंच संस्था,नागपुर इकाई अध्यक्ष होने के नाते मुझे भी— स्वाभाविक करुणा ने छू लिया और लेखनी ने रच दीं कुछ करुण कथा पटल पर जिन पर आपकी सच्ची आस्था की प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं ।)

☆  एक –  मूर्तिमान आस्था ☆   

लाॅक डाउन के चलते उस बदनाम “लाल गली” का सूनापन भयानक  लगता–आमने-सामने मिलाकर कुल बीस छोटे-छोटे घरों की वह गली – – हर दरवाजे पर अधमैले से पर्दे के भीतर टिमटिमाते बल्ब की रोशनी उस गली की बेबसी की कहानी बयां करती रहती।

गली के मुहाने पर ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल 59 वर्षीय माँगीलालजी बडे़ भावुक और दुःखी हो जाते वहां रहने वालों की स्थिति पर। सबसे ज्यादा बुरा लगता वहां गली में खेलते सात-आठ बच्चों को देखकर। अधनंगे से पेट पीठ से चिपके कुपोषित चार-पांच लड़के और तीन चार  लड़कियाँ।

हर पंद्रह बीस मिनट में एक ना एक कोठरी से पुकार आती जिसमें लडकों के नाम के साथ ही एक बड़ी ही वर्जित गाली भी होती। मैल गंदगी से भरा वह चेहरा आतंकित हो जाता और उस वर्जित शब्द से शर्मिंदा भी।

माँगीलालजी उन बच्चों से दूर – दूर से बतियाते रहते। उनकी भोली-भाली बातों, तमन्नाओं और पढ़ने-लिखने की इच्छा से वे तहेदिल से आप्लावित हो जाते—।

– – – और एक दिन— पुनर्वास कार्यालय में एक आवेदन ने सबकी आँखे नम कर दीं जब उस बदनाम गली के बच्चों को गोद लेने की इच्छा के साथ उन सबको अपना नाम देने की इच्छा और अपने दस बारह कमरों के पैतृक घर को बच्चों के लिए आश्रम बनाने की मंशा जाहिर की थी निःसंतान माँगीलालजी दंपत्ति ने। समाज के ठेकेदारों की भौंहे तनें इससे पहले ही अनेक समाज सेवी संस्थाओं ने भी सहमति की मुहर लगा दी और मूर्तिमान आस्था का प्रतीक बन गया गांव और शहर सीमा पर बसा वह “नीड़ “!!

 

☆  दो – अनचीन्हे रिश्ते ☆ 

आओ ना–आओ ना ओ  बाबूजी देखो तो अभी बहुत जलवे बाकी हैं मेरे पास। डांस करूंगी गाना गाऊंगी-। आओ ना बाबू।

बीस पच्चीस छोटी छोटी कोठरियों के दरवाजे, छज्जे या खिड़कियों से उठती आवाजें मुनीश को विचलित कर देतीं। वह चिल्ला-चिल्ला कर कह देना चाहता कि मैं कोई बाबू नहीं हूँ। तुम जैसा ही एक मजदूर हूँ। तुम अपना हुनर बेचती हो और मैं दिमाग  बेचकर पेट भरने का एक जरिया तलाश करता हूँ।

उस गली के शाॅर्टकट से स्टेशन रोड पर निकलते हुए रोज मुनीश सौ सौ लानते भेजता खुद पर मगर पाँच मिनट के रास्ते के लिए पच्चीस मिनट गँवाना उसे गवारा नहीं था।अतः वह वहीं से उसी गली से निकल जाया करता।

छः महीने पहले ही वह अपने गाँव से काफी दूर इस मँझोले से शहर में आया था। यहां स्टेशन के पास एक कंप्यूटर सेंटर में बैठकर लोगों की टिकिट निकालना, शहर में घूमने आने वालों को टैक्सी वाहन गाईड दिलवाना , होटल रूम दिलवाना आदि कार्य करता रहता।

अलबत्ता आधी रात के बाद वह बरबस उस मोगरा गली से ही होकर घर जाता। भीनी भीनी महक से महकती वह सुनसान गली उसे किसी मंदिर का सा आभास देती। साथ ही एक कोठरी के सामने रोज खिड़की  पर बैठी वह तीन वर्षीय छोटी सी गुड़िया मानों उसकी ही राह देखती बैठी मिलती। उसकी प्यारी मुस्कान और चमकीली आँखें उसे मानों पूरे समय पुकारती रहतीं।

