हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #5 ☆ जनरेशन गेप ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। श्री ओमप्रकाश  जी  के साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  शिक्षाप्रद लघुकथा “जनरेशन गेप ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #5 ☆

 

☆ जनरेशन गेप  ☆

 

पापाजी  उसे समझा रहे थे ,” सीमा बेटी ! अब तुम्हारी सगाई हो गई है . अब इस तरह यार दोस्तों के साथ घूमने जाना, सिनेमा देखना, शापिंग करना ठीक नहीं है ?….” पापाजी उसे आगे कुछ समझते कि सीमा ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा , ” पापाजी ! आप भी ना , १७ वी सदी की बातें कर रहे है.  हम नई पीढ़ी के लोग हैं. ऐसी पुरानी बातों में विश्वास नहीं करते हैं .”

अभी सीमा अपने पिताजी को जनरेशन गेप पर कुछ और लेक्चर सुनाती कि उस के मोबाइल के वाट्सएप्प पर एक सन्देश आ गया. जिसे पढ़- देख कर सीमा ‘धम्म’ से जमीन पर बैठ गई .

“क्या हुआ ?” सीमा के चेहर पर उड़ती हवाईया देख कर पापाजी ने पूछा तो सीमा ने अपना मोबाइल आगे कर दिया. जिस में एक फोटो डला हुआ था और  नीचे लिखा था , ” सीमा ! मैं इतना भी आधुनिक नहीं हुआ हूँ कि अपनी होने वाली बीवी को किसी और के साथ सिनेमा देखते हुए बर्दाश्त कर जाऊ. इसलिए मैं तुम्हारे साथ मेरी सगाई तोड़ रह हूँ.”

यह पढ़- देख कर पापाजी के मुंह से निकल गया , “बेटी ! यह कौन सा जनरेशन गेप है ? मैं समझ नहीं पाया ?”

शायद  सीमा भी इसे समझ नहीं पाई थी.  इसलिए चुपचाप रोने लगी .

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

 

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 5 – आभाळ दाटून आलं की..! ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं। अब आप श्री सुजित जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – सुजित साहित्य” के अंतर्गत  प्रत्येक गुरुवार को  पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी कविता आभाळ दाटून आलं की..!)

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #5 ☆ 

 

☆ आभाळ दाटून आलं की..!☆ 

 

आभाळ दाटून आलं की भिती वाटते

येणा-या पावसाची आणि

येणा-या आठवणींची सुध्दा

डोळ्यासमोर सहज तरळून जातं

गावाकडचं घर..,गावाकडचं आंगण

मनामधल्या सा-याच जखमा

पावसाच्या प्रत्येक थेंबाबरोबर

ओल धरू लागतात सलू लागतात…

पण मी मात्र संयमानं त्या

जखमांवर फुंकर मारत राहतो

अगदी..पाऊस थांबेपर्यंत

पाऊस पडत असताना

घरात जायची भितीच वाटते

कारण ह्या पावसाने

गावच्या घरासारखं हे ही घर

माझ्या अंगावर कोसळेल की काय

ह्याची भिती वाटते

आणि माझ्या मायेसारखाच

मीही ह्या घराच्या ढीगा-यात एकाएकी

दिसेनासा होईल की काय ह्याचीही

कारण..घर जरी बदललं असलं तरी

अजून आभाळ तेच आहे

आणि कदाचित..पाऊस ही..,

आभाळ दाटून आलं की

भिती वाटते येणा-या पावसाची

आणि येणा-या आठवणींची सुध्दा..

 

……©सुजित कदम

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ How to be Healthy, Happy and Wise ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer,  Author, Blogger, Educator and Speaker.)

☆ How to be Healthy, Happy and Wise

A Pathway to Authentic Happiness, Well-being and a Meaningful Life

Happiness, say the positive psychologists, is the experience of joy, contentment, or positive well-being, combined with a sense that life is good, meaningful, and worthwhile.

Twenty-three hundred years ago, Aristotle concluded that, more than anything else, men and women seek happiness. It is the meaning and the purpose of life, the whole aim and end of human existence. Different men seek after happiness in different ways and by different means, and so make for themselves different modes of life.

