English Literature – Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 42 – Bheeshma’s Pledge ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem Bheeshma’s Pledge. )

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 42

☆ Bheeshma’s Pledge ☆

  

Your depression and distress I comprehend now

Oh! My dear and beloved father

So? You wish to get home a beautiful lady

And make her your wife and my mother?

 

Ah! So relieved I am to finally apprehend

The cause of turbulence within your mind and heart

Your affection for me prohibits you from marriage

But father! I am also your humble part!

 

Heard I have that the lady whom you love

Has laid a condition, an assurance desires

That her sons should become the king, not me

Father, really I am ready for it, I have no ire

 

I understand that your affection for me forbids you

But father, love is the supreme of all sentiments!

Your happiness is what matters to me the most

How can I be fonder of the throne than my parents?

 

For a few moments, assuming an elder’s garb

I shall ask the lady’s father for her hand for you

I know that you will be so delighted

And seeing your pleasure, I shall be glad too

 

I promise that relinquish all claims I shall

To the throne, for that is my dharma

Give me the patience and courage to hold on to it;

The world shall know me and bless me as Bheeshma!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 35 ☆ लघुकथा – भेडिए ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक भयावह सामाजिक विडम्बना को उल्लेखित करती लघुकथा  “भेडिए”। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 35 ☆

☆  लघुकथा – भेडिए

वह सिर झुकाए बैठी थी, निर्विकार. मैं उससे पहले भी मिली थी पर इतनी लाचार वह कभी नहीं लगी. लंबी कद- काठी और मजबूत शरीरवाली वह दूसरी औरतों की तुलना में मुझे सशक्त लगी थी. हाँ  लगी तो थी  — ?

उससे सवाल पूछे जा रहे थे एक के बाद एक —

क्या हुआ था ? कौन था वह ? चेहरा तो देखा होगा ?

हर सवाल पर उसका एक ही जवाब था –  घना अँधेरा था, कुछ नी देकखा मैंने, पता नी कौन था.

वह क्या बोलती और कैसे ? दरवाजे के पीछे से कई जोडी आँखें उसे घूर रही थीं जिनमें धमकियां थीं, हिदायतें भी, घर की बात घर में ही रहने देने की.

ससुर ने साफ कह दिया था- जबान खोली तो देख ले, फिर घर में जगह ना मिलेगी.

किसी ने समाज सेवी संस्था को खबर कर दी थी, दो महिलाएं आई थीं जाँच पडताल करने के लिए, उनके ढेरों सवाल थे लेकिन इसे मानों कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था. वह  यही सोच रही थी कि घरवालों ने निकाल दिया तो नन्हीं बच्ची को लेकर  जाएगी कहाँ ?

एक महिला बोली- आप निडर होकर बोलिए, हम सब आपके साथ हैं. हमारे देश में निराश्रित स्त्रियों  और लडकियों के रहने के  लिए शेल्टर होम हैं, आपको कोई परेशानी नहीं होगी. शेल्टर होम का नाम सुनते ही वह मानों सोते से जगी हो, हाथ जोडकर दृढता से बोली – ना – ना जी मुझे कोई परेशानी ना है, मुझ पर कोई अत्याचार ना हुआ. पति के जाने के बाद इन सबने ही मुझे संभाला है. अब आप जाओ यहाँ से.

उसने  सुना था  शेल्टर होम में भी भेडिए ही बसते हैं.

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ संजय* ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ संजय 

दिव्य दृष्टि की

विकरालता का भक्ष्य हूँ,

शब्दांकित करने

अपने समय को विवश हूँ,

भूत और भविष्य

मेरी पुतलियों में

पढ़ने आता है काल,

वर्तमान परिदृश्य हूँ,

वरद अवध्य हूँ,

कालातीत अभिशप्त हूँ!

