हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७६ ⇒ उड़न किस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उड़न किस ।)

?अभी अभी # १०७६ ⇒ आलेख – उड़न किस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस नश्वर संसार में उड़न खटोले से लगाकर उड़न परी और उड़न सिख के बीच इतनी उड़ती उड़ती चीजें हैं, कि इन्हें देखकर एक साधारण इंसान का तो सर ही चकरा जाए । क्या पता,कब कोई एलियन उड़न परी, उड़न तश्तरी से इस धरती पर उतर आए, जिसे देख उड़न दस्ता भी आश्चर्य में पड़ जाए और उसका एक एलियन किस,हमारे धरती के फ्लाइंग किस पर भारी पड़ जाए ।

जब एक मक्खी उड़ती हुई,आपके मुंह पर फ्लाइंग किस मारकर उड़ जाती है,तो आप उसका क्या बिगाड़ लेते हो । हमने वे दिन भी देखे हैं जब खटमल हमारा खून चूस रहे हैं,और डैंड्रफ के कारण हम अपना सर खुजा रहे हैं । भला हो, ऑल आउट, काला हिट, मच्छरदानी,पैंटीन शैंपू और लक्ष्मण रेखा का,जो हमें इन उड़ते मक्खी,मच्छर और रेंगती छिपकली, चींटी मकोड़े और कॉकरोचों से हमारा और हमारी बालों की रूसी का भी बचाव करती रहती हैं ।।

हर इंसान को उड़ती खबर और उड़ती नज़र से सावधान रहना चाहिए । कोई अच्छी बुरी खबर उड़ते उड़ते कहां पहुंच जाए,कहा नहीं जा सकता । वे दिन हवा हुए,जब उड़ते हुए शांतिदूतों के जरिए प्रेम संदेश और मित्रता संदेश भेजे जाते थे । सरकारी आदेश तो डुगडुगी पीटकर ही सुनाया जाता था। सुनो,सुनो, सुनो ! और सबको सुनना भी पड़ता था ।

फिर काम की खबरें भी बेतार के तारों के जरिए भेजी जाने लगी । बेतार की भाषा किसी गागर में सागर से कम नहीं होती थी । शब्द और अक्षरों में कोई भेद नहीं होता था । कई बार तो अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था ।।

फिर आया सरस्वतीचंद्र का जमाना,जब ” फूल तुम्हें भेजा है खत में,फूल नहीं मेरा दिल है “,जैसे संदेश फूलों के जरिए भेजे जाने लगे । किसी भी पुरानी किताब में सूखा,मुरझाया कोई गुलाब का एक फूल कोई भूली दास्तान बयां करता नजर आता था ।

हमारे नीरज जी तो फूलों के रंग से ,और दिल की कलम से रोज ही पाती लिखते थे ।

आज तो स्थिति यह है कि इधर व्हाट्सएप पर संदेश लिखा जा रहा है,और उधर उन्हें उसकी भी खबर प्रसारित हो रही है । किस टाइप का प्रेम संदेश है यह,

जो लिखने से पहले ही बयां होने को लालायित है,उत्सुक है ।।

आसमान में उड़ते बादल भी विरही प्रेमियों के दिल का हाल जानते हैं । सावन के बादलों,उनसे ये जा कहो ,और ;

जा रे कारे बदरा,

सजना के पास ।

वो हैं ऐसे बुद्धू,

कि समझे ना प्यार ।।

हमारे आनंद बक्षी जी ने सावन को लाखों का बताया है,और नौकरी को दो टकियाॅं की । ऐसे फुल टाइम फूल,गुलदस्ता और फ्लाइंग किस भेजने वालों से भगवान हम शरीफों को बचाए । हम तो चाहते हैं,इस अधिक मास के सावन में दाल रोटी खाएं,और प्रभु के गुण गाकर कुछ पुण्य कमाएं ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८८ – देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।

दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।

होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।

व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।

प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।

फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।

आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।

अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।

यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२८ – बोनस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆ चुभते तीर # १२८ – व्यंग्य – बोनस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास की कंपनी ‘ग्लोबल सॉल्यूशंस’ में दिवाली का बोनस सिर्फ़ एक आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि कर्मचारियों की योग्यता मापने का सबसे बड़ा पैमाना थी। दफ़्तर में यह फुसफुसाहट थी कि इस बार कंपनी का मुनाफ़ा दोगुना हुआ है, इसलिए सीनियर मैनेजर वर्मा जी सब कर्मचारियों को भारी-भरकम बोनस का लिफ़ाफ़ा थमाने वाले हैं। लेकिन एक पेंच था, लिफ़ाफ़ा देने का तरीका हमेशा की तरह बहुत ही गुप्त रखा गया था।

विकास पिछले तीन महीनों से जी तोड़ मेहनत कर रहा था। रात-रात भर जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करना, चाय की चुस्कियों के साथ बॉस के बेतुके चुटकुलों पर सबसे तेज़ हंसना और हर मीटिंग में सबसे आगे खड़े रहना, उसने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसके सहकर्मी अमित का मानना था कि काम से ज़्यादा बॉस का मूड मायने रखता है। अमित दिन भर अपनी मेज़ पर बैठा सोशल मीडिया स्क्रॉल करता रहता था, लेकिन जब भी बॉस पास से गुजरते, वह स्क्रीन पर किसी गंभीर एक्सेल शीट को खोलकर मुंह ऐसा बना लेता जैसे देश की आर्थिक नीति वही तय कर रहा हो।

बोनस वितरण का दिन आया। कॉन्फ्रेंस रूम का दरवाज़ा बंद था। बाहर लंबी कतार लगी थी। कर्मचारी एक-एक करके अंदर जाते और बाहर निकलते समय चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान या गहरी खामोशी होती। कोई किसी को यह बताने को तैयार नहीं था कि अंदर क्या मिला। जब विकास की बारी आई, तो उसके दिल की धड़कन किसी पुराने इंजन की तरह तेज़ चलने लगी।

कमरे के अंदर वर्मा जी एक बड़ी सी लकड़ी की मेज़ के पीछे बैठे थे। मेज़ पर दो अलग-अलग रंगों के लिफ़ाफ़े रखे थे, एक चमकीला सुनहरे रंग का और दूसरा साधारण सफ़ेद। सुनहरे लिफ़ाफ़े का आकार सफ़ेद वाले से दुगना था। वर्मा जी ने विकास की तरफ देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “विकास, तुमने इस साल काम तो बहुत किया, लेकिन हमारी नीति के अनुसार तुम्हें इन दो लिफ़ाफ़ों में से किसी एक का चुनाव करना होगा। एक में नकद बोनस है और दूसरे में कंपनी के शेयर के साथ एक विशेष सम्मान पत्र।”

विकास धर्मसंकट में पड़ गया। सुनहरे लिफ़ाफ़े में ज़रूर भारी नकद राशि होगी, जबकि सफ़ेद लिफ़ाफ़ा साधारण लग रहा था। अमित ने बाहर निकलते समय सफ़ेद लिफ़ाफ़ा ही पकड़ा हुआ था और उसकी आंखों में चमक थी। विकास ने जोखिम लेने का फ़ैसला किया और भारी लगने वाले सुनहरे लिफ़ाफ़े पर उंगली रख दी।

वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए सुनहरा लिफ़ाफ़ा विकास को सौंप दिया। विकास ने उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर नकद पैसों की जगह ‘सर्वश्रेष्ठ धैर्यवान कर्मचारी’ का एक प्लास्टिक का मेडल और एक कूपन निकला, जिस पर लिखा था ‘अगले तीन महीने तक मुफ़्त ओवरटाइम चाय’।

विकास की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत पूछा, “सर, और सफ़ेद लिफ़ाफ़े में क्या था?”

