हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – माँ  का आँचल ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  एक सार्थक एवं  हृदयस्पर्शी लघुकथा माँ  का आँचल। इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

 ☆  माँ  का आँचल  ☆ 

 

आज अरुण की तलाश पूरी हुई।

आखिरकार इंटरव्यू में पास हो गया।

इतने में जोर से बारिश आ गई। भीगता हुआ अरुण बस स्टैंड से दौड़ता सा घर पहुंचा। भीतर सब लोग हाॅल में बैठे थे। उसे देखकर भैया भाभी रहस्यमय तरीके से एक दूसरे को देखकर चाय की सिप लेने लगे। छोटी बहन उसका बैग टटोलने लगी।

पिता गरजे कुछ देर ठहर कर नहीं आ सकते थे वैसे भी हम जानते हैं क्या हुआ होगा। इतनी बड़ी कंपनी में तुम्हें नौकरी  नहीं मिलेगी।

इतने में माँ दौड़ती सी तौलिया लेकर आई और धीरे से पूछा बेटा कुछ खाया कि नहीं और माँ के आँचल से खुशी के आँसू पोंछते अरुण की आँखों ने सच्चाई बयां कर दी जिसे कहने की असफल कोशिश कर रहा था।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 13 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 13/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 13 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

कैदी हैं सब यहाँ…

कोई ख्वाबों का..

तो कोई ख्वाहिशों का..

तो कोई ज़िम्मेदारियों का…

 

Everyone is prisoner here,

Some of their dreams,

While some of their desires…

Others of responsibilities…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 

होती तो हैं ख़ताएँ

हर एक से मगर…

कुछ जानते नहीं हैं

कुछ मानते नहीं…

 

Committal of mistakes

Happens by everyone…

Some are not aware of it

While others don’t accept it…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 

मुझको तो दर्द-ए-दिल का

मज़ा याद आ गया

तुम क्यों हुए उदास

तुम्हें क्या याद आ गया…

 

Remembered the bliss filled

Anguish of my lovelorn heart

Why did you become sad

Did you also miss something

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 

कहने को जिंदगी थी

बहुत मुख़्तसर मगर

कुछ यूँ बसर हुई कि

खुदा याद आ गया…

 

Had a life so to say

Though much ephemeral

Passed in such a way that

Made me remember the God..!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गुरु पूर्णिमा विशेष – गुरु जग में सर्वोपरि ☆ श्रीमती ज्योति मिश्रा

श्रीमती ज्योति मिश्रा

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमती ज्योति मिश्रा जी का ई- अभिव्यक्ति  में  हार्दिक स्वागत है।  गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर आज प्रस्तुत हैं आपकी विशेष रचना   “गुरु जग में सर्वोपरि।  इस सर्वोत्कृष्ट  रचना के लिए श्रीमती ज्योति मिश्रा जी को हार्दिक बधाई।

☆ गुरु पूर्णिमा विशेष – गुरु जग में सर्वोपरि

प्रथम गुरु माता है,जग में

सर्वप्रथम जिनको पाया।

रिश्ते मिले उन्हीं से सब

ममता का एहसास कराया ।।

 

सकल विश्व दशम दिशा

होता है,  गुरु का  मान ।

राजा भी आते शरण

तज राज पद, अभिमान ।।

 

अन्तर्मन जो करे प्रकाशित

जाने सकल  जहान ।

बिना गुरु के ज्ञान के

यह तन पशु समान ।।

 

ज्ञान बुद्धि के है साधक

मानव गुण की खान ।

त्याग दया की मूर्ति

गुरु है सदा  महान ।।

 

गुरु कृपा से सब संभव

गुरु करते कल्याण ।

अरूणि सी गुरु भक्ति नहीं

जो दाव लगा दे प्राण ।।

 

परम ब्रह्म ने पृथ्वी पर

जब मानव तन पाया

ज्ञान प्राप्त किया गुरुकुल

गुरु चरणों में शीश झुकाया।।

 

