English Literature – Poetry ☆ Daily ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.)

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry  “रोजाना ” . We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

☆ रोजाना ✍️  ☆

कैसे चलती है क़लम

कैसे रच लेते हो रोज?

खुद से अनजान हूँ

पता पूछता हूँ रोज,

भीतर खुदको हेरता हूँ

दर्पण देखता हूँ रोज,

बस अपने ही अक्स

यूँ ही लिखता हूँ रोज।

Daily …. ✍️

How does your pen

keep moving…

How d’you manage

to create everyday?

 

Being stranger

to myself I keep

asking for my

address everyday…

 

Keep introspecting

myself deep inside

As I peep into the

mirror everyday…

 

And, the pen just

oozes ink on paper

everyday looking

at my own image…

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ☆ सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆ इंद्रधनुष ☆ श्री संजीव अग्निहोत्री

श्री संजीव अग्निहोत्री

हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत एक रचना पाठकों से साझा कर रहे हैं। हमारा आग्रह  है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। हमने सहयोगी  “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति आयोजन” में प्राप्त चुनिंदा रचनाओं से इस अभियान को प्रारम्भ कर दिया  हैं।  आज प्रस्तुत है श्री संजीव अग्निहोत्री जी की प्रस्तुति  “ इंद्रधनुष ”

☆  सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆  इंद्रधनुष ☆

सात सुर भी नहीं सरगम में रह पाते,

शाख़-शाख़ अलग,वृक्ष से यही नाते ?

अब तो पड़ चुका है,आँख पे शक का पर्दा

दुआ- सलाम है,पर खुल के मिल नहीं पाते.

?

ये कौन हैं जो ज़हर,आबो-हवा को देते

मसलते अमन को,शोलों को हवा दे देते

और एक हम हैं,जो बिछाए गये जालों में

कुछ बिना सोचे,परिंदों की तरह फँस जाते.

?

कहीं तो जाति धर्म चौसर की गोटी हैं

ये इनका खेल है,ये सेंक रहे रोटी हैं

हमारे प्रेम के पौधे को ज़हर से सींचा

नज़र में ताज है, ये चाल बड़ी खोटी है.

?

हैं भारतीय सभी,इंद्रधनुष धारी हैं

है सात रंग,मगर आसमाँ पे भारी हैं

बड़े जतन से सम्भाला हुआ,ये गुलशन है

जो ताज ओ तख़्त की है दुश्मनी, तुम्हारी है.

©  श्री संजीव अग्निहोत्री

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 66 – चाक का प्रसाद ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर लघुकथा   “चाक का प्रसाद।  सुखान्त एवं प्रेरणास्पद / शिक्षाप्रद लघुकथाएं श्रीमती सिद्धेश्वरी जी द्वारा रचित साहित्य की विशेषता है। इस सार्थक  एवं  भावनात्मक लघुकथा  के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 66 ☆

☆ लघुकथा – चाक का प्रसाद ☆

छोटा सा गाँव और गाँव के बाहर मैदान, जहाँ पर एक कुम्हार अपनी झोपड़ी बनाकर रहता था।

परिवार में छोटा बच्चा और पत्नी, आसपास थोड़ी पेड़ पौधे और बाहर आँगन पर उसकी चाक पड़ी रहती थी। बिल्कुल पास में ही छोटा सा मंदिर था। कुल मिलाकर बहुत ही दयनीय अवस्था। दिये, कुल्हड़, मटकी बनाया करता था। बिक जाते तो आटा दाल अच्छे से मिलता और कभी ना बिके तो जो मिले उसी से गुजारा होता।

गाँव बस्ती में एक फल वाली अम्मा जिसका कोई नहीं था अकेले रहती थी और फल लाकर  गाँव में बेचती थी। शहर से टोकरी लेकर वह बस से गाँव के बाहर उतरती थी। प्रतिदिन का काम था कि वह एक दो फल उस  मंदिर पर चढ़ा देती थी।

