हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१४ ☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख परखिए नहीं–समझिए। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१४ ☆

☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆

जीवन में हमेशा एक-दूसरे को समझने का प्रयत्न करें; परखने का नहीं। संबंध चाहे पति-पत्नी का हो; भाई-भाई का हो; मां-बेटे का हो या दोस्ती का… सब विश्वास पर आधारित हैं, जो आजकल नदारद है; परंंतु हर व्यक्ति को उसी की तलाश है। इसलिए ‘ऐसे संबंध जिनमें शब्द कम और समझ ज्यादा हो; तक़रार कम, प्यार ज़्यादा हो; आशा कम, विश्वास ज़्यादा हो’ की दरक़ार हर इंसान को है। वास्तव में जहां प्यार और विश्वास है; वही संबंध सार्थक है, शाश्वत है। समस्त प्राणी जगत् का आधार प्यार है, जो करुणा का जनक है और एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सौहार्द, सहानुभूति व त्याग का भाव ‘सर्वे भवंतु सुखीन:’ का प्रेरक है। वास्तव में जहां भावनाओं का सम्मान है; वहां मौन भी शक्तिशाली होता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘खामोशियां भी बोलती हैं और अधिक प्रभावशाली होती हैं।’

यदि भरोसा हो, तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के अनेक अर्थ निकलने लगते हैं। इस स्थिति में मानव अपना आपा खो बैठता है। वह सब सीमाओं को लांघ जाता है और मर्यादा के अतिक्रमण करने से अक्सर अर्थ का अनर्थ हो जाता है, जो हमारी नकारात्मक सोच को परिलक्षित करता है, क्योंकि ‘जैसी सोच, वैसा कार्य व्यवहार।’ शायद! इसलिए कहा जाता है कि कई बार हाथी निकल जाता है और  पूंछ रह जाती है।

संवाद जीवन-रेखा है और विवाद रिश्तों में अवरोध उत्पन्न करता है, जो वर्षों पुराने संबंधों को पलभर में मगर की भांति लील जाता है। इतना ही नहीं, वह दीमक की भांति संबंधों की मज़बूत चूलों को हिला देता है और वे लोग, जिनकी दोस्ती के चर्चे जहान में होते हैं; वे भी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। उनके अंतर्मन में वह विष-बेल पनप जाती है, जो सुरसा के मुख की मानिंद बढ़ती चली जाती है। इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न किया करें; उससे ज़िंदगी छोटी हो जाती है…बहुत सार्थक संदेश है। परंंतु यह तभी संभव है, जब मानव क्रोध के वक्त रुक जाए और ग़लती के वक्त झुक जाए। ऐसा करने पर ही मानव जीवन में सरलता व असीम आनंद को प्राप्त कर सकता है। सो! मानव को ‘पहले तोलो, फिर बोलो’  अर्थात् सोच-समझ कर बोलने का संदेश दिया गया है। दूसरे शब्दों में तुरंत प्रतिक्रिया देने से मानव मन में दूरियां इस क़दर बढ़ जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है और जीवन-साथी– जो दो जिस्म, एक जान होते हैं; नदी के दो किनारों की भांति हो जाते हैं, जिनका मिलन जीवन-भर संभव नहीं होता। इसलिए बेहतर है कि आप परखिए नहीं, समझिए अर्थात् एक-दूसरे की परीक्षा मत लीजिए और न ही संदेह की दृष्टि से देखिए, क्योंकि संशय, संदेह व शक़ मानव के अजात-शत्रु हैं। वे विश्वास को अपने आसपास भी मंडराने नहीं देते। सो! जहां विश्वास नहीं; सुख, शांति व आनंद कैसे रह सकते हैं? परमात्मा भाग्य नहीं लिखता; जीवन के हर कदम पर हमारी सोच, विचार व कर्म हमारा भाग्य लिखते हैं। इसलिए अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखिए। संसार में जो भी अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लीजिए और शेष को नकार दीजिए। परंतु किसी की आलोचना मत कीजिए, आपका जीवन सार्थक हो जाएगा। वे सब आपको मित्र सामान लगेंगे और चहुंओर ‘सबका मंगल होय’ की ध्वनि सुनाई पड़ेगी। जब मानव में यह भावना घर कर लेती है, तो उसके हृदय में व्याप्त स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाएं मुंह छिपा लेती हैं; सदैव के लिए लुप्त हो जाती हैं और दसों दिशाओं में आनंद का साम्राज्य हो जाता है।

अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। वह हमें किसी के सम्मुख झुकने अर्थात् घुटने नहीं टेकने देता, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और दूसरों को नीचा दिखा कर ही सुक़ून पाता है। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की। इसलिए दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति का जीवन ही सार्थक व सफल होता है। इसलिए मानव को सुख में अहं को निकट नहीं आने देना चाहिए और दु:ख में धैर्य नहीं खोना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में सम रहने वाला मानव ही जीवन में अलौकिक आनंद प्राप्त कर सकता है। सो! जीवन में सामंजस्य तभी पदार्पण कर सकेगा; जब कर्म करने से पहले हमें उसका ज्ञान होगा; तभी हमारी इच्छाएं पूर्ण हो सकेंगी। परंतु जब तक ज्ञान व कर्म का समन्वय नहीं होगा, हमारे जीवन की भटकन समाप्त नहीं होगी और हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। इच्छाएं अनंत है और साधन सीमित। इसलिए हमारे लिए यह निर्णय लेना आवश्यक है कि पहले किस इच्छा की पूर्ति, किस ढंग से की जानी कारग़र है? जब हम सोच-समझकर कार्य करते हैं, तो हमें निराशा का सामना नहीं करना पड़ता; जीवन में संतुलन व समन्वय बना रहता है।

संतोष सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम धन है। इसलिए हमें जो भी मिला है, उसमें संतोष करना आवश्यक है। दूसरों की थाली में तो सदा घी अधिक दिखाई देता है। उसे देखकर हमें अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए, क्योंकि मानव को समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी, कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। संतोष अनमोल पूंजी है और मानव की धरोहर है। ‘जे आवहिं संतोष धन, सब धन धूरि समान,’ रहीम जी की यह पंक्ति इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि संतोष के जीवन में पदार्पण करते ही सभी इच्छाओं का शमन स्वतः हो जाता है। उसे सब धन धूलि के समान लगते हैं और मानव आत्मकेंद्रित हो जाता है। उस स्थिति में वह आत्मावलोकन करता है तथा दैवीय व अलौकिक आनंद में डूबा रहता है; उसके हृदय की भटकन व उद्वेलन शांत हो जाता है। वह माया-मोह के बंधनों में लिप्त नहीं होता तथा निंदा-स्तुति से बहुत ऊपर उठ जाता है। यह आत्मा-परमात्मा के तादात्म्य की स्थिति है, जिसमें मानव को सम्पूर्ण विश्व तथा प्रकृति के कण-कण में परमात्म-सत्ता का आभास होता है। वैसे आत्मा-परमात्मा का संबंध शाश्वत है। संसार में सब कुछ मिथ्या है, परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। इसलिए हमें तुच्छ स्वार्थों का त्याग कर अलौकिक आनन्द प्राप्त करने का अनवरत प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आवश्यकता है… उदार व विशाल दृष्टिकोण की, क्योंकि संकीर्णता हमारे अंतर्मन में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को पोषित करती है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजना बेहतर है और जो बुरा है, उसका त्याग करना बेहतर है। इस प्रकार आप बुराइयों से ऊपर उठ सकते हैं। इस स्थिति में संसार आपको सुखों का सागर प्रतीत होगा; प्रकृति आपको ऊर्जस्वित करेगी और चहुंओर अनहद नाद का स्वर सुनाई पड़ेगा।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जीवन में दूसरों की परीक्षा मत लीजिए, क्योंकि परखने से आपको दोष अधिक दिखाई पड़ेंगे। इसलिए केवल अच्छाई को देखिए; आपके चारों ओर आनंद की वर्षा होने लगेगी। सो! दूसरों की भावनाओं को समझने और उनकी बेरुखी का कारण जानने का प्रयास कीजिए। जितना आप उन्हें समझेंगे, आपकी दोष-दर्शन की प्रवृत्ति का अंत हो जाएगा। इंसान ग़लतियों का पुतला है और कोई भी इंसान पूर्ण नहीं है। फूल व कांटे सदैव साथ-साथ रहते हैं, उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। सृष्टि में जो भी घटित होता है मात्र किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं; सबके मंगल के लिए कारग़र व उपयोगी होता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ गंगा: हिमालय से सागर तक — एक अनन्त कथा ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🏞️ गंगा: हिमालय से सागर तक — एक अनन्त कथा 🏞️

क्या गंगा सचमुच एक ही नदी है?