गुरु के बिन भक्ति नही

गुरु  करते उत्थान  ।

गुरु जग में सर्वोपरि

गुरु बिन नही है ज्ञान ।।

 

© श्रीमती ज्योति मिश्रा

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गुरु पूर्णिमा विशेष – गुरूदेव श्री गुरू पूर्णिमा….. ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर आज प्रस्तुत हैं आपकी विशेष रचना   “गुरूदेव श्री गुरू पूर्णिमा…..।   इस सर्वोत्कृष्ट रचना के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ गुरु पूर्णिमा विशेष – गुरूदेव श्री गुरू पूर्णिमा…..

 

गुरु विनती रख लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

हाथ जोड़ गुरु शीश झुकाऊं

तेरे चरणों पर फूल चढ़ाऊं

मन की मुरादे ऐसी है कुछ

श्रद्धा से गीत आपका गाऊँ

 

गुरू विनती रख लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

सत्य राह पर सदा ही जाऊं

निर्मल मन से सबको निभाऊ

ईर्ष्या द्वेष मन से हटाऊं

परोपकार कर सुख अति पाऊं

 

गुरु विनती रख  लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

जब भी किसी के काम आऊं

पूरे मन से आपको ध्याऊँ

हाथ जोड़ गुरु आपको मनाऊं

पल पल रह ना मेरे पास

 

गुरु  विनती रख  लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

जन्म जन्म में तुझको पाऊं

माता पिता को शीश झुकाऊं

हरि से पहले तुझको ध्याऊं

गुरु को मना हरिहर पा जाऊं

 

गुरु  विनती रख लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

जीवन मेरा होगा उज्जवल

ज्ञान का सागर बहेगा पल पल

जीवन नैया पार लगाऊँ

श्रद्धा से मै शीश झुकाऊं

 

गुरु  विनती रख लेना पास

मुझको बनाना अपना दास

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – भारतीय ज्योतिष  क्या है? ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  जनसामान्य  के  ज्ञानवर्धन के लिए भारतीय ज्योतिष विषय पर एक शोधपरक आलेख  भारतीय ज्योतिष  क्या है?

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  भारतीय ज्योतिष  क्या है? ☆

भारतीय ज्योतिष शास्त्र विद्या को वेद का एक अंग माना गया है, इस विधा के द्वारा  मानव जीवन पर ग्रह-नक्षत्रों की छाया उच्च निम्न तथा वक्रीय दृष्टि के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जिसके द्वारा जातक के जीवन में भूत, भविष्य और वर्तमान का अध्ययन कर भविष्य वाणी की जाती है।

जब कोई जातक जन्म लेता है तो उस समय खगोलीय अनंत अंतरिक्ष के परिक्रमा पथ में भ्रमण कर रहे ग्रहों नक्षत्रों के स्वभाव तथा प्रभाव का अदृश्य किंतु स्थायी प्रभाव जातक के जीवन में अंकित हो जाता है, जो आजीवन काल क्रम के रूप में जातक को प्रभावित करता रहता है, इसका अध्ययन हमारे मनीषियों के शोध-पत्र के रूप में सामने आता है। इन प्रभावों के चलते ही मानव की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, बुद्धिमत्ता, दारिद्र, दुःख आदि का सटीक वर्णन संभव हो पाता है, जैसे गणना के आधार पर हमारा पंचांग, सूर्य के उदय अस्त तथा सूर्य ग्रहण चंद्रग्रहण की सालों पूर्व की सटीक जानकारी देता है। जिस प्रकार ज्ञान चक्षु से अंधेरे अथवा प्रकाश का ज्ञान हो पाता है, उसी प्रकार ज्योतिष विद्या भी गणितीय ज्ञानचक्षु है, जो मानव के भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान प्राप्त कर, भविष्य वाणी करने में सक्षम है, वैसे तो भारतीय ज्योतिष शास्त्र की महिमा अगम अपार है, लेकिन वर्तमान समय में हमारे देश में  जो मुख्य विधायें प्रचलित है, उसमें गणित ज्योतिष, तथा फलित ज्योतिष मूलस्तंभ के रूप में स्थापित हैं।