उस की टोकरी को हाथ लगा कर सिर चढ़ाने के लिए कुम्हार या उसकी पत्नी कोई भी खड़े रहते थे। कुम्हार की स्थिति देख फलवाली को बहुत दया आती पर स्वयं भी एक एक रुपए का सौदा करती थी।

इसलिए कभी ज्यादा नहीं दे पाती थी और जान बूझकर फल मंदिर में डाल जाती थी। मंदिर में जो फल मिलता था उसे कुम्हार की पत्नी अपने बच्चे को उठाकर दे देती थी।

सुभाष अपनी मां से और फल की मांग करता परंतु माँ कहती ‘चाक प्रसाद’ है बस एक ही खाया जाता है। जब दिवाली आएगी और बिक्री होगी तो खूब सारा प्रसाद चाक पर आयेगे और तब खा लेना।

बरसों बीत गए सुभाष पढ़ाई करने लगा। गरीबी कार्ड से उसे पढ़ने का अवसर मिल गया और पढ़ाई करने के बाद शहर के सरकारी अस्पताल में उसे परिचय पत्र बनाने का काम मिल गया।

सब कुछ भूल चुका था। अचानक एक दिन अस्पताल में कुछ काम से निकलकर वार्ड का चक्कर लगाते हुए देखा कि एक महिला गिरे केले के छिलके उठाकर खा रही थी। पाँव उसके वहीं ठिठक गए।

वह वहाँ से किसी को बताए बिना चुपचाप आकर नर्स और डॉक्टर से कहकर उस का इंतजाम करवाने लगा। अपने बिस्तर के पास टोकरी पर रखे ताजा फलों को देख अम्मा की आँखें भर आई। उसी समय नर्स ने हँसकर कहा…. “रोती क्यों हो अच्छे से खाओ और ठीक हो जाओ यह ‘चाक का प्रसाद’ है।”

‘चाक का प्रसाद’ बुढ़ी अम्मा सोचने लगी। दोपहर में गरम-गरम खाना लेकर सुभाष खड़ा था।

झलझलाती आंखों से उस बालक को पहचान लिया। और फिर भी रोते हुए लिपट पड़ी ।अस्पताल के कर्मचारी समझ न सके कि ‘चाक के प्रसाद’ का क्या मामला है। सभी को फल बांटा गया।

अब माँ खुश हो गई सभी ने समझा शायद किसी मंदिर से चाकदेव भगवान का प्रसाद आया है। सुभाष अपनी फल वाली माँ को पाकर बहुत खुश था।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मेरे..मन..की. ☆ ☆ श्री जयेश वर्मा

श्री जयेश वर्मा

(ई-अभिव्यक्ति में सुविख्यात साहित्यकार श्री जयेश कुमार वर्मा जी का हार्दिक स्वागत है। आप बैंक ऑफ़ बरोडा (देना बैंक) से वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। हम अपने पाठकों से आपकी सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक  अतिसुन्दर भावप्रवण कविता मेरे..मन..की. ।)

☆ कविता  ☆ मेरे..मन..की ☆

मैं हवा हो जाऊं

सबकी सांसो में समा जाऊं।।

मैं ना रहूँ तब भी,

एक खुशबू सा बिखर जाऊं।।

 

मैं एक चिड़िया हो जाऊं

सबके आँगन में फुदक जाऊं

हर मौसम में गाना गाऊँ

तिनके तिनके जोड़कर बनाउ घोसले

सबके साथ फिर थोड़ा सा रह जाऊँ।।

 

मैं एक बादल हो जाऊं

आसमा में भटकता भटकता

किसी अपने पर,

जम कर बरस जाऊं।।

 

मै जब पीला पत्ता हो जाऊं।

अपनी टहनी से बिछड़ जाऊं।

ऐ हवाओ आंधिया बन आना

मुझे उड़ा ले जाना,

अंनत की ओर….