What is the pathway to authentic happiness, well-being and a meaningful life? How can we equip ourselves with sustainable scientific tools to cultivate a happy and fulfilling life with a greater sense of well-being? This article attempts to answer these questions.

Taking care of body, mind and spirit is of utmost importance. It’s like a tripod. All limbs must be equally strong for balance and harmony. We need to transform the entire experience of life by taking care of all the relevant dimensions – physiological, psychological and spiritual.

After years of deep study and practical sessions with people from all walks of life, a holistic approach has emerged that blends carefully the best of positive psychology, meditation, yoga, laughter yoga, and spirituality.
Positive psychology is the science of happiness. It provides authentic understanding of happiness and well-being and dispels myths and wrong notions about happiness. It is a treasure trove of evidence-based happiness-increasing strategies from which one may choose activities suitable for oneself.

Meditation is an invaluable tool for calming, concentration and purification of the mind. It clears clouds and lets you seek wisdom. According to Matthieu Ricard, happiest monk on this planet, “Meditation is a practice that makes it possible to cultivate and develop certain basic positive human qualities in the same way as other forms of training make it possible to play a musical instrument or acquire any other skill.”

Yoga can do wonders for your health by stimulating endocrinal systems and taking care of neuro-muscular systems. It is suitable for modern day lifestyle diseases and brings about body-mind union. If you don’t have enough time, even then surya namaskara can be easily integrated into your daily life as it requires only five to fifteen minutes’ practice daily to obtain beneficial results remarkably quickly.

Laughter yoga combines laughter exercises with yogic breathing. It is instrumental in oxygenation of the body, strengthening immune system, and stress relief as feel good hormones known as endorphins are generated during the process. Just ten minutes of gentle laughter in the morning can change the complexion of your day.

Spirituality provides right view and right understanding of life. It gives spiritual insight into right speech, right action and right livelihood. Inner wisdom steers us in the right direction. If you desire everlasting health and happiness, cultivate wisdom.

All the five components – positive psychology, meditation, yoga, laughter yoga and spirituality – put together, enable complete transformation of the entire experience of life.

The benefits include health, happiness and peace for individuals; stress relief, team building, higher productivity, leadership and positivity at workplaces; health, bonding and integration in communities; and creativity, better concentration, emotional intelligence, spiritual growth, strong immune system and all-round personality development of youngsters.

In conclusion, may we say that the practice of yoga, meditation and laughter yoga along with fundamental understanding of positive psychology and spirituality can lead you to lasting happiness and peace.

 

Jagat Singh Bisht

Founder: LifeSkills
LifeSkills is a pathway to authentic happiness, well-being and a meaningful life!

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – चतुर्थ अध्याय (3) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्थ अध्याय

( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय )

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ।।3।।

वही पुराना योग आज है मैने तुझको बतलाया

क्योंकि तू मेरा परम मित्र है और ये मेरा मनभाया।।3।।

भावार्थ :  तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है।।3।।

 

That same ancient Yoga has been today taught to thee by Me, for, thou art My devotee and friend; it is the supreme secret. ।।3।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य – #4 – वातानुकूलित संवेदना ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में प्रस्तुत है एक ऐसी  ही लघुकथा  “वातानुकूलित संवेदना”।)

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – #4 ☆

 

☆ वातानुकूलित संवेदना ☆

 

एयरपोर्ट से लौटते हुए रास्ते में सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे पत्तों से छनती तीखी धूप-छाँव में साईकिल रिक्शे पर सोये हुए एक व्यक्ति पर अचानक नज़र पड़ी।

लेखकीय कौतूहलवश गाड़ी रुकवाकर उसके पास पहुँचा।

देखा – वह खर्राटे भरते हुए गहरी नींद सो रहा था।

समस्त सुख-संसाधनों के बीच मुझ जैसे अनिद्रा रोग से ग्रस्त सर्व सुविधा भोगी व्यक्ति को जेठ माह की चिलचिलाती गर्मी में इतने इत्मिनान से नींद में सोये इस रिक्शेवाले की नींद से कुछ ईर्ष्या सी होने लगी।

