(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९३ ☆
☆ – सूरज नहीं दिया… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
कब्रगाहों में सुरक्षित रखा जा रहा है
एक जिन्दा और भरा-पूरा देश ।
शीऽऽशी, आहिस्ता बोलो,
शोर करोगे तो
कब्रिस्तान में मंडरा रहे गिद्ध
पहिन लेंगे बगुलों के वस्त्र
और देने लगेंगे
अजान…
हे भगवान !
शबनमी इलाके में
शोले चहलकदमी कर रहे हैं।
भेड़ियों की पदचापों से
गुलाबों के खेत-दर-खेत
उजड़ रहे हैं।
बारूद की गद्दीनशीनी पर
कर दिया गया है
अगरुगंध को निष्कासित,
और आँसुओं में डूबे दिल
हो रहे हैं
जड़ यंत्र द्वारा शासित ।
आखिर क्या है
इस मुश्किल का हल,
क्या कोई भी उपाय
नहीं हो सकता सफल ?
तो आओ,
हम सहयोगी बनें
और करें इस साजिश को विफल,
मगर, यह तब होगा
जबकि हिमालय
हिमालय रहे
न हो पाये ‘विन्ध्याचल‘।
☆
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अश्रु जल का विरल सा...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “अश्रु जल का विरल सा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
☆ कथा कहानी ☆ ताजपोशी☆ डॉ. हंसा दीप ☆
वह दिन उर्मि के लिए बहुत ही खास था।
सम्मान का दिन। पुरस्कृत होने का दिन। ताजपोशी का दिन।
पुरस्कार उसकी अपनी मेहनत का। पुरस्कार कलमकारी का। पुरस्कार उन अनगिनत पलों का, जिनमें डूबकर, रच-बस कर उसने लिखा था। उसे उस मंच पर जाना था, तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। मंत्रियों और अफसरों के बीच। जीवन के सुंदरतम पलों को ले कर आएगा वह एक दिन और हमेशा के लिए माथे पर ताज की तरह सजा रहेगा।
फोटो के लिए उचित परिधान का चयन, चेहरे की झुर्रियों को खींचने वाले फेशियल-ब्लीच, ऐसे तमाम सौंदर्य प्रसाधनों से गुजरते हुए, उन प्रतीक्षित पलों को जीना था।
उसके अपने जीवन की यह महत उपलब्धि थी। अपनी मेज से सार्वजनिक मंच तक की दूरी उसने तय कर ली थी। उन पंक्तियों के सहारे, जो एकांत में जन्मी थीं। मन और कलम दोनों का तालमेल बैठाते हुए, कई-कई बार वाक्यों को तोड़ा-मरोड़ा और फिर से जोड़ा था। कभी उनसे जी भर कर प्यार किया था, तो कभी उनसे संघर्ष किया था। वे सारी कचोटती अनुभूतियाँ, जिन्हें कागज पर उतारने के लिए उसे जीते जी मरना पड़ा था, और फिर उन्हीं में पुन: जीवित भी होना पड़ा था। फिर से जीना भी उन्हीं शब्दों की ताकत थी, जिनमें उसने अपना मन उकेर कर रख दिया था।
आज वही शब्द उसकी अपनी पहचान बन चुके थे। वाहवाही और गौरव के वाहक। उसके अपने रचे शब्दों का संसार, एक लंबा सफर तय करके जैसे अपनी मंजिल को पा गया था। साहित्य जगत का यह प्रतिष्ठाजनक सम्मान हर किसी को नहीं मिलता, उसे मिला। इस साहित्यिक अलंकरण की ताजपोशी से उसका कद और भी ऊँचाइयों तक पहुँचेगा।
मगर, उर्मि सामान्य नहीं थी। भीतर की खुशी गायब थी। चेहरे पर तनाव-सा था। इसका सबसे बड़ा कारण था- उसका हमेशा से ही भीड़ से कतराना। लोगों से कन्नी काट लेना। किसी भी सभा में जाकर बोलना उसे अच्छा नहीं लगता था। अंतर्मुखी तो वह शुरू से थी ही, पर ज्यादा प्रशंसा उसे और भी नर्वस कर देती थी। समझ में नहीं आता कि इसका जवाब कैसे दिया जाए! इसीलिए वह इस सम्मान समारोह में जाने से भी बचना चाहती थी। इससे बचने का खयाल तो आया था, पूरे वेग से आया था। ठीक वैसे ही, जैसे स्वयं को ‘कमजोरों’ की प्रवक्ता मानने वाली नोबेल पुरस्कृत एल्फ़्रिड येलेनिक भी तो खुद पुरस्कार लेने नहीं गई थीं। इसलिए नहीं गई थीं क्योंकि उन्हें भीड़भाड़ वाली जगहों से भय लगता था। उन्हें भीड़ का फ़ोबिया था। टीवी एवं मीडिया से भी दूर रहती थीं।
क्यों न, वह स्वयं भी ऐसा ही कुछ करे! खयाल अच्छा था। बहुत अच्छा था। दिल को सुकून देने वाला। घर वालों से इस बात का जिक्र किया, तो सबने उसके इस निराशात्मक रवैये के लिए जी भर कर लताड़ा। तंज पर तंज करते रहे- “दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा!”
