(अग्रज एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं। आज के साप्ताहिक स्तम्भ “तन्मय साहित्य ” में प्रस्तुत है एक ऐसी ही लघुकथा “सुहाग की चूड़ी…… ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – #3 ☆
☆ सुहाग की चूड़ी…… ☆
हमेशा की तरह आज भी गुलशेर अहमद चूड़ियां लेकर फेरी पर निकला था। पिछले 15-20 वर्षों से हफ्ते-दस दिनों के अंतर से आसपास के सभी गांवों में उसके चक्कर लगते रहते हैं। हर एक गाँव में उसने कुछ ठीये बना रखे हैं, जहाँ से चूड़ी बेचने की उसकी अटपटी कलात्मक आवाज सुन मुहल्ले की सभी महिलाएं जुट जाती है।
बेटी-बहू से ले कर बूढ़ी तक सभी गुलशेर मियाँ को ‘गुलशेर भाई’ के नाम से संबोधित करती हैं।
प्रायः होटल से खाना खाने के बाद मुफ्त की मुट्ठी भर सौंफ-मिश्री व 2-4 दांत खुरचनी तथा किलो-पाव किलो सब्जी की खरीदी के बाद मुफ्त की मिर्ची-धनिया लेने की परिपाटी जैसे ही यहां भी भाव-ताव की झिकझिक के साथ निर्धारित चूड़ियाँ पहनने के बाद सुहाग के नाम पर फोकट की एक चूड़ी की मांग इन महिलाओं की सदा से बनी रहती है।
आज गुलशेर मियाँ के द्वारा किसी को भी सुहाग की अतिरिक्त चूड़ी नहीं मिलने से नाराज वे सब शिकायत करने लगी-
क्या गुलशेर भाई – हमेशा तो आप एक चूड़ी अपनी ओर से देते हो फिर आज क्यों नहीं….
मेरी बहनों! बूढ़ा हो रहा हूँ, अब पहले जैसी भागदौड़ नहीं हो पाती मुझसे, यूँ ही एक-एक कर दिन भर में सौ-डेढ़ सौ चूड़ियां ऐसे ही निकल जाती है, ऊपर से कांपते हाथों से ज्यादा टूट-फुट हो जाती है सो अलग। फिर मैं आप बहन बेटियों से ज्यादा मुनाफा भी तो नहीं लेता हूँ, अब आप ही बताएं ऐसे में मेरी गृहस्थी कैसे चलेगी?
पर भैया सुहाग की एक चूड़ी तो सब जगह देते हैं!
सच बात तो ये है मेरी बेन – वो सुहाग की नहीं भीख की चूड़ी होती है।
भीख की चूड़ी! ये क्या कह रहे हो गुलशेर भाई आप?
अच्छा ये बताओ मुझे क्या, आपके सुहाग की कोई कीमत नहीं है जो उनके नाम से मुफ्त की एक चूड़ी की मांग करते रहते हैं आप सब। फिर ये जो चूड़ियां पहनी है आपने, क्या ये आपके सुहाग की चूड़ियां नहीं है? मुफ्त की एक चूड़ी के बिना क्या आप सुहागिन नहीं समझी जाएंगी? और मांग कर फोकट में बेमन से मिली चूड़ी।
(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ “कवितेच्या प्रदेशात” में उनकी एक बाल कविता “सार्थक आणि लक्ष्य”। हिन्दी में एक कहावत है “मूलधन से ब्याज प्रिय होता है “। सभी दादा दादी/नाना नानी को अपने नाती पोते सर्वप्रिय होते हैं। मैं क्या आप सभी सुश्री प्रभा जी के कथन से सहमत होंगे ।
“नातवंडे प्रत्येक आजी आजोबांना खुप प्रिय असतात, त्यांच्या बाललीला पहाणं हे एक *आनंद पर्व* असतं ,एका लग्न समारंभात माझ्या नातवाकडे पाहून एक महिला मला म्हणाली, “तुमचा नातू गोड आहे” यावर पाच वर्षाचा माझा नातू पटकन म्हणाला होता, “सगळे नातू गोडच असतात”. याच माझ्या नातवाच्या -सार्थक च्या मैत्रीची एक कविता….” – प्रभा सोनवणे
अब आप प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी का साप्ताहिक स्तम्भ – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते हैं । )
Generally, it is believed that the Buddha was a pessimist who preached misery. Nothing can be farther from the truth.
