हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग- २६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

29 जुलाई को पूर्वाह्न दस बजे हरिद्वार से नैनीताल की यात्रा आरम्भ की। अब हमारी दाहिनी तरफ़ गंगा का तेज बहाव और बाईं तरफ़ हिमालय तराई से जुड़ी पहाड़ियाँ और उनसे निकलती पहाड़ी नदियाँ और इन पर बने पुलों से गुज़रते मनमोहक दृश्य की क़तार साथ लिए बढ़ चले।

आधा घंटा चलने के बाद उत्तर प्रदेश का बिजनौर जनपद लग गया। एक बड़ी बस्ती निज़ामाबाद आई। जिसकी बसावट इतिहास की एक बड़ी घटना से जुड़ी है। पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान मे हुआ जो वर्तमान समय में हरियाणा में है, इस युद्ध में तोपची इब्राहीम ख़ाँ गार्दी ने मराठों का साथ दिया था। दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। अवध के तराई इलाक़े पर एक अफ़ग़ान सरदार नजीबुल्लाह का क़ब्ज़ा था। उसने अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने बुलाया था। उसने ही नजीबाबाद बसाया था।

नवाब नजीब-उद-दौला, जिसे नजीब खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध रोहिल्ला मुस्लिम योद्धा और मुगल साम्राज्य और दुर्रानी साम्राज्य दोनों का रणनीतिकार योद्धा था। नजीब-उद-दौला 18 वीं शताब्दी के रोहिलखंड में एक प्रसिद्ध रोहिल्ला आदिवासी प्रमुख था, जिन्होंने 1740 के दशक में बिजनौर जिले में नजीबाबाद बसाया और “नवाब नजीब-उद-दौला” की उपाधि धारण की। 1757 से 1770 तक वह देहरादून पर शासन करते हुए सहारनपुर का गवर्नर था। वह मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के एक समर्पित सैनिक था; बाद में अपने करियर में उन्हें नवाब नजीब-उद-दौला के नाम से जाना जाने लगा। उस अवधि के कई स्थापत्य अवशेष नजीबाबाद में हैं, जिन्हें उन्होंने मुगल मंत्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाई पर बनवाए थे। उन्होंने सफदरजंग को वजीर के रूप में उत्तराधिकारी बनाया।

नजीब-उ-दौला की मृत्यु के बाद, उनका पुत्र जबीता खान  उनका उत्तराधिकारी बना। उनका कब्रिस्तान आज भी नजीबाबाद में है। नजीबाबाद में सुल्ताना डाकू या “द सुल्तान बैंडिट” का अड्डा था। जिसके खंडहर अभी भी नजीबाबाद में स्थित है। नजीबाबाद शहर को “हिमालय का प्रवेश द्वार” और “शहरों का शहर” के रूप में भी जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश का पिछड़ापन उजागर होने लगा। दो घंटे चलने के बाद उत्तराखंड के ऊधमपुर ज़िले का इलाक़ा लगते ही साफ़ सफ़ाई और विकास के दर्शन हुए। एक ढ़ाबे पर खाना खाकर रामनगर की तरफ़ यात्रा शुरू की। अब मुरादाबाद जनपद लग गया।

मुरादाबाद उत्तर प्रदेश में एक ज़िला, आयुक्त और नगर निगम है। मुरादाबाद राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से 167 किमी की दूरी पर और राज्य की राजधानी लखनऊ से 344 किमी उत्तर-पश्चिम में रामगंगा नदी के तट पर स्थित है। मुगल बादशाह शाहजहां के तहत कटेहर के सिपाहसालार रुस्तम खान ने बादशाह के सबसे छोटे बेटे राजकुमार मुराद बख्श के नाम पर बस्ती का मुरादाबाद नाम रखा था। इसकी स्थापना के तुरंत बाद, बादशाह ने संभल को भी कटेहरा के अधीन कर दिया। मुरादाबाद को बाद में 1740 में अली मोहम्मद खान द्वारा रोहिलखंड राज्य में मिला दिया गया था। पहले रोहिल्ला युद्ध में रोहिलों के पतन के बाद 1774 में अवध राज्य के नियंत्रण में आ गया था और फिर 1801 में नवाब द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, रोहिलखंड क्षेत्र को रामपुर की रियासत और दो जिलों – बरेली और मुरादाबाद में विभाजित किया गया। उत्तर प्रदेश के उसी मुरादाबाद ज़िला की एक बड़ी बस्ती काशीपुर से उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले में प्रवेश किया।

अंग्रेज वन्य जन्तुओं की रक्षा करने के शौकीन थे। सन् 1935 में रामगंगा के इस अंचल को वन्य पशुओं के रक्षार्थ सुरक्षित किया गया। उस समय के गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम ‘हेली नेशनल पार्क’ रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इस पार्क का नाम ‘रामगंगा नेशनल पार्क’ रख दिया गया। विश्व में जिम कार्बेट नाम एक प्रसिद्ध शिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। जिम कार्बेट जहाँ अचूक निशानेबाज थे वहीं वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे।

आज यह पार्क इतना समृद्ध है कि इसके अतिथि-गृह में 200 अतिथियों को एक साथ ठहराने की व्यवस्था है। यहाँ आज सुन्दर अतिथि गृह, केबिन और टेन्ट उपलब्ध है। खाने का उत्तम प्रबन्ध भी है। ढिकाला में हर प्रकार की सुविधा है तो मुख्य गेट के अतिथि-गृह में भी पर्याप्त व्यवस्था है।

रामनगर रेलवे स्टेशन से 12 कि॰मी॰ की दूरी पर ‘कार्बेट नेशनल पार्क’ का गेट है। रामनगर रेलवे स्टेशन से छोटी गाड़ियों, टैक्सियों और बसों से पार्क तक पहुँचा जा सकता है। बस सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। दिल्ली से ढिकाला तक बस आ-जा सकती है। यहाँ पहुँचने के लिए रामनगर कालागढ़ मार्गों का भी प्रयोग किया जा सकता है। दिल्ली से ढिकाला 297 कि॰मी॰ है। दिल्ली से गाजियाबाद- हापुड़- मुरदाबाद- काशीपुर- रामनगर होते हुए ढिकाला तक का मार्ग है। मोटर की सड़क अत्यन्त सुन्दर है।