“तुम्हारा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार नहीं है, न भी जाओगी तो किसी किताब में लिखा नहीं जाएगा।”
“बेहतर है कि जाकर ले लो। जिंदगी ऐसा मौका फिर न देगी।”
“बाद में पछताती रह जाओगी।”
“लोग तरसते हैं ऐसे पलों के लिए, और तुम भागना चाहती हो।”
जितनी तेजी से विचार आया था, उतनी ही तेजी से उसे बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सच तो कहा घर वालों ने- वह नोबेल था। लोग नोबेल विजेता को यूँ भी याद रखेंगे ही। कहाँ नोबेल और कहाँ उसका पुरस्कार! दोनों में जमीन आसमान का अंतर!
बेचारी उर्मि! मरती क्या न करती! जाने के अलावा कोई चारा न था।
वह रात कुछ ऐसी थी, जैसे कत्ल की रात हो। सारी तैयारियों के बावजूद करवटें बदलती रही। तनाव और घबराहट के कारण पेट में गुड़गुड़ाहट शुरू हो गई। सोचा, कुछ खा लिया जाए, तो शायद नींद आ जाए। देर से खाना और वह भी पेट भर कर खाना, उलटा पड़ गया। फैक्ट्री चालू हो गई, यानी लूज़ मोशन्स।
एक के बाद एक, लगातार दौरे, थमने का नाम ही नहीं लेते। वापस आकर लेटने की मोहलत भी नसीब नहीं होती और फिर वही वॉशरूम की ओर भागना। देखते-देखते रात ढलकर सुबह के चार बजा गई थी। पानी का एक घूँट भी जैसे शरीर ठुकरा देता। डायरिया, अपने चरम पर था। इस समय कहीं से भी, कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं थी।
अब उसके पास पानी पीना भी बंद कर देने के अलावा कोई उपाय नहीं था। फेशियल-मसाज से जो चेहरा खिला-खिला लग रहा था, अब वह पिचक गया था। लेकिन अब उसे इन सबकी चिंता नहीं थी। चिंता थी, तो सुबह दस बजे शुरू होने वाले कार्यक्रम में टिक कर बैठने की। ऐसा न हो कि बार-बार उठकर जाना पड़ जाए।
अब पेट में न अन्न था, न पानी। सब कुछ निकल चुका था और शरीर पस्त हो चुका था। खड़े रहने की हिम्मत पुरस्कार की ताकत से मिल रही थी।
आखिर वे पल आ ही गए। उसकी मेहनत की ताजपोशी पूरे सम्मान के साथ हुई। मंच का कार्यक्रम खत्म हुआ। तालियों की गूँज के बीच, फूलों के गुलदस्ते, शील्ड और शॉल थामे वह जैसे ही मंच से उतरी, कैमरों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक रिपोर्टर उसे घेरते चले गए। साक्षात्कार पर साक्षात्कार। हर बार वही सवाल, वही जवाब। उसका गला बैठ चुका था, पर वहाँ सारे माइक आगे बढ़ाने वाले थे। पानी देने वाला कोई नहीं था।
कैमरों की चमक का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। हालाँकि, गौर से सोचें तो इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए था। फिर भी, बार-बार दोहराए जाते सवालों के वही जवाब, न जाने क्यों उसे भीतर से विचलित कर रहे थे।
अतीत में घटी हर बात कैमरे के सामने सहजता से याद नहीं आ रही थी। ऊपर से कैमरों की तीखी लाइटें और पसीने से बचाने के लिए लगे पंखों की तेज हवा। बाल इस कदर शैतान हो गए थे, जैसे उन पर फुर्री उड़ा दी गई हो। जरा सी हवा लगते ही बालों ने अनुशासनहीनता की सारी हदें पार कर दी थीं।