Buddha had great compassion for all beings. He saw their misery, felt deep empathy, explored the causes, and discovered a way out.
Not only that. He gave us a valuable guide for deep and lasting happiness.
The building blocks of an authentically happy life are outlined in the Discourse on Blessings – Maha-mangala Sutta – thus:
• Not to associate with the foolish, but to associate with the wise; and to honor those who are worthy of honor
• To reside in a suitable locality, to have done meritorious actions in the past and to set oneself in the right course
• To have much learning, to be skillful in handicraft, well-trained in discipline, and to be of good speech
• To support mother and father, to cherish wife and children, and to be engaged in peaceful occupation
• To be generous in giving, to be righteous in conduct, to help one’s relatives, and to be blameless in action
• To loathe more evil and abstain from it, to refrain from intoxicants, and to be steadfast in virtue
• To be respectful, humble, contented and grateful; and to listen to the Dhamma on due occasions
• To be patient and obedient, to associate with monks and to have religious discussions on due occasions
• Self-restraint, a holy and chaste life, the perception of the Noble Truths and the realisation of Nibbana
• A mind unruffled by the vagaries of fortune, from sorrow freed, from defilements cleansed, from fear liberated
These are the greatest Blessings.
Buddha closes the discourse with the words, “Those who thus abide, ever remain invincible, in happiness established. These are the greatest blessings.”
There is no doubt whatsoever that the Buddha is the Ultimate Happiness Guru!
( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा )
( काम के निरोध का विषय )
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।38।।
अग्नि धुयें से मल से दर्पण, गर्भ श्र्लेष्म संवेष्ठित ज्यों
मनो विकारों के जालों में ज्ञान,पार्थ! आच्छादित त्यों।।38।।
भावार्थ : जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है।।38।।
As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust, and as an embryo by the amnion, so is this enveloped by that. ।।38।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक भावुक एवं मार्मिक लघुकथा “गटागट गोली ”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 4 ☆
☆ गटागट गोली’☆
बड़े-बड़े मकानों के बीच एक झोपडी नुमा घर। घर में सभी चीजों का अभाव। विधवा माँ अपने दो बच्चों के साथ रहती थीं। गरीबी की लाचारी के कारण पहले ही बुढ़ापे ने घर कर लिया था। पर बच्चों के कारण जी रहीं थीं। दोनों बच्चियों को लेकर जाये कहाँ? कैसे भी काम करके किसी का सामान उठा, किसी की मालिश और किसी के बर्तन माँज कर गुजारा कर रही थीं।
सभी की नजर उसके झोपड़ी घर पर ही थी कि कब इसे लेकर आलीशान मकान बना ले। पर वो बेचारी बच्चों का मुँह देखकर अपना जीवन यापन कर रहीं थीं। बारिश आते ही गली, सड़क और घर एक जैसा हो जाता था। सारी नालियों का गंदा पानी उसके घर समा जाता था।
माँ के काम पर जाने के बाद बच्चे आसपास ही खेलते रहते थे। गिर जाते, चोट लग जाती, पेट दुखता या फिर बुखार। सब की एक ही दवाई पास वाले परचून के दुकान वाले अंकल जी की मीठी दवाई। उससे उनका विश्वास था या यूँ कहें कि दवाई का भ्रम बना गया था। और सहन शक्ति ज्यादा हो गई थी कुछ भी दर्द सहने की।
एक दिन बहुत जोरों की आधी तुफान आया उन्हें पता नहीं था मां कितने बजे वापस आयेगी। शाम ढले मां वापस आई। बदन बुखार से तप रहा था और सारा शरीर भीगा हुआ। जैसे तैसे कर सब आधे सुखे आधे गीले पर सो लिए।
सुबह बच्चे तो उठे पर मां सोती ही रही। बहुत देर उठाने के बाद भी जब मां नहीं उठी। तो बच्चे जाकर अंकल जी से बोले—अंकल जी मां कुछ बोल नहीं रही है। आप मीठी वाली दवाई दे दो खाकर उठ जायेगी। परचून वाले अंकल जी समझ गये। मामला कुछ गड़बड़ है। घर जाकर देखने पर पता चला मां तो सदा के लिए इस दुनिया से जा चुकी हैं। सभी पड़ोस के एकत्रित हुए अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। अनाथ आश्रम वाले आकर दोनों बच्चियों को साथ ले गए। वहां पर सभी बच्चों ने सवाल किया? उत्तर में वे इतना ही बताती। मां ने न मीठी गोली नहीं खाई इसलिये भगवान के घर चली गई। खा लेती तो इस दूनिया से नहीं जाती।
दूकान वाले अंकल जी की मीठी दवाई और कुछ नहीं एक *गटागट की मीठी गोली * होती थीं। ???????
