हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ प्रेम ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ प्रेम

कब तक प्रेम करोगे मुझे?

मैं हँस पड़ा।

वह रो पड़ी।

कुछ नादान हँसी और आँसू की गणना करने लगे।

काल प्रतीक्षारत है कि समय के जीवनकाल में नादानों की गणना पूरी हो सके।

 

©  संजय भारद्वाज

रात्रि 11.22 बजे, 2 जुलाई 2020

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 1 ☆ सार्थक दोहे ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( हम गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  के  हृदय से आभारी हैं जिन्होंने  ई- अभिव्यक्ति के लिए साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य धारा के लिए हमारे आग्रह को स्वीकारा।  अब हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं आपके  सार्थक दोहे  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 1 ☆ दोहे ☆ ☆

 

कोई समझता कब कहां किसी के मन के भाव

रहे पनपते इसी से झूठे द्वेष दुराव

 

मन की पावन शांति हित आवश्यक सद्भाव

हो यदि निर्मल भावना कभी न हो टकराव

 

ममता कर लेती स्वतः सुख के सकल प्रबंध

इससे रखने चाहिए सबसे शुभ संबंध

 

प्रेम और सद्भाव से बड़ा न कोई भाव

नहीं पनपती मित्रता इनका जहां अभाव

 

मन के सारे भाव में ममता है सरताज

सदियों से इसका ही दुनिया में है राज

 

दुख देती मित्र दूरियां आती प्रिय की याद

करता रहता विकल मन एकाकी संवाद

 

होते सबके भिन्न हैं प्रायः रीति रिवाज

पर सबको भाती सदा ममता की आवाज

 

बातें व्यवहारिक अधिक करता है संसार

किंतु समझता है हृदय किस के मन में प्यार

 

मूढ़ बना लेते स्वतःगलत बोल सन्ताप

मिलती सबको खुशी ही पाकर प्रेम प्रसाद

 

बात एक पर भी सदा सबके अलग विचार

मत होता हर एक का उसकी मति अनुसार

 

प्रेम सरल सीधा सहज सब पर रख विश्वास

खुद को भी खुशियां मिले कोई न होय निराश

 

तीक्ष्ण बुद्धि इंसान को ईश्वर का वरदान

कर सकती परिणाम का जो पहले अनुमान

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 11 – केदार शर्मा ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार  : केदार शर्मा पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 11 ☆ 

☆ केदार शर्मा ☆

 

केदार शर्मा उर्फ़ केदार नाथ शर्मा (12 अप्रैल 1910 – 29 अप्रैल 1999), एक भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और हिंदी फिल्मों के गीतकार थे। उन्हें नील कमल (1947), बावरे नैन (1950) और जोगन (1950) जैसी फिल्मों के निर्देशक के रूप में बड़ी सफलता मिली, उन्हें अक्सर बॉलीवुड के महान कलाकारों गीता बाली, मधुबाला, राज कपूर, माला सिन्हा, भारत भूषण और तनुजा के अभिनय करियर की शुरुआत के लिए याद किया जाता है।

केदार शर्मा का जन्म नारोवाल पंजाब में हुआ था।  दो भाइयों, रघुनाथ और विश्वनाथ की अल्पायु मृत्यु और उनकी बहन तारो का कम उम्र में तपेदिक से निधन हो गया, एक छोटी बहन गुरू एक छोटे भाई हिम्मत राय शर्मा बचे, जो बाद में सफल उर्दू कवि के रूप में स्थापित हुए। केदार ने अमृतसर के बैज नाथ हाई स्कूल में पढ़ाई की जहाँ वे दर्शन, कविता, पेंटिंग और फोटोग्राफी में रुचि लेने लगे। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिनेमा में अपना करियर बनाने के लिए घर से भाग कर मुंबई पहुँचे  लेकिन रोजगार हासिल करने में असफल रहे तो अमृतसर लौट आए और हिंदू सभा कॉलेज में पढ़ाई हेतु प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने एक कॉलेज ड्रामेटिक सोसाइटी की स्थापना की।