इसके बाद फोटोग्राफर की भीड़ ने उसे घेर लिया। अपने-अपने लिए गए फोटो थमाने के लिए। हर किसी का दावा था कि उसी के पास सबसे अच्छे फोटो हैं। बस, पैसे देने होंगे। वह आखिरी पल तक सबसे पीछा छुड़ाकर इस कदर भागी कि कोई उसे देख न पाए। तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि बड़े स्टार, राजनैतिक हस्तियों का पत्रकारों पर गुस्सा करना कितना जायज होता है। अचानक कई सिनेमाई हस्तियों के चेहरे उसके सामने उभर आए। वही चेहरे, जो पीछे आते कैमरों को फटकारते हुए जल्दी से भीतर घुस जाते थे। आम जनता को लगता कि ये सेलिब्रिटी कितने अकड़ते हैं। किन्तु सचमुच, उनके जीवन का एक दिन जीना भी कितना मुश्किलों से भरा था।
एक ही दिन की सेलिब्रिटी जिंदगी में उसका अपना चैन कहीं खो गया था। एक दिन की ताजपोशी बहुत थी, जीवन में भी, यादों में भी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी। दूर, बहुत दूर। इतनी दूर कि फिर कभी ये कैमरे उसके पीछे न आएँ, उसे कैद करने की कोशिश न करें। उसके अनचाहे गुस्से को, चिढ़ को, घबराहट को, निराशा को और न बढ़ाएँ, क्योंकि लगातार भूखे रहने से आई कमजोरी ने उसका हाल बेहाल कर दिया था।
खैर, वह दिन भी निकल गया। घर वापसी हो गई। घर लौटते ही परिवार वालों के सवाल शुरू हो गए– “बहुत खुश हो?”
“बेहद उत्साहित हो?”
“राहत महसूस कर रही हो?”
वह हर सवाल पर बस हल्के से मुस्कुराती, और शांत स्वर में हर सवाल का एक ही जवाब देती रही, “मैं इस समय कुछ भी महसूस नहीं कर रही, सिर्फ एक खालीपन है।”
वह जल्द से जल्द उन पलों से उबरना चाहती थी। अचानक आए इस भावनात्मक उतार-चढ़ाव का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। आने वाले कई दिन उसे एक अजीब-सी स्थिति में डाल गए। ऐसा लगता था जैसे समय आगे तो बढ़ रहा था, किन्तु भीतर कहीं कुछ ठहर-सा गया था। कई दिनों तक एक अजीब-सी रिक्तता छायी रही। ऐसी, जहाँ न शब्द थे, न भाव। वह खुद से ही कट-सी गई थी।
सबसे ज्यादा चोट उसे तब लगी, जब बरसों पुराने मित्र भी पहले की तरह बात नहीं कर रहे थे। जैसे अचानक ही इस सम्मान ने रिश्तों की डोर को ढीला कर दिया हो। उनकी आवाज में अब वह अपनापन नहीं रहा था। उनके शब्दों में घुली दूरियाँ कानों को असहनीय हो रही थी। जो हँसी, ठहाके, बेफिक्र होकर आपस में साझा होते थे, अब औपचारिक मुस्कानों तक सीमित हो गए थे। मानो इस एक उपलब्धि ने अनजाने ही मित्रों के बीच दीवार खड़ी कर दी हो।
हैरानी इस बात की थी कि अब वह कलम की ओर देखती तक नहीं थी। ऐसा लगने लगा कि बहुत हो गया लेखन।
दिमाग कह उठता- “अब क्यों?”
दिल भी साथ देता, “अब क्या लिखना, और क्यों लिखना!”