©  संजय भारद्वाज

(18.5.2018, अपराह्न 3:50 बजे)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 59 ☆ व्यंग्य – व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर व्यंग्य “व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप ।  श्री विवेक जी ने  तटस्थ होकर सार्थक विषय पर विमर्श किया है।  मुझे अक्सर ऐसा साहित्य पढ़ने को मिल रहा है जिसमें स्त्री और पुरुष साहित्यकार  एक दूसरे के मन की विवेचना अत्यंत संजीदगी से कर रहे हैं या एक दूसरे के क्षेत्र में अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं । इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्या # 59 ☆

☆ व्यंग्य  – व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप  ☆

मेरी एक कविता में मैंने लिखा है कि आज की नारी ने जींस तो पहन लिया है, पर पारम्परिक साड़ी यथावत है, आशय है कि स्त्री को हर क्षेत्र में दोहरी भूमिका निभानी पड़ रही है. बड़े पदों पर स्त्री को अतिरिक्त सतर्क रहना होता है कि कोई यह न कहे कि अरे वो तो महिला हैं.

व्यंग्य के क्षेत्र में भी महिला व्यंग्यकार अपनी अन्य पारिवारिक व कार्यालयीन जिम्मेदारियो के साथ  बहुत महत्वपूर्ण लेखन कर रही हैं. यह भी सही है कि महिला होने के नाते प्रकृति दत्त गुणो के चलते कई जगह महिला लेखिकाओ पर संपादको, प्रकाशको या पाठको का सहज अतिरिक्त ध्यान जाता ही है. जिसके लाभ व हानि अवश्यसंभावी हैं.

प्रश्न है कि  क्या व्यंग्य रचना का मूल्यांकन यह देखकर किया जाय कि व्यंग्यकार स्त्री है या पुरूष ?  क्या लेखिका ही स्त्री मन को समझ सकती है ? मुझे लगता है कि व्यंग्यकार को स्त्री या पुरूष के खेमो में नहीं बांटा जाना चाहिए.  जब व्यंग्य लिखा जाता है तो विसंगतियो पर प्रहार होता है. सबसे अच्छा व्यंग्यकार वही होता है जो ” बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय “, मतलब स्वयं पर अंगुली उठाने का साहस करे. हो सकता है कि कुछ विशेष विषयो पर व्यंग्यकार अपनी स्वयं की परिस्थति परिवेश के अनुरूप पक्षपात कर जाता हो पर तटस्थ लेखन ही लोकप्रिय होता है. यह बिन्दु महिला व्यंग्यकारो पर भी लागू होता है.

अनेक व्यंग्यकार या चुटकुलो में पत्नी पर, साली पर, महिलाओ पर कटाक्ष किये जाते हैं, किन्तु महिलाये  अपनी जिजिविषा से इस सब को गलत सिद्ध करती बढ़ रही हैं. स्त्री समानता के इस समय में जितने जल्दी स्त्री विमर्श पीछे छूट जावे, समाज के लिये बेहतर होगा. व्यंग्यकार के पास सोच का अलग दायरा होता है, अतः हमें तो व्यंग्य में स्त्री समानता को बढ़ावा व सम्मान देना ही चाहिये. परिहास की बात अलग है, जिसमें मैं अपनी पत्नी के पात्र के जरिये कई बार व्यंग्य लिख देता हूं, पर अंतरमन से मैं पूरा फेमनिस्ट हूं.

पहली स्त्री व्यंग्यकार किसे कहा जावे यह शोध का विषय है, मुझे सूर्यबाला जी, अमृता प्रीतम जी,जबलपुर की सुधारानी श्रीवास्तव जिन्होने परसाई जी के प्रभाव में कुछ व्यंग्य रचनायें की  या बचपन में पढ़े हुये शिवानी जी के कुछ तंज वाले पैराग्राफ भी स्मरण आते हैं.  व्यंग्य शैली में इक्का दुक्का रचनायें तो अनेक लेखिकाओ की मिल जायेंगी. कविता, विशेष रूप से नई कविता के समय में कई कवियत्रियों ने भी चुटकुलो को व्यंग्य कविता में पिरोया है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 24 ☆ शिव संकल्प ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शिव संकल्प।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन के कटु सत्य पर विमर्श करती यह सार्थक रचना हमें कई प्रकार से प्रेरित करती है, बस शिव संकल्प की आवश्यकता है।  इस कालजयी सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 24 ☆

