अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (3) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ।।3।।

कहतें है ज्ञानी कि सब, दोषपूर्ण हैं कर्म

इससे उनको त्यागना , ही है सच्चा धर्म

किंतु दूसरों का है मत, यज्ञ दान तप कर्म

नहीं तजे जायें कभी ,यही धर्म का मर्म ।।3।।

 

भावार्थ :  कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।।3।।

Some philosophers declare that all actions should be abandoned as an evil, while others declare that acts of gift, sacrifice and austerity should not be relinquished.।।3।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 52 ☆ सो जाएँ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “ सो जाएँ”। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 52 ☆

☆  सो जाएँ ☆

 

चलो गहरी रात हो गयी, सो जाएँ

उदासी की गोद में ही सही, सो जाएँ

 

खामोश दीवारें बुला रही हैं प्यार से

उनकी ही आरज़ू पूरी करने, सो जाएँ

 

मकड़ी जाला बुन रही होगी उजाले का

उससे मूंह फेर कर आओ ना, सो जाएँ

 

शब् भर कुछ ख्वाब देख लें जुस्तजू के

ज़रीं उम्मीद दिल में छुपाये, सो जाएँ

 

फिर सुबह आ ही जायेगी नाउम्मीदी लिए

आज रात के दामन में छुपकर, सो जाएँ

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 39 ☆ डॉ ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अट्टाहस पत्रिका – अतिथि संपादक – श्री शांतिलाल जैन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री शांतिलाल जैन जी के  अतिथि संपादन में प्रकाशित  डॉ ज्ञान चतुर्वेदी जी  पर केंद्रित अट्टहास पत्रिका पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 39 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – डॉ ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अट्टाहस पत्रिका – अतिथि संपादक – श्री शांतिलाल जैन 

चर्चा में पत्रिका – अट्टहास का डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अंकअक्टूबर २०२०

अंक संपादक –  श्री शांति लाल जैन

प्रधान संपादक – श्री अनूप श्रीवास्तव

गुलिंस्ता कालोनी, लखनऊ ( उ प्र )

इससे पहले कि अट्टहास के डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अंक इस विशेषांक पर कुछ लिखूं, व्यंग्य को समर्पित पत्रिका अट्टहास पर व इसके समर्पित संपादक श्री अनूप श्रीवास्तव जी पर संक्षिप्त चर्चा जरूरी लगती है. ऐसे समय में जब कादम्बनी जैसी बड़े व्यवसायिक प्रतिष्ठानो की साहित्यिक पत्रिकायें बंद हो रही हों, एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने कंधो पर अट्टहास का बोझ लिये चलता दिखे तो उसकी जिजिविषा व व्यंग्य के लिये समर्पण की मुक्त कंठ प्रशंसा आवश्यक है. वे व्यंग्य का इतिहास रचते दिखते हैं. अट्टहास के अनवरत प्रकाशन हेतु ही नही किसी भी पत्रिका के सफल संचालन के लिये यह आवश्यक होता है कि पत्रिका का उत्तरोतर विकास हो, नये पाठक, नये लेखक पत्रिका से जुड़ें. इस लक्ष्य को पाने के लिये अट्टहास ने अतिथि संपादन के रूप में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग किये. क्षेत्रीय व्यंग्य विशेषांक  निकाले गये हैं.अतिथि संपादक की व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता व ऊर्जा का लाभ पत्रिका को मिला भी है. डा ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य के जीवंत शिखर पुरुषों में  हैं, उन पर केंद्रित विशेषांक निकालना किसी भी पत्रिका के लिये गौरव का विषय है. अट्टहास ने यह बेहद महत्वपूर्ण परम्परा प्रारंभ की है.

संपादन कितना दुष्कर काम है यह मैं समझता हूं, रचनायें बुलवाना, गुणवत्ता परखना, उन्हें एक फांट में संयोजित करना, सरल नही हैं. आदरणीय शांतिलाल जैन सर ने भोपाल से उज्जैन स्थानांतरित होने, स्वयं के स्वास्थ्य खराब रहने की व्यक्तिगत व्यस्तताओ के बाद भी महीनो भरपूर समय व ऊर्जा इस अंक के लिये सामग्री जुटाने व संपादन में लगाई है जिसके परिणाम स्वरूप ही अंक डा ज्ञान चतुर्वेदी पर संग्रहणीय दस्तावेज बन सका है.