धीरे-धीरे, दिनों की खामोशी हफ्तों में, महीनों में बदल गई। लोग, कैमरे, तालियाँ सब कुछ कहीं दूर खोते गए। फिर भी, उसके भीतर का सन्नाटा अडिग था, वज्र-सा अटल। जड़वत वहीं जमा रहा। वह अपनी सामान्य जिंदगी में लौटने को व्याकुल थी, अपनी मेज, कलम, शब्द और अपनी दुनिया की ओर। लौटने का रास्ता मिलने के बजाय और भटकाव की ओर धकेल रहा था।
बेचैनी भरी एक और रात किसी लंबे रतजगे-सी करवटों में कट गई। सुबह खिड़की से छनकर आती धूप चेहरे पर पड़ी, तो अनायास उठकर वह आईने के सामने जा खड़ी हुई। खुद को इतने गौर से देखा कि थका-हारा-सा प्रतिबिंब भी बोल उठे, राख में दबी धीमी चिंगारी की तरह। बगैर पलकें झपकाए, बेचैन आँखें कुछ खोज रही थीं, ऐसे जैसे उसे पाए बगैर उन्हें बंद होना मंजूर ही न हो।
खिड़की के बाहर फेंस के छोर पर, कचरे की सड़ी हुई परतों के बीच भी जीवन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी थी, प्रकृति, क्षय और पुनर्जन्म सब एक साथ उपस्थित थे। छोटे-छोटे नाजुक-से फूल काँपते हुए खिले थे, मानो सूरज की पहली छुअन के साथ ही अपनी पूरी उम्र जी लेना चाहते हों। एक बित्ता-सा हरा टमाटर पत्तों के बीच अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहा था। अभी वह बड़ा होगा, धीरे-धीरे लाल मुकुट पहनेगा, किसी की थाली में सजेगा, या फिर यहीं गिरकर दोबारा उगने की कोशिश करेगा। मिट्टी से उपजा, मिट्टी में बिखरा, ताकि समय फिर से गढ़ सके।
प्रकृति के सम्मान में अनायास ही पलकें भारी होकर झुक गईं। न कोई शोर, न कोई पदचाप, शायद उसी क्षण वह अपने भीतर लौटने लगी। कलम लिखने को आतुर थी- हर ताजपोशी का एक अंत होता है।
Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.
As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.
Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his Story – Running Shoes, Halting Breaths.
The room’s temperature was locked exactly at sixteen degrees Celsius. Neither sunlight nor fresh air ever breached this room; there was only a sterile white light that remained awake twenty-four hours a day, ensuring death would face no misunderstanding upon its arrival. On bed number four lay seventy-year-old Deenanath ji. Every three seconds, vapor would condense and then melt away on the oxygen mask strapped to his face. This was the solitary evidence of his being alive, observing which Sister Mary, the nurse sitting on the adjacent chair, was noting down entries in her diary.
It was exactly two o’clock in the morning. This is the hour when the silence in hospital corridors deepens to such an extent that even the sound of dripping glucose droplets mimics the ticking of a time bomb. Sister Mary checked her watch. She knew that Deenanath ji had only a few hours left. Dr. Anand had already clarified during his evening rounds that it was a case of multiple organ failure, and seeing the morning sun would be a miracle.
Suddenly, a slight movement flickered in Deenanath ji’s fingers. With immense effort, he slid his mask to one side. A strange anxiety trembled in his voice, “Mary… has… has he arrived?”
Mary took his freezing hand into her own and said with a reassuring smile, “Who, Deenanath ji? Yamraj (the God of Death)? Oh, his server is currently down; he doesn’t arrive this early.”
Mary’s sarcasm left a dry smile on Deenanath’s face. This was the unwritten rule of this hospice care unit—the final home for terminal patients—where pain was dried up using jokes rather than medicines. Deenanath ji had been here for the past two months. His lungs had given up, yet his eyes remained anchored to the door every single day. He was waiting for someone. It was a wait more petrified than the white walls of this room.
“Mary, my will… everything is fine, right? Will that man from the court arrive in the morning?” Deenanath asked, panting.
“Yes, Baba, everything is ready. Your lawyers have executed everything exactly as you instructed. Just hold onto your heart until morning,” Mary said, wiping the sweat from his forehead. Her tone carried a bitter irony—directed not at Deenanath’s immense wealth, but at the sheer helplessness that, despite possessing millions of rupees, was begging for a single breath.
Just then, the sound of footsteps echoed at the door. The heavy thud of boots. Mary was startled. Who could possibly visit at this hour of the night? The door slid open slowly. A tall young man dressed in a sharp suit stepped inside. His face exhibited a peculiar haste rather than exhaustion. He headed straight toward Deenanath’s bed.
The final flame of a dying lamp seemed to ignite in Deenanath’s eyes. He spoke with trembling lips, “Avinash… you have come, my son! I knew you would abandon your job and all your work in London to be with your old father in his final moments.”