☆ शिव संकल्प  

आचार, सदाचार, विचार, प्रचार, भ्रष्टाचार, दुराचार;

इन प्रत्ययों  ने तो नाक में दम कर दिया है। ये सत्य है कि दो और दो चार तो होते हैं; पर इनकी तो महिमा निराली है। लोग आचार- विचार करें या न करें किन्तु प्रचार अवश्य करेंगे। सदाचार का पाठ पढ़ते -पढ़ाते न जाने कितने भ्रष्टाचार और दुराचार इस जगत में हो रहे हैं । भ्रूण हत्या से शुरुआत होती है,  यदि वहाँ से बच निकले तो दुराचार की भेंट चढ़ जाने का खतरा सदैव मंडराता रहता है। यदि भाग्यवश इन दोनों खतरों को पार कर लिया तो अवश्य ही व्यक्ति पहले सदाचार  सीखेगा फिर सिखायेगा। इस सबके साथ- साथ उसे आसपास चल रहे  विभिन्न क्षेत्रों के प्रचार – प्रसार को भी झेलना होगा  या इसका अंग बन कर स्वयं भी इसमें कूद जाना पड़ेगा।

अब जब इन सबसे विजयी होकर कर्मभूमि पर उतरो तभी से भ्रष्टाचार का प्रवेश शुरू हुआ समझो। कोई भी कार्य इसके बिना पूरा ही नहीं होता। हर व्यक्ति इसी की दुहाई देता हुआ मिल जायेगा कि  ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार छाया हुआ, कोई भी कार्य बिना बड़ी पहचान होते ही नहीं, भलाई का जमाना ही नहीं रहा।

महंगाई तो इसके साथ  अमरबेल की तरह पनपती रहती है। बस कोई आधार मिला तो समझो निराधार आरोपों का दौर शुरू हुआ, लेनदेन से क्या नहीं हो सकता, सारे समझौते इसी से शुरू हो इसी पर खत्म होते हैं। ये कोरोना थोड़ी है; जो बढ़ता ही जाए, इसे दूर करना ही होगा। जागरूक लोग क्या नहीं कर सकते, जब एक प्रेमी कल्पना में ही सही आसमान से तारे तोड़ कर ला सकता है तो क्या समझदार भारतीय नागरिक भ्रष्टाचार रूपी अमरबेल को उखाड़ कर नहीं फेक सकता है क्या…?

फेक न्यूज के विशाल सागर में; डूबने- उतराने  से बेहतर है,  कि कोई ठोस कदम उठा कर देश और समाज को स्वस्थ बना;  कुरीतियों को दूर कर सदाचारी व नेक इंसान बनें। मेहनत पर विश्वास कर आगे बढ़ें तो अवश्य ही भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारी का मुँह काला होगा, बस ऐसा शिव संकल्प लेने की जरूरत हम सबको है।

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 54 – थोथा चना ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “थोथा चना । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 54 ☆

☆ लघुकथा –  थोथा चना  ☆

आज वह तीसरे दिन भी खड़ा हो कर वही राग अलापने लगा “सर! मेरे पास एक पाण्डुलिपि है जिस में ऐसी ऐसी विधियां है जिस से छात्र एक दिन में गणित, तीन दिन में हिन्दी के शब्द और चार दिन में छात्र फर्राटें से अंग्रेजी बोलना सीख जाए. उसे किसी ग्रामर की आवश्यकता नहीं पड़ेगी”

उस का यही रटारटाया वाक्य सुन कर गणित का प्रशिक्षण ले रहे शिक्षकबोर हो गए थे.

साहब उस की मंशा समझ गए, “आप पाण्डुलिपि यहां ले आना. अगर, अच्छी लगी तो मेरे पहचान के प्रकाशक से छपवा दूंगा.”