इस भीषण गर्मी व लू के थपेड़ों के बीच खुले में रिक्शे की सवारी वाली सीट पर धनुषाकार, निद्रामग्न रिक्शा चालक के इस कारुण्य दृश्य को आत्मसात कर वहाँ से अपनी लेखकीय सामग्री बटोरते हुए वापस अपनी कार में सवार हो गया

अनायास रिक्शेवाले से मिले इस नये विषय पर एक कहानी  बुनने की उधेड़बुन मेरे संवेदनशील मस्तिष्क में उमड़ने-घुमड़ने लगी।

घर पहुंचते ही सर्वेन्ट रामदीन को कुछ स्नैक्स व कोल्ड्रिंक का आदेश दे कर अपने वातानुकूलित कक्ष में अभी-अभी मिली कच्ची सामग्री के साथ लैपटॉप पर एक नई कहानी बुनने में लग गया।

‘गेस्ट’ को छोड़ने जाने और एयरपोर्ट से यहाँ तक लौटने  की भारी थकान के बावजूद— आज सहज ही राह चलते मिली इस संवेदनशील मार्मिक कहानी को लिख कर पूरी करते हुए मेरे तन-मन में एक अलग ही स्फूर्ति व  उल्लास है।

रिक्शाचालक पर तैयार मेरी इस सशक्त दयनीय कहानी को पढ़ने के बाद मेरे अन्तस पर इतना असर हो रहा है कि, इस विषय पर कुछ कारुणिक काव्य पंक्तियाँ भी खुशी से मन में हिलोरें लेने लगी है।

अब इस पर कविता लिखना इसलिए भी आवश्यक समझ रहा हूँ कि – हो सकता है, यही कविता या कहानी इस अदने से रिक्शे वाले के ज़रिए मुझे किसी प्रतिष्ठित मुकाम तक पहुंचा दे।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ प्रिय आवाज दे तुमने मुझको बुलाया नहीं ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव 

 

(डॉ. प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की एक  शृंगारिक भावप्रवण कविता।)

 

☆ प्रिय आवाज दे तुमने मुझको बुलाया नहीं

 

प्रिय आवाज दे तुमने मुझको बुलाया नहीं,

क्यों अर्धांगना तुमने मुझको बनाया नहीं।

क्या जीवन साथी बनने योग्य समझा नहीं,

या मेरे प्यार ने तुम्हारा हृदय हर्षाया नहीं।।

प्रिय – – – – – – – – – – – – – – – -नहीं।

 

प्रिय धड़कनें निज उर की तुमने सुनाया नहीं,

थिरकती उंगलियों से मन वीणा बजाया नहीं।

क्यों प्यारा घरौंदा तुमने मेरे संग बनाया नहीं,

क्या मेरे प्रणयी हृदय ने तुमको तड़पाया नहीं।।

प्रिय – – – – – – – – – – – – – – – -नहीं।

 

प्रिय प्रेम की उष्मा से तुमने मुझे मदमाया नहीं,

मेरी धमनियों में नेह तुमने अपना बहाया नहीं।

लावा तुमने अपने अनुराग का पिघलाया नहीं,

क्या मेरी उर वीणा ने तेरा हृदय लुभाया नहीं।।

प्रिय – – – – – – – – – – – – – – – -नहीं।

 

हा प्रिये! प्रेम ज्योति तुमने निरंतर जलाया नहीं,

क्या मेरे प्रणय ने तेरी देह में आग सुलगाया नहीं।

तेरे प्रेम ने तुझे मुझ संग रमण हेतु तरसाया नहीं,

मेरे अभिसार को तन मन ने तुझको मनाया नहीं।।

प्रिय – – – – – – – – – – – – – – – -नहीं।

 