एक बार लगातार तीन चार दिन वह बच्ची नहीं दिखाई दी तो मुनीश की चिंता और बेचैनी बहुत बढ़ गई।  पूरा साहस बटोर कर उसने द्वार खटका दिया। द्वार सहज ही  खुल गया। भीतर के टिमटिमाते बल्ब में देखा कि एक अत्यंत क्षीण काया मटमैले बिस्तर पर बेहोश सी पड़ी है और उसके सिरहाने वही बच्ची रो रही है। एक अनजानी करुणा से मुनीश का दिल सिहर गया। बच्ची के प्यार से बँधे उसके फर्ज ने उसे साहस दिया। पुलिस को फोन लगाकर उसने पूरी स्थिति बतायी।पुलिस ने वहां पहुंच कर उस बच्ची की माँ को अस्पताल पहुंचाया और बच्ची को अनाथाश्रम भेजने की कार्रवाई करने लगे। लेकिन मुनीश की करुणा – – – बीच में आ गई और बच्ची को अपनी भानजी बताकर उसने बच्ची को अपने पास रखने की प्रार्थना की। न जाने क्या सोचकर बच्ची की माँ ने भी इस रिश्ते की हामी भर दी। पुलिस वालों ने भी  मानवता की पुकार पर परिस्थितियों की  गंभीरता को समझते हुए बच्ची को उसकी तथाकथित नानी और मामा को सौंप दिया कुछ डाक्यूमेंट्स पर हस्ताक्षर करवाके।

– – – और करुणा का मूर्तिमंत रूप बने वे अनचीन्हे रिश्ते खुद पर ही गौरवान्वित हो उठे।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र 440010

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ ह्रास ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ ह्रास

 

एक ने कहा,

मेरे भीतर

कुछ कम हो रहा है,

अनेक ने कहा,

उनके  भीतर

कुछ कम हो रहा है,

इसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

उसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

सबने कहा,

सबके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

हरेक को भीतर कुछ कम होने का भास है,

मनुज! संभवत: यही मनुष्यता का ह्रास है..!

 

©  संजय भारद्वाज

14 जुलाई 2020, प्रात: 11:13 बजे

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 3 ☆ तुम ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( हम गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  के  हृदय से आभारी हैं जिन्होंने  ई- अभिव्यक्ति के लिए साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य धारा के लिए हमारे आग्रह को स्वीकारा।  अब हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं  आपकी हृदयस्पर्शी रचना  तुम ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 3 ☆

☆ तुम ☆

 

तुम्हारे संग जिये जो दिन भुलाये जा नहीं सकते

मगर मुश्किल तो ये है फिर से पाये जा नहीं सकते

 

कदम हर एक चलके साथ तुमने जो निभाया था

दुखी मन से किसी को वे बताये जा नहीं सकते

 

चले हम राह में जब धूप थी तपती दोपहरी थी

सहे लू के थपेडे जो गिनाये जा नही सकते

 

लगाये ध्यान पढते पुस्तके राते बिताई कई

दुखद किस्से परिश्रम के सुनाये जा नहीं सकते

 

तुम्हारे नेह के व्यवहार फिर फिर याद आते हैं

दुखाकुल मन से जो सबको बताये जा नही सकते

 

बसी हैं कई प्रंसगो की सजल यादें नयन मन में

चटक है चित्र ऐसे जो मिटाये जा नही सकते

 

मसोसे मन को सब यादें मै चुपचाप झेल लेता हूं

बिताई जिदंगी के दिन भुलाये जा नहीं सकते

 

अचानक छोड हम सबको तुम्हें जाने की क्या सूझी

जहॉ से जाने वाले फिर बुलाये जा नही सकते

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 13 – सोहराब मोदी ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार  : सोहराब मोदी पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 14 ☆ 