एक स्थानीय सुधारवादी आंदोलन के प्रमुख ने केदार के नाटकों में से एक में हिस्सा लिया और शराब की बुराइयों को दर्शाती एक मूक फिल्म का निर्माण करने के लिए उसे काम मिला। इस परियोजना से अर्जित धन का उपयोग करते हुए, उन्होंने खालसा कॉलेज, अमृतसर में एक स्थानीय थिएटर समूह में शामिल होने से पहले अंग्रेजी में अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की। 1932 में उनकी शादी हुई तब उन्होंने कमाई के बारे में गम्भीरता से सोचना शुरू किया। फिल्म निर्देशक देवकी बोस की शुरुआती बोलती फिल्म पूरन भगत (1933) को देखकर वह न्यू थियेटर्स स्टूडियो में भाग्य आज़माने की उम्मीद में कलकत्ता के लिए रवाना हुए। कई महीनों की बेरोजगारी के बाद वह न्यू थियेटर्स के एक तत्कालीन अभिनेता, पृथ्वीराज कपूर (जहाँ वह पहली बार, पृथ्वीराज के आठ वर्षीय बेटे, राज कपूर से मिले) से मिलने में कामयाब रहे। पृथ्वीराज कपूर ने केदार को अपने पड़ोसी, तत्कालीन कुंदन लाल सहगल से मिलवाया, जिन्होंने एक परिचित के माध्यम से केदार को देवकी बोस से मिलने की व्यवस्था कर दी। देबकी बोस ने केदार को फिल्म सीता (1934) के लिए मूवी स्टिल्स फोटोग्राफर के काम पर रखा था, लेकिन बैकग्राउंड स्क्रीन पेंटर और फिल्म इंकलाब (1935) के लिए पोस्टर चित्रकार के रूप में केदार को फिल्म के निर्माण में काम मिला।  उन्होंने छप्पन (1935) और पुजारिन (1936) जैसी फिल्मों पर न्यू थियेटर्स के साथ काम करना जारी रखा, और  1936 में देवदास में उनके दोस्त कुंदन लाल सहगल द्वारा अभिनीत संवाद और गीत लिखने के लिए कहा गया तो एक बड़ा ब्रेक मिला। देवदास न केवल एक हिट थी, बल्कि “बलम आयी बसो मोरे मन में” और “सुख के अब दिन बीतत नाही” जैसे गाने देश भर में लोकप्रिय हो गए। केदार ने बाद में कहा, “बिमल रॉय और मुझे, देवदास में हमारा पहला बड़ा ब्रेक मिला था,  उन्हें कैमरामैन के रूप में और मुझे लेखक के रूप में।”

केदार को 1940 में जीत, औलाद और दिल ही तो है के लिए अपनी पटकथा लिखने का मौका दिया गया, कुछ सफलता मिली। इसके बाद उन्हें चित्रलेखा (1941) का निर्देशन करने के लिए कहा गया, जो एक हिट फिल्म बन गई और केदार एक निर्देशक के रूप स्थापित हो गए। उन्होंने अपनी पहली फिल्म नील कमल में राज कपूर और मधुबाला को लेकर अपनी फिल्मों का निर्माण शुरू किया। उन्होंने गीता बाली को अपनी पहली फिल्म, सोहाग रात (1948) में कास्ट किया और बाद में उन्हें राजकपूर के साथ फिल्म बावरे नैन (1950) के लिए टीम में शामिल किया। उसी वर्ष उन्होंने नर्गिस और दिलीप कुमार अभिनीत जोगन का निर्देशन किया। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में जवाहरलाल नेहरू ने शर्मा के गीतों को सुना था, उन्हें बुलाया और उन्हें चिल्ड्रन्स फिल्म सोसाइटी का प्रमुख निदेशक बनने के लिए कहा। केदार शर्मा ने बाल फिल्म सोसाइटी के लिए कई फिल्मों पर काम किया, जिसमें फिल्म जलदीप भी शामिल है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा प्राप्त हुई।  उन्होंने 1958 में शॉ ब्रदर्स स्टूडियो के लिए सिंगापुर में एक वर्ष फिल्मों का निर्देशन किया।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 50 – मोह भंग ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “मोह भंग । )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 49 ☆

☆ मोह भंग

 

बुद्ध के प्रारंभिक उपदेश, आगम सूत्रों में से एक में, इस कथन के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी है। यह कहानी कुछ इस तरह से है :