“सर! कोरा आश्वासन तो नहीं है ना?” उस ने पुनः पूछा.

“आप ले आना उस के बाद देखेंगे.” कहते हुए साहब निकल गए.

मगर, मास्टर ट्रेनर को उस की बात अखर गई. वे बोले”  साथियों आज हम एक हासिल का घटाना सीखेंगे. देखते हैं कि कौन बच्चों को कैसे सवाल कराता है” यह कहते हुए मास्टर ट्रेनर ने उसी शिक्षक को उठा दिया.

वह आया. उस ने घटाव किया. देख कर सब हंस पड़े.

“क्यों भाई ! कोई गलती है क्या ?” उस ने हंसते हुए सदन से पूछा.

“कुछ नहीं” एक मनमौजी शिक्षक ने कहा “यदि आप दुकानदार होते तो सभी ग्राहकों को 90 रूपए में से 12 रूपए घटा कर 88 रूपए वापस कर देते.”

“क्या?”  वह शिक्षक अभी मनमौजी शिक्षक की बात समझ नहीं पाया था.

तभी तीसरा शिक्षक बड़बड़ाया, “थोथा चना………….”

सुन कर सदन में हंसी के फव्वारे छूट गए.

चले?”

“हाँ साहब ! मैं उन्हें तड़फता हुआ नही देख सकता था.”

“अच्छा. अब दोनों तड़फ़ना. एक बाहर और एक अन्दर.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

20/01/2015

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 33 ☆ तुम भारत हो ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक सकारात्मक एवं भावप्रवण कविता  “तुम भारत हो.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 33 ☆

☆  तुम भारत हो ☆ 

 

तुम भारत हो पहचान करो

स्वमेव स्वयं

बुद्धम शरणम

 

खगकुल का वंदन है देखे

अब भोर हँसे

स्व शांत चित्त ये सागर भी

मन मोर बसे

प्रियवर के  अनगिन हैं मोती

चिर जीव रसे

 

पवन सुखद है तरुणाई

सुंदर वरणम

तुम भारत हो पहचान करो

स्वमेव स्वयं

बुद्धम शरणम

 

है अतुल सिंधु पावन बेला में

प्रीत बिंदु

अब अपना स्व लगता है

मीत बन्धु

मनवा ने छोड़े द्वंद्व

रच रहा नए छंद

 

प्राची में है लाली छाई

कमलम अरुणम

तुम भारत हो पहचान करो

स्वमेव स्वयं

बुद्धम शरणम

 

दृग में चिंतन, उर में मंथन

है अब आया

ये धरा बनी कुंदन चन्दन

है मन भाया

है वंदन करती पोर-पोर

खिलती काया

 

है सत चित भी अब

आनन्दम करुणम

तुम भारत ही पहचान करो

स्वमेव स्वयं

बुद्धम शरणम

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 51 – थेंब पावसाचा ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “थेंब पावसाचा”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #51 ☆ 

☆ थेंब पावसाचा ☆ 

 

थेंब पावसाचा       हातात झेलला

नाही होवू  दिला     माती मोल. . . . !

 

थेंब पावसाचा     विसावला कसा

ओलावला पसा    आपोआप. . . . . !

 

थेंब पावसाचा    ओली आठवण

सुखद पेरण       जाता जाता. . . . !

 

थेंब पावसाचा     नाजूकसा मोती

गंधाळली नाती    अंतरात . . . !

 

थेंब पावसाचा     पाहुणा  क्षणाचा

सत्कार तयाचा    डोळ्यातून. . . . !

 

थेंब पावसाचा       देऊनीया ओल

रेंगाळला बोल       कवितेत. . . . . !