 

©  जयेश वर्मा

संपर्क :  94 इंद्रपुरी कॉलोनी, ग्वारीघाट रोड, जबलपुर (मध्यप्रदेश)
वर्तमान में – खराड़ी,  पुणे (महाराष्ट्र)
मो 7746001236

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ लघुकथा संग्रह “संवेदना” अनुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी

सुश्री संगीता कुलकर्णी

निवेदन –

आपण अनेक पुस्तके वाचतो. त्यातील काही पुस्तकं आपल्याला आवडतात. त्यावर बोलावं, इतरांना सांगावं, असं आपल्याला वाटतं.  कित्येकदा आपल्या पुस्तकाबद्दल इतरांशी बोलावं, आपली त्यामागची भूमिका मांडावी, असंही काही वेळा  वाटत. या वाटण्याला शब्द देण्यासाठी एक नवीन सादर सुरू करत आहोत,पुस्तकांवर बोलू काही.’  आज त्यातील पहिला लेख  सुश्री संगीता कुलकर्णी यांचा.

संपादक मंडळ – ई – अभिव्यक्ती 

☆ पुस्तकांवर बोलू काही ☆ लघुकथा संग्रह “संवेदना” अनुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆ 

अनुवादित पुस्तक – संवेदना

मूळ हिंदी लेखक – डाॅ. कमल चोपडा

अनुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

समकालीन हिंदी प्रस्थापित लेखकांमध्ये  डॉ कमल चोपडा हे एक महत्वाचं नाव. त्यांच्या हिंदीतील निवडक लघुत्तम कथांचा अनुवाद  संवेदना या नावाने श्रीमती उज्ज्वला केळकर यांनी केला आहे..

आपल्या सभोवतालचं जीवन त्यातील सहजता, गंभीरता, तर कधी कधी भयावहताही ते सहजतेने पाहतात व अनुभवतात. तसेच आपल्या भोवती घडणारे घटना- प्रसंग, ते घडवणा-या विविध व्यक्ती, त्यांचे विचार, विकार, वर्तमानात जाणवणारी सुसंगती- विसंगती, स्वार्थ, त्याग, सांमजस्य ताठरता यांचे ते सूक्ष्म निरीक्षण करतात.

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

या त्यांच्या पुस्तकातील कथांत लक्षणीय विविधता आहे. कौटुंबिक नातेसंबंध, सामाजिक व्यवहार, सांप्रदायिक दंगे, राजकारण अशा विविध क्षेत्रांतील अनेक पैलू या कथांमध्ये आहेत. कौटुंबिक नात्यातील अनेक प्रकारचे भावबंध त्यांनी उलगडलेले आहेत. मुलं, त्यांचे आई-वडील भावंड, सासवा- सूना या नात्यातील आत्मियता, प्रेम, जिव्हाळा त्यांच्यातील ताण-तणाव त्यातून प्रगट झालेले भाव- भावनांचे कल्लोळ या सा-याला चिटकून राहिलेले दारिद्रयाचे अस्तर त्यातूनच झरणारी आत्मीयतेची माणुसकीची जाण हे सर्व या कथांमधून प्रगट होते.

सासू-सुनेचे संबंध तर जगजाहीर… पण इथे मुलगा आणि सून यांच्यातील बेबनाव दूर करणारी सासू आहे. “ओठांत उमटले हसू– मूळ कथा छिपा हुआ दर्द ” या कथेत तर गावाहून सासू-सास-यांना भेटायला आल्यावर घरात फक्त मक्याचचं पीठ शिल्लक आहे बाकी काही नाही हे कळल्यावर…आम्ही फक्त तुमच्याच हातच्या मक्याच्या रोट्या खायला आलो आहोत पण त्या सोबत दूध, लोणी, तूप, साखर असं काहीही घालू नका. डाॅक्टरांनी आम्हाला खाऊ नका म्हणून सांगितलयं…असं म्हणत सासूचा आत्मसन्मान जपणारी समंजस सून आहे.