गणित ज्योतिष शास्त्र जहां सूक्ष्म गणितीय गणना पर आधारित है, इनके द्वारा ही किसी जातक की जन्म कुंडली का निर्माण किया जाता है। इसका मूल आधार भारतीय ज्योतिष गणना की सबसे छोटी इकाई निमिष, पल, विपल, प्रतिपल, पलापल  आदि से निर्धारित की जाती है।  जन्मकुंडली के निर्माण के मूल आधार के लिए हमें भारतीय पंचांग का सहारा लेना पड़ता है।

जिनमें पांच ज्योतिष काल खंड की गणनाएं है जिन्हें क्रम से तिथि, वार, नक्षत्र, तथा योग और करण के रूप में जाना जाता है। पंचांग ही यह तय करता है कि आज की  तिथि वार नक्षत्र योग में कौन सी राशि का अनंत अंतरिक्ष में संचरण काल है। अन्य ग्रहो की युति किस राशि में किस रूप में कितने समय के लिए है, वहीं स्थिति जन्मकुंडली का आधार पुष्टि करती भूत भविष्य वर्तमान की आधारशिला रखती है, परंतु इस विषय में इस समय विषय  के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है।

हमारे मनीषियों ने भारतीय ज्योतिष पद्धति की कालखंड की गणना विधा का रूपांतरण पाश्चात्य कालखंड की गणना से किया है, इसीलिए निमिष पल विपल प्रतिपल को घंटों मिनटों में परिभाषित किया जा सका है। उनके अनुसार चौबीस मिनटों की एक घंटी, ढ़ाई घंटी का एक घंटा, तथा एक दिन, यानी चौबीस घंटे में साठ घटियां होती है।

फलित ज्योतिष क्या है? 

जब गणित ज्योतिष के आधार पर जातक के ग्रह, नक्षत्र, तिथि आदि का ठीक ठीक ज्ञान हो जाता है, तब उसे ही आधार मानकर जातकों के जीवन काल के परिणाम पर विचार किया जा सकता है, जो नवग्रहों के सर्वभाव तथा प्रभाव से पूरी तरह प्रभावित होते हैं। जैसे सूर्य की गर्मी तथा चंद्रमा की शीतलता लाखों करोड़ों मील दूर से मानव जीवन तथा मन को प्रभावित करती है, उसी प्रकार अन्य ग्रहों की युति परिस्थिति भी मानव जीवन को प्रभावित करती है। ऐसी ज्योतिष शास्त्रियों की मान्यता है, जो जटिल गणितीय संरचना पर आधारित है। एक कुशल गणितीय समझ वाला ही ज्योतिष विद्या का सही उपयोग कर सटीक भविष्यवाणी कर सकता है। जो पूर्वानुमान पर आधारित है, जिससे जीवन के भावों प्रभावों राशि फल, सफल, वर्षफल, के अलावा भावेश फल ग्रह युति मेलापक, मुहुर्त विचार आदि के द्वारा भविष्य वाणी संभव है।

भारतीय ज्योतिष का अंतरिक्ष तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार मानव जीवन से संबंध तथा प्रभाव का अध्ययन