पहाड़ी हिमालय का तराई क्षेत्र फिर शुरू हो गया। रामनगर पहुँच कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के गेट पर पहुँचे। जिप्सी की बुकिंग कर हल्की बूंदाबाँदी के बीच तीन घंटे पार्क भ्रमण किया। दोपहर के समय खुले क्षेत्र में हिरण, नीलगाय, मोर दिखे लेकिन राजा साहिब किसी गुफा में आरामतलबगीर थे।

फिर कॉर्बेट संग्रहालय देखा। उनके साहसिक जीवन और लेखन की यादों के साथ कुछ समय वहाँ गुज़ारा। अब हम एक बहुत ही शानदार इंसान जिम कार्बेट के इलाक़े में हैं। उनकी कहानी न सिर्फ़ रोचक बल्कि रोमांचक भी है।

एडवर्ड ज़िम कॉर्बेट (25 जुलाई 1875 – 19 अप्रैल 1955) एक ब्रिटिश शिकारी, वन्यप्रेमी, प्रकृतिवादी और लेखक थे, जिन्होंने भारत में कई आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार करके भोलेभाले ग्रामीणों को भययुक्त किया था। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में कर्नल का पद धारण किया और उनको तात्कालिक आगरा और अवध के संयुक्त प्रांतों की सरकार द्वारा आदमखोर बाघों और तेंदुओं को मारने के लिए बुलाया जाता था।

जिम कॉर्बेट का जन्म कुमाऊं के नैनीताल शहर में ब्रिटिश परिवार में 25 जुलाई 1875 को हुआ था। वह क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और उनकी दूसरी पत्नी मैरी जेन की आठवीं संतान थे। मैरी जेन के पहले पति आगरा के डॉ चार्ल्स जेम्स डॉयल थे, जिनकी मृत्यु 1857  के संग्राम में इटावा में हो गई थी। मैरी जेन अपने तीन बच्चों के साथ नैनीताल भाग कर जान बचाने में कामयाब रहीं। क्रिस्टोफर कॉर्बेट सैन्य सेवा से निवृत्त होने के बाद नैनीताल शहर के पोस्टमास्टर नियुक्त होकर 1862 में नैनीताल चले गए थे। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। नैनीताल में उनकी मुलाक़ात मैरी जेन  से हुई। दोनों ने शादी कर ली। उन दोनों के नौ बच्चे हुए, क्रिस्टोफर कॉर्बेट के रिश्तेदार के 1857 संग्राम में मारे गए, रिश्तेदारों के तीन बच्चे और मैरी जेन के तीन बच्चे इस प्रकार पंद्रह बच्चों के भीड़ भरे परिवार में ज़िम का उम्रदराज़ नम्बर ऊपर से चौदहवाँ था। परिवार नैनीताल में रहता था परंतु सर्दियों में तलहटी में चला जाता था, जहाँ उनके पास गाँव में “अरुंडेल” नामक एक झोपड़ी थी, जो अब कालाढुंगी के नाम से एक बड़ी बस्ती हो गई  है।

1891 तक कुमांऊँ कमिश्नरी में कुमांऊँ, गढ़वाल और तराई के तीन जिले शामिल थे। उसके बाद कुमांऊँ को अल्मोड़ा व नैनीताल दो जिलों में बाँटा गया। ट्रैल, लैशिगंटन, बैटन, सर हेनरी रामसे आदि विभिन्न कमिश्नरों ने कुमांऊँ में समय-समय पर विभिन्न सुधार तथा रचनात्मक कार्य किए। जमीन का बंदोबस्त, लगान निर्धारण, न्याय व्यवस्था, शिक्षा का प्रसार, परिवहन के साधनों की उपलब्धता के कारण अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान कुमांऊँ की खूब उन्नति हुई। हेनरी रामसे के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं- ‘उनको कुमांऊँ का बच्चा-बच्चा जानता है। वे यहाँ के लोगों से हिल-मिल गए थे। घर-घर की बातें जानते थे। पहाड़ी बोली भी बोलते थे। किसानों के घर की मंडुवे की रोटी भी खा लेते थे।’ अंग्रेजों ने शासन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार किए, वहीं अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोरतम न्याय व्यवस्था स्थापित की, जो अब नैनीताल के उच्च न्यायालय के रूप में साकार है।

मैरी जेन यूरोपीय लोगों के बीच नैनीताल के सामाजिक जीवन में बहुत प्रभावशाली महिला थीं और वह एक तरह की रियल एस्टेट एजेंट बन गईं। क्रिस्टोफर विलियम 1878 में पोस्टमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। 21 अप्रैल 1881 को दिल का दौरा पड़ने के कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। जिम तब छह वर्ष के थे और उनके सबसे बड़े भाई टॉम ने नैनीताल के पोस्टमास्टर के रूप में पदभार संभाला। बहुत कम उम्र से, जिम कालाढुंगी में अपने घर के आसपास के जंगलों और वन्य जीवन पर मोहित हो गया था। लगातार भ्रमण से उन्होंने अधिकांश जानवरों और पक्षियों को उनकी आवाज़ से पहचानना सीखा। समय के साथ वह एक अच्छा ट्रैकर और शिकारी बन गया। उन्होंने ओक ओपनिंग स्कूल में अध्ययन किया, जो नैनीताल में फिलेंडर स्मिथ कॉलेज, जिसे बाद में हैलेट वॉर स्कूल के रूप में जाना जाता है, और अब बिड़ला विद्या मंदिर, नैनीताल में विलय हो गया। उन्नीस साल की उम्र से पहले उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बंगाल और उत्तर पश्चिम रेलवे में नौकरी कर ली। शुरू में एक ईंधन निरीक्षक के रूप में काम किया, और बाद में बिहार के मोकामा घाट पर गंगा के पार माल के ट्रांस-शिपमेंट के लिए एक ठेकेदार के रूप में काम किया। जिम कॉर्बेट ने मोकामा घाट पर रेलवे कर्मचारियों के लिए एक स्कूल शुरू किया।