वर्मा जी ने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खोलकर दिखाया, उसमें पचास हज़ार रुपये नकद और एक हफ्ते की सशुल्क छुट्टी का पत्र था। वर्मा जी बोले, “कंपनी ने इस बार चालाकी की परीक्षा ली थी। जो इंसान सिर्फ चमक-धमक देखकर फैसला लेता है, वह बोनस नहीं, सिर्फ मेडल का हकदार होता है।”

तभी कॉन्फ्रेंस रूम का पर्दा हटा और पूरी टीम ने ज़ोरदार तालियां बजाना शुरू कर दिया। विकास ने अपना प्लास्टिक का मेडल गले में डाला और मुस्कुराते हुए कहा, “सर, कम से कम तीन महीने चाय के पैसे तो बचेंगे!” पूरा कमरा फिर से ठहाकों और तालियों से गूंज उठा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक।)

☆ आलेख – बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक  ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

बुजुर्ग परिवार और समाज की रीढ़ होते हैं। हमारे जीवन की व्यवस्था इनके इर्द-गिर्द घूमती है। संस्कार, भाषा, खेती, शादी, झगड़ों का समाधान सभी में ये मार्गदर्शक होते हैं, इसलिए बुजुर्गों को अनुभव का खजाना एवं कुल का जीवित इतिहास कहा जाता है। चार आश्रमों की अवधारणा में वानप्रस्थ और सन्यास बुजुर्गों के लिए ही है। ‘ मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य देवो भव ‘ इसी सोच से भारतीय संस्कृति में समाहित है। बताया गया है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य बड़ा है, सौ आचार्यों से एक पिता बड़ा है और एक हजार पिताओं से भी माता गौरव में बड़ी होती है। माता-पिता सर्वोच्च हैं, अनुभव, संस्कार और आशीर्वाद के प्रतीक हैं। परिवार व समाज में इनकी सेवा करना केवल कर्तव्य नहीं अपितु अपने ही जीवन को आयु, ज्ञान और यश से भरने का रास्ता है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी परिवर्तन, तकनीक, नवीन विचारों और भविष्य की सम्भावनाओं की वाहक है। इन दोनों के बीच यदि संवाद बना रहे तो अनुभव और नवाचार का सुन्दर समन्वय सम्भव है। वर्तमान समय में पारिवारिक विघटन, शहरीकरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की महत्वाकांक्षा ने दोनों ही पीढ़ियों के सम्बन्धों को चुनौती दी है। बुजुर्गों को लगता है कि नई पीढ़ी परम्पराओं और पारिवारिक मूल्यों से विमुख होती जा रही है और युवा पीढ़ी वर्तमान परिस्थितियों के लिए बुजुर्गों को अनुपयुक्त मान रहे हैं।

पीढ़ी अंतराल की इस अवधारणा में दोनों के सोच, अनुभव, भाषा, तकनीकी व्यवहार, सामाजिक प्राथमिकताओं और जीवन-मूल्यों का अंतर है, जो तनाव को जन्म दे रहा है। संवाद के अभाव में एक घर में रहते हुए दोनों ही समस्याएँ साझा करने से बचते हैं। बच्चे समझते हैं कि उपदेश मिलेगा तो वहीं पर बुजुर्ग अपने को उपेक्षित अनुभव करते हैं। अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि परम्परा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी हैं लेकिन इन दोनों को समन्वित किया जा सकता है। बुजुर्ग अपने अनुभव से बता सकते हैं कि  क्या मूल्यवान है और नई पीढ़ी यह बता सकती है कि इसे नये संदर्भ में कैसे अपनाया जाए? इसी प्रकार डिजिटल तकनीक भी संवाद का सेतु बन सकती है। युवा स्मार्टफोन,ऑनलाइन सेवाओं की जानकारी बुज़ुर्गों को दे सकते हैं और बुज़ुर्ग भी युवाओं को धैर्य से परिवार का इतिहास, संस्कृति व जीवन के अनुभवों से परिचित करा सकते हैं। परिवार में सामूहिक गतिविधियाँ, सहभोज, संस्मरण सुनने की परम्परा, पुराने फोटो का संरक्षण, बुज़ुर्गों का परामर्श, संवाद व संवेदनशीलता को विकसित कर सकता है।