क्या आपने कभी सोचा है—गंगा आखिर जन्म कहाँ लेती है?

क्या वह किसी एक पहाड़ की गोद से निकलती है, या फिर अनेक नदियों की संगति से बनती है?

यह प्रश्न जितना सरल लगता है, उसका उत्तर उतना ही रोचक है।

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि अनेक धाराओं, पर्वतों, मिथकों, तपस्याओं और सभ्यताओं की संयुक्त यात्रा है।

वह हिमालय की बर्फीली चट्टानों से जन्म लेकर, ऋषियों की भूमि से गुजरते हुए, मैदानों को जीवन देती है, और अन्ततः सागर की अनन्त गोद में समा जाती है।

इस यात्रा में वह केवल जल नहीं बहाती—वह इतिहास, संस्कृति, श्रद्धा और जीवन की धारा बहाती है।

भगीरथ की तपस्या और भागीरथी का जन्म 🏞️

हिमालय की ऊँचाइयों में, लगभग 4,000 मीटर की ऊँचाई पर, एक विशाल हिमनद है—गंगोत्री ग्लेशियर। उसके अग्रभाग पर स्थित गुफानुमा स्थान को गोमुख कहा जाता है। यहीं से निकलती है वह पतली सी धारा जिसे हम भागीरथी कहते हैं।

कहानी यहाँ से नहीं, उससे बहुत पहले से शुरू होती है।

कहते हैं कि राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की मुक्ति के लिए उनके वंशज राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। वर्षों की साधना के बाद ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने की अनुमति दी। पर समस्या यह थी—स्वर्ग से उतरती गंगा का वेग इतना प्रचण्ड था कि पृथ्वी उसका आघात सह न पाती।

तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया। उनकी उलझी जटाओं से छनकर जब गंगा पृथ्वी पर उतरी, तब वह शांत, कोमल और जीवनदायिनी बन गई।

यही कारण है कि हिमालय से उतरती धारा को भागीरथी कहा गया—भगीरथ की तपस्या का फल।

हिमालयी घाटियों में भागीरथी की यात्रा 🏞️

गोमुख से निकलकर भागीरथी गंगोत्री, हर्षिल और उत्तरकाशी की घाटियों से गुजरती है। रास्ते में छोटी-छोटी नदियाँ—जाह्नवी, अस्सी गंगा और भिलंगना—उससे मिलती जाती हैं।

यहाँ का हर मोड़ कथा सुनाता है।

कहीं देवदार के जंगल हैं, कहीं बर्फ से ढकी चोटियाँ, और कहीं प्राचीन मंदिर जहाँ साधु-संत सदियों से ध्यान करते आए हैं।

टिहरी का बदलता हुआ दृश्य 🏞️

इसी मार्ग में एक स्थान आता है—टिहरी।

कभी यहाँ एक पुराना, जीवंत पहाड़ी शहर था, जहाँ बाज़ारों में जीवन गूँजता था। आज वही स्थान टिहरी बाँध की विशाल झील के नीचे सोया हुआ है।

भागीरथी पर बने इस बाँध ने आधुनिक भारत को बिजली और जल तो दिया, पर साथ ही पुरानी टिहरी की स्मृतियाँ भी जल में समा गईं।

मानो नदी कह रही हो—समय के साथ सब बदलता है, पर प्रवाह नहीं रुकता।

गोमुख से लगभग 205 किलोमीटर की यात्रा के बाद भागीरथी एक विशेष स्थान पर पहुँचती है—देवप्रयाग।

पर उससे पहले हमें उस दूसरी महान धारा की कहानी जाननी होगी जो यहाँ आकर उससे मिलती है—अलकनन्दा।

अलकनन्दा और पंच प्रयागों की अद्भुत यात्रा 🏞️

अलकनन्दा का जन्म भी हिमालय की गोद में, सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर के पास माना जाता है।