एक बार एक आदमी था जिसकी चार पत्नियाँ थीं। प्राचीन भारत की सामाजिक प्रणाली और परिस्थितियों के अनुसार, एक आदमी के लिए कई पत्नियाँ हो सकती थीं। इसके अतिरिक्त, लगभग एक हजार साल पहले जापान में हेनियन काल के दौरान, एक स्त्री के लिए कई पति होना भी असामान्य नहीं था। एक बार वह व्यक्ति बीमार हो गया और मरने वाला था। अपने जीवन के अंत में, वह बहुत अकेला अनुभव कर रहा था और इसलिए उसने अपनी पहली पत्नी को अपने साथ दूसरी दुनिया में जाने के लिए कहा। उसने कहा, ‘मेरी प्रिय पत्नी,’ मैंने आपको दिन और रात्रि प्रेम किया, मैंने पूरे जीवन में तुम्हारा ख्याल रखा। अब मैं मरने वाला हूँ, क्या आप मेरी मृत्यु के बाद मेरे साथ चलेंगी? ”

उसे अपनी पत्नी द्वारा हाँ कहने की उम्मीद थी। लेकिन उसने उत्तर दिया, “मेरे प्यारे पति, मुझे पता है कि आप हमेशा से मुझसे प्यार करते हो। और अब आप मरने जा रहे हैं। अब मेरा आपसे अलग होने का समय है। अलविदा मेरे प्रिय”

उसने अपनी दूसरी पत्नी को अपने अंतिम समय में अपने पास बुलाया और उसे मृत्यु में उसके पीछे आने के लिए आग्रह किया। उसने कहा, ‘मेरी प्यारी दूसरी पत्नी, आप जानती हो कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ कभी-कभी मुझे डर लगा कि तुम मुझे छोड़ सकती हो, लेकिन मैं दृढ़ता से आपके पास रहा। मेरे प्रिय, कृपया मेरे साथ आओ”

दूसरी पत्नी ने शाँत रूप से व्यक्त किया और कहा, “प्रिय पति, आपकी पहली पत्नी ने आपकी मृत्यु के बाद आपसे जुड़ने से इनकार कर दिया। मैं आपका अनुसरण कैसे कर सकती हूँ? अपने तो मुझे केवल अपने स्वार्थ की खातिर ही प्रेम किया है”

अपनी मृत्यु के समय झूठ बोलते हुए, उसने अपनी तीसरी पत्नी को बुलाया, और उससे पूछा कि क्या वह उसका अनुसरण करेगी? तीसरी पत्नी ने उसकी आँखों में आँसू के साथ उत्तर  दिया, “मेरे प्यारे, मुझे आपके ऊपर दया आ रही है और मैं आपके लिए उदास अनुभव कर रही हूँ। इसलिए मैं आपके साथ शमशान तक जाऊंगी। यह आपके लिए मेरा आखिरी कर्तव्य है” इस प्रकार तीसरी पत्नी ने भी अपने पति की मृत्यु के साथ जाने से इनकार कर दिया।

उसकी तीन पत्नियों के इनकार करने के बाद अब उसने याद किया कि उसकी एक और चौथी पत्नी भी है, जिसके लिए उसने कभी भी बहुत ज्यादा परवाह नहीं की थी। उसने हमेशा उसके साथ दासी की तरह व्यवहार किया था और हमेशा उससे बहुत नाराज रहता था। उसने अब सोचा कि अगर उसने उसे मृत्यु के लिए उसका पालन करने के लिए कहा, तो वह निश्चित रूप से मना ही कर देगी। लेकिन उस व्यक्ति का अकेलापन और भय इतने गंभीर थे कि उसने अपनी उस चौथी पत्नी को भी मृत्यु के बाद अन्य दुनिया में अपने साथ जाने के लिए कहा। चौथी पत्नी ने खुशी से अपने पति के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

उसने कहा, ‘मेरे प्रिय पति,’ मैं आपके साथ अवश्य जाऊंगी। जो कुछ भी होगा मैं हमेशा आपके साथ रहने के लिए दृढ़ संकल्पित हूँ। मैं आपसे अलग नहीं हो सकती हूँ। तो यह एक आदमी और उसकी चार पत्नियों की कहानी है।

ये पत्नियाँ क्या संकेत करती है?

गौतम बुद्ध ने इस कहानी का निम्नानुसार निष्कर्ष निकाला: प्रत्येक पुरुष और स्त्री  की चार पत्नियां या पति हैं। ये पत्नियाँ कौन है?