अपने जीवन के दौरान जिम कॉर्बेट ने कई आदमखोर तेंदुओं और बाघों का पता लगाया और उन्हें गोली मार कर इलाक़े के बाशिंदों को डर से निजात दिलाई। लगभग एक दर्जन अच्छी तरह से प्रलेखित आदमखोर थे। कॉर्बेट ने अपनी पुस्तकों में मानव हताहतों का ब्योरा प्रदान किया है, जिसमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ, चंपावत टाइगर और द टेंपल टाइगर और कुमाऊं के आदमखोर शामिल हैं। ब्रिटिश और भारतीय सरकारों के रिकॉर्ड के अनुसार इन आदमखोर ने 1,200 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला था। इसलिए आदमखोरों को जीने का अधिकार नहीं था।

पहला नामित आदमखोर बाघ, चंपावत टाइगर अनुमानित 436 प्रलेखित मौतों के लिए जिम्मेदार था। 1910 में पनार तेंदुआ था, जिसने कथित तौर पर 400 लोगों को मार डाला था। 1926 में रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ था, जिसने आठ साल से अधिक समय तक बद्रीनाथ की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को आतंकित किया, और 126 से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार बताया गया। उसके द्वारा मारे गए अन्य उल्लेखनीय आदमखोरों में तल्ला-देस आदमखोर, मोहन आदमखोर, ठक आदमखोर, मुक्तेसर आदमखोर और चौगढ़ बाघिन थे।

खतरनाक शिकारी खेल का पीछा करते हुए कॉर्बेट अकेले और पैदल शिकार करना पसंद करते थे। वह अक्सर एक छोटा कुत्ता रॉबिन के साथ शिकार करते थे, जिसके बारे में उन्होंने कुमाऊं के आदमखोरों किताब में लिखा था।

कॉर्बेट ने 1920 के दशक के अंत में अपना पहला कैमरा खरीदा और अपने दोस्त फ्रेडरिक वाल्टर चैंपियन से प्रेरित होकर सिने फिल्म पर बाघों को रिकॉर्ड करना शुरू किया। हालाँकि उन्हें जंगल का घनिष्ठ ज्ञान था, लेकिन अच्छी तस्वीरें प्राप्त करना एक कठिन काम था, क्योंकि जानवर बेहद शर्मीले थे।

उन्होंने कुमाऊं हिल्स में भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान, हैली नेशनल पार्क की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नाम शुरुआत में लॉर्ड मैल्कम हैली के नाम पर रखा गया था। 323.75 किमी 2 (125.00 वर्ग मील) को कवर करने वाले हैली नेशनल पार्क के रूप में जाना जाने वाला एक आरक्षित क्षेत्र 1936 में बनाया गया था, जब सर मैल्कम हैली संयुक्त प्रांत के गवर्नर थे; और एशिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान अस्तित्व में आया। 1954-55 में रिजर्व का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया और 1955-56 में इसका नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया। इंडोचाइनीज टाइगर का नाम जिम कॉर्बेट के नाम पर 1968 में व्रातिस्लाव माज़क द्वारा रखा गया था, जो दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले बाघ की नई उप-प्रजातियों का वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1968 में, बाघों की पांच शेष उप-प्रजातियों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा गया था: पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी, इंडोचाइनीज़ टाइगर, जिसे कॉर्बेट का बाघ भी कहा जाता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९७ ☆ गीत – ।। पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९७ ☆

☆ गीत ।। पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

पैसों के लिए दोस्ती पैसे का याराना है।

आ गया यह कैसा  अजब सा जमाना है।।

***

पैसे की गुलाम बनती   जा रही है दुनिया।

मतलब परस्त सी ढलती जा रही है दुनिया।।

अच्छे कर्मों से अब नाम नहीं कमाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

****

कुछ के अच्छे कर्मों से संसार चल रहा है।

मानवता नाम अभी जिंदा सा लग रहा है।।

रिश्ते भी दिखते जैसे पैसों का दोस्ताना है।

पैसों के लिए दोस्ती,  पैसे का याराना है।।

***

भूल गए लोग किअपनों का साथ जरूरी है।

सुख बढ़ता दुख बंटता यह इसकी दस्तूरी है।।

बना आज कल जिंदगी का गजब फसाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २४ – कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋतु वसंत“.)

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २४ ?

? कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

क्या कविता-गीत लिखूँ तुम पर, तुम ख़ुद हो गीत-ग़ज़ल साथी

तुम कली हो तुम ख़ुद तितली हो, तुम ख़ुद हो खिला कमल साथी ll

=2=

इतना है प्रेम प्रगाढ़ मेरा, जीना तुम बिन दुश्वार मेरा

धड़कन कहती दिल भी कहता, तुम बिन हर पल है विकल साथी ll

=3=

अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, तुम साथ निभाना सुख-दुःख में