अपने संपादकीय में अनूप जी लिखते हैं व्यंग्य विधा है या शैली इस बहस में पड़े बिना ज्ञान जी ने अपनी पृथक शैली में लगातार लिखकर स्वयं को साबित किया है. उनका यह लिखना कि शिखर पर होते हुये भी ज्ञान जी में लेश मात्र भी अभिमान नही है, वे लगातार युवाओ के मार्गदर्शक बने हुये हैं. यह टिप्पणी  डा साहब के कृतित्व व व्यक्तित्व का सूक्ष्म आकलन है.

अतिथि संपादक शांतिलाल जैन जी ने अपनी भूमिका बहुत गरिमा व गम्भीरता से निभाई है. उन्होने डा चतुर्वेदी की चुनिंदा रचनाये जैसे नरक यात्रा से अंश, हम न मरब से अंश,  मार दिये जाओगे भाई साब, पुरातन राजा रानी की आधुनिक प्रेम कथा, एक खूबसूरत खंजर अंक के पाठको के लिये प्रस्तुत की हैं. मुझे लगता है उनके लिये ज्ञान सर की लम्बी रचना यात्रा में से चंद रचनायें चुनना फूलो की टोकरी में से चंद बीज के दाने चुनने जैसा रहा होगा. तुम ज्ञानू हम प्रेमू पढ़ा मैं प्रेम जनमेजय जी की भावनाओ को आत्मसात करता रहा. वे लिखते हैं ज्ञान व्यंग्ययात्रा का घनघोर प्रशंसक है, ज्ञान जी लिखते हैं प्रेम सक्षम होते हुये भी तिकड़मी नहीं है. मुझे लगा जैसे सी सा झूले के दो छोर पर बैठे दो व्यक्ति एक दूसरे को आंखों में आंखे डाल बड़ा साफ देख रहे हों.सुभाष चंदर जी,  हरीश नवल जी, सूर्यबाला जी, गिरीश पंकज जी,  पंकज प्रसून जी, प्रभु जोशी जी, रामकिशोर उपाध्याय जी, डा हरीश कुमार सिंह,  अरुण अर्णव खरे जी, श्रवण कुमार उर्मलिया जी के लेख पठनीय हैं. ज्ञान जी का उपन्यास नरक यात्रा बहु चर्चित रहा है उसकी कांति कुमार जैन जी की समीक्षा, मरीचिका पर मधुरेश जी की समीक्षा, हम न मरब पर कैलाश मण्डलेकर जी की समीक्षा महत्वपूर्ण चयन है. अंक में प्रस्तुत सारे चित्र डा ज्ञान का जीवन एल्बम हैं. पारिवारिक चित्र, सम्मान के चित्र, पद्मश्री ग्रहण करते हुये चित्र, अनेक व्यंग्यकारो के साथ के चित्र सब दस्तावेज हैं. समग्र टीप की है विजी श्रीवास्तव जी ने जिसे पढ़कर अभीभूत हूं. मैं अट्टहास लम्बे समय से पढ़ता रहा हूं, जबलपुर में इसके एक अंक के विमोचन का आयोजन भी कर चुका हूं, पर निर्विवाद लिख सकता हूं कि अट्टहास का डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अक्टूबर २०२० अंक पिछले अनेक वर्षो के अंको में सर्वश्रेष्ठ है. जिसके लिये अट्टहास, अनूप जी, शांतिलाल जी, ही नही इसका हर पाठक बधाई का पात्र है. मुझे लगता है जो भी व्यंग्य प्रेमी इसे पढ़ेगा संदर्भ के लिये मेरी तरह संग्रहित जरूर करेगा.

 

चर्चाकार  .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ तो चलूँ….! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ तो चलूँ….!

 

जीवन की वाचालता पर

ताला जड़ गया

मृत्यु भी अवाक-सी

सुनती रह गई

बगैर ना-नुकर के

उसके साथ चलने का

मेरा फैसला…,

जाने क्या असर था

दोनों एक साथ पूछ बैठे-

कुछ अधूरा रहा तो

कुछ देर रुकूँ…?

मैंने कागज़ के माथे पर

कलम से तिलक किया

और कहा-

बस आज के हिस्से का लिख लूँ

तो चलूँ…!