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

दिनांक  27/3/2019

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (5) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)

 

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।।5।।

सत, रज,तम, गुण प्रकृति से ही लेते हैं जन्म

वही देह में आत्मा को रखते हैं बंद ।।5।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥

 

Purity, passion and inertia-these qualities, O mighty-armed Arjuna, born of Nature, bind fast in the body, the embodied, the indestructible!।।5।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिवस विशेष – विश्व इतिहास की पहली महिला योद्धा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज  24 जून को  वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक प्रेरक एवं ऐतिहासिक आलेख  “विश्व इतिहास की पहली महिला योद्धा।  इस ऐतिहासिक आलेख  को हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिवस विशेष – विश्व इतिहास की पहली महिला योद्धा ☆

(समय के साथ यदि ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यो को नई पीढ़ी के सम्मुख दोहराया न जावे तो विस्मरण स्वाभाविक होता है,  आज की पीढ़ी को रानी दुर्गावती के संघर्ष से परिचित करवाना इसलिये भी आवश्यक है, जिससे देश प्रेम व राष्ट्रीय एकता हमारे चरित्र में व्याप्त रह सके इस दृष्टि से सरदार पटेल पर बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास के लेखक व  एकता शक्ति ग्रुप के संस्थापक  इंजी अमरेन्द्र नारायण जी के नेतृत्व में विगत वर्ष रानी दुर्गावती जयंती का आयोजन कई संस्थाओ में किया गया था. इस वर्ष लाक डाउन के चलते इस आलेख में वर्णित  यू ट्यूब काव्य रचना के जरिये एकता शक्ति ग्रुप, जबलपुर वीरांगना रानी दुर्गावती को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है. आज जब देश की सीमाएं दुश्मन से घिरी हुई हैं एवं हमारी सेना में महिलाओं को बराबरी का दर्जा है, रानी दुर्गावती का सुस्मरण बहुत प्रासंगिक है )

माना जाता है कि विश्व इतिहास में रानी दुर्गावती पहली महिला है जिसने समुचित युद्ध नीति बनाकर अपने विरूद्ध हो रहे अन्याय के विरोध मे मुगल साम्राज्य के विरूद्ध शस्त्र उठाकर सेना का नेतृत्व किया और युद्ध क्षेत्र मे ही आत्म बलिदान दिया.रानी दुर्गावती के मदन महल के दर्शन किये हैं कभी आपने ? एक ही शिला को तराश कर यह वाच टावर, छोटा सा किला जबलपुर में पहाड़ी के उपर बनाया गया है. इसके आस पास अप्रतिम नैसर्गिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है. रानी दुर्गावती सोलहवीं शताब्दि की वीरांगना थीं, उनके समय तक गौंड़ सेना पैदल व उसके सेनापति हाथियो पर होते थे, जबकि मुगल सेना घोड़ो पर सवार सैनिको की सेना थी. हाथी धीमी गति से चलते थे और  घोड़े तेजी से भागते थे,  इसलिये जो मुगल सैनिक घोड़ो पर रहते थे  वे तेज गति से पीछा भी कर सकते थे  और जब खुद की जान बचाने की  जरूरत होती  तो वो तेजी से भाग भी जाते.किंतु  पैदल गौंडी सेना धीमी गति से चलती  और जल्दी भाग भी नही पाती थी.

विशाल, सुसंगठित, साधन सम्पन्न मुगल सेना जो घोड़ो पर थी उनसे जीतना संख्या में कम, गजारोही गौंड सेना के लिये कठिन था,  फिर भी जिस तरह रानी दुर्गावती ने अकबर की दुश्मन से वीरता पूर्वक लोहा लिया, वह नारी सशक्तीकरण का अप्रतिम उदाहरण है. तीन बार तो रानी ने मुगल सेना को मात दे दी थी, पर फिर फिर से और बड़ी सेना लेकर आसफ खां चढ़ाई कर देता था.