डा0.प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात #5 – मला वाटते …. ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात”  में  उनकी  एक ऐसी  कविता जो वर्तमान पीढ़ी की प्रत्येक सास अपनी  बहू के लिए मन ही मन लिखती होंगी ।  किन्तु , प्रत्यक्ष में कोई प्रदर्शित कर पाती हैं और कोई नहीं कर पाती । कभी अहंकार (Ego) आड़े आ जाता है तो कभी कुछ। आपकी कविता में बहू ही नहीं बेटी का स्वरूप भी दिखाई देता है। सुश्री प्रभा जी को निश्चित रूप से ऐसे उत्कृष्ट साहित्य के लिए साधुवाद और उनकी लेखनी को नमन।  

सास और बहू के रिश्तों पर उनकी भावना उनके ही शब्दों में –

“ सासू सुनेचं नातं युगानुयुगे वादग्रस्तच ठरलेलं आहे……माझ्या सूनेबद्दल च्या भावना व्यक्त करणारी कविता….

आजच्या #कवितेच्या प्रदेशात  मध्ये! ” – प्रभा सोनवणे

अब आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं । )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 5 ☆

 

 ☆ मला वाटते …..☆

 

ती खरोखर सुंदर आहे

आणि आवडतेही मला मनापासून !

ती दिसते अधिक आकर्षक आणि गोड

चुडीदार ,पंजाबीड्रेस मध्येच !

पैठणीत ही दिसते खुलून …….

पण मला वाटते ,

तिने क्वचितच नेसावी साडी ,

मात्र जीन्स वापरावी सर्रास ,

जावे ट्रेकिंगला ,

करावी मुलुखगिरी !

आयुष्यातले सारे सारे आनंद

लुटावेत  मनसोक्त !

स्वयंपाक ही करावा चटपटीत -चटकदार ,

हवा तसा हवा तेंव्हा !!

मला आवडते तिचे सफाईदार ड्राईव्हिंग ,

आणि फर्डा इंग्रजी संभाषणही .

मिळालेल्या स्वातंत्र्यातून आणि संधीतून

बनावे तिने स्वयंसिद्ध ,स्वयंपूर्ण !

 

तिच्यात दिसते मला नेहमीच

एक हरणाचे पाडस ,

जंगलात हरविलेले ……….

पण क्वचितच कधीतरी ………

तिच्यात एक मांजरही संचारते ,

फिस्कारते अधून मधून ,

न बोचकारता ,

रक्तबंबाळही  करते ………

पण ….पण …..तिच्यातले ते निरागस ,

टपो-या डोळ्याचे ,चकचकीत कांतीचे .

हरिणाचे पाडसच

बागडत असते आस पास !!

 

………तिच्या तिच्या  अभयारण्यात

असावे ते सुखरुप …..आनंदी !

 

ती खरोखर सुंदर आहे ,

आणि आवडतेही मला ,

मनापासून …………..

 

© प्रभा सोनवणे,  

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पुणे – ४११०११

मोबाईल-9270729503

 

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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – ☆ पुष्पकचा सेवाभावी गरुड़☆ – श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे

श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे

(श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है ।  e -abhivyakti पर पिछले दिनों  आपके द्वारा लिखी गई  श्री विजय यशवंत सातपुते जी की पुस्तक “प्रकाश पर्व ” की समीक्षा प्रकाशित की थी  जिसे अच्छा प्रतिसाद मिला। समाजसेवी श्री शांताराम गरुड जी  के सेवाभाव पर  यह आलेख वास्तव में उनका एक अविस्मरणीय संस्मरण है जिसे हम अपने पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं। यह आलेख श्री विक्रम आप्पासो शिंदे जी की  समाज सेवा भावना को भी प्रदर्शित करता है। )

 

☆ पुष्पकचा सेवाभावी गरुड़ ☆ 

(श्री शांताराम गरुड़ – आयुष्यपणाला लावून अखंड सेवेच व्रत चालवणारा एक सच्चा समाजसेवक, माणुसकिचा  कैवारी..!)

 

एखदाचा साताऱ्याहुन पुण्याला पोहोचलो.पाच-सव्वापाच वाजल्या असतील..वरती आभाळाच थैमान चालू झालं होत आणि माझ्या डोक्यातदेखिल विचारांनी थैमान माजवल होतं. कारण आज बऱ्याच दिवसांनी त्या साताऱ्या मधील yc कॉलेज मध्ये बराच वेळ  एकांतात घालवला होता…जुन्या आठवणी ताज्या झाल्या होत्या आणि तिच्याशी जवळपास 1 मिनीट 12 सेकंदाचाच संवाद झाला होता. बाकि संवाद मुकाच होता.