☆ सोहराब मोदी  ☆

सोहराब मोदी अपने जमाने के जाने-पहचाने इंडो-फ़ारसी नाट्यकर्मी, फ़िल्मी कलाकार, निर्देशक और निर्माता थे। उनका जन्म फ़ारसी परिवार में 02 नवम्बर 1897 को बनारस के नज़दीक रामपुर में हुआ था, उनके पिता मेरवान जी मोदी इंडीयन सिविल सर्विस में थे। उनकी परवरिश यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश) के ग्रामीण इलाक़ों में होने से उनका हिंदी और उर्दू ज़बान पर बराबर का नियंत्रण था और घर के प्रशासनिक माहौल  व घर पर अंग्रेज़ी तालीम से अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य पर भी अच्छा ख़ासा अधिकार था। सोहराब मोदी बुलंद आवाज़ के ऊँचे-पूरे क़द और मज़बूत काठी के मुकम्मिल इंसान थे।

उन्होंने शेक्सपियर के नाटक हेलमेट पर आधारित “खून ही खून”, सिकंदर, पुकार, पृथ्वी वल्लभ, झाँसी की रानी, मिर्ज़ा-ग़ालिब, जेलर और नौशेरवान-ए-आदिल नामक बेहतरीन फ़िल्में बनाईं थीं। उनकी फ़िल्मों में हमेशा एक उद्देश्यपरक संदेश होता था। फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए उन्हें 1980 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था।

वे स्कूली पढ़ाई पूरी करके अपने भाई केकी मोदी के साथ मिलकर 26 साल की उम्र में एक नाटक कम्पनी “आर्य सुबोध थिएटर कम्पनी” स्थापित करके पूरे देश में नाटक करते रहे। जिसकी कमाई से एक प्रोजेक्टर ख़रीदा और ग्वालियर के टाउन हाल में एक फ़िल्म दिखाई।

भारत में से बाबा साहब फाल्के 1913 से मूक फ़िल्म बनाना शुरू कर चुके थे, उनकी पहली फ़िल्म “हरिशचंद्र तारामती” थी लेकिन 1931 तक सवाक् फ़िल्मों का दौर शुरू होने से नाटक कम्पनी के नाटकों का क्रेज़ जाता रहा इसलिए सोहराब मोदी फ़िल्मों की तरफ़ मुड़ गए। उन्होंने शेक्सपियर के नाटक हेलमेट और किंग जॉन पर आधारित खून का खून और सैद-ए-हवस फ़िल्मे बनाईं लेकिन दोनों बॉक्स आफ़िस पर पिट गईं।

उन्होंने 1936 में मिनर्वा मूवी टोन नामक संस्था स्थापित की और 1938 में मीठा ज़हर और तलाक़ बनाईं जो ख़र्चा निकालने में सफल रहीं। 1939 में पुकार, 1941 में सिकंदर, 1943 में पृथ्वी-वल्लभ बनाईं। पुकार फ़िल्म बादशाह जहांगीर की न्याय व्यवस्था पर केंद्रित थी जिसमें चंद्र मोहन, नसीम बानो और कमाल अमरोही के डायलाग ने धूम मचा दी। सिकंदर भी एक बड़ी सफलता सिद्ध हुई जिसमें पृथ्वी राज कपूर बने थे सिकंदर और सोहराब मोदी ख़ुद राजा पोरस और के.एन. सिंग राजा आम्भी बने थे, फ़िल्म के डायलाग आज भी बेमिशाल माने जाते हैं। तीनों की आवाज़ बुलंद और हिंदुस्तानी का उच्चारण साफ़ था। फ़िल्म के संवाद पर दर्शक पर्दे पर सिक्कों की बारिश करते थे। बाद में एक और सिकंदर-ए-आज़म बनी थी जिसमें सिकंदर दारा सिंह और पृथ्वी राज कपूर राजा पोरस बने थे।

पृथ्वी वल्लभ फ़िल्म कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी के उपन्यास पर आधारित थी जिसमें सोहराब मोदी और दुर्गा खोटे के लम्बे डायलाग चलते हैं। नायिका रानी मृणालवती फ़िल्म के नायक का अनादर करते हुए उससे बहस करते-करते उससे प्रेम करने लगती है। सोहराब मोदी के फ़िल्मी सेट में पारसी थिएटर की झलक मिलती है। जेलर और भरोसा इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