Avinash glanced at the time on his expensive luxury watch and, without displaying a shred of emotion, addressed Mary directly, “Sister, where is the doctor? These are some urgent documents that require his signature. I have a flight back to London in the morning; I cannot afford to miss the board meeting. Is he conscious?”
The silence of the room grew sharper. Sister Mary measured Avinash from head to toe. The vulture hidden beneath the glitz of that expensive suit was starkly visible to her. Medical science may not have discovered a drug to make humans immortal, but it had certainly engineered a ventilator to keep such superficial relationships functional.
Mary took a deep breath and said, “Yes sir, your father is perfectly conscious. He has been holding onto his final breaths for the past two months just for this board meeting of yours. Even medical science is baffled as to how a man who cannot survive two minutes without oxygen managed to live for two months, purely out of attachment to his son.”
Avinash felt the sting of this sarcasm, but he lacked the spine to stand straight and face it. He immediately pulled legal documents from his bag and laid them before Deenanath, “Dad, please sign here. After this, you will be liberated from this pain. The doctors are saying there is no hope anyway.”
Deenanath held the pen with trembling hands. Tears flowing from his eyes fell upon the white sheets of the will, causing the ink to smudge slightly. Without reading a single word, gathering the absolute last remnants of his life’s energy, he signed the document. The moment the signatures were complete, Avinash snatched the papers, secured them in his file, and breathed a sigh of relief.
“Thank you, Dad. I must leave now. I’m running late for the airport. Sister, please take care of him,” Avinash said, stepping toward the door without looking back. He abstained from even touching his father’s cooling body, perhaps terrified that the contagion of death might jinx his multi-million dollar business deal.
“Avinash…” a muffled cry from Deenanath echoed through the room. But by then, Avinash had already crossed the corridor. Even his shadow had vanished.
The same ‘tick-tick’ sound returned to fill the room. Deenanath’s eyes were now fixed blankly on the ceiling. The green lines undulating across the monitor were gradually flattening out. The frequency of the beeps was slowing down.
Sister Mary quietly walked over to the bedside table and picked up an envelope. This was the envelope Deenanath had handed to her a week ago on the condition that it must only be opened when Avinash arrived.
“Deenanath ji, your son has left. Should I open this now?” Mary’s voice was heavy with emotion.
Deenanath simply lowered his eyelids very gently.
Mary opened the envelope. Inside lay another legal document, bearing the official seal of the Ministry of Health. As Mary read the text inscribed on that paper, her hands began to tremble. Her tears spilled over, dripping directly onto the document.
The paper stated that Deenanath ji had already transferred all his properties, factories, and bank balances three months ago to a trust for orphaned children. And the document that Avinash had just rushed away with after securing a signature was not a property will at all. It was a No Objection Certificate (NOC) by which Deenanath ji had authorized the donation of both his eyes, his liver, and his heart to the ailing children of that orphanage upon his death. For that NOC to be valid, the signature of Avinash as a legal heir and witness was mandatory—which he, in his blind haste, had appended without reading.
Beneath the document was a short line written in Deenanath’s own hand: “Son, you never gave me your time while I was alive, but because of this unwitting signature of yours, my death will grant life to someone else today. I have made the greatest transaction of my life… in exchange for your indifference, I have purchased breaths for some children.”