गरुड काका आणि मी…अव्यक्त सर्व काही?

स्वारगेट ला pmt च्या स्टॉपवर थांबलो होतो. बऱ्याच वेळ झालं डोक्यातल काहूर शांत होत नव्हतं…आजुबाजुला गर्दीही वाढत होती. अजुनतरी सेनापती बापट रोड ला जाणाऱ्या बसचा कुठेही थांगपत्ता नव्हता.चर्..चिक..चिक.. या बस च्या जोरात दाबलेल्या ब्रेक च्या आवजाने भानावर आलो ..! समोर सेनापती बापट रोड वरुन जाणारी बस थांबली आणि अखेर मी मोठ्या कसोशिने मार्गस्थ झालो.बसल्या बसल्या सीटवर एक मोठासा सुस्कारा टाकला आणि तेवढ्यात खाकी वर्दीतील एक निरागस..भाबड़ ..चेहऱ्यावर कृतज्ञतेचा भाव स्पष्ट दिसणार्ं पन्नाशीतल व्यक्तिमत्व शेजारी येवून बसले.मला जरा त्यांच्याबद्दल आपुलकी वाटली. न राहून त्यांच्याशी बोलता झालो.थोडेसे चोचरे बोलत बोलत तेही माझ्याशी संवाद साधू लागले. आणि त्या साध्या सरळ विभूती पलिकडचे लाखमोलाचे कार्य स्पष्ट होवू लागले….मी ते सर्व अचंबित होवून ऐकतच राहिलो. त्याचं नाव होत “शांताराम गरुड़” आणि ते महानगर पालिकेच्या शव वाहणाऱ्या बस “पुष्पक” वरती गेली 12 वर्षे  ड्राईवर म्हणून कार्यरत होते. म्हणजे आयुष्यातील एक तप या माणसाने मृत्युपलिकडच्या माणसांमध्ये घालवले होते. दररोज स्वारगेट डेपो अंतर्गत येणाऱ्या संपूर्ण पुणे क्षेत्रातील दोन व्यक्तींच्या पार्थिवाशी सामना होत होता या माणसाचा. कित्येकांची प्रेतं या माणसाने उघड्या डोळ्यांनी पाहिली होती. कित्येकांचे रडवलेले मुखवटे हा इसम दररोज पाहत होता. दुर्दशा झालेल्या कुटुंबाची व्यथा याच माणसाने पाहिली होती. 12 वर्षामध्ये न थकता अविरतपने गरुड़ काका मृत्युच्या पलीकडे गेलेल्या माणसांची सेवा करतच होते. पुष्पक हे शव वाहन चालविन्यास दुसरा कोणताच ड्राईवर तयार होत नसे मात्र गरुड़ काका खऱ्या अर्थाने पुष्पकाचे  गरुड़ ठरले होते. 12 वर्ष्यात जवळपास 7500 हजार पार्थीव् वाहुन न्हेणारे गरुड़ काका आता बोलता बोलता पाप पुण्य आणि खऱ्या अर्थाने सेवा सुश्रुषा काय असते याबद्दल बोलते झाले. मी सुन्न होवून ऐकताच राहिलो. त्या चोचरेपनातून त्यांनी एक किस्सा सांगितला..तो त्यांच्या आयुष्यातील.!!  काकांचा two व्हीलर वरुन वार्जे मध्ये मोठा एक्सीडेंट झाला होता.त्यावेळी ते pmt त बस ड्राईवर म्हणूनच काम करत होते. 3 वर्षे कोमात गेल्यावर काका पुन्हा हळूहळू चांगले झाले. तेव्हा त्यांच्या घरच्यांची झालेली दयनीय अवस्था काकांनी पाहिली होती. ती दुःखाचि व्यथा जणू त्यांनी तिथुनच प्यायली होती. आणि पुन्हा कामावर रुजू होताना त्यांनी ठरवल होते की “जिवंत माणसांची सेवा सुश्रुषा फार झाली आता..या मेलेल्या लोकांसाठी आणि त्यांच्या कुटुंबसाठी उरलेले आयुष्य सेवा सुश्रुषा करण्यात वेचायच्. आणि तेव्हापासून आज अखेर पर्यन्त हा माणूस तितक्याच् निष्ठेने पुष्पक च्या माध्यमातून प्रेतवाहिनिवर कार्यरत झाला. कित्येक आक्रोश ऐकले त्यांच्या कानांनी..आकांत करणाऱ्या स्त्रीया-माणस…गहिवर घालणारे चिमुकले जिव…हाम्बरडा फोडणाऱ्या माउली..तर कधी शांतपणे केविलवाण्या होऊन त्यांच्या पुष्पक मधून स्मशानाकडे फुंदत चाललेल्या प्रेतयात्रा..बस्स!!!  आता मी पुन्हा अस्वस्थ झालो होतो आणि काका सहजपणे बोलत होते. कल्पनाशक्ति आता माझाच खून करू पाहत होती आणि त्याच क्षणाला माझ्या अंगावर काटा उभा राहिला. मी पुन्हा मोठासा सुस्करा सोडला आणि अखेर त्यांना बोलता बोलता थाम्बवलच..!! त्याचं खुप कौतुक केल. ती कौतुकाची थाप माझ्यासारख्या त्यांच्या मुलाच्या वयाच्या पोराकडून मिळताना देखील ते तेवेढेच उत्साही आणि समाधानी दिसत होते. आज खऱ्या अर्थाने आयुष्यपणाला लावून सामाजासाठी झटनारा प्रामाणिक समाजसेवक मला भेटला होता. त्या सेवेतच त्यांनी त्यांच्या आयुष्याचा राम पाहिला होता जणू,,.कोणत्याही पुरस्काराचा मानकरी हा माणूस कधीच झाला न्हवता ना कधी श्रेयवादासाठी हा माणूस रुसला होता!! हाच खरा समाजसेवक होता…! पण तरीही दुर्लक्षित??