 

©  संजय भारद्वाज 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सैन्य जीवन की ओर ☆ कर्नल अखिल साह

कर्नल अखिल साह 

(ई- अभिव्यक्ति से हाल ही में जुड़े  कर्नल अखिल साह जी  एक सम्मानित सेवानिवृत्त थल सेना अधिकारी हैं। आप  1978 में सम्मिलित रक्षा सेवा प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान के साथ चयनित हुए। भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में प्रशिक्षण के पश्चात आपने  इन्फेंट्री की असम रेजीमेंट में जून 1980 में कमिशन प्राप्त किया। सेवा के दौरान कश्मीर, पूर्वोत्तर क्षेत्र, श्रीलंका समेत अनेक स्थानों  में तैनात रहे। 2017 को सेवानिवृत्त हो गये। सैन्य सेवा में रहते हुए विधि में स्नातक व राजनीति शास्त्र में स्नाकोत्तर उपाधि विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त किया । कर्नल साह एक लंबे समय से साहित्य की उच्च स्तरीय सेवा कर रहे हैं। यह हमारे सैन्य सेवाओं में सेवारत वीर सैनिकों के जीवन का दूसरा पहलू है। ऐसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी एवं साहित्यकार से परिचय कराने के लिए हम हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी  में प्रवीण  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी का हार्दिक आभार।  हमारा प्रयास रहेगा कि उनकी रचनाओं और अनुवाद कार्यों को आपसे अनवरत साझा करते रहें। आज प्रस्तुत है कर्नल अखिल साह जी की  एक भावप्रवण कविता ‘सैन्य जीवन की ओर

☆ सैन्य जीवन की ओर

 

अनजानी सी थी वह राह

अनदेखी, अनसुनी थी वह डगर

जिस पर निकल पड़ा था मैं

छोड़ घर-परिवार, गांव-नगर।

 

विचलित सा, सहमा सा था मैं

जब भर्ती होकर गया निकल

त्याग कर हर सुख सुविधा

मित्रों का साथ, माँ का आँचल।

 

पर चंद दिनों के दौर में ही

भूल गया सब कष्ट अपने,

अब श्रम, प्रशिक्षण, अनुशासन

बन गए मेरे जीवन के सपने।

 

उमड़ रहा है मन में मेरे

देश सेवा का अजब जूनून

सैन्य वर्दी में ही अब मुझे

मिल रहा है ग़ज़ब सुकून।

 

© कर्नल अखिल साह

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 65 – निर्मल सांसें मिलेगी तुमको ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर एवं  समसामयिक कविता   “निर्मल सांसें मिलेगी तुमको।  आशा पर संसार टिका है। ईश्वर शीघ्र  इस आपदा से सारे विश्व को मुक्ति दिलाएंगे और सबको निर्मल सांसे मिलेगी। इस सार्थक  एवं  भावनात्मक कविता के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 65 ☆

☆ कविता – निर्मल सांसें मिलेगी तुमको ☆

 

ये कैसी लाचारी है

चारों ओर हाहाकारी हैं

 

मानव की विवशता  देखो

प्रकृति भी निठुराई है

श्वासों का सब खेल निराला

ऑंखें  सबकी पथराई है

 

मनुज डरा है मनुज से

सहमा भाई से भाई है

पूछ ना ले कोई कहीं से

स्वयं को सब ने बचाई है

 

यह कैसा है तांडव छाया

घनघोर विपदा है आई

मरे मिले ना कोई चार कांधे

रोने न कोई है माँ जाई

 

आग उगलते लपटों में

वसुंधरा भी कांप रही

बेबस होती जिंदगी में

धन भी काम न आया सही

 

बहता निर्मल स्वच्छ जल

बार बार कहता संदेश यही

अपने लिए जिएं सदा कल

प्रकृति के लिए जियो तो सही

 

निर्मल सांसें मिलेगी तुमको

नहीं बांधना होगा बंधन

मत काटो मेरे अंचल को

मिलेगा तुमको अनमोल धन

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 65 ☆ मनाचा ठाव☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता  “मनाचा ठाव।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 65 ☆

☆ मनाचा ठाव 

 

