हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१८ ☆ सरस्वती वंदना ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपके द्वारा रचित – सरस्वती वंदना )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१८ – साहित्य निकुंज ☆

🙏 सरस्वती वंदना 🙏 डॉ भावना शुक्ल ☆

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

तेरे चरणों में मैया मेरा माथा होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

श्वेत कमल पर तू राजे

कर में वीणा धार।

मधुर-मधुर स्वर निकले

प्यारी – सी झंकार।

मन मंदिर में आना होगा।

माँ सरस्वती तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

नाद से तेरे गूंजे जग सारा

चारों दिशी  फैले उजियारा।

ज्ञान सुधा का अमृत बरसता

जीवन रस  बरसाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

 तेरी कृपा से मिलता  ज्ञान।

मन में सुमंगल गाते गान।

चरणों में तेरे शीश झुकाता।

भक्ति भाव का पुष्प चढ़ाता  ।

हर हृदय में प्रकाश फैलाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९० – नवगीत – जीवन को वसंत करो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन को वसंत करो

? रचना संसार # ९० – गीत – जीवन को वसंत करो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

पतझड़ से इस जीवन को तुम,

आकर कंत वसंत करो।

नीरस ,नीरव संप्रेषण को,

गुप्त ,निराला ,पंत करो।।

*

शब्द -शब्द  माणिक कर  दो तुम,

भरो प्रेम की गागर तुम।

गुंजित सारा जग हो जाए,

वंशी तुम नटनागर तुम।।

भाव  सुपावन गंगाजल कर,

लेखन को जीवंत करो।

*

श्वेता की वीणा बजती हो,

सात सुरों की सरगम हो।

अलंकार रस छंद  निराले,

नवल सृजन का उद्गम हो,

नव रस की रसधारा में तुम,

पीडाओं का अंत करो।

*

निष्ठाओं की डोर पकड़कर ,

तन -मन अर्पण करना है।

दिनकर -सा उजियारा करने ,

सार्थक चिंतन  करना है।।

जग -कल्याण भावना रखकर,

मन को सज्जन संत करो ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #३०० ☆ गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०० ☆

गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया☆ श्री संतोष नेमा ☆

इत पकड़त वो उत झट धावें, हाथ बढ़ावें मैया

दधि-माखन की मटकी फोड़ें, खाबें खूब मलैया

*

प्रेम -जाल सखियों पै फेंके, बाँके बंशी बजैया

बालापन बहु असुर संहारे, हर्षित यशुमति मैया

*

भू मंडल मुँह खोल दिखाया, चकित भई तब मैया

बाल रूप “संतोष” सुहावे, चाहे प्रभु की छैयां

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २० – कविता – अभी बाकी है… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता अभी बाकी है।)

☆ शशि साहित्य # २० ☆

? कविता – अभी बाकी है…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बहुत लुटाया है…

उससे ज्यादा बाकी है..

 

थाम कर हाथ चल दूं, खुद का,

राह अभी वह बाकी है..

 

आईने में देख खुद को,

मुस्कुरा सकूं,

सम्मान अभी वह बाकी है..

 

आसमान दामन में भर लूं,

अरमान अभी वह बाकी है..

 

जरा तौल लूं पंखों को,

उड़ान अभी तो बाकी है..

 

आवाज सुनकर थम जाऊं..

पुकार में अब क्या बाकी है????

 

भोर का सूरज चमक उठा,

ना अब अंधियारा बाकी है..

 

मन उम्मीदों से भरा हुआ है,

“उसको”  गुहार  सुनना पड़ेगी,

प्रार्थना दिल से जारी है..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इशारा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  इशारा।)

? कविता – इशारा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(महाश्रृंगार छंद)

?