श्रेयवादासाठी…नावासाठी….वैयक्तिक स्वार्थासाठी..नावलौकिकसाठी समाजकार्याच्या नावाखाली समाजालाच थुका लावणारे असामाजिक कार्यकर्ते आजपर्यंत कैक पाहिले होते पण त्यात शांताराम गरुड़ कुठेही गवसले नव्हते..गाडगेबाबा ही नव्हते आणि नव्हते तिथे कधी आमटे  कुटुंब..!!!

बालभारतीच्या कार्नर ला बस टर्न घेवू लागली तेव्हा मी त्यांच्या सोबत एक माझ्या आठवणीसाठी सेल्फ़ी घेतला आणि पुढच्याच् शेती महामंडळ च्या स्टॉपवर् त्यांचा निरोप घेऊन उतरलो.

आता पुन्हा डोकं गरम झाल होत..

आज तीन प्रसंगांनि तीन वेगळ्या दुनियेंच दर्शन घड़वल होत..! वैयक्तिक,नैसर्गिक आणि सामाजिक जगण्याची..कर्तव्याची सूत्र एकाच दिवसात अनुभवायला मिळाली होती. तिचा,पावसाचा आणि गरुड़ काकांच्या चिंतनाचा हिशोब करता करता अखेर रूमवर पोहोचलोच आणि मग ही लेखनी तुमच्याशी बोलू लागली..!!!

अजुन अंधारात असणाऱ्या खऱ्या समाजसेवकांचा गौरव होणार की नाही..! त्यांच्या कार्याचे किमान त्यांना समाधान मिळावे म्हणूनतरी सन्मान होईल की नाही.खरे हीरो फ़िल्म मध्ये डायलाग मारताना कधीच  नाहीत दिसणार ..तर ते  समाजाच्या तळागाळात समाजाचा बोझा  आपल्या खांद्यावर घेताना दिसतील.त्यांनाच सलाम माझा..!! तुमच्याकडे असेल एखादा पुरस्कार तर त्या पुरस्काराचाच सन्मान होईल ऎसा सेवक पाहून न्याय देण्याचा प्रयत्न करा..! परिवर्तन नक्की होईल.!