पहली ‘पत्नी’ हमारा शरीर है। हम दिन और रात्रि हमारे शरीर से प्यार करते हैं। सुबह में, हम अपने चेहरे को धोते हैं, अच्छे कपड़े और जूते पहनते हैं।

हम अपने शरीर को भोजन देते हैं। हम इस कहानी में पहली पत्नी की तरह हमारे शरीर का ख्याल रखते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, हमारे जीवन के अंत में, शरीर या हमारी पहली ‘पत्नी’ अगली दुनिया में हमारा अनुसरण नहीं करती है।

जैसा कि एक टिप्पणी में कहा गया है, ‘जब आखिरी साँस हमारे शरीर को छोड़ देती है तो हमारे चेहरे का रंग बदल जाता है और हम चमकदार जीवन की उपस्थिति खो देते हैं हमारे प्रियजन चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं और विलाप करते हैं, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता है। जब ऐसी कोई घटना होती है, तो शरीर को खुले मैदान में जला दिया जाता है और हमारा शरीर केवल श्वेत राख बनकर रह जाता है। यह ही हमारे शरीर का गंतव्य है।

दूसरी पत्नी का क्या अर्थ है? दूसरी ‘पत्नी’ हमारे भाग्य, हमारी भौतिक चीजें, धन, संपत्ति, प्रसिद्धि, स्थिति और नौकरी है जिसे हमने हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की है। हम इन भौतिक संपत्तियों से जुड़े हुए हैं। हम इन भौतिक चीजों को खोने से डरते हैं और अधिक होने की इच्छा रखते हैं। हमारी इच्छाओं की कोई सीमा नहीं है। हमारे जीवन के अंत में ये चीजें हमारी मृत्यु के साथ हमारे साथ नहीं जा सकती हैं। जो भी हमने कमाया है, हमें उसे छोड़ना होगा। हम खाली हाथ इस दुनिया में आये थे। इस दुनिया में हमारे जीवन के दौरान, हमें भ्रम है कि हमने एक भाग्य प्राप्त किया है। मृत्यु पर, हमारे हाथ खाली होते हैं। हम अपनी मृत्यु के बाद अपना भाग्य नहीं पकड़ सकते, जैसे कि दूसरी पत्नी ने अपने पति से कहा: ‘तुमने मुझे अहंकार केंद्रित स्वार्थीता के साथ पकड़ रखा था। अब अलविदा कहने का समय है’

तीसरी पत्नी का क्या अर्थ है? हर किसी की तीसरी ‘पत्नी’ होती है। यह हमारे माता-पिता, बहन और भाई, सभी रिश्तेदारों, दोस्तों और समाज का रिश्ता है। वे शमशान तक उनकी आँखों में आँसू के साथ हमारे मृत शरीर के साथ चलते हैं वहाँ तक वे सहानुभूतिपूर्ण और दुखी रहते हैं।

इस प्रकार, हम अपने भौतिक शरीर, हमारे भाग्य और हमारे समाज पर निर्भर नहीं हो सकते हैं। हम अकेले पैदा हुए हैं और हम अकेले मर जाते हैं। हमारी मृत्यु के बाद कोई भी हमारे साथ नहीं होगा। बुद्ध ने चौथी पत्नी का उल्लेख किया है, जो मृत्यु के बाद अपने पति के साथ जाती है। इसका क्या अर्थ है? चौथी ‘पत्नी’ हमारा मस्तिष्क है। जब हम गहराई से निरीक्षण करते हैं और पहचानते हैं कि हमारे मस्तिष्क क्रोध, लालच और असंतोष से भरे हुए हैं, अगर हम अपने जीवन पर नज़र डाले तो देखेंगे की क्रोध, लालच, और असंतोष ही हमारे कर्मों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। हम अपने कर्म से अलग नहीं हो सकते हैं। चौथी पत्नी ने अपने मरने वाले पति से कहा, ‘जहाँ भी तुम जाओगे मैं तुम्हारा पीछा करूंगी”

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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मराठी साहित्य – कविता ☆ सुजित साहित्य – लाॅकडाउन….! ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “लाॅकडाउन….!”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆  सुजित साहित्य  –  लाॅकडाउन….! ☆ 

तू तिथे.. .

मी इथे.. .

सारं काही लाॅकडाउन लाॅकडाउन..

फेसबुक आणि व्हाॅट्सअप वरती

भेटतो आपण येऊन जाऊन..

 

हातामध्ये तुझा हात

बाईकवरचा आपला थाट

रोजची आपली तीच वाट….