सोहराब मोदी के उनकी फ़िल्मों की नायिका नसीम से रोमांटिक सम्बंध रहे लेकिन 1950 में शीशमहल फ़िल्म बनते समय तक उनके सम्बंधों में ठंडापन आ गया था। उसके बाद उनसे 20 साल छोटी महताब नाम की एक कलाकार उनसे नौशेरवान-ए-आदिल फ़िल्म से जुड़ी, जिससे उन्होंने 48 साल की उम्र में शादी कर ली, उनका उससे एक पुत्र महल्ली सोहराब हुआ।

सोहराब मोदी की फ़िल्म शीशमहल बम्बई की मिनर्वा थिएटर में लगी तो वे ख़ुद दर्शकों की प्रतिक्रिया पता करने वहाँ मौजूद थे, उन्होंने देखा कि सामने की कुर्सी पर बैठा एक दर्शक आँख बंद करके बैठा है। उन्होंने थिएटर के मैनेजर को बुलाकर उस दर्शक की टिकट के पैसे लौटाने को कहा। मैनेजर ने थोड़ी देर बाद आकर उन्हें बताया कि वह दर्शक अंधा है, इसलिए वह सिर्फ़ सोहराब मोदी के डायलाग सुनने आया है। सोहराब मोदी ने फ़िल्म समाप्त होने पर उस दर्शक को मैनेजर के रूम में बुलाकर उसे उस फ़िल्म के डायलाग सुनाए। फ़िल्मकार का दर्शक से ऐसा रिश्ता हुआ करता था।

मैंने भारत भवन में सोहराब मोदी की “झाँसी की रानी” फ़िल्म देखी जिसे उन्होंने अपनी बीबी महताब को लेकर बनाई थी, जिसमें वे ख़ुद झाँसी की रानी के राजगुरु की भूमिका में थे। झाँसी और लड़ाइयों की शूटिंग के साथ कसा कथानक और धाराप्रवाह डायलाग बांधे रखे रहे। सोहराब मोदी की ‘झांसी की रानी'(1953) भारतीय सिनेमा की पहली रंगीन फिल्म थी।

उन्होंने 1954 में मिर्ज़ा-ग़ालिब बनाई जिसमें सुरैया को मिर्ज़ा-ग़ालिब की महबूबा की भूमिका में उतारकर  मिर्ज़ा-ग़ालिब की ग़ज़लें उनसे गवाईं थीं। ज़फ़र, ज़ौक़, मोमिन, तिशना और सेफता को बिठाकर इस दौर की महफ़िल का समां बांधा था, वह देखते ही बनता है। फ़िल्म को राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक मिला था, तब फ़िल्म की स्क्रीनिंग के बाद नेहरु जी ने कहा था कि आपने ग़ालिब को ज़िंदा कर दिया। उन्हें 1980 में दादा साहब फाल्के अवार्ड मिला था। उनकी पत्नी ने कहा था कि फ़िल्म उनकी पहली और आख़िरी प्रेमिका थी। 28 जनवरी 1984 को 86 साल की पकी उम्र में उनका देहांत हो गया था। भारत सरकार ने 2013 में उनकी याद को अक्षुण बनाए रखने हेतु डाक टिकट जारी किया था।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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English Literature – Book-Review – Lines of Fate – Ms. Neelam Saxena Chandra

Lines of Fate

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e-abhivyakti.com congratulates Ms. Neelam Saxena Chandra ji for this most successful book released on 20th June 2020.  Excerpts from the Amazon as on 18th July 2020 itself describes the success story of less than one month.

Amazon Bestsellers Rank: #644

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. )

☆ Book Review – Lines of Fate: First Love and Other Stories by Ms. Neelam Saxena Chandra

Lines of Fate: First Love and Other Stories by AKS Publishing House written by Ms. Neelam Saxena Chandra

Often a simple encounter on the path of life can change one’s entire future. “Lines of Fate” by Neelam Saxena Chandra is a collection of such selected, distinctive and unique tales from different walks of life. She has come with this unique collection of short stories to entertain the readers.

When a dice is rolled, one does not know what the outcome will be. Similarly, in an encounter between people, the aftermath is simply indefinite and unidentifiable. Maybe, the lines of fate decide the final outcome. Twists and turns are a part and parcel of each of these stories, written in simple, easy-to-read and lucid language.