यह नदी सीधे गंगा नहीं बनती। रास्ते में पाँच महत्वपूर्ण संगमों से गुजरती है जिन्हें पंच प्रयाग कहा जाता है।

  1. विष्णुप्रयाग 🏞️

यहाँ धौलीगंगा आकर अलकनन्दा से मिलती है।

ऊँचे पर्वतों के बीच यह संगम ऐसा लगता है मानो दो उत्साही युवतियाँ हाथ थामकर आगे बढ़ रही हों।

  1. नन्दप्रयाग 🏞️

यहाँ नन्दाकिनी नदी अलकनन्दा में समाहित होती है।

कहते हैं यह स्थान नन्द बाबा की स्मृति से जुड़ा है—वही नन्द जिनकी गोद में बालक कृष्ण ने लीलाएँ की थीं।

  1. कर्णप्रयाग 🏞️

यहाँ पिण्डर नदी अलकनन्दा से मिलती है।

महाभारत के महान योद्धा कर्ण ने यहाँ तप किया था—इसीलिए इसका नाम कर्णप्रयाग पड़ा।

  1. रुद्रप्रयाग 🏞️

यहाँ मन्दाकिनी नदी आती है, जो केदारनाथ की घाटियों से निकलती है।

यह संगम अत्यन्त भावपूर्ण है—मानो शिव की भूमि से आई मन्दाकिनी, विष्णु की धारा अलकनन्दा से आलिंगन कर रही हो।

  1. देवप्रयाग 🏞️

और अन्ततः, अलकनन्दा पहुँचती है देवप्रयाग, जहाँ उसकी भेंट भागीरथी से होती है।

देवप्रयाग: जहाँ गंगा जन्म लेती है 🏞️

देवप्रयाग का दृश्य अद्भुत है।

एक ओर गहरे हरे रंग की अलकनन्दा, दूसरी ओर तेज़ और कुछ मटमैली भागीरथी—दोनों स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देती हैं।

यहीं एक रोचक लोककथा सुनाई जाती है।

स्थानीय लोग हँसते हुए कहते हैं—

देखो, यह तो सास और बहू का मिलन है!

अलकनन्दा को सास कहा जाता है—अनुभवी, लम्बी यात्रा करके आई हुई।

भागीरथी को बहूचंचल, तेज़ और नई।

जब दोनों मिलती हैं तो थोड़ी देर तक उनका रंग अलग-अलग दिखता है, जैसे सास-बहू अपनी-अपनी बात पर अड़ी हों। फिर धीरे-धीरे वे एक हो जाती हैं—और तब जन्म लेती है गंगा।

ऋषिकेश और हरिद्वार: आध्यात्मिक द्वार 🏞️

देवप्रयाग से आगे गंगा ऋषियों की भूमि में प्रवेश करती है।

सबसे पहले आता है ऋषिकेश—योग और ध्यान की विश्व राजधानी। यहाँ लक्ष्मण झूला, राम झूला और गंगा आरती का दिव्य दृश्य मन को शान्त कर देता है।

फिर आती है हरिद्वार, जहाँ गंगा पहली बार विशाल मैदानों में उतरती है।

हर की पौड़ी की आरती में हजारों दीपक जब जलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो तारे धरती पर उतर आए हों।

मैदानों की जीवनदायिनी धारा 🏞️

हरिद्वार से आगे गंगा फैलती जाती है और उत्तर भारत के विशाल इंडो-गंगेटिक मैदान को जीवन देती है।

इस यात्रा में अनेक नदियाँ उससे मिलती हैं।

उत्तर से आने वाली नदियाँ—

रामगंगा, घाघरा (जिसे सरयू भी कहते हैं), गंडक, कोसी और महानन्दा।

दक्षिण से आने वाली नदियाँ—

यमुना, टोंस, सोन और पुनपुन।

इनमें सबसे बड़ा संगम होता है प्रयागराज में—जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम माना जाता है।

यहीं लगता है विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम—कुम्भ मेला। करोड़ों श्रद्धालु एक साथ गंगा में स्नान करते हैं। वह दृश्य किसी आधुनिक चमत्कार से कम नहीं।

प्रदूषण और हमारी जिम्मेदारी 🏞️

मैदानों में पहुँचते-पहुँचते गंगा का स्वरूप बदल जाता है।

जहाँ वह हिमालय में निर्मल थी, वहीं शहरों के बीच उसे प्रदूषण का सामना करना पड़ता है।

सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से उसे स्वच्छ बनाने का अभियान चलाया है।

पर नदी को सचमुच बचाना केवल सरकार का नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है।

गंगा केवल जलधारा नहीं—वह हमारी माँ है।

और माँ को स्वच्छ रखना सन्तानों का धर्म है।

भारत से बांग्लादेश तक: पद्मा की यात्रा 🏞️

पश्चिम बंगाल में पहुँचकर गंगा का स्वरूप फिर बदलता है।

सीमा पार करते ही बांग्लादेश में उसे नया नाम मिलता है—पद्मा

यहाँ वह जमुना (ब्रह्मपुत्र की धारा) और फिर मेघना से मिलती है।

तीनों मिलकर एक विशाल डेल्टा बनाते हैं—दुनिया का सबसे बड़ा नदी डेल्टा।

यहाँ के सुन्दरबन के मैंग्रोव जंगल, रॉयल बंगाल टाइगर और असंख्य पक्षियों का संसार इसी जल से जीवित है।

सागर से मिलन: एक अनन्त चक्र 🏞️

अन्ततः, हजारों किलोमीटर की यात्रा के बाद गंगा बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।

पर क्या यह यात्रा सचमुच समाप्त होती है?

नहीं।

सागर का जल फिर बादल बनता है, बादल हिमालय पर बरसते हैं, और वही जल फिर से गंगा बनकर बह निकलता है।

यही प्रकृति का अनन्त चक्र है।

भारत की आत्मा 🏞️

गंगा केवल एक नदी नहीं—वह भारत की आत्मा है।

उसके किनारे सभ्यताएँ पलीं, ऋषियों ने ज्ञान पाया, कवियों ने गीत लिखे और करोड़ों लोगों ने जीवन पाया।

हिमालय से सागर तक उसकी यात्रा हमें याद दिलाती है—

जीवन भी एक नदी है।

बहते रहना ही उसका धर्म है।

जय मां गंगे! हर हर गंगे! 🏞️

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#SpiritualIndia

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© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – औरत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – औरत ? ?

मैंने देखी,

बालकनी की रेलिंग पर लटकी

खूबसूरती के नए एंगल बनाती औरत,

मैंने देखी,

धोबीघाट पर पानी की लय के साथ

यौवन निचोड़ती औरत,

मैंने देखी,

कच्ची रस्सी पर संतुलन साधती

साँचेदार, खट्टी-मीठी औरत,

मैंने देखी

चूल्हे की आँच में

माथे पर चमकते मोती संवारती औरत,

मैंने देखी,

फलों की टोकरी उठाये

सौंदर्य के प्रतिमान लुटाती औरत..,

अलग-अलग किस्से

अलग-अलग चर्चे

औरत के लिए राग एकता के साथ

सबने सचमुच देखी थी ऐसी औरत,

बस नहीं दिखी थी उनको,

रेलिंग पर लटककर

छत बुहारती औरत,

धोबीघाट पर मोगरी के बल पर

कपड़े फटकारती औरत,

रस्सी पर खड़े हो अपने बच्चों की

भूख को ललकारती औरत,

गूँधती-बेलती-पकाती

पसीने से झिजती

पर रोटी खिलाती औरत,

सिर पर उठाकर बोझ

गृहस्थी का जिम्मा बँटाती औरत..,

शायद

हाथी और अंधों की कहानी की तज़र्र् पर

सबने देखी अपनी सुविधा से

थोड़ी-थोड़ी औरत,

अफसोस-

किसीने नहीं देखी एक बार में

पूरी की पूरी औरत!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८६ – नवगीत – गुरुवर वंदना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गुरुवर वंदना

? रचना संसार # ८६ – गीत – गुरुवर वंदना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

अंतस में विश्वास भरो गुरु,

तामस को चीर।

प्रेम भाव से जीवन बीते,

दूर हो सब पीर।।

 

मान प्रतिष्ठा मिले जगत में,

उर यही है आस।

शीतल पावन निर्मल तन हो,

सुखद हो आभास।।

कोई मैं विधा नहीं जानूँ

गुरु सुनो भगवान।

भरदो शिक्षा से तुम झोली,

दो ज्ञान वरदान।।

शिष्य बना लो अर्जुन जैसा,

धनुषधारी वीर ।

 