हमारे मनीषियों ने, अपनी भौगोलिक स्थितियों का स्थापन सीमा विस्तार अक्षांस , देशांतर तथा कर्क मकर जैसी रेखाओं के द्वारा रेखांकित कर क्षेत्रों का विभाजन किया हैं।  वहीं पर खगोलीय अनंत अंतरिक्ष को भी तीन सौ साठ अंश की वृत्तीय सीमा रेखा खींच कर अनंत को भी सीमा रेखा में बांध दिया है, जिसमें सौरमंडल, तारा मंडल आकाशगंगाओं, ग्रहों नक्षत्रों आदि का अध्ययन समाहित है, जिसका ज्योतिष शास्त्र से सीधा संबंध है।  हमारे ज्योतिषविद् सूर्योदय सूर्यास्त का सटीक मान  ऋतु परिवर्तन, तिथि परिवर्तन त्योहारों पर्वों का ज्ञान होता है, जो इस विधा की सटीकता का केंद्र ‌बिंदु है।

इसे कपोल-कल्पित अथवा गल्पविद्या कतई नहीं समझा जाना चाहिए। यह भारतीय शास्त्रों का एक अंग है।  पौराणिक, ज्योतिषीय, तथा बैज्ञानिक आधार पर भी सूर्य को अक्षय उर्जा स्रोत शक्ति तथा तेज का प्रतीक, तथा देवताओं में भी प्रमुख स्थान प्राप्त है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य का जन्म माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि माना जाता है, पौराणिक श्रुति के अनुसार इन्हें हनुमान जी के गुरु तथा शनि के पिता के रूप में माना जाता है, खगोलीय भौगोलिक गणना सिद्धांत के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मूलभूत केन्द्र में सूर्य ही है। हमारी ज्योतिष विधा में जातकों के भूत भविष्य वर्तमान में चलने वाला घटना क्रम ग्रहों नक्षत्रों तथा राशियों के प्रभाव से प्रभावित माना जाता है। जो सूर्य चंद्रमा तथा पृथ्वी की गति पर आधारित है। जातक के जन्म समय में खगोल अंतरिक्ष में स्थित ग्रह नक्षत्रों की स्थिति पर निर्भर है, करोड़ों मील दूर स्थित सूर्य किस प्रकार पृथ्वी पर प्रकृति तथा जीव-जगत को प्रभावित करता है, वह साक्षात् दीखता है। हमारे ग्रहों का मुखिया भी सूर्य ही है सारे ग्रह नक्षत्र सूर्य के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। अनंत अंतरिक्ष में ना जाने कितने सौरमंडल है जिसका ज्ञान विधाता के अलावा किसी को भी नहीं है।

गहन अध्ययन के आधार पर ज्योतिष मान्यता के ये मुख्य बिंदु नजर आते हैं

1–पौरणिक मान्यताओं का आधार।

2–गणितिय सिद्धांतों का आधार।

3–खगोलिय ग्रहों नक्षत्रों की गति विधियों का आधार तथा प्रभाव।

4–भौगोलिक परिस्थितियों का आधार।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 

विशेष – प्रस्तुत आलेख  के तथ्यात्मक आधार ज्योतिष शास्त्र की पुस्तकों पंचागों के तथ्य आधारित है भाषा शैली शब्द प्रवाह तथा विचार लेखक के अपने है, तथ्यो तथा शब्दों की त्रुटि संभव है, लेखक किसी भी प्रकार का दावा प्रतिदावा स्वीकार नहीं करता। पाठक स्वविवेक से इस विषय के समर्थन अथवा विरोध के लिए स्वतंत्र हैं, जो उनकी अपनी मान्यताओं तथा समझ पर निर्भर है।

 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – समझदारी का पाठ ☆ सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। एच आर में कई प्रमाणपत्रों के अतिरिक्त एच. आर.  प्रोफेशनल लीडर ऑफ द ईयर-2017 से सम्मानित । आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है।  आज प्रस्तुत है उनकी एक सार्थक लघुकथा  – समझदारी का पाठ )

? समझदारी का पाठ ?