Mary lifted her gaze toward the bed. A straight green line had drawn itself across the monitor screen, and a long, continuous, unending ‘beep’ sliced through the silence of the room. Upon Deenanath ji’s face rested a smile so serene, sharp, and absolute—one that had permanently defeated the world’s most transactional relationship. Weeping, Mary drew the white sheet over his face, but even from beneath that shroud, the brilliant irony shone clearly—the final satire a dying father had delivered to this selfish world with his very last breath
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| अभंग ||“।)
अभी अभी # १०४३⇒ आलेख – || अभंग || श्री प्रदीप शर्मा
जो भजे हरि को सदा, वो ही परम पद पाएगा। हरि हजार हाथ वाला ही नहीं, हजार नाम वाला भी है। राम तेरे कितने नाम, विष्णु सहस्रनाम ! भक्त विभक्त भले ही नहीं होता हो, लेकिन अपने इष्ट के भक्ति भाव में अनुरक्त रहता है। वह जो भजता है, वह भजन हो जाता है।
भारत देश संतों की पावन भूमि है। संगत, संतन की कर ले। अयोध्या के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, या फिर मथुरा, गोकुल, वृन्दावन के श्याम, सूर, तुलसी, और मीरा ही नहीं, गुजरात के नरसिंह भगत और महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, और समर्थ रामदास ने भी अपने भजनों से जन मानस को भक्ति रस में आंदोलित और आनंदित किया।।
कृष्ण भक्ति के कई आयाम हैं। वे ठाकुर जी भी हैं और मथुराधीश और द्वारकाधीश भी। वे ही राधाकृष्ण हैं और वे ही नाथद्वारा के श्रीनाथ जी भी। उनकी लीला अपरम्पार है। जगन्नाथ पुरी में अगर वे दाऊ बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं तो पंढरपुर में उनके साथ रुक्मिणी जी हैं। वृन्दावन के ही कृष्ण कन्हैया पंढरपुर में विट्ठल बन जाते हैं। यहां उनके साथ राधा रानी नहीं देवी रुक्मिणी विराजमान हैं।
जिस तरह अष्टछाप के संतों ने और रसखान और मीराबाई ने कृष्ण भक्ति में पदों की रचना की, उसी प्रकार महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, नामदेव और जनाबाई ने पंढरपुर के विठोबा की भक्ति में लीन हो, मराठी में अभंग की रचना की। वैष्णव संप्रदाय की तरह महाराष्ट्र में भी वारकरी संप्रदाय है जो अपने विट्ठल के दर्शनार्थ अपने अपने स्थानों से जय श्री हरि विट्ठल का जयघोष और पांडुरंग के अभंगों का कीर्तन करते हुए पैदल ही पंढरपुर की ओर प्रस्थान करते हैं।।
संत ज्ञानेश्वर महाराज ने ही वारकरी संप्रदाय की नींव डाली। वारकरी का अर्थ होता है, परिक्रमा करना। देवशयनी एकादशी को यहां लाखों भक्त विठोबा रुक्मिणी मंदिर की नाचते गाते परिक्रमा और पूजा अर्चना करते हैं। मीराबाई के पदों की ही तरह विठ्ठलाच्या गवळणी महाराष्ट्र के घर घर में गाई जाती है।
आप कोई भाषा जानें यह जरूरी नहीं, बस पंडित भीमसेन जोशी का अभंग माझे माहेर पंढरी एक बार सुन लें।
विसरू नको रे आई बापा ला और धरिला पंढरी चा चोर जैसे कई अभंग आपकी भक्ति भाव की चेतना को भंग नहीं होने देंगे।।
चैतन्य महाप्रभु की यह कीर्तन विधा ही आज महाराष्ट्र में अभंग और वारकरी संप्रदाय के रूप में फल फूल रही है।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “कुछ कुछ होता है का मतलब”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२ ☆
व्यंग्य ☆ “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
मैं रात्रि का भोजन करके पान खाने झब्बूलाल की दुकान पहुंचा। दुकान बंद होने का समय था इक्का दुक्का ग्राहक थे। दुकान में गाना बज रहा था
“तुम पास आए, यूं मुस्कुराए
तुमने न जाने क्या सपने दिखाए।
अब तो मेरा दिल जागे न सोता है।
क्या करूं हाए, कुछ कुछ होता है…
मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्ते भाई साहब कहते हुए एक पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पान मुंह के हवाले किया ही था कि झब्बू ने प्रश्न दाग दिया – भाई साहब, “ये कुछ कुछ होता है” का मतलब आखिर क्या होता है ? मैंने कहा झब्बू फालतू की बात मत छेड़ो, मुझे घर जाकर अभी एक लेख लिखना है। झब्बू बोला – भैया फालतू बात नहीं कर रहा। जब जब ये गाना सुनता हूँ देर तक सोचता रहता हूं कि आखिर ये “कुछ – कुछ” है क्या ? आप पत्रकार हैं। आप नहीं बताएंगे तो कौन बता पाएगा? मैंने कहा – प्यारे भाई पत्रकार क्या सब कुछ जानता है ?