आता सारं काही

लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

 

नाक्यावरची ती काँफी

काँफीवरची ती वाफ

आणि वाफेवरती रंगत जाणारे

गप्पाचे ते…..तासन तास..

आता सारं काही

लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

 

दिवसभर तुझी साथ

माझे शब्द तुझी दाद..

कवितेची मग रंगते मैफल

समारोपाला रोजचा ऊशीर

आता सारं काही..

लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

 

मधाळलेली सायकांळ

अंधाराला घाई फार

मनामध्ये दोघांच्याही

निरोपाचा एकच ताल..

आता सारं काही..

लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

 

रोजचा उशिर आणि

रोजची गडबड

घरातल्यांची ती नुसती बडबड

ठरलेले रोज तेच उत्तर

आता सांर काही..

लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

 

तू तिथे.. .

मी इथे.. .

सारं काही लाॅकडाउन लाॅकडाउन…!

फेसबुक आणि व्हाॅट्सअप वरती

भेटतो आपण येऊन जाऊन. !

भेटतो आपण येऊन जाऊन. !

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ संस्कृति ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं सार्थक कविता संस्कृति ।  इस  कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – संस्कृति  ☆ 

 

रामायण, महाभारत औ’ गीता

कहलाते जिनके धार्मिक ग्रंथ

जहाँ वीर शहीदों ने जन्म लिया

उस पावन धरा की संस्कृति

लग रहा है मानो!!

आज खडी है बाज़ार में

अवनति की राह पर

चली भारत की संस्कृति

अब पनप रही है पाश्चात्य देशो में

सीखा रामायण विदेशियों ने

जाना गीता-सार दूसरों ने

लोकगीत व नृत्य में रुचि?

आज  कुछ भारतीय युवा

नहीं सुनना चाहते सत्संग

गीता या रामायण का पाठ

खो चुके स्वयं को चकाचौंध में

अंधियारे में चले खोजने रोशनी?

न ढूँढने पर मिलता प्रकाश

कल्पना में जीता है युवा

हकीकत की दुनिया से परे

अलग फिल्मों की दुनिया में

भूलकर स्वयं को किरणों में

नहीं पाश्चात्य संस्कृति हमारी

मत लगा अंधी दौड़ इंसान

भारत की है अमृत संस्कृति

भारत- संस्कृति चिर प्रवाहित

भारत के संस्कार विश्व में महान

विविधता में एकता है पहचान

गुज़ारिश है मात्र एक

लाना विचारों में बदलाव

पहनावा कुछ भी हो

नहीं फर्क करना कभी

संस्कृति को बचाना

देश को आगे है बढ़ाना

भारत देश के युवा की

संस्कृति है पहचान

बरकरार रखना है उसे

संस्कृति का अर्थ समझ

अपनाना उसे दिल से

बेमन मत छूना पैर बड़ों के

मत देना झूठा प्यार

मुस्कुरा देना देखकर

खुश हो जाएंगे बुजुर्ग

देख तार-तार आदमी

बस यही होगी जीत

यहीं है संदेश जीवन का

यहीं है गीत प्यार का

यही है सूरज की किरण

मत खो जाना गुफाओं में

मत भटकना गलियारों में

उद्देश्य औ’ मंजिल की ओर

मात्र चलते रहना  इंसा

मत कर इन्कार

यही है संस्कार

यही है संस्कार।

 

©  डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (14) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)

 

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ।।14।।

सतोगुणों की संवृद्धि पर यदि कोई तजता देह

तो वह उत्तम प्राणियों के जाता है गेहं।।14।।

 

भावार्थ :  जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।14।।

 

If the embodied one meets with death when Sattwa has become predominant, then he attains to the spotless worlds of the knowers of the Highest.।।14।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 54 ☆ मोहे चिन्ता न होय ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय एवं प्रेरक आलेख मोहे चिन्ता न होय।  दुखों को सहर्ष स्वीकारना एवं  उस पर विजय पाना ही जीवन की सार्थकता है। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 54 ☆

☆ मोहे चिन्ता न होय

 उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है,  लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है– फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता।’ यही है ज़िंदगी का सत्य व हमारे दु:खों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता। वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब गलत है और वे लोग भी दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते। वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है। जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते, हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता। वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते। हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर ज़ंग लग जाता है। हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं और अपने जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते। हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं। सो! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, चीखते-चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है। सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता। वे अंतर्मन की शक्तियों को पहचान कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं, कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते। वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती।

परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है, सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है। वह गलत दिशा में तीर चलाता रहता है। इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर, उस घर को बदलता है; नये-नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों को  नकार देता है,; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता। वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं, हमारे ही पास होता है। दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है; आपकी मन:स्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा?

रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल-ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है। सो! आवश्यकता है, सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की;  हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की; सत्य को स्वीकारने की। जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते; हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन-शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता।

‘कुछ हंसकर बोल दो/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है। जीवन में सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं। सो! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं। जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सब से हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय निरंतर परिवर्तन- शील है। समय आने पर दिन-रात व ऋतु- परिवर्तन अवश्यंभावी है। कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है। लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ नहीं प्राप्त होता। इसी संदरभ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं।’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मन:स्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं; जीवन में नई उमंग-तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िंदगी से उसी रफ़्तार से पुन: दौड़ने लगती है।

चेहरा मन का आईना है, दर्पण है। जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं। वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाते प्रतीत होती है; समुद्र की लहरें चीत्कार करने लगती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं। इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है  कि इंसान को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। आखिर कौन बच पाया है…कालचक्र की गति से? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा। कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन ब्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन-भर मुसीबतों का सामना करते रहे। राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास; सीता-हरण; रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक, धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग; विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण,; अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना; राम की सीता से मुलाकात; अग्नि-परीक्षा और अयोध्या में पुनरागमन। पुनः अग्नि परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे। यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हो, तो ज़िंदगी कैसे गुज़र जाती है, पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दु:ख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है। अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है। आइए! समस्त ऊर्जा को दु:ख निवारण में लगाएं। खुद भी हंसें और संसार के प्राणी-मात्र के प्रति संवेदनशील बनें; आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें। समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें। अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें। गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दु:ख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि- नियंता को भूलें नहीं… यही है दु:खों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद-नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वह प्राणी-मात्र में परमात्मा-सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं। अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी, ‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय।’ चिंता किसी रोग का निदान नहीं है। इसलिए चिंता करना व्यर्थ है। परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से अधिक जानता है, तो हम चिंता क्यों करें? सो! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ बरगद / Banyan Tree – सुश्री निर्देश निधि ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

Captain Pravin Raghuvanshi ji  is not only proficient in Hindi and English, but also has a strong presence in Urdu and Sanskrit.   We present an English Version of Ms. Nirdesh Nidhi’s  Classical Poetry  बरगद  with title  “Banyan Tree” .  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation.)

आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में  आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से  इस कविता की मूल लेखिका सुश्री निर्देश निधि जी एवं अनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.

सुश्री निर्देश निधि

 ☆ बरगद ☆ 

 (मेरी यादों में बसा वह बरगद जिसे कट जाना पड़ा नवनिर्माण के लिए, और (दुःखद) परिणामस्वरूप जन्मी यह रचना–)