We are pleased to reproduce the Book Review by an enlightened reader Mr Javvad Rizvi, Age 33, Bhopal. He is GIS executive at MAPIT Center Bhopal.

Review:

My Ratings – ⭐⭐⭐⭐/5

Quote of the Day –

There are two types of people who will tell you that you cannot make a difference in this world: those who are afraid to try and those who are afraid you will succeed…….

Synopsis –

Lines of Fate by Neelam Saxena is a Short book contains 16 short stories. As I usually prefer reading short fiction this is the perfect book for short story lovers. In this book, the Author did a great job of explaining her point of view in the form of short tales that can be read by anybody without experiencing any boredom. Each and every story has lots of twists and turns in it. Out of 16 stories, I found some of them are really heart touching for me but some are just Okay but those stories contain some morals or messages for readers.

Each and every story comprises of lots of feelings and emotions which either makes you Happy or makes you Cry. Author plot each story in a very unique manner to catch their readers until the end of the book. The characterization of the personalities in this book has plotted very clearly by the Author. The twists and turns in every story make it more engaging and intriguing.

Each and every story seems realistic. This is the perfect book for beginners in the field of reading. I am really impressed with Authors work of writing this great book and never get enough of it. I must say i want more from the writer of this book to write more stories like this and entertain the readers with your writing concept.

Here’s a summary of some really good stories from this book.

First Love – This is the story about Sukriti and Bhushan and their little daughter Surili. They both love each other very much. Everything was going perfectly in their life until surili starts acting weirdly.
Their life changed after that incident.

The Book Store – This is the Story about a Book store owner name Mr. Gidlani and their costumers named Waheeda and Martin who loves each other. 10 years later they come to the same book store to thank Mr. Gidlani for supporting them. Their Love story started in his Book store in front of Mr. Gidlani.

The Second Chance – This is the story about College fellows named Toshi and Tushar. Toshi started feeling for Tushar after seeing a love note for her in his notebook but she never discusses this with anyone not even with Tushar due to her reserved nature. Years after her graduation she Met with Tushar again. What happened next is still hidden in this book.

There were more interesting stories in this book to read.

To read more, You have to grab this book and enjoy it till the end page of the book.

Amazon Link – >>>> Lines of Fate

Youtube Link >>>>   Neelam Saxena Chandra

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division, Pune

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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam -2 Creation of different creature☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar

(It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)    

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 ☆ Weekly Column – Samudramanthanam -2  Creation of different creature☆ 

Lord Vishnu was disappeared and Lord Brahma was sitting over white lotus alone. The lotus was coming out from the sea of milk or “Kshirasāgara”.

After some time, a sound breaks the concentration of Lord Brahma. He opens his eyes and saw in front of him four kids of age around five years were standing. They salute to Lord Brahma and said,” paranam, salute to our father”

Lord Brahma said with little bizarre look, “who four are you? You all are looking very innocent kids? Please let me know where you have come?”

One from those four little boys said, “O! Brahma we are generated from your mind and, so we are your manasputra, “mind born sons”. We are ‘Kumars’ (ku means ‘who’ and ‘mar’ means ‘kill’, so kumar means who can kill him? means no one. So kumars are death-less). Our names are Sanaka (ancient), Sanandana (blissful), Sanatana (Eternal) and Sanat (Lord Brahma, eternal, accompanied by a protector). Now please tell us why you have created us and what we have to do now?”

Lord Brahma said, “O! my manasputras, I have created all four of you on the command of Lord Vishnu and he is given us a task to create universe. I want you to help me to create universe.”

After listing name of Lord Vishnu all four kumars eyes closed from joy and peace and they start chanting name of Lord Vishnu. After sometimes one of kumars Sanaka said to Lord Brahma,” Our father, what a beautiful world you have given to us ‘Vishnu’ the sound of Vishnu makes us joyful. From now on wards we will chant only name of Vishnu and will do nothing”

Lord Brahma said, “my sons yes you can chant that name but before that you have to help me to create different creatures and natural entities”

Then Sanatana said, “But we don’t know anything except the name of Lord Vishnu. We are yours mind born sons and now our mind is occupied with Lord Vishnu. Lord Vishnu is not originator he is only ever presence preserver. Nothing is coming in our mind except name and properties of Lord Vishnu. So, from now onwards we will remain as it is and chant only name of Lord Vishnu till eternity”

Then Sanandana said,” Oh! father at the time when you were thinking about our image to create us. Your focus was only on Lord Vishnu. So, we have born with the essence of Lord Vishnu having properties of Lord Vishnu only. If you have to create sons who can help you to create universe you should have to think and concentrate on those properties which are required to create different parts of nature and universe, than output of that meditation will defiantly be sons who know and help you to create universe.