झब्बू ने मेरी ओर लम्बी मुस्कान फेंकते हुए कहा – भैया में तो ऐसा ही समझता हूं। पत्रकार चोरी, डकैती, खून के बारे में पुलिस से ज्यादा, बजट के बारे में वित्त मंत्री और अर्थशास्त्रियों से ज्यादा, विदेश नीति के बारे में विदेश मंत्री और देश की सुरक्षा के बारे में रक्षा एवं गृह मंत्री व सेना से ज्यादा जानता है। अभी राम मंदिर में चंदा चोरी पर समाचार पत्रों को पढ़कर लग रहा है कि जैसे पत्रकार इस मामले में भी जांच अधिकारियों से ज्यादा जानते – समझते हैं। खेल पत्रकार तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन जैसे बड़े खेलों तक में यह बता देते हैं कि जीतने के लिए किस खिलाड़ी को कैसे खेलना चाहिए। शायद इसी कारण से लोग पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते, पत्रकारों से बचने की कोशिश करते हैं। मैंने झब्बूलाल से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा भाई मुझे माफ करो मैं सादा पत्रकार हूं, खोजी या खेल पत्रकार नहीं और वापस लौटने लगा। झब्बू ने आवाज दी भाई साहब ये भाभी जी का पान तो लेते जाएं। मैं वापस मुड़ और पान की पुड़िया ली। झब्बू ने मार्मिक शब्दों में कहा, भैया आपने मेरी शंका का समाधान नहीं किया। अब मुझे रात भर नींद नहीं आएगी। सोचता रहूंगा कि आखिर “कुछ कुछ होता है” का मतलब क्या होने से है।
मैंने कहा देखो भाई झब्बू – “कुछ कुछ होने” का कोई एक मतलब नहीं है। इसके हजार मतलब हैं जो अलग – अलग परिस्थितियों में अलग – अलग होते हैं। शाहरुख खान, काजोल, रानी मुखर्जी को जो “कुछ कुछ” हुआ था वह अलग था। किसी राष्ट्राध्यक्ष को टॉफ़ी पाकर और झुमके पहनने से किसी राष्ट्राध्यक्ष को जो “कुछ कुछ” हुआ वह अलग था, भारत की तरक्की देखकर चीन, पाकिस्तान और अमेरिका को जो “कुछ कुछ” हो रहा है वह अलग है, ईरान युद्ध में फंस कर ट्रंप को और यूक्रेन युद्ध में फंस कर पुतिन को होने वाला “कुछ कुछ” अलग है। इसी तरह बंगाल चुनाव हारकर ममता को और जीतकर भाजपा नेताओं को होने वाला “कुछ कुछ” भी अलग – अलग है। प्रियंका और राहुल को होने वाले “कुछ कुछ” की तुलना, बराबरी या समानता भी किसी दूसरे के “कुछ कुछ” से नहीं की जा सकती। मेरी बात से झब्बू के चेहरे पर समाधान के भाव उभरते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैं वापस लौटने लगा तो झब्बू ने टोका, बोला – भाई साहब, मुझे पता था कि पत्रकार के पास हर बात का जवाब होता है, वह अति दूरदर्शी होता है तभी तो जब चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री थे तब एक बार उन्होंने कहा था कि अब पत्रकारिता इतने आगे बढ़ गई है कि मुझे सुबह समाचार पत्र पढ़कर पता चलता है कि मैंने कल रात क्या सोचा अथवा मैं आगे क्या करने वाला हूं। पत्रकारों पर झब्बू की बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “आम आदमी की व्यथा…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७२ ☆
☆ # “आम आदमी की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆
☆
एक आम आदमी
व्यवस्था से पीड़ित आदमी
अपनी बदहाली के लिए
अपनी बर्बादी के लिए
अपनी तंगहाली के लिए
अपनी जेब खाली के लिए
किससे शिकायत करे
किससे फरियाद करे
किसको अपना दुखड़ा बताए
किसको घायल तन का टुकड़ा दिखाएं
किसी के पास उसके लिए
वक्त नहीं है
हर कोई मदमस्त है
कानून भी कोई सख्त नहीं है
वही इसी परेशानी मे खड़ा है
अपनी बेबसी पर रोता पड़ा है
वक्त ने उसके जिस्म पर
एक पैदाइशी जख्म जड़ा है
उससे वह जीवन भर लड़ा है
आज वह थक हार कर
चुपचाप है
जीवन उसके लिए अभिशाप है
मुस्कुराना उसके लिए एक श्राप है
न्याय उससे कोसों दूर है
व्यवस्था अपने मद में चूर है
उसका पसीना अब सूखने लगा है
उसका अंग अंग अब दुखने लगा है
कोई मरहम लगाने वाला नहीं है
कोई वंचितों को जगाने वाला नहीं है
सारे लोग सामंतशाही के शिकारी है
वह शोषित आज नंगा भिखारी है
वह सोचता है
ऐसे जीने से क्या फायदा
हर किसी ने तोड़ा है
उससे किया हुआ वायदा
उसके लिए जीना दुश्वार है
ऐसा जीना तो वाकई धिक्कार है
परिवार की गरीबी और भूख
उसे अंदर ही अंदर तोड़ चुकी है
उसे एक भयानक निर्णय की तरफ
मोड़ चुकी है
या तो वह परिवार सहित
आत्महत्या कर लेगा
या फिर शस्त्र उठाकर
व्यवस्था की हत्या कर देगा
क्या उसके लिए यही न्याय होगा?