जिंदगी बदले रंग हजार,

तभी तो पाना मुश्किल पार l

इशारा देती है हर बार,

भटकते रहते हैं लाचार ll

नजर को पढना मुश्किल यार,

सत्य ही है सबका आधार l

झूठ तो कर्ता है लाचार,

सोच लो क्या होगा उपचार ll

*

इशारा करना अब तो छोड़,

सामने आकर मन से बोल l

हृदय की धड़कन कहती देख, प

कड़ कर मुझको आँखें खोल ll

प्रेम के देखो लाखों रंग,

तभी तो होती रहती जंग l

इसे जो समझे जाता हार,

निराले होते उसके ढंग ll

*

इशारा कर्ता है जब ईश,

नहीं देता है मानव ध्यान l

बाद में रोता प्रभु को कोस,

मिले जब कर्मो से अपमान ll

करो तुम सरल शील व्यवहार,

तभी होती है जस जयकार l

बने हम प्रकृति का आधार,

दिए हो यह अनुपम उपहार ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९० – विचारगाथा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९० – विजय साहित्य ?

☆ विचारगाथा…!

माणूस नाही,धर्मा करीता

धर्म पाहिजे, माणूसकीचा

गेले सांगून‌‌, बाबासाहेब

मार्ग दावीला, विश्व शांतीचा.

*

मानव मूल्ये, हवी एकता

भाव असावा,‌ विश्व‌बंधुता

संघर्ष न्यारा, मार्ग अनोखा

नको कुणाच्या,‌मनी कटूता.

*

शिका लढा नी, संघटीत व्हा 

शिका लोकहो, सुशिक्षीत व्हा

करा स्वतःला, पदवीधर

दिली प्रेरणा, संरक्षीत व्हा.

*

शिक्षण आहे, वाघीण माया

जाईल कैसे, पोषण वाया

हक्क माणसा, मिळवायाला

स्वावलंबनी, झिजवा काया.

*

लोकशाहीची, तंत्र प्रणाली

कसे जगावे, तत्व कळाली

जबाबदारी, कर्तव्ये‌ सारी

मानवतेच्या, पदी वळाली.

*

आत्म बलाने, वावरणारी

सक्षम व्हावी समाज नारी

माया ममता, शांती करूणा

बुद्धिनिष्ठता, जगता भारी.

*

नको कुणाची, साहू गुलामी

संविधान‌ ही, घटना नामी

वैज्ञानिकता, ध्येय ठेवूनी

रहा सुखाच्या, सदैव धामी.

*

महामानवी, विचार गाथा

आठवताना, झुकतो माथा

शब्द बोलती, भीमरायाचे

नका खाऊरे,‌ जुलमी लाथा.

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ नित्य युद्धाचा प्रसंग… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ नित्य युद्धाचा प्रसंग… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

छातीवरती तीर, मी

सहज झेलले होते.

प्रत्यंचा होउन धनुष्याची

ताण पेलले होते.

मी असा अद्भुत योद्धा

हरुन विजयी झालो.

युयुत्सु नसलो तरीही

युद्धास प्रत्ययी आलो.

नि:शस्त्र निहत्ता वीर

मी अहिंसेने लढलो.

झेलताझेलता वार

वीरगतीस प्राप्त झालो.

आम्हास नित्य युद्धाचा प्रसंग

उक्तीस शरण मी गेलो.

लढतालढता स्वत:शी

मग धारातिर्थी पडलो.

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # अखेरचा हा तुम्हा दंडवत… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # अखेरचा हा तुम्हा दंडवत… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