Then, those four kumars, started flying in space and left the Lord Brahma alone again.

 

© Ashish Kumar

New Delhi

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 40 – रेल्वेत भेटलेली मस्त मैत्रीण ! ☆ श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी  का एक विस्मरणीय संस्मरण   “रेल्वेत भेटलेली मस्त मैत्रीण  !”।  उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 40 ☆

☆ रेल्वेत भेटलेली मस्त मैत्रीण  ! ☆ 

साधारण पंचवीस वर्षांपूर्वीची घटना…..

सातारा रेल्वे स्टेशनवर बंगलोरला निघालो होतो.कोरेगाव गेलं रहिमतपूर स्टेशन आलं तशी एक साधारण पस्तीशीची एक खेडवळ बाई डोक्यावर पिशवी  हातात ट्रंक घेऊन चढायचा प्रयत्न करत होती दोन्ही हात सामानाला गुंतलेले ..

मग काय..ती म्हणाली ” काय बया पायऱ्या तरी केल्यात्या ..रेल्वेवाल्यांनला इवढं सारीक कळत न्हाय..आवं बाया मानसास्नी चढाय तरी याया पायजेल का नगं .! ”

बहुधा ती पहिल्यांदाच रेल्वेने प्रवास करत असावी.

मी दाराशी जाऊन तिच्या डोक्यावरची पिशवी उचलून घेतली त्यामुळं तिचा उजवा हात मोकळा झाला मग त्या हाताच्या आधारानं ती डब्यात आली.अन् दाणकन् तो  दणकट देह समोरच्याच रिकाम्या बर्थवर दिला झोकून .म्हणाली ” ” ”  कित्ती येळ वाट पहातिया पन् गाडी म्हनून येळवर यील ती रेल्वी कसली वं…  नंनंदेच  घर टेसनापस्न जवळच हाय तवा ऐकू यत समदं..आज आमकी  गाडी दोन तास उशीराने धावत आहे.

….अवं . कसलं काय आन् फाटक्यात पाय.

..”!

” कुठं चाललाय..?

” आवं सांगलीच्या तितं आमचं गाव हाय……..”

पण तुम्ही तर आता इथं रहिमतपुरला गाडीत चढलात..?

आवं हितं माजी ननंद ऱ्हातीया म्हनलं आलोया हिकडं तवा जावांवं भिटून तिला…”

” आवं मंबईला गेलती भनीकडं .लयी दीस बलवत हुती भन म्हनलं जावावं .. मंबई बगाव..”

गेली बया पन् कसलं काय आन् शेनात पाय….!”

गेली तितं तर बया भराभरा डोक्यावर फिरतंय …..म्हनंलं ” हे गं काय? त म्हन्ती ” अगं हितं लयी गरम हुत असतं तवा पंखा लावायलाच लागतोया.

म्हनलं “. बरं हाय बया आमच्या गावाकडं कसं समदं मोकळं  ढाकळं .घरात बसा भायेर बसा कसलं भन्नाट येतया वारं……! … “कसली बया तुझी मंबई साधं वारं सुदिक पंक्यानं आन् ती बी  इकात  घियाचं…”!

तिला म्हटलं .. तुमच्या घरी पंखा नाही.. कां…?”

तशी ती ..”छ्या बया आमच्या खेड्यागावात  कशाला पायज्येल ह्यो पंका न् बिंका…! मस्त वारं सुटतया बघा….आन् त्ये बी फुकाट……”!

” आवं त्या आमच्या मंबईच्या भनीकडं सक्काळी उटले आपली बगते तर कुट्ट्ं म्हनून मोकळी जागा न्हाई ..आवं सक्काळी सक्काळी मानसाला जायाला व्हंवं कां नगं..सांगा बरं…?