बैर द्वेष तज दूँ मैं सारी,

खोलो प्रभो द्वार।

न्याय धर्म पर चलूँ सदा मैं,

टूटे नहीं तार।।

आप कृपा के हो सागर,

प्रभो जीवन सार।

रज चरणों की अपने देदो,

गुरु सुनो आधार।।

सेवा में दिनरात करूँ प्रभु,

रहूँ नहीं अधीर।

 

एकलव्य सा शिष्य बनूँ मैं,

रचूँ फिर इतिहास।

सत्य मार्ग पर चलता जाऊँ,

हो जग उजास।।

ब्रह्मा हो गुरु आप विष्णु हो,

कहें तीरथ धाम।

रसधार बहादो अमरित की,

जपूँ आठों याम।।

दीपक ज्ञान का अब जला दो,

गुरुवर दानवीर।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आशियाना ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आशियाना.)

🌱 लघुकथा – आशियाना 🌷

“चल भाग यहां से कब्रिस्तान के चौकीदार ने सोते हुए भिखारी को फटकार लगायी. भिखारी शमशू को उठाते हुए कहा – “भय्ये सिर्फ रात भर ही तो सोता हूँ. किसी को क्या तकलीफ हो रही है?”

“अरे भाई समझता क्यों नही. यह कब्रिस्तान है. रिश्तेदार एतराज करते हैं.”

“भला इसमे एतराज की क्या बात है?”

“इन्हे भी तो सुकून चाहिए. फिर आये दिन जादूटोना के लिए मांत्रिक कब्र खोदकर मुर्दे गायब करते हैं. मैंने तुझे कई बार समझाया, पर तू बाज़ नही आता” यह कहते हुए साथ आई पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस स्टेशन के दरोगा ने कडक आवाज मे पूछा. “क्यों बे मुर्दे  चुराता है?”

शमशू डरते हुए बोले “हूजूर मजबूरी मे सोता हूँ.”

“अब यह सब नहीं चलेगा. कहीं और ठिकाना ढूंढो”

“हुजूर कहां ढूंढू. मस्जिद या मंदिर के पास सोता हूं तो हकाल देते हैं. धार्मिक या सरकारी संस्थान के आसपास आने नही देते. फुटपाथ पर सोते हैं तो कब कोई पियक्कड़ गाड़ी में  कुचल दे, कोई भरोसा नहीं. बच गए तो लंगड़ा-लूला बनकर ज़िन्दगी गुजारो.”

“इसमे पुलिस क्या कर सकती है?”

“कम से कम हमें कब्रिस्तान मे सोने दीजिए. जहाँ डर की बजाए शांति तो है.”

यह सुनकर स्तब्ध होकर दरोगा महात्मा गांधी जी की तस्वीर की ओर देखने लगा.

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१४ ☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नवसंवत्सर)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

नवसंवत्सर आ गया, खुशियाँ लेकर आज।

चैत्र मास का आगमन, हर्षित हुआ समाज।।

माँ का स्वागत कर रहे, नवराते त्योहार।

माँ नौ रूपों में सजी, उत्सुक सब घर द्वार।।

 *

महिमा तेरी खूब है, करती हो कल्याण।

सबकी विपदा तुम हरो, करते माँ हम ध्यान।।

 *

करते  माँ  से याचना, आओ सबके द्वार।

नव दुर्गा का आगमन, नौ दिन का त्योहार।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा।)

? मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

-1-

करे बसेरा देख लो, सारा विहग समाज।

काटो कानन तुम नहीं, भटके सारे आज ll

भटके सारे आज, करे मानव मनमानी l

आओ हम सब साथ, शपथ हैं लेते बानी ll

कहे मंजिरी आज, वृक्ष है साथी मेरा l

सबको देता लाभ, कीश भी करे बसेरा ll

-2-

रैन बसेरा है जगत, नहीं ठिकाना आज l

जीवन जीते हम सभी, अलग अलग अंदाज ll

अलग अलग अंदाज,  चलें हैं सूनी राहें l

अश्कों से है आज, देख ये भरी निगाहें ll

कहे मंजिरी आज, बढ़े घनघोर अँधेरा l

अंजानी है राह, मिले कब रैन बसेरा ll

-3-

करें बसेरा बाँस पर, बगुलों का परिवार l

करते हैं कलरव मधुर, नीड़ करें तैयार ll

नीड़ करें तैयार, रोज खोजे वे खाना l

योगी का रच ढोंग, लक्ष्य मछली को पाना।।

कहे मंजिरी आज, आस से भरा सवेरा l

बगुला गाता गान, नीड़ में करें बसेरा ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९६ ☆ मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी  भावप्रवण कविता मानवता अब हार रही है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆

कविता – मानवता अब हार रही है☆ श्री संतोष नेमा ☆

मानवता अब  हार  रही  है  |

होकर द्रवित  पुकार रही है  ||

बेटा करता कत्ल  बाप  का |

जाने   कैसी   रार   रही   है ||

कैसे  बदला वक्त आज का |

रिश्ते सभी  बिसार रही  है ||

*

खूब बँटे हम  जाति धर्म  पर |

रखा न बिल्कुल ध्यान कर्म पर ||

रखा ताक  पर मानवता  को |

दिखें  न कितने दाग मर्म पर ||

भेद-भाव   दीवार  रही   है |

मानवता  अब  हार   रही  है

*

हथियारों  की   जंग  देख  लो |

बारूदों   के    रंग   देख   लो ||

रखें  अहम  को   सबसे  आगे |

अब   देशों  के  ढंग   देख  लो ||

झूठी शान अकड़ वालों को|

अब दुनिया धिक्कार  रही है  ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

चौराहों   पर   खड़े    दुशासन |

भूखे   दानव   नोच   रहे   तन ||

बदली चाल समय  की देखो |

अब   नारी  के  टूट   रहे   मन ||

कब   आयेंगे   कृष्ण   कन्हैया |

अबला   क्यों  लाचार  रही  है ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

भय परमाणु  सामरिकता   का |

बढ़ती नित्य पाशविकता  का ||

मची   होड़   है   हथियारों  की |

काम  नहीं अब नैतिकता   का ||

अब  ‘संतोष’  शांति की  खातिर |

सबकी   यही   पुकार   रही   है |

मानवता   अब   हार   रही    है  |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १६ – कविता – नदिया की धार… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘नदिया की धार।)

☆ शशि साहित्य # १६ ☆

? कविता – नदिया की धार…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

मस्त मगन वो बहती धार,

फूलों ने थमने, प्यार से लिया पुकार…

मदमाती वो हंसती रही,

मंद गति वो चलती रही…

खेत खलिहानों को,

वन और उपवनों को…

जीवनदान, जो लिया है ठान,

यही तो है उसके अस्तित्व का सार…

पूजनीय वह वंदिता,

महिमा उसकी अपरंपार…

रुकना उसके वश में नहीं,

मोह में पड़ना ,ठीक नहीं,

रुकी जलधार, होगा प्रकृति प्रहार…

थमना राह का रोड़ा है,

फिर समुद्र मिलन भी होना है…

तन्मय हो वो बह चली…

बन रसवंती धार….

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४८ ⇒ दलित के घर भोजन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दलित के घर भोजन।)

?अभी अभी # ९४८ ⇒ आलेख – दलित के घर भोजन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने किसी दलित के घर जाकर भोजन किया है, क्या कृष्ण की तरह कभी आपने भी किसी दुर्योधन का मेवा त्याग विदुर के घर का साग खाया है। सुदामा तो खैर, कृष्ण के सखा थे, ब्राह्मण देवता होते हैं दलित नहीं, कृष्ण यह जानते थे, इसलिए उनके चरण भी अपने अंसुओं से धोए। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई।

हमने अपने जीवन में ऐसा कोई सत्कार्य नहीं किया जिसका छाती ठोंककर आज गुणगान किया जा सके। बस बचपन में जाने अनजाने हमने भी एक दलित के घर भोजन करने का महत कार्य संपन्न कर ही लिया। हम जानते हैं, हम कोई सेलिब्रिटी अथवा नामी गिरामी जनता के तुच्छ सेवक भी नहीं, हमारे पास इस सत्कार्य का कोई वीडियो अथवा प्रमाण भी नहीं, फिर भी हमारे लिखे को ही दस्तावेज़ समझा जावे, व वक्त जरूरत काम आवे।।