फ़िर देखो सजा-सुसज्जित सा, अपने ख़्वाबों का महल साथी ll

=4=

शर्मो-हया के दल-दल में, देखो मैं दला सा जाता हूँ

बातें मैं न कर पाऊँगा, अब तुम ही करो पहल साथी ll

=5=

हो बहार जीवन में संगी, रहे न शिकवा-गिला कोई

हर लम्हा ख़ुशनुमा सजीला, जीवन जाए सम्हल साथी ll

=6=

जब दौर बुरा आये कोई, तब साथ मेरे रहना ऐसे

ज्यों परछाई रहती है, संग रहना तुम हर पल साथी ll

=7=

मुस्कान चाँदनी जैसी है, स्वर कोई मधुर कोकिला सा

दुनिया में चीज़ हसीं जितनी, लगती है तेरी नकल साथी ll

=8=

तुम हो सतरंगी इन्द्रधनुष, मेरे जीवन नभ-मण्डल पर

हुआ बसेरा मन में जबसे, दिल में मची हलचल साथी ll

=9=

ओझल यूँ न होना नज़र से, बस यही इल्तिज़ा है मेरी

दूर हुई तुम कुछ क्षण को भी, ये दिल न जाए मचल साथी ll

=10=

विकट क्षणों में जीवन के तुम, सदा निभाना साथ मेरा

बनना ऐसा मेरा सहारा, ज्यों ग्रंथों की रहल साथी ll

=11=

ऋतु वसंत आयी मादकमयी, रंग पर्व रंगीला

दिल निश्छल यह प्रेम अटल, यह इश्क़ रहे अव्वल साथी ll

=12=

फाल्गुन मादक मस्त अहा, रंगीला नशीला महीना

महुआ ज्यों मदमत्त होके, सब दूर करें अटकल साथी ll

=13=

जीवन क्यों बदरंग रहे, इस रंग-बिरंगी होली में

‘राजेश’ रंग दूँ गाल तेरे, तू साथ मेरे अब चल साथी ll

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३६ ⇒ कंधा और बोझ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंधा और बोझ ।)

?अभी अभी # ९३६ ⇒ आलेख – कंधा और बोझ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाथ जहां से शुरू होते हैं, उसे कंधा कहते हैं जितने हाथ उतने ही कंधे।

अक्सर हम जिन हाथों को मजबूत करने की बात करते हैं, वे खुद मजबूत कंधों पर आश्रित होते हैं।

अगर कंधा कमजोर हुआ, तो हाथ किसी काम का नहीं। फिल्म नया दौर में दिलीप साहब हाथ बढ़ाने की बात करते हैं। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। यहां पूरा बोझ तो कंधों पर है, और श्रेय हाथ ले रहे हैं।

एक फिल्म आई थी जागृति। उसमें भी कुछ ऐसा ही गीत था। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यानी पूरा बोझ बेचारे मासूम बच्चों पर। क्या आपको उनके कंधों पर लदे भारी बस्ते का बोझ नजर नहीं आता। और पूरे देश का बोझ उन पर लादने चले हो। बच्चे की जान लोगे क्या।।

हम जब छोटे थे तो कुछ औरतों को सर पर टोकनी उठाए देखते थे। किसी में सब्जी तो किसी में बर्तन।

ये मोहल्ले में फेरी लगाती थी। बर्तन वाली औरतें घर के पुराने कपड़ों के एवज में नए घर गृहस्थी के बर्तन देती थी। एक तरह का एक्सचेंज ऑफर था यह।

कपड़े दे दो, बर्तन ले लो, पैसे दे दो, जूते ले लो, की तर्ज पर। याद कीजिए फिल्म, हम आपके हैं कौन।

ऐसी ही कोई कपड़े बर्तन वाली औरत राह चलते, हमें रोक लेती थी। बोझा जब जमीन पर होता है, तो उसे सर पर लादने के लिए किसी की मदद लेनी पड़ती है। जब वह हमसे मिन्नत करती, बेटा जरा हाथ लगा दो, बहुत भारी है, तो हम पहले आसपास देखते थे, लेकिन फिर अनिच्छा से ही सही, हाथ लगा ही देते थे। वाकई, बोझा बहुत भारी होता था। कुछ समय के लिए हम सोच में भी पड़ जाते थे, इतना वजन, यह औरत कैसे उठा लेती है, लेकिन फिर सजग हो, अपने रास्ते चल पड़ते थे। उसकी दुआ जरूर हमें सुनाई देती थी, जिसे हम भले ही अनदेखा कर देते थे, लेकिन मन में किसी को मदद की संतुष्टि का भाव फिर भी आ ही जाता था।।

किसके कंधों पर कितनी जिम्मेदारियों का और कितनी मजबूरियों का बोझ है, यह केवल वह ही जानता है। शरीर के बोझ से मन का बोझ अधिक भारी होता है, लेकिन आप मानें या ना मानें, वह बोझ भी यही कंधे ढोते रहते हैं।

किसी के झुके हुए कंधों से ही पता चल जाता है, यह बेचारा, काम के बोझ का मारा, कुछ लेते क्यों नहीं, हमदर्द का सिंकारा।

जब बच्चे थे, तो पिताजी के कंधे पर बैठकर घूमने जाते थे। बड़े खुश होते थे, हम कितने बड़े हो गए हैं। जब असल में बड़े हुए तो असलियत पता चली, हमारे कंधों पर कितना बोझ है।।

चलो रे, डोली उठाओ कहार, पीया मिलन की रुत आई। लेकिन आजकल कहां कहार भी डोली उठाते हैं। चार पहियों की चमचमाती कार से, ब्यूटी पार्लर से सज धजकर आई दुल्हन, विवाह मंडप में प्रवेश करती है। कंधों से अधिक, कानों पर डायमंड इयररिंग्स का बोझ।

जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए, जब इंसान यह संसार छोड़ता है तो चार कंधों की अर्थी पर ही जाना पड़ता है। यानी जन्म से अंतिम समय तक कंधे का साथ नहीं छूटता। अर्थी का बोझ भी मजबूत कंधे ही उठा पाते हैं। हमने तो जिधर भी कंधा लगाया है, अर्थी उधर ही झुकी है। कहीं से लपककर मजबूत कंधे आते हैं, और अर्थी से अधिक हमें राहत महसूस होती है। ईश्वर ना करे, हमें कभी किसी को कंधा देना पड़े, बोझ के मारे, हमारा कंधा उतर भी सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६० ☆ कविता – इस दुनियाँ में… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – इस दुनियाँ में…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६०