क्या उस गरीब के साथ यह अन्याय नहीं होगा?
अगर ऐसा ही है
तो हम कब जाएंगे?
पीड़ितों के लिए
कब न्याय मांगेगे?
या उनको उनके हाल पर छोड़कर
उनके जख्मों को रिसता छोड़कर
उनके जीवन में कटुता का जहर घोलकर
क्या हम रोज अपनी प्रशंसा के गीत गाएंगे ?
क्या हम उनकी बर्बादी का उत्सव जोर-शोर से मनाएंगे ? /
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘फौजी की पहचान है…‘।)
🎬 शॉर्ट फिल्म ‘तावीज़’ में युक्तार्थ का जीवंत अभिनय🎞️
जबलपुर। संस्कारधानी की माटी से निकले बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता युक्तार्थ श्रीवास्तव इन दिनों अपनी नई लघु फिल्म “तावीज़” में अपने असाधारण और जीवंत अभिनय को लेकर देश भर में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। निर्माता अजय जोशी की इस लघु फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे युक्तार्थ ने अभिनय की एक ऐसी नई मिसाल पेश की है, जिसकी हर तरफ जमकर सराहना हो रही है। यह लघु फिल्म समाज को तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास के जानलेवा जाल से दूर रहने का एक बेहद भावप्रधान और मार्मिक संदेश देती है।
Ajay Joshi Films Presents – Taweez – Short feature film.
Please Watch, Subscribe, like and drop your valuable thoughts comments, also on its IMDB page (TAWEEZ).
इस लघु फिल्म में युक्तार्थ का अभिनय सिर्फ कलाकारी नहीं, बल्कि जीवंतता की पराकाष्ठा है। उन्होंने अपने किरदार के दर्द, कशमकश और हर एक जज्बात को पर्दे पर इस तरह उतारा है कि दर्शक खुद को उस चरित्र से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। उनका अभिनय इतना मार्मिक और प्रभावशील है कि देखने वालों को भी रुला देता है। समीक्षकों का मानना है कि उनके चेहरे के हाव-भाव, आँखों की गहराई और संवाद अदायगी में ऐसा जादू है जो सीधे दिलों को छू जाता है। उन्होंने बिना किसी बनावट के, बेहद स्वाभाविक और रियलिस्टिक तरीके से मुख्य चरित्र की आत्मा को पर्दे पर जिंदा कर दिया है।
युक्तार्थ की यह बेमिसाल अभिनय क्षमता उनके वर्षों के कड़े संघर्ष और कला साधना का परिणाम है। वे रंगमंच के एक बेहद मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जिन्होंने देश भर में 1500 से अधिक नाटकों और मोनोलॉग में अपनी कला का लोहा मनवाया है। इसके साथ ही प्रसिद्ध टीवी शो ‘क्राइम पेट्रोल’ सहित कई धारावाहिकों में उनके द्वारा निभाए गए किरदारों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई है। अपनी इसी लाजवाब अदाकारी के दम पर आज देश भर में उनके लाखों प्रशंसक हैं। ‘तावीज़’ में उनके इस झकझोर देने वाले अभिनय ने जहाँ दर्शकों को भावुक किया है, वहीं अपनी जन्मभूमि का गौरव भी पूरे देश में बढ़ाया है।
युक्तार्थ भाषा विज्ञानी, हिंदी बुन्देली के मर्मज्ञ स्व.डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव के नाती एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रतुल श्रीवास्तव, श्रीमती विमला श्रीवास्तव के सुपुत्र हैं।
ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्री युक्तार्थ श्रीवास्तव जी को हार्दिक बधाई अभिनंदन 💐
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