तुझ्यासारखाच छोटा, माझ्या डोळ्यांत सागर

माझे विश्व जर लोटा, तुझे विश्व हे घागर

तुझ्या घटातले पाणी, नाही कधीच अटत

डोळ्यांतील अश्रु सुद्धा, माझ्या नाही रे घटत

तुझ्या पोटातील मोती, त्यांना मोठीच किमंत

थोरा मोठ्यांच्या गळ्यात, त्यांना वाटते गंमत

मोती शिंपल्यात माझ्या, गळा आईच्या पडती

दुःख सांगती आईला, ढसाढसा ते रडती

तुझे नीर, माझे अश्रु, दोन्हीमध्ये खारे पाणी

किनारा नि ह्या पापण्या, होती ओल्या पून्हा दोन्ही

तुझ्या लाटांचे भूषण, तन भिजण्याची आशा

माझ्या डोळ्यांची आसवे, तेथे काळजाची भाषा

अश्रु आनंदाचे कधी, जाती आनंद देऊन

वाटते या मनाला की, आलो सागर पोहून

काल सागराच्या तळी, होती रत्नांचीच खाण

कर्म माणसांचे आहे, तेथे सापडते घाण

सहजच उतरून सागरातला, शोधलास तू गाव

कसा माणसा लागत नाही, तुझ्या मनाचा ठाव

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाखरू ☆ श्रीशैल चौगुले

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पाखरू ☆ श्रीशैल चौगुले☆

 

पाखरांचा जीव भिरभिरतो

अजून रानोमाळी

कलमी फळा पिकात शोधीत

जुनीच माती काळी.

 

दगड नाही, कुसळ नाही

तरीही कोंडतो श्वास

रसायनात गुदमरलेली

गगनभरारी पंखा आस.

 

फुलात नसले मध तरीही

काळीज भृंगराचे भ्रमरे

कालवे-धरणे दुथडी भरुन

पाखरांच्या मनात, जुनीच

ओहोळ-झरे.

 

कसे-कोण जाणे, ऊंच-ऊंच

टोकावरती पाखरु बसले

वार्यावरती पंख हलेनात

हे तर टॉवर, पर्वत कसले.

 

आता पाखरु पावसाशिवाय रोजच भिजते, चिवचिवते

घरट्यासाठी वेड्यासारखी घिरट्या घालीत, बोन्सायभोवती

जुने मंदिर-वाडे, वड, पिंपळाच्या

पाऊलखुणा शोधीते.

 

© श्रीशैल चौगुले

९६७३०१२०९०

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मूर्ती ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ जीवनरंग ☆ मूर्ती ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर 

तो एक कलाकार होता. त्याने खूप सुंदर सुंदर मूर्ती घडवल्या होत्या. मातीच्या मूर्ती, दगडाच्या मूर्ती,  खडकांवर भीत्तीचित्राप्रमाणे कोरलेल्या मूर्ती. काही मूर्ती लहान होत्या. काही खूपच भव्य होत्या. पण सगळ्याच मूर्ती सुंदर होत्या. मूर्ती जीवंत आहेत , एकमेकींशी बोलताहेत, असं वाटत होतं. किती प्रकारच्या मूर्ती बनवल्या होत्या त्याने. दंतविहीन निरागसबालके. त्यांची फुलांसारखी कोमलता मनाला मोहून टाकायची. काहींमध्ये उफाळणारं तारुण्य,  प्रणयाचं आमंत्रण असायचं. प्रकाशाची चमक त्यात असायची. काही विरह व्यथा प्रकट करणार्‍या असायच्या. काही मूर्ती जरा-जर्जर वृद्धांच्याअसायच्या. भूतकाळाचीआठवणकरणारे त्यांचे डोळे पाणवलेले असायचे.

फुलांचा मोसम होता. सगळ्या मूर्ती आपल्या लावण्याच्या तोर्‍यात होत्या. पण लवकरच मौसम बदलला. फुले आणि ऊबदार वातावरण दूर सारत ढग गडगडू लागले. विजा चमकू लागल्या. धो धो पाऊस सुरू झाला. मातीच्या मूर्तीरडू लागल्या. रडता-रडता  हळूहळू विरघळून गेल्या. त्यांचं नामोनिशाणही राहीलं नाही.