बघून घे रे एकदा आम्हाला आणि सांगशिल इतरांनाही बघून घ्या म्हणावं आता आजच्या घडीला आम्हाला… उद्याचा काहीही भरवंसा देता येत नाही गड्यानों… कित्येक वर्षांपासून आमची मुळंपाळं या भूमीच्या गर्भात खोल खोल रूतून भक्कमपणे रूजली गेल्यामुळे ही डेरेदार वृक्षराजी आपल्या थंडगार सावलीची शाल या आजूबाजूच्या परिसरावर पसरून बसली होती… पावसाचं पाणी नि जमिनीतली पोषणमुल्ये यावरच कोवळ्या अंकुरापासून जी जीवनाची वाटचाल सुरू केली म्हणतोस ते आजतागायत परिपक्वतेचा वटवृक्षाचा पार होईपर्यंत… सारं काही निमुटपणाने, अबोलपणाने, अचल राहून साक्षीत्वाने वर्तमान जगत नि जागता राहीलो… माझ्या अपेक्षाचं ओझं मी माझ्याच खांद्यावर वावगत राहीलो पण त्याच वेळी तुमच्या माझ्याकडून असणाऱ्या अपेक्षांना मात्र भरभरून फळ देत गेलो… हीच काय ती माझी निरपेक्ष नि :स्वार्थ सेवा मी म्हणजे आम्ही तुमची करत आलो… प्रतिकूल उन्हाळ्याच्या संघर्षाचे चटक्यांनी जेव्हा तुमचे तन नि मन भाजून निघायचे तेव्हा त्या तापलेल्या देहाला नि मनाला माझ्या सावलीत थंडावा लाभायचा… गार वाऱ्याची झुळूक ताजतवानं करून जाताना पुन्हा जोष भरायची… आणि पुढे तुमची वाटचाल सुरू व्हायची… तप्त झालेली ती अवतीभवतीची जमिन देखील माझ्या सहवासात असल्याने समाधानी आनंदी राहयची.. मला तेव्हढाच तीचे अल्पांशाने का होईना पण ऋण फेडल्याचा हलकेपणा वाटून जाई… पण ते ऋण कधीही न फिटणारे आहे याची मला पूर्ण कल्पना असायची… कर्तव्यपूर्तीचं समाधान लाभत असे अश्यावेळी… जीवन रहाटचक्रानूसार आमच्यातला कुणी वयोमानानुसार वाळून जरठ होत असे तेव्हा वठलेल्या खोडाला मग वाळीत टाकलेला एकाकीपणा जाणवत जाई… तर कधी निर्सगालाच दया येऊन तो मुळासकट मग उन्मळून टाकी… तेव्हा क्षणाचं वाईट तर वाटायचं पण त्यावेळी असही वाटायचं आपल्याच सावलीच्या पदराखाली वाढीस लागणारी ती लहान मोठी झाडं यांच्या पुढच्या प्रगतीसाठी, विकासासाठी आपण जागा करून द्यायची नाही तर मग कुणी… आणि त्या नवोदितांना स्व:ताच्या बळावर कधी फुलावे, बहरावे.. परावलंबित्व असण्यापेक्षा स्वाल़ंबी असणे अधिक गरजेचे नाही का.. असा सर्वहिताचा विचार करून आपली जागा मागच्यांना रिकामी करून देऊ लागलो… पण कर्तव्यात एव्हढी म्हणून कसर सोडली नाही.. ते तहहयात निभावत गेलो… कालानुरूप सगळ्या जगाचा चेहरामोहरा बदलत गेला… तुम्ही निरकुंश सत्ता सगळ्यावर चालवत गेलात तरीही आमच्या शिवाय तुमचं जगणं शक्य नव्हतचं… या गोड भ्रमात आम्ही गाफि़ल राहिलो आणि आणि तिथेच पहिली कुर्हाड आमच्या मुळावर तुम्ही घातलीत… का तर सुखाच्या समृद्धीचा राजमार्ग निर्वेध करण्यासाठी आमची कत्तल करण्याशिवाय तुमच्यापुढे दूसरा पर्याय नव्हता… अगदी निष्ठूरपणे नि असहिष्णुतेने आमचा गळा घोटलात… पण खरं सांगू तुम्ही आम्हाला नव्हे तर तुम्ही स्वतःलाच उध्वस्त करत गेलात… जंगल, रान झाडे झुडपे नाहीशी केलीत आणि उघडा बोडका कातळ वांझ माळरान निर्माण केलात… मैलोगणती अंतर टप्यात आले खरे पण तुमच्या हृदयातील ममतेचे अंतर मात्र दूरावत गेले… उद्या आम्हाला इथून गच्छंती करण्यात येणार आहे.. तेव्हा पुन्हा काही आम्ही असे तुमच्या कुणाच्याही दृष्टीला पडणार नाही… इतकचं काय तुमच्या भावी पिढ्यांच्या स्वप्नातही आम्ही दिसणार नाही… तेव्हा बघून घे रे एकदा आम्हाला आणि सांगशिल इतरांनाही बघून घ्या म्हणावं आता आजच्या घडीला आम्हाला… उद्याचा काहीही भरवंसा देता येत नाही गड्यानों…