९३ वर्षीय सुप्रसिद्ध कवि गीतकार एवं लेखक प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध  की एक रचना है ‘‘गौडवाने की रानी दुर्गावती” जिसमें उन्होनें दुर्गावती का  समग्र चित्रण किया है. प्रस्तुत है वह रचना

उपजाये हैं वीर अनेको विध्ंयाचल की माटी ने

दिये कई है रत्न देश को मां रेवा की घाटी ने

 

उनमें से ही एक अनोखी गढ मंडला की रानी थी

गुणी साहसी शासक योद्धा धर्मनिष्ठ कल्याणी थी

 

युद्ध भूमि में मर्दानी थी पर ममतामयी माता थी

प्रजा वत्सला गौड राज्य की सक्षम भाग्य विधाता थी

 

दूर दूर तक मुगल राज्य भारत मे बढता जाता था

हरेक दिशा मे चमकदार सूरज सा चढता जाता था

 

साम्राज्य विस्तार मार्ग में जो भी राह मे अड़ता था

बादशाह अकबर की आंखो में वह बहुत खटकता था

 

एक बार रानी को उसने स्वर्ण करेला भिजवाया

राज सभा को पर उसका कडवा निहितार्थ नहीं भाया

 

बदले में रानी ने सोने का एक पिंजन बनवाया

और कूट संकेत रूप मे उसे आगरा पहुंचाया

 

दोनों ने समझी दोनों की अटपट सांकेतिक भाषा

बढा क्रोध अकबर का रानी से न रही वांछित आशा

 

एक तो था मेवाड प्रतापी अरावली सा अडिग महान

और दूसरा उठा गोंडवाना बन विंध्या की पहचान

 

घने वनों पर्वत नदियों से गौड राज्य था हरा भरा

लोग सुखी थे धन वैभव था थी समुचित सम्पन्न धरा

 

आती हैं जीवन मे विपदायें प्रायः बिना कहे

राजा दलपत शाह अचानक बीमारी से नहीं रहे

 

पुत्र वीर नारायण बच्चा था जिसका था तब तिलक हुआ

विधवा रानी पर खुद इससे रक्षा का आ पडा जुआ

 

रानी की शासन क्षमताओ, सूझ बूझ से जलकर के

अकबर ने आसफ खां को तब सेना दे भेजा लडने

 

बडी मुगल सेना को भी रानी ने बढकर ललकारा

आसफ खां सा सेनानी भी तीन बार उससे हारा

 

तीन बार का हारा आसफ रानी से लेने बदला

नई फौज ले बढते बढते जबलपुर तक आ धमका

 

तब रानी ले अपनी सेना हो हाथी पर स्वतः सवार

युद्ध क्षेत्र में रण चंडी सी उतरी ले कर मे तलवार

 

युद्ध हुआ चमकी तलवारे सेनाओ ने किये प्रहार

लगे भागने मुगल सिपाही खा गौडी सेना की मार

 

तभी अचानक पासा पलटा छोटी सी घटना के साथ

काली घटा गौडवानें पर छाई की जो हुई बरसात

 

भूमि बडी उबड खाबड थी और महिना था आषाढ

बादल छाये अति वर्षा हुई नर्रई नाले मे थी बाढ

 

छोटी सी सेना रानी की वर्षा के थे प्रबल प्रहार

तेज धार मे हाथी आगे बढ न सका नाले के पार

 

तभी फंसी रानी को आकर लगा आंख मे तीखा बाण

सारी सेना हतप्रभ हो गई विजय आश सब हो गई म्लान

 

सेना का नेतृत्व संभालें संकट मे भी अपने हाथ

ल्रडने को आई थी रानी लेकर सहज आत्म विश्वास

 

फिर भी निधडक रहीं बंधाती सभी सैनिको को वह आस

बाण निकाला स्वतः हाथ से यद्यपि हार का था आभास

 

क्षण मे सारे दृश्य बदल गये बढे जोश और हाहाकार

दुश्मन के दस्ते बढ आये हुई सेना मे चीख पुकार

 

घिर गई रानी जब अंजानी रहा ना स्थिति पर अधिकार

तब सम्मान सुरक्षित रखने किया कटार हृदय के पार

 