लॉकडाउन खुलने की प्रक्रिया चालू हो चुकी थी पर अभी भी स्कूल बंद थे।

सोनू स्कूल बंद होने की वजह से घर में बैठ-बैठ कर बहुत परेशान हो गया था। सावधानी बरतने के लिए मम्मी सोसाइटी में भी नहीं जाने देती थी। वो बाहर खेलने जाने के लिए मम्मी से बहुत लड़ता था पर उसका, मम्मी पर कोई असर नहीं होता था और सोनू नाराज़ होकर खाना भी नहीं खाता।

अब थक हार कर, वो रोज़ मन लगाने के लिए बालकनी में बैठने लगा और बाहर देखा करता। स्वस्थ रहने के लिए सोनू के पापा ने उसे जल्दी उठाना चालू कर दिया था ताकि सुबह-सुबह व्यायाम कर सके। धीरे-धीरे सोनू को जल्दी उठने की आदत पड़ने लगी।

एक दिन सुबह वो 5 बजे ही उठ गया और जा कर बालकॉनी में बैठ गया और बाहर देखने लगा। तभी उसने देखा चौकीदार अंकल का बेटा गोलू सोसाइटी के गाड़ियाँ साफ़ कर रहा था। सोनू ने जिज्ञासा वश पापा से पूछा की “इस माहौल में वो तो बाहर जा सकता है पर हम क्यों नहीं ?”

पापा ने बताया ” चौकीदार अंकल के पैर में चोट लगने की वजह से वो गाड़ियाँ साफ़ नहीं कर सकते और अगर गाड़ियाँ साफ़ नहीं करेंगे तो उन्हें गाडी साफ़ करने के पैसे नहीं मिलेगा और फिर घर खर्च कैसे चलेगा। इसलिए उनका बेटा उनका काम करता है। काम के साथ सेहत का भी ध्यान रखना है इसलिए वो सुबह जल्दी काम निबटा कर वापस घर चला जाता है। ”

पापा की बात सुन सोनू की आँख में पानी आ गया और खुद पर शर्म आने लगी, पापा ने सोनू को रोने की वजह पूछी।

सोनू बोला ” एक गोलू है जो मज़बूरी में घर खर्च चलाने के लिए घर से अपनी परवाह किये बिना बाहर निकल रहा है और एक मैं हूँ जो सिर्फ खेलने के लिए बाहर जाने की ज़िद्द करता हूँ| वो मुझसे छोटा होकर भी कितना समझदार है और मैं। अब से मैं कभी ज़िद्द नहीं करूंगा और जब तक सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता तब तक घर के बाहर जाने की बात भी नहीं करूंगा। ”

इस छोटी सी घटना ने सोनू को समझदारी का पाठ सीखा दिया जिसे उसने ज़िंदगी भर याद रखा।

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 18 ☆ सांगावे कुणा. ? ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है  उनका एक बालगीत  “सांगावे कुणा. ?“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 18 ☆

☆ सांगावे कुणा. ?

 

हसत हसत आला उन्हाळा

हसत हसत गेला हिवाळा

रडत म्हणे पावसाळा

येईन मी पुन्हा.!!

 

थंडीमधे सकाळची काळ वाटे शाळा

टिचर म्हणे प्रार्थनेची रोज वेळ पाळा

आम्हा मुलांचे कुणीच नाही

सांगावे कुणा. ?  !!हूंऽऽहूंऽऽ

 

पावसात रिमझिम त्या थंडगार धारा

आई म्हणे ,भिजू नका,खाऊ नका गारा

आम्हा मुलांचे कुणीच नाही

सांगावे कुणा. ? !!हूंऽऽ हूंऽऽ

 

उन्हाळ्यात शाळेला सुट्टी किती मजा

पप्पा म्हणे उन्हामधे खेळू नको राजा

आम्हा मुलांचे कुणीच नाही

सांगावे कुणा. ? !!हूंऽऽहूंऽऽ

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (15) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)

 

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ।।15।।

 

रजोगुणो की वृद्धि पर कर्म संगी की प्राप्ति

तमो गुणो के काले में मूढ योनि संप्राप्ति ।।15।।

भावार्थ :  रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है॥15॥

 

Meeting death in Rajas, he is born among those who are attached to action; and dying in Tamas, he is born in the womb of the senseless.