अखेरचा हा तुम्हाला दंडवत.. सोडोनि जातो गाव…

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १६ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १६ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

 परमेश्वराशी संवाद

गाथेतील अभंगांचे वाचन करीत असताना पटकन लक्षात येणारी गोष्ट म्हणजे तुकाराम महाराज परमेश्वराशी अनेक वेळा अत्यंत जवळीकतेने आणि प्रेमादराने संवाद साधतात. आज आपण त्यांच्या अभंगांतून देवाशी घडलेला संवाद पाहूया.

अखंड नामस्मरण त्यांनी अंगीकारले आहेच. ते हरीला पुन्हा पुन्हा हेच सांगतात की

 हरी तुझे नाम गाईन अखंड/

 यावेळी पाखंड नेणे काही//

 अंतरी विश्वास अखंड नामाचा/

 काया मने वाचा हेची देही//

 तुका म्हणे आता देई संत संग/

 तुझे नामी रंग भरो मना//

हे देवा, माझ्या मुखात तुझेच नाव अखंड रहावे या व्यतिरिक्त मी दुसरी कोणतीच गोष्ट जाणत नाही. तुझ्या नामावरचा माझा विश्वास कायम रहावा, आणि काया, वाचा, मने करून माझ्या ओठी तुझ्या नावाशिवाय दुसरे काहीच नको. ईश्वरा जवळ ते संतांच्या संगतीची याचना करतात कारण संत हे ईश्वराचे रूप आहे.

प्रपंचात अडकलेल्या तुकाराम महाराजांची अवस्था दोलायमान झालेली आहे. ना धड प्रपंच ना परमार्थ अशा स्थितीत ते हरीलाच साद घालतात. त्याला सांगतात, हे मुरारी, माझे चित्त धनामध्ये गुंतले आहे, आणि ते मला दारोदार हिंडवीत आहे. हे मनाचे असे भरकटणे थांबतच नाही. पृथ्वीवर भटकू- नही समाधान काही मिळत नाही.

 धना गुंतले चित्त माझे मुरारी/

 मन घेऊन हिंडवी दारोदारी//

 मन हिंडता न पुरे यासी काही/

 ७मही ठेंगणी परि ते तृप्त नाही//

पुढे ते देवाला सांगतात की त्यांची बुद्धी सुद्धा शांत दिसत नाही, कारण इंद्रिय विषयांच्या भोवऱ्यात ते सापडले आहेत. या अशा भरकटलेल्या चित्तामुळे माझ्या जिवाला शांती नाही. तेव्हा या दुष्ट आणि खोड्याळ मनापासून हे परमेश्वरा तू मला वेगळे कर.

 पाहता न दिसे मज शुद्ध मती/

 पुढे पडीलो इंद्रिया थोर घाती//

 जीवा नास त्या संगती दंडबेडी/

 हरी शीघ्र या दृष्ट संघाशी तोडी//

षड्रिपुंची तुकाराम महाराजांना फार भीती वाटते. ते देवाला विनवतात,

 मोह पापिणी दुष्ट माया ममता/

 काम क्रोध ही यातना थोर करी//

 तुजवाचुनी सोडवी कोण हरी//

ही सर्व माया, ममता, मोह म्हणजे एखाद्या दुष्ट पापिणीसारखे आहेत. काम, क्रोध यामुळे मनाला फार यातना सहन कराव्या लागतात, त्यामुळे हे हरी तुझ्यापासून मी दूर जातो. ते पुढे देवाला सांगतात, निद्रा, दंभ, आळस, याची त्यांना भीती वाटते. म्हणून देवा या दुर्गुणांना माझ्या देहात थारा नसावा. मला फक्त तुझ्या एकट्याचीच हाव आहे.