☆ इस दुनियाँ में…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

इस दुनियाँ में सबसे सुन्दर अनुपम भारत देश है

अपने में अपना सा प्यारा इसका हर परिवेश है ।।

इस दुनियाँ में…

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण बिखरा अति सौंदर्य है

वन, मरूथल, पर्वत, नदियों मंदिरों में भी आश्चर्य है

प्राकृत सुषमा, हरे भरे खेतों में अजब मिठास है

हर प्रदेश का खान-पान कुछ भिन्न है, मोहक वेश है || 1 ||

इस दुनियाँ में…

उत्तर, ओड़ीसा, कर्नाटक अलग नृत्य संगीत है

खान पान जीवन पद्धति में सबकी अपनी रीति है

फिर भी सब हैं सरल भारतीय, संस्कृति अनुपम एक सी

गंगोत्री से रामेश्वर तक धार्मिक भाव विशेष है || 2 ||

इस दुनियाँ में…

राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हर मन की पावन चाह है

प्रगति हिमालय सी संवृद्धि हो जैसे सिन्धु अथाह है

जीवन सबका निर्मल मन पावन हो कर्मठ भावना

भारत का युग युग से “बंधुता’ प्रेम रहा संदेश है ||3||

इस दुनियाँ में…

सकल देश में दूर छोर तक सरल सादगी व्याप्त है।

अभ्यागत का स्वागत मन से करना सबको आप्त है।

धार्मिक मर्यादाओं का सभी निर्वाह सदा हर हाल में

हरेक निवासी के मन में बैठा पूर्वज आदेश है ||4||

 *

इस दुनियाँ में सबसे सुंदर अनुपम भारत देश है।

जिसके आध्यात्मिक वैभव की चर्चा देश-विदेश है ।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को पांचवां सविता कथा सम्मान – अभिनंदन ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को पांचवां सविता कथा सम्मान – अभिनंदन ☆ 

सविता कथा सम्मान का यह पांचवां वर्ष है। इसे प्रतिवर्ष चयनित महिला कथाकार को दिया जाता है। इसे श्रीमती सविता दानी की स्मृति में प्रारंभ किया गया है। यह देश का विशिष्ट सम्मान है। इस वर्ष इसे प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को दिया जा रहा है। सोनी पांडेय आजमगढ उत्तर प्रदेश में निवास करती हैं।

अन्विति पत्रिका, पहल और सविता कथा सम्मान आयोजन समिति के द्वारा आयोजित यह सम्मान समारोह आज 7 मार्च 2026 को संध्या 7 बजे डा हीरालाल कला वीथिका, रानी दुर्गावती संग्रहालय, भंवरताल जबलपुर में संपन्न होगा। प्रसिद्ध शिल्पकार व लेखिका शम्पा शाह, भोपाल यह पुरस्कार प्रदान करेंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवियत्री सविता भार्गव करेंगी। कार्यक्रम का संचालन कथाकार श्रद्धा श्रीवास्तव करेंगी।

जबलपुर शहर के इस प्रतिष्ठा आयोजन में आप सादर आमंत्रित हैं। कृपया अवश्य पधारें। कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह राजेन्द्र दानी, शरद उपाध्याय, योगेन्द्र श्रीवास्तव, विवेक चतुर्वेदी, कुंदन सिद्धार्थ, हिमांशु राय व सभी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं ने किया है।

💐 ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से कथाकार सोनी पांडेय जी को इस विशिष्ट उप्लब्धि के लिए हार्दिक बधाई 💐

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हेचि दान देगा देवा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ हेचि दान देगा देवा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

पाहीले मी

एक स्वप्न नवे

दूर गवताचे हिरवेगार,

गालीचे होते पसरले…

 

नदी नाले

ओसंडून वाहत होते,

नाद खळाळत्या पाण्याचा

कानात घुमतो आहे..

 

प्रत्येकाच्या

होते सुहास्य वदनी,

मतमतांतरे होती

मन भिन्नता मात्र नव्हती..

 

नव्हते कुणाच्याही

मनात जातीपातीचे किल्मिषे

धार्मिक सण साजरी होई

उत्साने, आनंदाने..

 

स्वप्नात पाहीले

ते सत्यात उतरु दे

राहू दे गुण्यागोविंदाने

देवा हेचि दान दे…

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ अंकुरित आभाळ… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

सुरेखा चिखलकर

संक्षिप्त परिचय 

सुरेखा महिपती चिखलकर

शिक्षण – B.A. मराठी
दिव्यांग – 80% दोन्ही पायांनी

सध्या सामाजिक कार्य, कवयित्री, ब्यूटी पार्लर आणि लेडीज शॉप चालवते. सामाजिक कार्यासाठी महाराष्ट्र शासनाचा पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर पुरस्कार, आणि साहित्यिक 30 आसपास पुरस्कार.वाचन आणि लेखन अविरत चालू आहे…

 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ अंकुरित आभाळ… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

अजाणत्या वयात कळत नव्हते काही

सर्वासारखे मला उभे राहता येत नाही…

*

पण याच जमिनीत एक स्वप्नांचा अंकुर रुजला ,

पंख नसतानाही आभाळाकडे झेप घेण्याचा ध्यास लागला..

*

दोन्ही हात जमिनीवर उड्या मारण्याची हौस भारी ,

पण ह्याच जिद्दीतून फुलली माझ्या अस्तित्वाची गाथा खरी..