पतीचा अन्याय सहन करणारी स्त्री हे चित्र तर आपल्याला जागोजागी दिसतं. ” पती परमेश्वर–मूळ कथा- पालतू ” या कथेत तर दुस-या बाईकडे जाण्यासाठी बायकोकडे पन्नास रुपये मागणा-या नव-याचे पाय सुपारी देऊन गुंडाकडून निकामी करणारी व नंतर त्याला औषधोपचार करून भाजीच्या गाडीवर बसवून त्याला कामाला लावणारी व माझा पती ” पती परमेश्वर ” असेही म्हणणारी विरळा बायको भेटते…. दारूडा नवरा मेल्यानंतर आठ दहा वर्षांचा मुलाला सोडून दुसरा घरोबा करणा-या आईचं दुःख समजून घेणारा..आपल्याला सोडून गेल्यावरही आपल्यात कटुता येऊ न देणारा ” असेल तिथे सुखी असो– मुळ कथा– जहाँ रहे सुखी रहे ” अशी इच्छा बाळगणारा मुलगाही येथे आपल्याला भेटतो..

सांप्रदायिक दंग्याच्या पार्श्वभूमीवरच्या अनेक कथांही यात आहेत. पण प्रत्येक कथेचा रंग वेगळा सांगण वेगळ…” विष-बिज ” मूळ कथा विष-बिज मधील म्हातारी म्हणते लूटमार, आगं लावणं यामुळे तुमच्या धर्माची प्रतिष्ठा कशी वाढेल? उलट अशा प्रत्येक घटनेतून तुमच्या शत्रूंची संख्याच वाढत जाईल आणि मग ही आग तुमच्या घरापर्यंत, तुमच्या मुलांबाळांपर्यंत पोचेल….

तर “तपास–मूळ कथा- शिनाख्त ” या कथेत पोलिसांची कुत्री त्या भागातला एक कुख्यात गुंड एक आमदार एक गुन्हेगार यांच्यापर्यंत पोचतात. इन्स्पेक्टर आझाद आपल्या अधिका-याला अहवाल सादर करतो. खरे गुन्हेगार कोण? हे कळल्यावर तो अधिकारी म्हणतो तुला ‘ तपास ‘ नाही ‘ तपासाच नाटक ‘ करायला सांगितलं होतं. त्यावर इन्स्पेक्टर म्हणतो माझा तपास पूर्ण झालाच नव्हता. चौथ्या गुन्हेगारापर्यंत मी पोचलोच नव्हतो. चौथा गुन्हेगार पोलिस म्हणजे आपण..

आजारी मुलाच्या औषधपाण्यासाठी पैसे हवे असलेला एक सामान्य माणूस..पैशासाठी बस मध्ये बाँम्ब ठेवायला तयार होतो. उतरता उतरता त्याला एका लहान मुलाचं रडणं ऐकू येतं. त्याला ते आपल्याच मुलाचं वाटतं व तो बस मध्ये बाँम्ब आहे हे सगळ्यांना सांगून खाली उतरायला लावतो. लहान मुलाचे रडण्या- हसण्याचे आवाज आपल्याच मुलासारखे कसे वाटतात? मग ते कुठल्या का धर्माचे असेनात…कथा– ‘धर्म– मूळ कथा– धरम ‘

‘सफरचंद– मूळ कथा– फल’ व ” पैसा आणि परमेश्वर — मूळ कथा–पैसा और भगवान ” या कथांत तर मुलांचे मन, त्यांना पडणारे गमतीदार प्रश्न मांडले आहेत. ” पैसा व परमेश्वर ” या कथेत तर देवाला पैसे टाकताना पाहून ‘ देव भिकारी आहे का? ‘ त्याला पैसे टाकून त्याच्याकडे भिका-यासारखं काही का मागतात? त्याला जर पैसे हवे असतील तर तो आपल्या जादूने पैशाचा ढिग निर्माण करणार नाही का? असं विचारणारा व विचार करायला लावणारा निरागस पिंकू इथे आहे…

अशा अनेकविध कथांतून सांप्रदायिक कट्टरतेच्या दरम्यान सद्भभावना आणि मानवी मूल्यांच्या जपणुकीचा आशय अतिशय सुंदररित्या मांडलाय..विविध पातळ्यांवर विविध अंगाने होणा-या शोषणाचे अनेक रूपरंग त्यांच्या या कथांतून प्रगट झाले आहेत..