 निज देखता निज हे दुरी जाये/

 निजा आळस दंभ या भीत आहे//

 तया वस्ती नको देऊ देवा/

 तुज वाचुनी नास्ती आणिक देवा//

 

 करी घातपात भय लाज थोरी/

 असे सत्य व्हाव बहु भक्ती दूरी//

 नको मोकलू दीनबंधू अनाथा/

 तुका विनवी ठेवूनी पायी माथा//

या ठिकाणी महाराजांनी देवाला दीनबंधू म्हणून संबोधले आहे. मोठ्या भावाप्रमाणे हा हरी दीनांचे, पीडितांचे रक्षण करतो. महाराजांच्या काळातही घातपात लबाडी होतीच. तर त्यापासून ते म्हणतात हे दीनबंधू तू मज अनाथाला वाचव. संशय, संकोची वृत्ती हे अवगुण फार घातक आहेत तेव्हा मला तू यापासून दूर ठेव. तुझ्या पायांवर माझी एवढी विनंती आहे.

प्रपंचातील तुकाराम महाराज स्वतःला अनाथ म्हणत आहेत, कारण एका परमेश्वराशिवाय त्यांना आजूबाजूला दुसरे कोणी दिसतच नाही.

पांडुरंगाच्या दर्शनाची उत्कट आस हा तर गाथेचा गाभा आहे. पांडुरंगाला ते माऊलीच म्हणतात. याही अभंगात त्यांची ही माऊलीच्या भेटीची उत्कटता दिसून येते. आईची आणि तिच्या अपत्याची काही कारणांमुळे ताटातूट झाली तर ते बालक सैरभैर होऊन मोठ्याने रडायला लागते, तशीच तुकाराम बुवांची अवस्था या त्यांच्या अभंगातून झालेली आपल्याला दिसते.

 बोलोनिया दाऊ का तुम्ही नेणाजी देवा/

 ठेवाल ते ठेवा ठाई तैसा राहीन//

 पांगुळले मन काही नाठवे उपाय/

 म्हणून पाय जीवी धरुनी राहिलो//

 त्याग भोग दुःख काय सांगावे मांडावे/

 ऐसी धरियेली जीवे माझ्या थोर आशन का//

 तुका म्हणे माता बाळ चुकलीया वनी/

 न पवता जननी दुःख पावे विठ्ठले//

महाराज म्हणतात, ” हे देवा मला दर्शन द्या असे तुम्हाला वारंवार सांगण्याची आवश्यकता आहे का? तुम्हाला तर हे माहीतच आहे. तुम्ही मला जसे ठेवाल तसा मी राहीन. माझं मन अत्यंत दुर्बल झाल्यामुळे मी तुमच्या पायाशी आलो आहे, माझ्याकडे अन्य कोणताच उपाय नाही. मी कोणते भोग घ्यावे, कोणते दुःख सोसावे मला माहित नाही. रानामध्ये आई आणि मुलाची ताटातूट झाल्यासारखी माझी मनस्थिती झाली आहे.

विठ्ठलाच्या दारात जणू काही धरणे धरून बसल्यावर तुकाराम महाराजांना स्वतःतीलच दोष दिसतात आणि मग ते रागाने विठ्ठलाला म्हणतात,

 जळो माझे कर्म वाया केली कटकट/

 झाले तसे तंट नाही आले अनुभवा//

मी उगीचच तुमच्या दारात कटकट केली आग लागो माझ्या कर्माला. तुमची सत्कीर्ती मी जी ऐकली त्याचा मला अनुभव आला नाही.

 आता पुढे धीर काय देऊ या मना/

 ऐसे नारायणा प्रेरिले ते पाहिजे//

अहो नारायणा आता मी माझ्या मनाला कसा धीर देऊ ते तुम्हीच सांगा.