यह तब की बात है, जब हम किसी सांदीपनी आश्रम में नहीं, हिंदी मिडिल स्कूल में पढ़ते थे। सरकारी स्कूल था, जिसे आज की भाषा में शासकीय कहा जाता है।

पास में ही मराठी मिडिल स्कूल भी था, जहां कभी अभ्यास मंडल की ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला गर्मी की छुट्टियों में आयोजित हुआ करती थी। आज वहां भले ही मराठी मिडिल स्कूल का अस्तित्व नहीं हो, अभ्यास मंडल जरूर जाल ऑडिटोरियम में सिमटकर रह गया है।

तब सिर्फ हिंदी और मराठी मिडिल स्कूल ही नहीं, उर्दू और सिंधी मिडिल स्कूल भी होते थे। जैसा पढ़ाई का माध्यम, वैसा स्कूल!

कक्षा में हर छात्र का एक नाम होता था, और बस वही उसकी पहचान होती थी। अमीर गरीब की थोड़ी पहचान तो थी, लेकिन जाति पांति की नहीं। दलित जैसा शब्द हमारे शब्दकोश में तब नहीं था।

बस यहीं से हमारी दोस्ती की दास्तान भी शुरू होती है।।

जो कक्षा में, आपकी डेस्क पर आपके साथ बैठता है, वह आपका दोस्त बन जाता है। आज इच्छा होती है यह जानने की, हमारे वे दोस्त आज कहां हैं, कैसे हैं। दो दिन साथ रहकर जाने किधर गए। किसी का नाम याद है तो किसी का चेहरा। धुंधली, लेकिन सुनहरी यादें।

उस दोस्त का चेहरा आज तक याद है नाम शायद कहीं गुम गया। वहीं रिव्हर साइड रोड पर वह रहता था। स्कूल, घर और दोस्तों को आपस में जोड़ने वाली हमारे शहर की नदी पहले खान नदी कहलाती थी। आजकल इसके सौंदर्यीकरण के साथ ही इसका नामकरण भी कान्ह नदी कर दिया गया है। गरीब दलित हो गया और खान कान्ह।।

खातीपुरा और रानीपुरा जहां मिलते हैं, वही रिव्हर साइड रोड है, जहां आज की इस कान्ह नदी पर एक कच्चा पुल था, जिसके आसपास की बस्ती तोड़ा कहलाती थी। नार्थ तोड़ा और साउथ तोड़ा। ठीक उसी तरह, जैसे अमीरों की बस्ती में नॉर्थ और साउथ ब्लॉक होते हैं। इसी तोड़े में मेरा यह दोस्त रहता था और जिसके आग्रह पर मैं आज से साठ वर्ष पूर्व उसकी झोपड़ी में प्रवेश कर चुका था।

कच्चा घर था, घर में सिर्फ उसकी मां और एक जलता हुआ चूल्हा था, जिस पर मोटी मोटी गर्म रोटी सेंकी जा रही थी। एक डेगची में गुड़ और आटे की बनी लाप्सी रखी थी। मैं संकोचवश उसके आग्रह को ठुकरा ना सका और एक पीतल की थाली में मैंने भी भोग लगा ही दिया।।

हम इंसान हैं, कोई भगवान नहीं। हर व्यक्ति बुद्ध नहीं बन सकता। गरीबी अमीरी और जात पांत, ऊंच नीच की दीवार नहीं तोड़ सकता और ना ही संसार से पलायन कर सकता। जो हमें आज ईश्वर ने दिया है, वह सबको नहीं दिया। आज भी वह दोस्त मेरी आंखों के सामने नजर आता है। उसकी मां और उसके हाथ की लाप्सी रोटी का सात्विक स्वाद।

कुंती ने कृष्ण से यही तो मांगा था। अगर कष्ट में आपकी याद आती है, आप हमारे करीब होते हो, तो थोड़ा कष्ट ही सही, थोड़ा अभाव ही सही। जीवन में कुछ दोस्त ऐसे बने रहें, जिनके बीच हम सिर्फ इंसान बने रहें। कितनी दीवारें, कितने क्लब और सर्कल हमें मानवीय मूल्यों से जोड़ रहे हैं, अथवा तोड़ रहे हैं, हमसे बेहतर कौन जान सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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