आता तुम्हीच ठरवा…खरा समाजसेवक कोण??

मला छळणारी ती……..लेखनी!!

तिच्या आठवणीत विचारांच् थैमान माजवणारा तो……पाऊस!!

मरणोत्तरांची सेवा करणारे ते…..गरुड़ काका??

 

©  कवी विक्रम मालन आप्पासो शिंदे

मु/पो-वेळू(पाणी फाउंडेशन), तालुका-कोरेगाव, जिल्हा-सातारा 415511

मोबाइल-7743884307  ईमेल – mastermindkaviraj@gmail.com

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Laughter Yoga Learning Video in Hindi ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer,  Author, Blogger, Educator and Speaker.)

☆ Laughter Yoga Learning Video in Hindi 

आइये सीखें – हास्य योग कैसे करें?
How to do Laughter Yoga? Tutorial in Hindi

आइये, पहले यह विडियो देख लें:

आइये सीखें – हास्य योग कैसे करें? How to do Laughter Yoga? Tutorial in Hindi

(विडियो देखने के लिए कृपया उपरोक्त लिंक पर क्लिक करें)

हास्य-योग करने की शुद्ध विधि इस विडियो में सुन्दर व सरल ढंग से समझायी गयी है. इसे देखकर आप सही ढंग से हास्य-योग करना सीख सकते हैं और सिखा सकते हैं. हास्य-योग के चार चरणों को इस विडियो में समझाया गया है. ये चार चरण हैं:

१. ताली बजाना
२. गहरी सांस
३. बच्चों की तरह मस्ती
४. हास्य व्यायाम

This video explains in a simple and beautiful manner how to do Laughter Yoga in the correct manner. After watching this video, you can learn and teach the four basic steps of Laughter Yoga.
The four steps of Laughter Yoga are:

1. Clapping and chanting
2. Deep breathing
3. Child like playfulness
4. Laughter Exercises

हास्य-योग बिना किसी कारण हंसी और प्राणायाम का मिश्रण है. कोई भी बिना चुटकुलों के, यहाँ सिर्फ हास्य व्यायामों के माध्यम से देर तक लगातार हंस सकते हैं. बच्चों की तरह मस्ती और नज़रें मिलने से हंसी वास्तविक हंसी में परिवर्तित हो जाती है और एक-दूसरे की देखा-देखी सब खुलकर हंसने लगते हैं.

Laughter Yoga is a unique concept of prolonged voluntary laughter created by an Indian physician Dr Madan Kataria in the year 1995 in Mumbai. We begin laughter as an exercise and it soon becomes contagious by eye contact and childlike playfulness.

हास्य-योग के इस ट्रेनिंग सत्र का सञ्चालन कर रही हैं श्रीमती राधिका बिष्ट, लाफ्टर एम्बेसडर व लाफ्टर योग मास्टर ट्रेनर. वे लाइफ स्किल्स – जीवन कौशल – की संस्थापक हैं.

This video is excerpted from 2-day Certified Laughter Yoga Leader training conducted in Indore on the 10th and 11th of July 2015 by Radhika Bisht and Jagat Singh Bisht, Certified Laughter Yoga Master Trainers and assisted by Sai Kumar Mudaliar, Certified Laughter Yoga Teacher.

 

Jagat Singh Bisht  and Smt. Radhika Bisht 

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – चतुर्थ अध्याय (2) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्थ अध्याय

( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय )

 

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।2।।

 

इस प्रकार से परंपरागत इसे राजर्षियों ने जाना

किंतु काल क्रम में विनष्ट हो,नही रह सका पहचाना।।2।।

 

भावार्थ :  हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया।।2।।

 

This, handed down thus in regular succession, the royal sages knew. This Yoga, by a long lapse of time, has been lost here, O Parantapa (burner of foes)! ।।2।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

 

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