*

कळले जेव्हा बालमनाला दोष दिला नाही देवाला

आरूढ झाले दैवावरती केली सुरवात शिकण्याला…

*

केली चिरफाड पायांची जिद्द होती उभे राहण्याची

 नशिबाने दिली आस मिळाली साथ कुबड्यांची …

*

शिक्षणाची पायरी दिवसेंदिवस चढत नव्या उमेदीने घडत होते,

लेखणीच्या बळावर मी आभाळालाही स्पर्श करत होते…

*

तुटले होते पंख जरी घेतली झेप उडण्यासाठी

अंकुरलेल्या स्वप्नांना कवेत घेण्यासाठी…

*

बनेल उदाहरण प्रत्येकाला सोडून लाचारी भिड आयुष्याला

थकतील पाय जरी पथ चाल तू घडण्याला…

*

नाही  आशा मला उद्याची धडपडते मी मनोरुग्णांसाठी,

मांडते रोज नवा डाव स्वतःशीच पुन्हा जिंकण्यासाठी..

*

धन्य ती माझी मायमाउली  उभी मी आज तिच्यासाठी,

जोपासले तिने कष्टाने ताठमानेने लढण्यासाठी…

*

ऋण तुझे फेडण्यास आई नको दुसरी ओटी,

पुन्हा पुन्हा जन्म मिळो माय तुझ्याच ग पोटी

🙏 

© सुरेखा महिपती चिखलकर

गोटखिंडी, तालुका वाळवा

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ नमस्कार… ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ नमस्कार☆ सौ शालिनी जोशी

नमस्कार

भारतीय संस्कृतीचे एक विलोभनीय वैशिष्ट्य म्हणजे नमस्कार. नमस्कारायची सुरुवात सकाळी उठल्यापासूनच होते.

‘समुद्र वसने देवी पर्वतस्तन मंडले l विष्णू पत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे’

समुद्र, पर्वत यांना धारण करणाऱ्या विष्णुपती लक्ष्मीला पदस्पर्श करण्याआधी तिला नमस्कार करून तिची क्षमा मागणारी आपली संस्कृती आहे. भूमी विषयी कृतज्ञता व्यक्त करण्याचा, आदर व्यक्त करण्याचा भाव यात आहे. नंतर स्नान झाल्यावर देवाला, आई-वडिलांना, घरातील जेष्टाना, गुरुना नमस्कार करणे व त्यांचे आशीर्वाद घेणे दोन्ही तितकेच महत्त्वाचे. नमस्कारात प्रेम, आदर, नम्रता, सद्भाव आहे.त्यानंतर मिळणारा आशीर्वाद दिवसभराच्या कार्याला यश देणारा,सत्कार्याची प्रेरणा देणारा असतो.

नमस्काराला वंदन,नमन, प्रणाम, प्रणिपात, अभिवादन, असे प्रतिशब्द आहेत. विनय हे नमस्काराचे मूळ आहे. दोन्ही तळवे एकमेकांना चिकटून सरळ छातीवर, आणि मस्तक श्रद्धेने वाकलं की नमस्कार होतो. तेथे अहंकार नाही. नम्रता, आदर, प्रेमभाव असावा. वंदन म्हणजे नमस्कारच पण श्रद्धा जास्त. ‘वंदे मातरम्’ म्हणून मातृभूमीला तसेच ध्वजवंदन म्हणजे ध्वजाला वंदन करतात. नवविधाभक्ती मध्ये वंदन भक्ती आहे.

देव, गुरु,आचार्य, सत्पुरुष यांना साष्टांग नमस्कार करतात. साष्टांग म्हणजे स अष्टांग, आठ अंगे जमिनीला टेकून केलेला नमस्कार. दोन पाय, दोन गुडघे, दोन हात, नाक व कपाळ. यात पूर्ण शरणागती व्यक्त होते. हाच प्रणिपात ऋजुता, नम्रता सांगणारा.

सूर्यनमस्कार ही भारतीय संस्कृतीतील श्रेष्ठ नमस्कार पद्धती आहे.हे बारा भागात घातले जातात. याचे शारीरिक व मानसिक फायदे आहेत. व्यायाम व आसने दोन्ही साधतात. कोणत्याही साधनाशिवाय करायची ही भारतीय पद्धत आता जगन्मान्य झाली आहे.

आपली संस्कृती सर्वाभूती परमेश्वर पाहणारी आहे.त्यामुळे ‘दीपज्योती नमोस्तुते’ म्हणून साऱ्या तेज तत्वाला नमस्कार. नदीतही मनुष्यत्व बघून तिची ओटी भरून नमस्कार केला जातो. समुद्राला नारळ आपण करून जलतत्त्वाची पूजा असते. वृक्ष पूजा तर सर्वांना माहीतच आहे. एकंदरीत नमस्कार भारतीय संस्कृतीचे सौंदर्य आहे. चूक झाल्यास नमस्कार करून माफी मागितली म्हणजे तोच नमस्कार संरक्षक कवच होतो. भारतात धर्म,भाषा, वेशभूषा यात विविधता असली तरी नमस्कार सगळ्यात आहे. प्रपंच्यात, परमार्थात, स्वागत आणि निरोपातही नमस्काराला स्थान आहे. समोरच्या व्यक्तीला रामराम म्हणून नमस्कार करणे म्हणजे स्वतःच्या व दुसऱ्याच्या हृदयस्थ रामाला नमस्कार होतो. सर्वात तोच आत्मा हा भाव समानता प्रस्थापित करतो. आपोआप राग, द्वेष दूर होतात. दोषरहीत दृष्टीने सर्वत्र भगवंत पाहणे हीच नमन भक्ती.

ग्रंथारंभी किंवा शुभकार्याच्या आरंभी संबंधित सर्वांना नमस्कार करण्याची प्रथा आहे. यातून कार्यपूर्तीसाठी त्यांचे आशीर्वाद मिळतात. ग्रंथाची सुरुवात ‘श्री गणेशाय नमः’ने करतात.‘नमस्ते नमस्ते’ असे दोनदा म्हणल्याने त्याची तीव्रता वाढते.’ सर्वदेव नमस्कार: केशवं प्रतिगच्छति l’हा विश्वात्मक भाव नमस्कारातून व्यक्त होतो. गुरु हा नेहमी वयाने मोठा असतो असे नाही. तेव्हा आपल्यापेक्षा लहान गुरु असतात तरी त्याला नमस्कार करावा. हा त्या गुरुतत्त्वाचा मान असतो. कन्या पूजनाच्या वेळी कुमारीकेला व बटू पूजनाच्या वेळी बटूला नमस्कार करतात. डोळे मिटून देवतेला नमस्कार करताना देवतेचे ध्यान होऊन सुख समाधान प्राप्त होते.मानसिक आरोग्य चांगले राहते.