दुसर्‍या दिवशी ऊन पडलं. टणक दगडावरच्याआणि खडकांवर कोरलेल्या मूर्तींनाआपल्या दृढतेचाआणि लावण्याचा अभिमान वाटूलागला. दूर दूर विखुरलेल्या छिन्न-भिन्न झालेल्या मूर्तींना त्यांच्या अभिमानाची तीक्ष्ण धार अधीकच वेदना देऊन गेली.

एक दिवस धरतीच्या पोटातून एक विलक्षण थरथर, भयानक, विचित्र आवाज ऐकू  येऊ लागला. जमीन सरकली. तिचा वक्ष भग्न होऊन विदीर्ण झाला. मोठमोठ्या शीलाखंडांसमवेतलोखंडासारख्या टणक मूर्ती त्यात सामावल्या.

दुसर्‍याच दिवशी तो कलंदर कलाकार पुन्हा तिथे आला. नव्या उगवत्या सूर्याबरोबर तिथलं वातावरण त्याला इतकं अद्भूत वाटलं, की तोपुन्हाआपल्याकामाला लागला. बघता मूर्तींची एक भव्य सृष्टी पुन्हा तिथे स्थापित झाली. काही कच्च्या मातीच्या मूर्ती, काही दगडांच्या, लोखंडासरख्या टणक… पण सगळ्याच सुंदर… अति सुंदर…

 

मूळ हिंदी कथा – मूर्तियाँ    मूळ लेखिका – सुश्री शकुन्त दीपमाला

भावानुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ गणित ☆ सौ. श्रेया सुनील दिवेकर

☆ विविधा ☆ गणित ☆ सौ. श्रेया सुनील दिवेकर ☆

माणसाचे आयुष्य हे एक गणितच आहे नाही का? माणसाने जन्मभर नुसती गणितच तर सोडवायची असतात. कधी बेरीज तर कधी गुणाकार करायचा असतो कधी वजाबाकी तर कधी भागाकार, पण कधी आणि कुठे कोणती सूत्रे वापरायची हे मात्र त्याला समजले पाहिजे.

काय गंमत आहे नाही का? माणसाच्या आयुष्याची सुरवात होते ती गणिताने आणि शेवट ही गणितानेच होतो..

शाळेत आपण वजाबाकी, बेरीज, गुणाकार, भागाकार सारे काही शिकतो. अंकांशी खेळायला शिकतो. पण प्रत्यक्षातही आपल्याला जन्मभर तोच खेळ खेळायचा असतो ह्याचा आपण विचारही केलेला नसतो.

अंकांची बेरीज करता करता आपण अनेकांशी कळत न कळत बेरजेच्या रुपात कधी जोडले जातो हेच कळत नाही. हां अर्थात बेरजेच्या रुपात रहायचे की वजाबाकी व्हायचे हे आपल्यावर आहे म्हणा.

शाळेत गुणाकार, भागाकार करताना ती सूत्रे शिकताना खूप कंटाळा यायचा, वैताग येई नुसता, पण आज लक्ष्यात येते आपले सारे आयुष्य सूत्रांवर तर आधारलेले आहे.

आई म्हणायची माणसाचे पाढे कसे तोंडपाठ पाहिजेत, गणितात पैकीच्या पैकीच पाहिजेत. तेव्हा नाही पण आता पटते एकदा काही गणित चुकले की आयुष्याचे सारे गणित चुकत जाते. मग बेरजेची कधी वजाबाकी होती तेच कळत नाही आणि गुणाकाराचा भागाकार व्हायला ही वेळ लागत नाही.

आपल्या आयुष्याचे गणित कसे पाहिजे तर आपल्याला दुसर्‍यांच्या आनंदाचा गुणाकार करता आला पाहिजे तर दुःखाचा भागाकार. नात्यांची बेरीज करता आली पाहिजे तर त्यांच्या अडचणींची वजाबाकी करता आली पाहिजे.

शेवटी आयुष्य हा एक गणिताचाच तर खेळ आहे. जो मांडायचाही आपणच आणि खेळायचाही आपणच आहे. आपल्यालाच तर ठरवायचे आहे की कशाची बेरीज करायची आणि कशाची वजाबाकी.

ज्याला हे जमले त्याला आयुष्याचे गणित उत्तम जमले नाही का??

सहज मनाच्या कोपऱ्यातून ☺️6.8.2020

 

©  सौ. श्रेया सुनील दिवेकर

मो 9423566278

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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