डाॅ. कमल चोपडा यांच्या कथा जीवनातील, लोक व्यवहारातील, आचार-विचारातील विसंगतीवर नेमकं बोट ठेवते व मोजक्याच शब्दांतून त्यांचं मार्मिक दर्शनही घडवतं..

 

©  सुश्री संगीता कुलकर्णी 

ठाणे

मो 9870451020

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 67 ☆ अर्थव्यवस्था (हज़ल) ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 67 ☆

☆ अर्थव्यवस्था (हज़ल)  ☆

रोज सकाळी हवा उतारा उठल्या नंतर

इलाज नाही दारुत पुरता फसल्या नंतर

 

नशा शोधली अशी कशी ही अरे माणसा

तरंगताना दिसतो दारुत बुडल्या नंतर

 

अपशब्दांची उधळण होते तोंडामधुनी

असेच घडते त्यांच्या सोबत बसल्या नंतर

 

बैठक आता कशी थांबवू तुम्हीच सांगा

ग्लास दारुचा ओठांना ह्या भिडल्या नंतर

 

हातामधला ग्लास डोलतो चढते त्याला

मी तर मानव डोलणार ना चढल्या नंतर

 

दया करावी धर्म सांगती सारे येथे

पामरास या उचलुन घ्यावे पडल्या नंतर

 

देशाची ह्या अर्थव्यवस्था माझ्यावरती

देश चालणे कठीणच दारु सुटल्या नंतर

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाया प्रपंचाचा…. ☆ श्रीशैल चौगुले

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पाया प्रपंचाचा…. ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

गणिते मांडावीत

आठवे सांडावीत

मनात कोंडावीत

दुःख-कष्टाची सूत्रे.

 

पायरी सोडवता

ऊत्तरे घडवता

बेरीज-गुणाकार

प्रायश्चीते चुकांचे.

 

भुमिती कोन-बाजूंची

कसोटी संघर्षांची

प्रमेये संयमात

जीवन सिध्दातांचे.

 

आयुष्याचे ग्रंथ

हाताळता संभाव्ये

भावनांचे अवयव

वर्ग-घातांकावे क्षण.

 

त्रिकोणाचा छेद

हृदय संवेदना

प्रेमळ वर्तुळात

पाया प्रपंचाचा.

 

© श्रीशैल चौगुले

९६७३०१२०९०

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जंगलच्या राजाची प्रार्थना ☆ सौ.वंदना अशोक हुळबत्ते

☆ जीवनरंग ☆ जंगलच्या राजाची प्रार्थना ☆ सौ.वंदना अशोक हुळबत्ते ☆

एक चिमणी उडत उडत जंगलात गेली .सोबत कावळेदादा होता.त्यांना घाई गडबडीने जाताना पाहून माकडदादा उड्यामारत  त्यांचा मागे गेले.पोपट,घार, बुलबुल, त्यांच्यात सामील झाले.

जंगलच्या राजा समोर उभे ठाकले.

शहरात वावरणाऱ्या या पक्ष्यांची,प्रांण्याची झुंड बघून

सिंहराजे म्हणाले “आज शहरातील मंडळींना जंगलाची आठवण कशी झाली?”

“महाराज मोठा अनर्थ झाला आहे.शहरातील रस्ते सुनसान झाले आहेत.लोक रस्त्यावर येत नाहीत.सार कसं शांत शांत आहे.”चिमणीने खुलासा केला.

तसा कावळेदादा म्हणाला “हे काहिच नाही महाराज,रस्त्यावर गाड्या नाहीत ,फटफटी नाहीत,सायकली नाहीत,ट्रक नाहीत,जरा सुध्दा कसला आवाज म्हणून नाही.लय भारी वाटतंय.लॅकडाऊन आहे म्हणे तीन महिने मोठी महामारी आली आहे.”