 

गुरु पूर्णिमा पर्व पर परम आदरणीय प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  जी को सदर चरण स्पर्श।

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ मिलते हैं कैसे कैसे मकान मालिक …. ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है एक सार्थक व्यंग्य  मिलते हैं कैसे कैसे मकान मालिक …. । इस व्यंग्य के सन्दर्भ में आदरणीय श्री कमलेश जी के ही शब्दों में “लीजिए मित्रो । लाॅकडाउन के दौरान पुरानी फाइलों में से व्यंग्य मिला । दैनिक ट्रिब्यून में 27 अक्तूबर , 1987 के रविवारीय में प्रकाशित । यह भी आकाशवाणी , जालंधर, की कार्यक्रम अधिकारी डाॅ रश्मि खुराना की सीरीज मिलते हैं कैसे कैसे लोग के लिए लिखा गया था । बहुत आभार रश्मि जी ।। नवांशहर रहता तो आप पूरा व्यंग्यकार बना कर छोड़तीं पर भाग्य चंडीगढ़  ले गया और कुछ का कुछ बनता गया ,,,,पर कोई खेद नहीं ……।”  कृपया आत्मसात करें।

☆ व्यंग्य  : मिलते हैं कैसे कैसे मकान मालिक ….   

कहावत है : जो सुख छज्जू दे चौबारे,  वो वल्ख न बुखारे। पर अपने राम जब से नौकरी में आए हैं तब से अपने चौबारे का सुख भूल गये हैं। अब तो किसी प्यारे गीत के टुकड़े की तरह यह कहावत याद रह गयी है।

अपने घर, अपने चौबारे और अपने शहर को छोड़कर हमने कितनों के बोल सहे, कितने मकान मालिकों के नखरे उठाये, मीठे कड़वे ताने सहे ,,,,भगवान् मुंह न खुलवाये। वैसे भी मकान मालिक की बात करते ही उनका रौब से भरा चेहरा जब याद आता है तब बोलती वैसे ही बंद हो जाती है।

अजीब इत्तेफाक कि जब नौकरी शुरू की थी तब भी मकान लेने में दिक्कत आती थी क्योंकि तब हम कुंवारे थे। तब से एक ज़माना गुजर गया। हम बीबी बच्चों वाले हुए और अब भी मकान मालिक हमें मकान किराये पर  मकान देने में बहुत तकलीफ महसूस करते हैं। तब हमारे कुंवारे होने से परहेज था , अब शादीशुदा होने पर ऐतराज। जब शादी नहीं हुई थी और हम मकान किराये पर लेने जाते थे तब मकान मालिक किसी तेज़ गेंदबाज की तरह पहली ही गेंद पर आउट कर देते थे -हम तो शादीशुदा को ही मकान किराये पर देते हैं। आप शादीशुदा हो क्या ?

हम किसी अपराधी की तरह जैसे ही मुंह लटकाते उसी समय घर के दरवाजे ज़ोर से बंद हो जाते। हम क्लीन बोल्ड हुए बल्लेबाज की तरह पैविलियन लौट आते। ज़माना काफी तरक्की कर गया है। अब मकान मालिक शादीशुदा लोगों को मकान किराये पर देने से कतराने लगे हैं। वे साफ कह देते हैं कि मियां बीबी की तो कोई बात नहीं। आपके बच्चों की फौज की परेड से हमें डर लगता है। हम बेबस होकर कभी अपने बच्चों को देखते हैं तो कभी परिवार नियोजन के पोस्टर याद करते हैं। काश , हमने सरकार की बात पर ध्यान दिया होता तो यूं सरेआम मकान मालिकों की निगाहें हमें बेइज्जत न कर डालतीं।