 गुणवंत केलो दोष जाणयासाठी/

 माझे माझे पोटी बळकट दूषण//

मला तुम्ही गुणवंत केलेत, पण मी परदोषच बघत बसलो. मी व माझे मानणे हा तर माझ्यातीलच दोष आहे.

 तुका म्हणे अहो केशीराजा दयाळा/

 बरवा हा लळा पाळीयेला शेवटी//

शेवटी महाराज म्हणतात, ” हे केशवा, दयाळा, तुम्ही माझे खूप लाड पुरवलेत, त्याची प्रचिती आली. माझे गुणदोष समजले, हे तुमचे माझ्यावर चांगले उपकार झाले. याचाच अर्थ जेव्हा महाराजांनी स्वतःच्या अंतरंगात डोकावून पाहिले तेव्हा त्यांना हे ज्ञान मिळाले.

असे देवाशी कधी भांडण, कधी रुसवा कधी गोडवा दर्शविणारे अनेक अभंग गाथेत सापडतात आणि त्यावरून तुकाराम आपल्याला समजतातच परंतु परमार्थाचीही. आपल्या सामान्यांना थोडी तरी ओळख होते.

पुढील भागात आणखी काही अभंगांचा आपण विचार करू.

क्रमशः… १६

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ शॉर्टकट… – भाग – ३ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ जीवनरंग ☆

☆ शॉर्टकट… – भाग – ३ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

(त्या दिवशी सामान घ्यायला मी स्टोअरमध्ये गेले तर हमीदा भेटली. कोणीतरी बोलायला भेटलं म्हणून बरं वाटलं.  ॓ठहरोना हमिदा. साथ जायेंगे.॔ असं म्हणत तिला थांबवून माझं सामान घेऊन झाल्यावर आम्ही बरोबर निघाले. थकल्यासारखी दिसणारी हमीदा पावले ओढीत सावकाश चालत होती. )

इथून पुढे – – 

 ॓क्यूं हमीदा, तबीयत ठीक नही है क्या? क्या हुआ? 

या माझ्या प्रश्नावर ती म्हणाली, क्या करनेका बहन? अपना नशीबही अच्छा नही. चाचाके मर्जीनुसार कभी उनके रूममे भी जाना पडता है. पैर दबाने के बहाने से बुला लेते है और…. क्या करूं? मेरे फॅमिलीको खाली मेरा पैसा चाहिये. मेरा पासपोर्ट वगैरा सब चाचाके पास ही है. यहा दो बरस पुरे होने के बाद मुझे दो महीने की छुट्टी मिलेगी. तब तक मै वापस नही जा सकती. अभी मैने एक तरकीब सोची है. जब जब चाचा पैर दबाने के लिए बुलाते है, तो मैं पहिले उनसे कुछ अच्छा गहना मॉ॑ग लेती और मेरे बॅग में रखती. सायरा बेगमको सब पता है. लेकिन वो कुछ नही कर सकती. मेरे मेहनत का पैसा तो मेरे घरवालेही खाते है. कम से कम कुछ सोना तो मेरे पास रहेगा. तिचं घर आल्यावर,  ॓फिर मिलेंगे.॔ खुदा हाफिज.॔ म्हणून ती निघून गेली.

 पण तिचं बोलणं ऐकून माझ्या डोक्यावर वीज पडल्यासारखं झालं. माझी अवस्था तिच्यापेक्षा फार वेगळी नव्हतीच !दिवसेंदिवस सुरेंद्रची मागणी वाढत चालली होती. त्यातच सुलेखा ताईला दिवस गेल्याचं कळलं. मी वरकरणी त्यांच्या आनंदात सहभागी असल्याचं नाटक केलं. पण एकदा सुलेखा ताईला फोनवर कुणाशी तरी बोलताना मी ऐकलं होतं की त्या होम सायन्सच्या डिप्लोमाची फी खूपच जास्त आहे. आता दोन वर्ष पूर्ण झाल्याशिवाय आपली इथून सुटका नाही हे मी मनोमन जाणलं होतं. बाळ.. बाळंतीणीचं करायचं सोडून मला कोण शिकायला पाठवेल? इतकी चांगली हक्काची मुलगी कामाला घरात असताना मला कोण एवढ्यात भारतात पाठवेल?॔ 