“म्हणून तर आताआमचे मंजूळ आवाज त्यांच्या कानी पडायला लागले.आम्ही शहरात असतो हे आता त्यांना कळतोय.”कोकीळेने आपलं म्हणे मांडले.” मी तर हवे तिथे उड्या मारु शकतो.कुठे ही कसा ही हिंडू शकतो.कोण मला अडवत नाही.मी राजा हे शहराचा माझ्या कुटुंबाला घेऊन जावू शकतो.मी स्वंतत्र आहे आणि माणसे घरात बंद”वाकुल्या दाखवत माकडाने माहिती पुरवली

“महाराज,मी बघतोय,भाजीपाला घेण्यासाठी,दूध घेण्यासाठी,औषधे घेण्यासाठी माणस तोंडाला फडकी बांधून जीवमूठीत घेवून येतात आणि अगाऊपणा करत मोटरीवरून हिंडणाऱ्याच्या गांडीवर पोलिसांच्या काठ्या पडतात.जाम खुश हाय मी.मला काळ्या काळ्या म्हणूण चिडवत्यात चांगली खोडमोडली “कावळेदादा  तिखट मीठ लावून घटना सांग होते.बुलबुल म्हणाले “रस्त्यावर प्लस्टिक कचरा नाही,गुटक्यांची,वेफर्सची,कुरकुऱ्याची रिकामी रॅपर नाहीत,पाण्याच्या, कोल्ड ड्रिंक्स च्या बाटल्या नाहीत,रस्ते कसे स्वच्छ आहेत.माणसे किती कचरा करतात प्रदूषण वाढवतात.या लाॅकडाऊनमूळे प्रदूषण तरी कमी झाले शुध्द शाश्वस घेता येतो.’

प्रत्येकाने काही ना काही सांगीतले सिंह महाराजांनी सारं शांतपणे ऐकून घेतले.मग आपले म्हणने मांडले”या साऱ्या घटनांची कल्पना मला आहे.मानवाला कोरोना विषाणूंची बाधा झाली आहे.याला ते स्वत: कारणीभूत आहेत.मी या संदर्भात विचारपूस केली तेव्हा समजले माणसाचे वर्तन निसर्ग नियमांच्या विरूद्ध आहे.तो स्वत:च्या बुध्दीच्या जोरावर निसर्गाला आपल्या कवेत घेवू पहात आहे पण हे शक्य नाही.मनुष्य हा देखिल प्राणीच आहे त्यांने आपल्या मर्यादा ओलांडल्या तर त्यांचे परिणाम त्यांना भोगावे लागणार.निसर्गाचा नियम काय आहे.प्रत्येक विषाणू, जीवाणू निसर्गात सहजीवनाने राहतो.एक जीव दुसऱ्या जीवावर जगतो.हि साखळी खंडित करण्यांचे काम मानवाकडून होत आहे.त्यांची शिक्षा त्याला मिळणार”

“करतो कोण आणि भोगतो कोण.अस झालं आहे महाराज एका देशातील मानवाच्या चूकीच्या वर्तनाची शिक्षा समस्त मानवजातीला भोगावी लागत आहे.मी तर त्यांचा अंगणातच असते.आज माझे अस्तित्व धोक्यात आले आहे.पण सगळे मानव असे नाहीत.आपल्या गोष्टी ऐकत हे मोठे होतात. आपण काही तरी केलं पाहिजे ते आपलेच आहेत.”डोळ्यात पाणी आणून चिमणी सांगत होती.

“आपण त्यांचे वैरी नाही.पण गुहेतील वटवाघळे किचनमध्ये आणू खायला कुणी सांगितले यांना, जे त्यांच अन्न नाही ते खावं कशाला? आता त्या वटवाघळाला दोष द्यायला हे समस्त मानव रिकामे.निसर्गा पुढे कुणाचे चालत नाही.निसर्गात घडणाऱ्या सगळ्या   घटनांचे आकलन होत नसते.निसर्ग स्वत:च्या नियमाने वागतो.प्रत्येक गोष्टीत संतुलन करतो.जी गोष्ट जास्त होते ती नष्ट करतो.नष्ट झालेली पुन्हा निर्माण करतो.संतुलन हा निसर्गाचा एक चमत्कारच म्हणावा लागेल.तो अनभिज्ञ आहे.आपण सारे सजीव सृष्टीचे भाग आहोत.म्हणून आज तरी आपण काहीच करू शकत नाही.