नमस्काराचे सुद्धा वेगवेगळे प्रकार आहेत. हाताने पायाला स्पर्श करून मस्तक खाली वाकवतात. काहीजण चरणावर मस्तक ठेवतात. काहीजण हस्तालोंदन करतात. कोणी आलींगन देतात. कोणी नुसतेच कमरेत वाकतात. तर कोणी टोपी, पागोटे काढतात. पत्रातही ज्याला आपण पत्र लिहितो, त्याला नमस्कार लिहून मग लिखाणाला सुरुवात केली जाते. अशा प्रकारे नमस्कार हा साधा, सोपा, बिन कष्टाचा पण लाभदायक आहे.

 या कारणें नमस्कार श्रेष्ठ l नमस्कारें वोळती वरिष्ठ ll

(दा.४/६/२५)

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ परीक्षा… ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ ‘परीक्षा…’ ☆ सुश्री संध्या बेडेकर ☆

” दुःख माणसाच्या धैर्याची परीक्षा घेत असत..”

अजय अनिता दोघे ही एकाच college मधे शिकत होते.•• दोघे ही हुषार. त्यामुळे लगेचच चांगल्या नोकऱ्या मिळाल्या. हेही त्यांच्या लक्षात आले की They are in love. तेंव्हा त्यांनी लग्न करायचे ठरविले. दोघांच्या घरी एकमेकांची माहिती होतीच, त्यामुळे लगेचच दोन्ही घरचे भेटले व लग्न ठरलं.••••

अनिता ने मात्र सर्वांसमोर एक अट ठेवली. ती म्हणाली••• मी एकत्र कुटुंबात राहणार नाही. हे ऐकून अजय व त्यांचे आई-वडील तर चकित झालेच ,बरोबर अनिता चे आई-वडील पण अनिता कडे आश्चर्याने बघू लागले ••

लगेचच अजय चे बाबा म्हणाले, ठीक आहे. मला अनिता चे कौतुक वाटतं की तिने हे लग्नाआधी सर्वांसमोर सांगितले.•••थोडा वेळ द्या आम्हाला .••• आपण उद्या पुन्हा भेटू व पूढचे ठरवू .असं म्हणून बाबांनी परिस्थिती सांभाळुन घेतली.•••

घरी येताना सर्व शांत होते .अजय व आई खूप disturb आहे .हे बाबांच्या लक्षात आले .

घरी आल्यावर बाबा म्हणाले ••••

अरे !! तुम्ही वेगळे राहिला तर आम्हाला काही हरकत नाही .••जवळ राहिलं म्हणजेच प्रेम असत का ? अनिता चांगली मुलगी आहे. तुम्ही दोघे एकमेकांना मागच्या पाच वर्षांपासून ओळखता. चांगली शिकलेली आहे .दिसायला सुंदर आहे. मुख्य म्हणजे तुला आवडते ना •••.मग आम्हाला काही हरकत नाही ••

.आजी मात्र नाखुश होत्या. त्यांनी एकुलत्या एक सुनेबद्दल बघीतलेली सर्व स्वप्न एका क्षणात संपल्यासारखी त्यांना वाटलं. •••.अजय फक्त ऐकत होता .••••

दुसऱ्यां दिवशी अजयने अनिताला समजविण्याचा खूप प्रयत्न केला .पण काही उपयोग झाला नाही .••••

बाबां मात्र आईला समजविण्यात यशस्वी झाले.•• मुलांच्या सुखासाठी व आनंदासाठी आई वडील नेहमीच कोणतेही निर्णय लवकर घेतात.••कोणत्याही प्रकारची तडजोड करायला ते लगेच तयारी दाखवतात .••••

आता अजय अनिता चा संसार सुरू झाला. आई बाबांनी स्वतः लक्ष देऊन त्यांच्या घरातील सर्व सामान अनिता च्या पसंती ने घेतले .••अगदी चमच्या पासून फ्रीज पर्यंत सर्व वस्तू घरात तयार होत्या ••••.

दोघांची नोकरी होती. अजय आठवड्यातून एकदा घरी यायचा ••.येताना फोन करून , विचारून पिशव्या भरभरून तो आई बाबांकरिता त्यांची औषधे ,फळ ,भाज्या आणून देत असे .•••

बाबा म्हणायचे. अरे !!मग मी काय करू??? आम्हाला बाहेर जायचे कारणच मिळत नाही.•• तेंव्हा अजय हसून म्हणत असे ,•••• बाबा !! तुम्ही फक्त आईला घेऊन फिरायला जात जा.•• अनिता मात्र काही खास कारण असेल तरच यायची.•• आईला त्याचे खूप वाईट वाटत असे .बाबांना याची जाणीव होती. ते खंबीर होते .बायकोला सांभाळायची जबाबदारी पण माझीच आहे .हेही बाबांना माहीत होते .••••

बाबा म्हणजे एक प्रसन्न चित्त व्यक्तिमत्त्व .••नेहमीच वेगळ्या आयडिया असतात त्यांच्या जवळ .••• आणि आपली आयडिया कशी छान आहे ,हे त्यांना पटवून पण देता येत .••••

दोघांची गाडी हळूहळू रुळावर येऊ लागली. वरवरून आई खूष आहेत ,असं दाखवत जरी असल्या ,तरी कुठे तरी त्यांचे मन दुखावले होते .••••