जिसे देश घूमने का शौक हो , उसे अलग अलग मकानों में रह कर अपनी यह इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए। इसीलिए तो इस शेर से छेड़छाड़ करने का मन बन गया है :

सैर कर दुनिया की गाफिल

मकान बदल बदल के ,,,,,

अपने राम ने जितने मकान बदले होंगे उतने ही मकान मालिकों के नियम सामने आते गये। अब तो मकान मालिकों के नियमों की लम्बी चौड़ी सूची भी याद हो गयी है। बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में पहाड़े याद करने पड़े थे।

अपने राम को एक मकान मालिक के कुत्ते की इज्जत न करने पर मकान खाली करने का हुक्म भी सुनना पड़ा था। तब हमें इस मुहावरे पर ईमान करना पड़ा था कि उनसे प्यार करना है तो उनके कुत्ते से भी प्यार करो। हमें मालूम था कि हमें यह मकान बड़ी तलाश के बाद किराये पर मिला था। इसलिए कुत्ता हमें जब जब घूर घूर कर देखता था तब तब हम उसे उतने ही प्यार से पुकारते थे परंतु इस महंगाई के ज़माना में हम खुद ग्लुकोज के बिस्कुट न खाकर उनके कुत्ते को बिस्कुट कब तक खिला सकते थे ? हमारी मकान मालकिन हमें उत्साहित करते कहती -आपसे पहले वाले किरायेदार से तो पूरी तरह हिल मिल गया था पर क्या करें आपसे तो हमारे रोमी की दोस्ती हो ही नहीं रही। शायद आप इसे इसकी पसंद के बिस्कुट खिलाना भूल जाते हो।

अब आप लोग ही बताइए कि आदमी को रोटी नसीब नहीं और मकान मालिकों के कुत्ते किरायेदारों के बिस्कुटों पर पलते रहेंगे ?

हमारी एक मकान मालकिन ने सारा घर हमें सौंप दिया जैसे देश तेरे हवाले। छोटी मोटी मरम्मत का काम भी हमारे विश्वास पर छोड़ गयीं। हम कहें कि घोर कलयुग में  ऐसी मकान मालकिन ? जरूर हमने पूर्व जन्म में मोती दान किए होंगे। पर कहते हैं न कि बुरे को नहीं उसकी मां को मारो।

आंगन में लगे पेड़ को कटवाने का आदेश जारी किया तो मजबूरी जाहिर करने पर सलाह दी कि आपके दफ्तर के चपरासी किस काम आयेंगे ?

-वे तो दफ्तर के काम के लिए हैं मां जी। घर के काम काज के लिए थोड़े हैं।

-हमारे काका को देखो। फलाने शहर में अफसर है। घर का हर काम दफ्तर के चपरासी करते हैं और एक तुम हो पेड़ भी नहीं कटवा सकते ? तेरा इतना कहा भी न मानेंगे ? कह कर तो देख।

-न मांजी। मुझसे यह भ्रष्टाचार नहीं होता।

-बड़ा आया हरिश्चंद्र,,,,भूखा मरेगा। मेरा मकान खाली कर दे।

मरता क्या न करता ? मकान खाली कर दिया। नये मकान मालिक के किराये के रेट ही बांटा कम्पनी की तरह ऊंचे थे। यानी नब्बे रुपये , नब्बे पैसे जैसे। वे मकान मालिक एक सप्ताह पहले से ही हमारा हालचाल पूछने आने लगते और विदा होते होते किराये के पैसों की याद दिला देते यह कहते हुए -बेटा। फिर आना पड़ेगा। किराया आज ही दे देते तो अच्छा होता। हम उन्हें सौ का नोट पकड़ाते और वे किसी चालाक बस कंडक्टर की तरह छुट्टे रुपये न होने का बहाना लगा सौ का नोट ही उड़ा ले जाते। हम सोचते कि अगले महीने एडजस्ट कर लेंगे पर वे हमारे पांव ही न लगने देते और कहते कि हमने तो दूसरे दिन ही बच्चों के साथ दस का नोट भिजवा दिया था। फिर हम उनसे किराये की रसीद मांगते तो वे कहते बेटा रसीद तो लिखी गयी।

-कब और कहां ?