(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना एक काव्य संसार है । साप्ताहिक स्तम्भ अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है एक कवि के हृदय में काव्य सृजन की प्रक्रिया को उजागर करती उनकी कविता “शस्त्रक्रिया”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 4 ☆
Some time back, we were invited by Nestle to conduct a Laughter Yoga session during their Zone Asia-Oceania-Africa Safety, Health and Environmental Sustainability Workshop at Goa Marriott Resort & Spa, India.
The audience included the Executive Vice President from Nestle headquarters at Vevey, Switzerland and Market Corporate Safety Managers from 20 countries including Australia, China, Egypt, India, Indonesia, Japan, Malaysia, Philippines, Singapore and Turkey, along with factory safety heads from Bangladesh, India and Sri Lanka.
The session disguised as wellness break was a well kept secret till the last minute. It took just a couple of minutes for the vibrant group to cultivate childlike playfulness. They were almost ecstatic as they did Greeting Laughter, Milkshake Laughter, Cell Phone Laughter, Hearty Laughter, Lion Laughter and Calcutta Laughter.
The entire environment was transformed within a few minutes and there was a paradigm shift in the group dynamics after the session as jubilant chants of ‘Very Good Very Good Yay’ continued to echo in the following days till the workshop was over and the delegates were seen off at the airport.
The response strengthened our belief that the whole world is a large extended family which may be easily united through love and laughter.
Sweet memories of the session still linger on in our minds.
( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा )
( काम के निरोध का विषय )
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्।।37।।
भगवान ने कहा-
काम और ये क्रोध,मनुज के कर्मो के दुष्प्रेरक है
अति बुभुक्षु ओै” पापी हैं ये बडे शत्रु संप्रेषक है।।37।।
भावार्थ : श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान।।37।।
It is desire, it is anger born of the quality of Rajas, all-sinful and all-devouring; know this as the foe here (in this world). ।।37।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
(डॉ उमेश चंद्र शुक्ल जी की यह लघुकथा वैसे तो पितृ दिवस पर ही प्रकाशित होनी थी किन्तु, मुझे लगा कि इस कथा का विशेष दिन तो कोई भी हो सकता है। जीवन के कटु सत्य को प्रस्तुत करने के लिए डॉ उमेश जी की लेखनी को नमन।)
☆ लाठी ☆
(एक अविस्मरणीय लघुकथा)
मैं पढ़-लिखकर नौकरी करने लगा । माँ-पिताजी ने अपना लंबा अमावस्यायी उपवास तोड़ा । उनके चेहरे पर झुर्रियों की इबारत एकाएक धूमिल पड़ गई ।
मेरी शादी कर दी गई । उन्हें प्यारी-सी बहू मिल गई । मुझे पत्नी मिल गयी । साल भर के बाद ही वे दादा-दादी बन गये । उन्हें बचपन मिल गया, लेकिन तभी दूर शहर में मेरा स्थानांतरण हो गया । मैं कछुआ हो गया।
कभी-कदा पत्रों की जुबान सुनता था कि धुंध पड़ी इबारत पर मौसम, आयु प्रभाव डाल रही है और लिखावट गहराती जा रही है । अब उन्हें राह चलते गड्ढे नज़र आने लगे हैं । उन्हें अब जीने का चाव भी नहीं रहा, यह बात नहीं थी, पर अक्सर वे कहते – ” बहुत जी लिए ।”
मेरे अपने परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी बढ़ती गई । फिर भी मैंने उन्हें एक दिन पत्र लिखा- “बच्चों की फ़ीस, ड्रेस, टैक्सी, बस घर का किराया, महँगी किताबें-कापी के बाद रोज़ के ख़र्चे ही वेतन खा जाते हैं, कुछ बचता ही नहीं । अब बताइये, आपको क्या दूँ ?”
माँ-पिताजी ने जवाब में आशीर्वाद लिखा । फिर लिखा – बुढ़ापे का सहारा एक लाठी चाहिए । ख़रीद सकोगे ? दे सकोगे ?”