स्वाभिमान सम्मान ज्ञान है मां रेवा के पानी मे

जिसकी आभा साफ झलकती गढ़ मंडला की रानी में

 

महोबे की बिटिया थी रानी गढ मंडला मे ब्याही थी

सारे गौंडवाने मे जन जन से जो गई सराही थी

 

असमय विधवा हुई थी रानी मां बन भरी जवानी में

दुख की कई गाथाये भरी है उसकी एक कहानी में

 

जीकर दुख मे अपना जीवन था जनहित जिसका अभियान

 

24 जून 1564 को इस जग से था किया प्रयाण

है समाधी अब भी रानी की नर्रई नाला के उस पार

 

गौर नदी के पार जहां हुई गौडो की मुगलों से हार

कभी जीत भी यश नहीं देती कभी जीत बन जाती हार

 

बडी जटिल है जीवन की गति समय जिसे दे जो उपहार

कभी दगा देती यह दुनियां कभी दगा देता आकाश

अगर न बरसा होता पानी तो कुछ और हुआ होता इतिहास

 

इस गीत को जबलपुर के श्री सोहन सलिल व सुश्री दिव्या सेठ ने स्वर तथा संगीत , व तकनीकी सहयोग देकर श्री प्रशांत सेठ ने बड़ी मेहनत से मधुर संगीत के साथ तैयार किया है. यह गीत यू ट्यूब पर निम्न लिंक पर सुलभ है. 

यूट्यूब वीडियो लिंक >>>>

(दुर्गावती शौर्य गाथा): गोंडवाना की रानी के साहस और बलिदान की कहानी

रानी दुर्गावती पर अनेक पुस्तके लिखी गई है, कुछ प्रमुख इस तरह है-

  1.   राम भरोस अग्रवाल की गढा मंडला के गोंड राजा
  2.   नगर निगम जबलपुर का प्रकाशन रानी दुर्गावती
  3.   डा. सुरेश मिश्रा की कृति रानी दुर्गावती
  4.   डा. सुरेश मिश्र की ही पुस्तक गढा के गौड राज्य का उत्थान और पतन
  5.   बदरी नाथ भट्ट का नाटक दुर्गावती
  6.   बाबूलाल चौकसे का नाटक महारानी दुर्गावती
  7.   वृन्दावन लाल शर्मा का उपन्यास रानी दुर्गावती
  8.   गणेश दत्त पाठक की किताब गढा मंडला का पुरातन इतिहास

इनके अतिरिक्त अंग्रेजी मे सी.यू.विल्स, जी.वी. भावे, डब्लू स्लीमैन आदि अनेक लेखको ने रानी दुर्गावती की महिमा अपनी कलम से वर्णित की है।

वीरांगना की स्मृति को अक्षुण्य बनाये रखने हेतु भारत सरकार ने 1988 मे एक साठ पैसे का डाक टिकट भी जारी किया है।

रानी दुर्गावती  ने 400 साल पहले ही जल संरक्षण के महत्व को समझा था, अपने शासनकाल मे जबलपुर मे उन्होने अनेक जलाशयो का निर्माण करवाया, कुछ ऐसी तकनीक अपनाई गई  कि पानी के प्राकृतिक बहाव का उपयोग करते हुये एक से दूसरे जलाशय में बिना किसी पम्प के  जल भराव होता रहता था. रानी ने अपने प्रिय दीवान आधार सिंग, कायस्थ के नाम पर अधारताल, अपनी प्रिय सखी के नाम पर चेरीताल और अपने हाथी सरमन के नाम पर हाथीताल बनवाये थे। ये तालाब आज भी विद्यमान है। प्रगति की अंधी दौड मे यह जरूर हुआ है कि अनेक तालाब पूरकर वहां भव्य अट्टालिकाये बनाई जा रही है।

रानी दुर्गावती के समय की और भी कुछ चीजे, सिक्के, मूर्तियां आदि  रानी के नाम पर ही स्थापित रानी दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर में संग्रहित हैं.