सुनो लकड़हारे ,

हमारे पोखर वाले खेत के मुहाने पर

ये जो बरगद वाला पेड़ है न

ये सुनाता है किस्से, कहता है कहानियाँ

हमारे दादा परदादाओं की ।

कई बार मेरे सपने में आता है कोई झुकी कमर वाला बूढ़ा

और कहता है

ये बरगद नहीं, वंश वृक्ष है

आदमी जीते हैं और मर जाते हैं

ये जीवित रहता है, पीढ़ी दर पीढ़ी

इसे कभी हमारे बुज़ुर्गों ने सौंपी थी बुज़ुर्गियत

पहनाई थी पगड़ी

खड़ा है इसीलिए, हनुमान सा चिरजीवी

सुनो लकहारे तुम

तुम इसकी जड़ें तो क्या

टहनियाँ भी मत छूना

इनमें रात भर समेटता है निशाचारी चाँदनी की ठंडक

बुरकता है दुपहरी भर थोड़ी – थोड़ी

थके मांदे राहगीरों की तपती झुलसती काया पर, करीने से

सुनो लकड़हारे

तुम उसकी टहनियाँ तो क्या

पत्तियों को भी मत छूना

ये बजकर खरताल सी, सुर साधकर साथ समीरों के

सुनाती है मंद – मंद लोरियां ,गाती हैं दीपक राग

हर नई सुबह करती हैं सिंगार

लेकर उषा से ढेर सारी लालिमा

सुनो लकड़हारे

तुम इसकी पत्तियां तो क्या

इसकी हवाओं को भी मत छूना

जिन्हें ये दिन  भर ठहराता है सबकी उखड़ती साँसों में

अंधेरी रात के बिछौने से रात भर बीनता है कालिमा

बुनकर कालीन बिछा देता है दिनभर के लिए

बना छोड़ी है सराय इसने अपनी घनी छाँव तले

बाबुल के घर लौटतीं  गाँव की बेटियों के सिर पर

पिता के आशीर्वाद सा, सेवल को खड़ा रहता है

बालकों को पुचकारता, बूढ़ों के सुर में सुर मिलाता

यौवन के सुरमई सपनों का ,

ज्वार भाटों से भरा समंदर ये

पशु और परिंदों का,

चेतन और उनींदों का बाल सखा जो है

साथ खड़ी पोखर के सीने पर चढ़ा रहता है

हंसी ठिठोली का रिश्ता जो जोड़ रखा है

जब देखो तब, आँख बचाकर उसके धुले पुंछे आँचल पर

अपनी बेकार हुई पत्तियां ठेल देता है

सुनो लकड़हारे,

तुम लकड़हारा बनकर इसे कभी मत देखना

मासूम परिंदों के साथ ही इसने पाल रखे हैं आदम खोर भी

विमर्श करता रहता  है रात भर उनसे

खड़ा रहता है चौकन्ना चौकीदार सा

वो जो हमारे पोखर वाले खेत के मुहाने पर

बरगद वाला पेड़ है न ……

 

© निर्देश निधि

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

 ☆ Banyan Tree☆

 

O’, Woodcutter!

At the mouth of our farm land,

Next to the puddle pond

There is this banyan tree,

That tells stories,

Narrates fables of

Our grandfathers, great grandfathers…

 

Many a times, there comes

this old man in my dreams,

with a humpback…

Who proclaims

This is not just a banyan tree,

It’s a family tree

People live and die

As it lives on, generation after generation…

Long back, it was crowned with

the title of *’Ageless’* by our ancestors

Since then, it wore the  ‘turban of elders’…

And, as Lord Hanuman*

it has been standing rock-solid ever since,

Steadfast forever…!

 

Listen you, Woodcutter!

Don’t you dare touching its twigs

Leave apart even cutting its roots…

Throughout the night,

It gathers the coolness of the nocturnal moonlight…

As it sprinkles fragrant and

soothing freshness on

the scorching bodies

of the tired travelers…

 

Listen, O’ Woodcutter!

What to talk of twigs,

You don’t even touch the leaves…

It plays the zither,

with a melodious sound

Singing celestial lullabies in Deepak Raga* tune

Adorning itself with the redness

of the dawn every morning…

 

Listen, O’ Woodcutter!

Leave apart even chopping the leaves

Don’t you dare

touching its winds

Which it puffs in everyone’s breath,

throughout the day…

Picks up the ‘Kalima’ –the darkness– of the night,

Weaves a soothing layer of carpet below, for the day…

Has made a perennial

inn under its dense shade

Envelops as the blessings of father

On the heads of the daughters of the village,

 returning to their parental house…!

 

It fondles with the children,

Harmonises tone with

the aged ones and shows the

beautiful dreams to the youth,

A swollen sea full of tides

of animals and birds,

Inseparable childhood friend

of animate and  inanimate objects,

while standing by the side of puddle,

firmly as ever..

Maintaining the relationship of joy and laughters…!

Whenever it feels like,

It quietly, dumps the wasted leaves,

On the spick and span ground below…

 

Listen, O’ Woodcutter!

Don’t you ever look at it as a wood-chopper…

Along with innocent birds,

it has also raised man-eaters,

as it keeps discussing

with them all night through

Standing watchful like a sentinel,

At the mouth of our puddle-farm,

That very Banyan tree …!

 

© Captain (IN) Pravin Raghuanshi, NM (Retd),

Pune

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ-14 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पियाँ-14

आदमी

बोलता रहा ताउम्र,

दुनिया ने

अबोला कर लिया,

हमेशा के लिए

चुप हो गया आदमी,

दुनिया आदमी पर

बतिया रही है!

 

©  संजय भारद्वाज

प्रातः 9:44 बजे, 2.9.2018

( कवितासंग्रह *चुप्पियाँ* )

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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