लवकरात लवकर या स्थितीतून संपूर्ण मानव जात बाहेर पडू दे अशी प्रार्थना विश्वकर्मा जवळ करू शकतो इतकंच.”

“खरे महाराज तुमचे.या घटनेतून आपण केलेल्या चूकांची जाणीव  मानवजातीला व्हावी आणि त्यातून बोध घेऊन पुन्हा अशी चूक होणार नाही याची काळजी घ्यावी.ही इच्छा.देव त्यांना सद्बुद्धी देवो.हीच प्रर्थना करु.मला माझ्या घरी गेलं पाहिजे माझी लेकरं वाट बघत असतील.”

 

© सौ.वंदना अशोक हुळबत्ते

मो.९६५७४९०८९२

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सुख म्हणजे काय ☆ सौ. राधिका भांडारकर

 ☆  विविधा ☆ सुख म्हणजे काय ☆ सौ. राधिका भांडारकर ☆ 

माझ्या आजोबांच्या घरात दर्शनीच भिंतीवर एक मोट्ठी पाटी होती. त्यातलं पहिलं वाक्य चांगलच ध्यानात आहे!

समाधान हेच खरे सुख! गंमत म्हणजे लहानपणी, मोठे होत असताना सुखाविषयीची अनेक सुभाषिते ,श्लोक ऐकले अन् अभ्यासिले.

जगी सर्वसुखी असा कोण आहे? किंवा,

अलसस्य कुतो विद्या

अविद्यस्य कुतो धनम्

अधनस्य कुतो मित्र

अमित्रस्य कुतो सुखम्

कधीतरी माझ्या मनात, हाश्लोक आठवला आणि आले, आळशी असुनही शिकलोच की! पदवी मिळाली! नोकरी मिळाली..

मित्रपरिवार तर लहानपणापासून विस्तारलेलाच!

म्हणजे हा श्लोक आपल्याला लागू होत नाही!

मग हे सगळे ऊदात्त सिद्धांत मी जरा बाजुलाच ठेवले आणि माझ्या सुखाच्या ,आनंदाच्या व्याख्या तपासून पाहिल्या. शाळेत असताना ,मे महिन्याच्या सुट्टीत अडीचकं (आता हे पाढे वगैरे प्रकरण संपुष्टातच आलय्) म्हटलं की वडील अडीच आणे द्यायचे आणि मैदानात भाड्याची सायकल चालवायची परवानगी द्यायचे.. केव्हढा आनंद व्हायचा!

अबोला धरलेली जीवलग मैत्रीण एकदम एके दिवशी गळामीठी द्यायची!तो असायचा परमोच्च सुखाचा क्षण!

छोटे छोटे सुखाचे अनंत क्षण!

बसच्या भल्यामोठ्या रांगेत ऊभे असताना, आपल्याला हवी असलेल्या नंबरची बस आली की,सगळ्यांना ओलांडून बसमधे शिरताना होणारा आनंद कसा सांगू?

रेल्वेने प्रवास करत असताना आपल्या आरक्षित जागेवर कुणीही आगंतुक बसलेले नाहीत म्हणून भांडण टळल्याचा तो आनंद माझ्रासाठी विलक्षण असतो!

माझ्यासाठी वरसंशोधन चालु असताना, वडीलांनी विचारले,”तुझ्या जोडीदाराबद्दल काय अपेक्षा आहेत?”

मी लगेच ऊत्तर दिले,”जेवताना भुरके मारणारा आणि ताटात अन्न सांडणारा नवरा नको मला!”