रानी दुर्गावती ने सर्वप्रथम मालवा के राज बाज बहादुर से लडाई लडी थी, जिसमें बाज बहादुर का काका फतेहसिंग मारा गया था। फिर कटंगी की घाटी मे दूसरी बार बाज बहादुर की सारी फौज का ही सफाया कर दिया गया। बाद मे रानी रूपमती को संरक्षण देने के कारण अकबर से युद्ध हुआ, जिसमें तीन बार दुर्गावती विजयी हुई पर आसफ खां के नेतृत्व मे चौथी बार मुगल सेना को जीत मिली और रानी ने आत्म रक्षा तथा नारीत्व की रक्षा मे स्वयं अपनी जान ले ली थी.

नारी सम्मान को दुर्गावती के राज्य मे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। नारी अपमान पर तात्कालिक दण्ड का प्रावधान था। न्याय व्यवस्था मौखिक एवं तुरंत फैसला दिये जाने वाली थी.  रानी दुर्गावती एक जन नायिका के रूप मे आज भी गांव चौपाल में लोकगीतो के माध्यम से याद की जाती हैं.

गायक मडंली-

तरी नाना मोर नाना रे नाना

रानी महारानी जो आय

माता दुर्गा जी आय

रन मां जूझे धरे तरवार, रानी दुर्गा कहाय

राजा दलतप के रानी हो, रन चंडी कहाय

उगर डकर मां डोले हो, गढ मडंला बचाय

हाथन मां सोहे तरवार, भाला चमकत जाय

सरपट सरपट घोडे भागे, दुर्गे भई असवार

तरी नाना………..

ये लोकगीत मंडला, नरसिंहपुर, जबलपुर, दमोह, छिंदवाडा, बिलासपुर, आदि अंचलो मे लोक शैली मे गाये जाते है इन्हें सैला गीत कहते है।

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालींजर मे हुआ था. उनके पिता कीरत सिंह चन्देल वंशीय क्षत्रिय शासक थे। इनकी मां का नाम कमलावती था। सन् 1540 में गढ मंडला के राजकुमार दलपतिशाह ने  विवाह कर दुर्गावती  का वरण किया था। अर्थात आज जो अंतर्जातीय विवाह स्त्री स्वात्रंत्य व नारी अस्मिता व आत्म निर्णय के प्रतीक रूप में समाज स्वीकार कर रहा है, उसका उदाहरण  रानी ने सोलहवीं शताब्दी में ही प्रस्तुत किया था. 1548 मे महाराज दलपतिशाह के निधन से रानी ने दुखद वैधव्य झेला। तब उनका पुत्र वीरनारायण केवल 3 वर्ष का था। उसे राजगद्दी पर बैठाकर रानी ने उसकी ओर से कई वर्षो तक कुशल राज्य संचालन किया।

आइने अकबरी मे अबुल फजल ने लिखा है कि रानी दुर्गावती के शासन काल मे प्रजा इतनी संपन्न थी कि लगान का भुगतान प्रजा स्वर्ण मुद्राओ और हाथियो के रूप मे करती थी।

शायद यही संपन्नता, मुगल राजाओ को गौड राज्य पर आक्रमण का कारण बनी।

शायद रानी ने राज्य की आय का दुरुपयोग व्यक्तिगत एशो आराम, बड़े बड़े किले महल आदि बनवाने की जगह आम जनता के सीधे हित से जुड़े कार्यो में अधिक किया, यही कारण है कि जहां मुगल शासको द्वारा निर्मित बड़े बड़े महल आदि आज भी विद्यमान हैं, वहीं रानी के ऐसे बड़े स्मारक अब नही हैं.

लेकिन, महत्वपूर्ण बात यह है कि अकबर ने विधवा रानी पर हमला कर, सब कुछ पाकर भी कलंक ही पाया, जबकि रानी ने अपनी वीरता से सब कुछ खोकर भी इतिहास मे अमर कीर्ति अर्जित की।

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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