… आणि त्यादिवशी सुरेंद्रने ॓मोठी मागणी ॔ पुढे केली. मी सगळी काळजी घेईन. तुला काही त्रास होणार नाही असं आश्वासनही दिलं.॔ हे कधीतरी घडणारच होतं, म्हणून मीही सावध होते. मुंबईला मी रात्रीच्या ज्युनिअर कॉलेजला जात असताना माझ्याबरोबरच्या काही मैत्रिणी, त्यांनी काल कुठे कसा सेक्सचा अनुभव घेतला ते रंगवून सांगत असंत. अमक्या तमक्या त्या मोठ्या बकऱ्याकडून ठरल्यापेक्षा मी काय जास्त उकळलं, ड्रेस कॉस्मेटिक्स ज्वेलरी सेट कसं मिळवलं. याचं वर्णन करीत. मी त्यांच्या धैर्यापुढे अवाक् होई…. .॔ 

चित्रा पुन्हा रडू लागली. तिच्या पाठीवर हात फिरवत राजश्री तिला शांत राहायला सांगत होती. पण हे सगळे प्रकार ऐकून राजश्रीच एवढी हादरून गेली होती की आता तिच्याच पाठीवरून हात फिरवायला तिला सावरायला, तिचे डोळे पुसायला रमेश जवळ असता तर फार बरं झालं असतं असं तिला वाटत होतं. आणि एकीकडे हे सारं रामायण ऐकायला तो इथे नाही तेही चांगलं झालं असं वाटत होतं.

 काही मिनिटं अशीच शांततेत गेली. थोडं थांबून चित्रा म्हणाली दीदी,॓ कसं सांगू तुला? सुरेंद्रची मागणी मान्य करण्याआधी मी त्याच्यापुढे मुंबईतली महागाई, शिक्षणाचा खर्च, आमची घराची गरज असा सारा पाढा वाचला. त्यानं मला माझ्या मुंबईच्या बँक अकाउंटमध्ये पन्नास हजार रुपये जमा करण्याचं आश्वासन देऊन ते पूर्ण केलं. आणि मगच मी त्याच्या स्वाधीन झाले. मी कबूल करते की माझ्या हातून खूप मोठी चूक झाली. पुरुष सहवासाची आणि प्रत्येक वेळी बँकेत जमा होणाऱ्या पैशाची मला भुरळ पडली. पण मला आता तिथून, या साऱ्या मोहातून लवकर बाहेर पडायचं होतं. मी वेळेवर मुंबईला पोचले नाही तर इथलं शैक्षणिक वर्ष सुरू होईल. मला पुढच्या वर्षात ॲडमिशन मिळणार नाही हे मला माहीत होतं.

 दीदी, तुम्हा दोघांना माहितेय की मला पुढे शिकून कॉम्प्युटरचा एखादा कोर्स करून स्वतःच्या पायावर उभे राहायचंय.

 ॓… आणि माझं नशीब चांगलं म्हणून दुबईच्या त्या मोहमयी, सोनेरी दुनियेतून परतण्याचा ॓शॉर्टकट ॔ मला लवकरच सापडला. काही दिवसांपूर्वी सुलेखाताई,  ॓आज मी लवकर घरी येते. दोघी मिळून थोडे लाडू, शंकरपाळे करू.॔ असे सांगून शाळेत गेली. आणि अनपेक्षितपणे, सुखाला चटावलेला सुरेंद्र लवकर घरी आला. त्याला मी ॓आज ताई पण लवकर घरी येणार आहे.॔ असं अजिबात सांगितलं नाही. आणि माझ्या अपेक्षेप्रमाणे आमच्या प्रेमाचा सिलसिला सुरू असतानाच सुलेखाताई तिच्याकडची किल्ली लावून दार उघडून आत आली. सुरेंद्रला घाईनं माझ्या खोलीतून बाहेर पडताना पाहून आणि आमच्या चेहऱ्यावरून तिनं काय ते जाणलं.