-हमारे दिल में।

-पर हम आपका दिल निकाल कर तो सरकार को नहीं दिखा सकते न।

-फिर आप मकान बदल लो।

और लीजिए नये मकान मालिक ने तो ऐसा समां बांधा कि पूछो मत। हमारे लोकतंत्र ने हर छोटे बड़े को वोट डालने का अधिकार दिया है लेकिन हमारे मकान मालिक ने यह हक छीनने की कोशिश भी की। जब कमेटी वाले वोट बनाने आए तब हमने फाॅर्म भर कर जैसे ही उनको सौंपने चाहा तो किसी फिल्म के खलनायक की तरह वे अवतरित हुए और फाॅर्म के टुकड़े टुकड़े कर दिये। कमेटी वालों को भगा दिया। कारण पूछने पर बताया कि आपको वोट की पड़ी है और हमें हाउस टैक्स बचाने की। हमने कमेटी में लिखवा रखा है कि हमारे कोई किरायेदार नहीं रहता और अगर तुम्हारी वोट हमारे पते पर बन गयी तो हमारी पोल खुल जायेगी और साबित हो जायेगा कि किरायेदार तो है। फिर बरखुरदार हमारे ऊपर हाउस टैक्स लग जायेगा। वोट बनवाने का इतना ही शौक है तो कोई और मकान ढूंढ लो।

अब आप बताइए कि ऐसे उसूलों वाले मकान मालिकों के सामने बिजली कम जलाना , बल्ब कम वोल्टेज के लगाना , बच्चों के कूदने से छत कमज़ोर न हो जाये , पानी की बूथद बूंद बचाना , फूल न तोड़ना, घर आने का ठीक वक्त याद रखना , आंगन की सफाई और जमादार के पैसे देना आदि इतनी लम्बी लिस्ट है कि इन उसूलों का पालन करने वाली शख्सियत को कैलाश मानसरोवर जाकर तपस्या करने वाले योगी से भी ज्यादा मुश्किल टाॅस्क मिल गया। वैसे भी इस महंगाई के दौर में अपने मकान की चाह तो पूरी हो या न ,,,,,किरायेदार रहना पड़ेगा तो मकान मालिकों की उंगलियों पर नाचना पड़ेगा। भगवान् उन्हें सुदबुद्धि दे। सबको सन्मति दे भगवान्।

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

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हिन्दी साहित्य ☆ कविता ☆ ज्यों-ज्यों अगस्त्य हुए ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  की एक भावप्रवण एवं सार्थक कविता  ”ज्यों-ज्यों अगस्त्य हुए“।डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के इस सार्थक एवं  संत कबीर जी के विभिन्न पक्षों पर विमर्श के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ ज्यों-ज्यों अगस्त्य हुए ☆

 

चंदा ने

शीतलता दी

चाँदनी दी बिन माँगे

कि रह सकें हम शीतल

पाख भर ही सही

सता न सकें हमें चोर ,चकार

सूरज ने

खुद तपकर रोशनी दी

पहले जग उजियार किया

तब जगाया हमें

नदी ने पानी दिया

कि बुझ सके प्यास हम सबकी

समुद्र ने अपनी लहरों पर

बिठाकर घुमाया

दिखाया सारा जगत

कि खुश रहें हम सब

इन्होंने मछलियाँ भी दीं

धरती ने, पेड़ों ने दिए

कंद-मूल,असंख्य और अनंत

फल-फूल और शस्यान्न

क्या-क्या नहीं दिए

भरने के लिए हमारा पेट

ज्यों-ज्यों हम अगस्त्य हुए

ये होते गए निर्जल,बाँझ और उजाड़।

 

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

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