आणि खरोखरच पुरुषांत अभावानेच अढळणारा व्यवस्थितपणा असलेला जोडीदार मिळाला अन् मी भरुन पावले!

पुढेपुढे माझ्या सुखाच्या व्याख्या बदलतच राहिल्या.

म्हणजे मदतनीस वेळेवर आली तर होणारा आनंद अन् त्यातून जाणवणारं सुख !

प्रभातसमयी नवर्‍याने दिलेला गरमागरम वाफाळलेला चहा! वा! क्या बात है! It makes my day!

अमेरिकास्थित मुलींशी बोलताना त्यांच्या आवाजावरुन जाणवणारी त्यांची ख्यालीखुशाली हाही एक सुखदु:खाचा विषय असतो.त्या मजेत तर मी मजेत त्यांचा आनंद माझा आनंद!

लाॅकडाउनमुळे सगळंच बंद! पण नवर्‍याने वाढदिवसाचे गिफ्ट काय दिले? कुंडीतल्या झाडावर ऊमलललेलं टवटवीत गुलाबाचं सुंदर फुल! अन् नजरेतली गाढ प्रीत!

किती सुखाचा क्षण!

एकीकडे म्हणतात, Sky is the limit. ध्येय बाळगा. जीवनात लक्ष्य हवं. Low ambition is crime. तर वडील म्हणायचे माणसांनी फार महत्वाकांक्षा बाळगु नयेत——नव्हे महत्वाकांक्षाच नसाव्यात!

गोंधळ व्हायचा माझा. पण कुठेतरी आता पटतं. गीतेतलाच ना हा सिद्धांत.

कर्म करा फळाची अपेक्षा न ठेवता! महत्वाकांक्षे सोबत अपेक्षा येते अन् मग अपयशातून दु:ख नैराश्य!

मग मनांत येत, सुशांत सिंगने आत्महत्या का केली? अधिक पैसा अधिक ग्लॅमर अधिक कीर्ती———— आणि मनाविरुद्धच्या परिस्थितीत टिकुन राहण्याचं नसलेलं मनोबल!

म्हणुनच सुखाच्या व्याख्या तपासल्या पाहिजेत. जया अंगी मोठेपण तया यातना कठीण! पण मोठेपणातही छोटेपण जपता आलं पाहिजे! म्हणूनच छोट्याछोट्या क्षणातलं सुख मुठीत सांभाळून ठेवते मी. मला मेडीकलला जायचं होतं .पण नाही जाऊ शकले. झाले होते मी निराश, दु:खी! पण दुसरे पर्याय मिळाले आणि यश मिळालं! जीवन थांबलं नाही.

हंं..!! म्हणजे परवा संपूर्ण भारत देशाने जेव्हां डाॅक्टरांना अभूतपूर्व सलामी दिली तेव्हां नकळत वाटलंही “आज आपणही या समुहात असतो…!!”

असो तर मंडळी सुखाची व्याख्या करता येत नाही. दोन अधिक दोन बरोबर चार असे ते गणित नाहीच! पुन्हा तत्वंआलीच..सुख मानण्यावर आहे!

प्रत्येकाच्या सुखाच्या कल्पना वेगळ्या. सुख प्रेमात आहे .सुख त्यागात आहे .सुख अहिंसेत आहे.

सुख देण्यात आहे! वगैरे वगैरे खूप काही…!सुख म्हणजे काय रे भाऊ? ——या प्रश्नाला काहीच ऊत्तर नाही.

मी मात्र एव्हढच म्हणेन, सुख—सुखी असणं ही वृत्ती आहे कदाचित असे तर नाही ना, तुज आहे तुजपाशी परी जागा चुकलासी,..!!

 

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (15) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

(कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन)

 

शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव।।15।।

 

मन,वाणी व शरीर से नर करता जो काम

सही गलत उस कर्म के हेतु, पाँच ये नाम।।15।।

 

भावार्थ :  मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।।15।।

 

Whatever action a man performs by his body, speech and mind, whether right or the reverse, these five are its causes.।।15।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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