 खरं म्हणजे गेल्या काही दिवसांपासून तिला आमचा संशय होताच. पण आज आम्ही रंगेहाथ पकडले गेलो होतो. त्या दोघांची खूप वादावादी झाली. मलाही खूप बोलणी खावी लागली. शक्य तितक्या लवकरचं तिकीट काढून माझी मुंबईला रवानगी करण्याचा निर्णय झाला. मी ताईकडून आठवणीनं माझ्या पासपोर्टबरोबर माझं बारावीचं आणि माझी इतर सर्टिफिकेट्स मागून घेतली आणि मगच माझी बॅग भरायला घेतली. दीदी, मी तुम्हा दोघांची क्षमा मागते. माझा अपराध तुम्ही समजून घ्याल ना?॔ 

 राजश्री काहीही बोलण्याच्या मनस्थितीतच नव्हती. आपण काय करायला गेलो आणि हे काय होऊन बसलं याबद्दल खंत करावी की आपण विश्वासानं दुसऱ्या देशात पाठवलेली दुसऱ्याची मुलगी सुखरूप घरी आली याबद्दल देवाचे आभार मानावे हेच तिला समजेना. डोळे पुसत, जिना उतरणाऱ्या चित्राकडे ती निःशब्द होऊन नुसती बघत उभी राहिली.

 मन मोकळं झाल्याने चित्राला आता जरा बरं वाटत होतं. राजश्रीताईकडून घरी येताना चित्राला दुबईतला आणखी एक प्रसंग आठवला…

… एकदा काही खरेदीसाठी ती सुलेखाताई आणि सुरेंद्र एका मॉलबाहेर भेटणार होते. त्या दिवशी सुरेंद्रनं आपल्याला घरी फोन करून ठरल्या वेळेपेक्षा एक तास लवकर तयार राहायला सांगितलं होतं. सुरेंद्रला आवडणारा सुंदर आकाशी रंगाचा ड्रेस घालून आपण तयार झालो. ड्रेसचं आणि आपलं सुरेंद्रनं अगदी ॓साग्रसंगीत  ॔कौतुक केलं. बाहेर पडल्यावर गाडी वेगळ्याच दिशेला निघालेली पाहून आपण सुरेंद्रला विचारलं ,॓आपल्याला ताईने तिकडच्या मॉलमध्ये बोलावलं आहे ना ?॔हो. पण त्याआधी एक सरप्राईज आहे बाईसाहेबांना. असं म्हणत सुरेंद्रने गाडी ॓गोल्डसूक ॔ जवळ उभी केली. मागे ताईंबरोबर खरेदीला गेलो होतो तेव्हा आपल्याला आवडला होता तसाच सोन्याचा सेट सुरेंद्रने आपल्यासाठी खरेदी केला. भारावून जाऊन तो सेट पर्समध्ये ठेवताना आपल्याला झालेला आनंद आपण लपवू शकलो नाही. गाडीत बसल्यावर सुरेंद्र म्हणाला,  ॓बाईसाहेब याची पुरेपूर वसुली मी करणार आहे बरं !॔आपण खोटं खोटं रागावून त्याला आणखीनच उत्तेजन दिलं होतं. मॉलमधली खरेदी आटोपून, घरी येऊन सारं आवरल्यावर रात्री आपण आपल्या खोलीचं दार लावलं. तो चमचमणारा सुंदर सेट घालून स्वतःला पुन्हा पुन्हा आरशात न्याहाळलं. मग एका जुन्या ड्रेसमध्ये तो सेट गुंडाळून अलगद बॅगेच्या तळाशी ठेवला.

… आत्ता दीदीला सगळं काही सांगताना ही गोष्ट आपल्याला आठवली नाही की हे सांगायचं आपण मुद्दामून टाळलं ?

समाप्त –

© सौ. पुष्पा चिंतामन जोशी

कोथरूड, पुणे

मो ९९८७१५१८९०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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