नुसतीच म्हनत्यात मंबई लयी.ऽऽ…म्होट्टी….”.!”

तशी भनीन मला न्हेलं दरवाजा उगाडला न् म्हनली  “जा हितं….!..आन् बघते तं काय  तितं पादुका !…अग बया…?

पयला नमस्कार क्येला बघा ! म्हनलं देवा परवास समदा ब्येस झाला बग…तुज्या कुरपेनं…”!

तशी भन आली म्हनली ,

“अगं ताई हे काय देवळ न्हाई ह्याला संडास म्हणत्यात.सकाळी हितंच जायाचं असतया जा….. !”

म्या श्याप सांगितलं.. म्हनलं ,” म्या न्हाई बया पादुकावर पाय ठिऊन पाप डोक्यावं घ्यियाची…….!”मंग काय..?

आवं तिनं घेतलं की भायेरनं दार लावून ……न् मी  आत..हुबी….”!

कसंबसं दोन दीस काडलं बया मंबईत  न् आले बया परत.प्वाॅट लयी गच्चं झाल्यालं मंग  यस्टीनं हितंआली…”..!

आमच्या गावाला जायाला लयी येळ लागल म्हून हितं नंनंद ऱ्हाती तिच्याकडं ग्येले तितं काय म्हनत्यात ते नाटकात ते ” होल वावर इज आवर …” .! तितं ग्येले बया खळाखळा एकदा प्वाॅट रितं झालं तवा बरं वाटलं बगा….”!

विक्रेत्याच्या सामोस्यांच्या  खमंगवासाने आमची भूकही चाळवली.आम्ही सामोसे घेतले तिला म्हटलं घ्या   गरम गरम .”.. !

” नग बया , माज्या नंदनं दिलीयाकी मला डाळकांदा भाकर बांदून…मी खाईन नंतरनं…..तुम्ही खावा…!”

पण नंतर बहुधा सामोशाच्या वासानं तिलाही खावंसं वाटलं असावं मग म्हणाली…

” ये…..पोऱ्या बगु वाईच एकांदा…लयी नगं… वास ब्येष्ट येतुया…म्हनून……”!

आणि तिनंही एक घेतला चव मस्त लागतीय  म्हणल्यावर आणखी दोन खाल्ले. म्हणाली ” आता बास झालं बया.दुपारच्या जेवणाची बेगमीच झाली बगा….”!

तिचं तोंड खाण्यात गुंतल्यामुळं तेवढाच  आमच्या श्रवणेंद्रियांना विश्राम मिळाला.आम्हालाही जरा डुलकी यायला लागली…थोडा वेळ शांततेत गेला.जरा बरं वाटलं.

तिनं विचारलं..” ताई कुटं जाऊ लयी लागलीया..”

मी खुणेनेच दाखवलं तशी…

ती गेली दार उघडलन् …. ओरडली अगं बया ..ऽऽ…ऽ. हितंबी पादुका…ऽऽ…. !”

तेवढ्यात गाडी एका छोट्याशा स्टेशनवर थांबली तशी ती डब्याच्या दाराकडं धावली अन् म्हणाली ……

“आवं जरा.. ….कंडाक्टरला म्हनावं आलेचं. बरं कां………”!. असं म्हणत आम्ही काही सांगण्याच्या आधीच ती उतरुन धूम चकाट……….!

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक:-१२-७-२०

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (1) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पुरूषोत्तम योग

(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

श्रीभगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ।।1।।

 

श्री भगवान ने कहा-

जड ऊपर, शाखा तले, अविनाषी अष्वत्थ

छंद पत्र जिसके उसे जो जाने सो दक्ष ।।1।।

 

भावार्थ :  श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को ‘ऊर्ध्वमूलवाला’ कहते हैं) और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले (उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा ‘अधः’ कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को ‘अधःशाखा वाला’ कहते हैं) जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी (इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को ‘अविनाशी’ कहते हैं) कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते (इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद ‘पत्ते’ कहे गए हैं) कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। (भगवान्‌ की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना ‘वेद के तात्पर्य को जानना’ है)।।1।।

 

They (the  wise)  speak  of  the  indestructible peepul tree,  having  its  root  above  and branches below, whose leaves are the metres or hymns; he who knows it is a knower of the Vedas.।।1।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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