अजय आज येणार हे कळलं की आई अगदी तयारीला लागायच्या.••• बाबा लिस्ट घेऊन आईंनी सांगितले ले सर्व साहित्य आणून द्यायचे .•••आई वेगवेगळे पदार्थ तर करायच्याच. बरोबर त्यादिवशी चा डबा म्हणून दोन तीन भाज्या, पोळ्या पण द्यायच्या••. अरे !! तेवढंच अनिताला काम कमी होईल. असं म्हणायच्या.••• नोकरी करुन सर्व करताना ती थकत असेल .••••

अनिता मात्र आपल्या विश्वात अगदी दंग होती . रमलेली होती .••आता तर project leader होती •••.त्यामुळे आनंदात होती••.पण वाढत्या कामाबरोबरच तिचा stress ही वाढत होता.••••

कंपनी मधे employees साठी कधी कधी काही कार्यक्रम आयोजित होत असतात.••• आजचा कार्यक्रम••

‘ Stress management’ वर होता.••••

अनिता ने attend केला ••.वक्ता अर्थातच तयारीने आले होते .••त्यांनी ‘ what is stress?’ त्यांचे शारीरिक व‌ मानसिक कसे परिणाम होतात. stress management करिता काय काय आपण करू शकतो?? त्याबद्दल ते बोलले .योग करणे , regular excercise करणे का गरजेचे आहे हे सांगितले .••••

आपले भाषण संपवताना ते म्हणाले तुम्ही सर्व शिकलेले तरूण अहात. पैसा , post , promotion , फक्त याचाच विचार करू नका . कुठे तरी फुल स्टोप लावायला शिका . कुठे थांबायचे ?? हे ठरवायला शिका .••••

आनंद केंव्हा घेणार आयुष्यात ?? आनंद घेणे ही वर्तमान काळातील गोष्ट असते . भविष्यात घेऊ म्हणून पूढे ढकलायची गोष्ट नव्हे..••••

Life मधे priorities ठरवायाला शिका. पैसा आणि फॅमिली दोन्ही महत्वाचे.••• freedom, privacy. च्या नावाखाली आपल्या माणसांहुन आपण दूर तर होत नाही ना . याचे भान ठेवा .•• एकटेपणा हे सुद्धा स्ट्रेस चे एक मोठे कारण आहे .•• जेंव्हा व्यक्त व्हायला कोणी विश्वासाचे मिळत नाही.तेंव्हा •• स्ट्रेस एकत्र होत जातो ••. तुमच्या या नवीन कल्चर मधे नोकरी सोडणे ,बदलणे, किंवा नोकरी जाणे, या सहज घडणाऱ्या गोष्टी आहेत. •• त्यामुळे अस्थिरता व अनिश्चितता या दोन्ही तलवारी सतत टांगलेल्या असतात तुमच्या आयुष्यात .• निश्चित काही गोष्ट असेल तर ती तुमची फॅमिली आहे .••तो तुमचा आनंद आहे. तेंव्हा विचार करा.••

तुम्ही त्या सर्वांबरोबर जीवापाड तडजोड करता जे निश्चित नाही .•••मग परिवार बरोबर का नाही ??? ती तर जास्त सोपी व सहज गोष्ट आहे .ओझ आणि मन हलकं करायला परिवारासारखी दुसरी सेफ जागा नसते.••• तुमचे कौतुक करायला व तुम्हाला, तुमच्या मुलांना सांभाळायलाही कोणी तरी पाहिजेच ना.••••

माझ्या भाषणात हा उल्लेख मी सर्वात शेवटी जरी केला असला ,तरी ही सर्वात महत्त्वाची गोष्ट आहे .•• हे लक्षात ठेवा .••••

अचानक अनिता च्या डोळ्यासमोर अजय च्या आई बाबांचा चेहरा आला .••त्यांनी पाठविलेले डबे ,वेळोवेळी घेतलेली काळजी तिला आठवली .•••

अनिता घरी आली ती वेगळ्याच विचारात.•• येताना तिने बाबांना फोन केला ••.अजय ला पण सुट्टी घ्यायला सांगितले .••••

अनिता अजय उद्या घरी येतायेत . बाबांनी आईंना सांगितले .दोघांच्या चेहऱ्यावर प्रश्न चिन्ह??? होते. मिश्रीत भाव होते.•••

बाबा म्हणाले अग !! उद्या अनिता च्या आवडीचा स्वयंपाक कर.••••

दुसऱ्या दिवशी अजय अनिता घरी आले. अनिता ने आई बाबांना सांगितले ,•••

आम्ही येथे तुमच्या बरोबर रहायला येणार आहोत नेहमी करिता .,••

अजय ,आई बाबा पुन्हा एकदा आश्चर्य चकित झाले.•• पण यावेळी मिळणारा धक्का सुखद होता.•••

बाबा म्हणाले •••••

“Yes , you are always welcome .”

फक्त मला पंधरा दिवस द्या. तुमची खोली व्यवस्थित करायला .,••• आई नी बाबांकडे बघीतले , त्यांच्या चेहऱ्यावर आनंद व बाबांबद्दलचा अभिमान स्पष्ट दिसत होता.••• .

” दुःख माणसाच्या धैर्याची परीक्षा घेत असत. .”

‘संयम ‘आणि ‘माफ करायची ताकद ‘ मनुष्यात असली की सर्व साध्य होते .•••

इतरांकडून कमीत कमी ‘अपेक्षा ‘ व स्वतःकडून जास्तीत जास्त ‘तडजोडी :या दोन गोष्टी प्रत्येकाचे जीवन आनंदी व यशस्वी बनवू शकतात .••••

” चुकीने चूकीच्या मार्गावर गेले तर काही हरकत नाही .पण चूक लक्षात येताच मार्ग बदलायची इच्छा व हिम्मत दाखविणे हे कौतुकास्पद आहे .”••••

म्हणतात ना •••••

“जिंदगी हमें हमेशा एक नया पाठ पढ़ाती है — हमें समझाने के लिए नहीं — हमारी सोच बदलने के लिए. “

© सुश्री संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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