आधुनिक परिवारों में आज बुज़ुर्गों की भूमिका बदल रही है। पहले वे परिवार के निर्णायक होते थे लेकिन आजकल वे अधिकार-आधारित सम्बन्धों से सहभागिता आधारित सम्बन्धों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। नई पीढ़ी का भी उत्तरदायित्व है कि बुज़ुर्गों को समय दें , इनकी बात धैर्य से सुनें, इनको डिजिटल दुनिया से जोड़ें, इनकी सामाजिक उपयोगिता को पहचानें, असहमति को अपमान में न बदलें। कहने का तात्पर्य है कि पीढ़ियों के बीच समन्वय के लिए किसी एक पक्ष को पूरी तरह बदलने के बजाय दोनों पक्षों में लचीलापन आवश्यक है। सुनना संवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरे की बात पूरी होने से पूर्व निष्कर्ष निकालना संवाद को कमजोर करता है। युवाओं को बुज़ुर्गों के अनुभव का सम्मान करना चाहिए और बुज़ुर्गों को युवाओं के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ युवा अपनी असहमति व्यक्त कर सकें और बुजुर्ग अपनी भावनाएँ नि:संकोच साझा कर सकें। इसके अतिरिक्त अंतर पीढ़ी संवाद में विद्यालय-महाविद्यालय, समाज और सामुदायिक, स्वयंसेवी संस्थाएँ, सांस्कृतिक मंच आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अंतर पीढ़ी में संवाद का सामाजिक महत्व होता है। जब बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा एक साथ आएगी तो निश्चित ही सकारात्मक परिणाम आएँगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि नई पीढ़ी भी भविष्य की बुजुर्ग पीढ़ी है। वह भी उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचेगा, जहाँ अनुभव तो होगा लेकिन सामाजिक गति शायद आगे निकल चुकी होगी अत: इस बात को ध्यान में रखना होगा कि जिस समाज में वृद्धावस्था को सम्मान व सहभागिता मिलेगी वहाँ भविष्य में वृद्ध होना भय या सामाजिक बहिष्कार का पर्याय नहीं बनेगा। बुजुर्गों को सम्मान देने व साझेदार बनाने की आज आवश्यकता है। बुजुर्गों का अनुभव,युवाओं का नवाचार जब संवाद के माध्यम से मिलते हैं तब पीढ़ी अंतराल संघर्ष नहीं, सामाजिक समन्वय की शक्ति बन जाता है। संवाद से समझ पैदा होती है, समझ से सम्मान, सम्मान से सहभागिता और सहभागिता से सदैव ही समन्वय स्थापित होता है। यही वह मार्ग है जिसके माध्यम से परिवार को अधिक संवेदनशील, समाज को समावेशी और भविष्य को मानवीय बनाया जा सकता है।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७५ ⇒ आत्म – मुग्धता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म – मुग्धता।)

?अभी अभी # १०७५ ⇒ आलेख – आत्म – मुग्धता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

COMPLACENCY

दर्पण झूठ ना बोले ! अगर झूठ बोलता तो कौन दर्पण देखता ? बार बार आइना कौन देखता है, वही जो खूबसूरत होता है, सुंदर होता है। फिर भी जब विश्वास नहीं होता, तब ही यह प्रश्न किया जाता है, मैं कैसी लग रही हूं ? और अगर फिर भी जवाब संतोषजनक नहीं मिलता, तो मूड खराब हो जाता है। दो घंटे की तैयारी पर पानी फिर जाता है।

दूसरे आप पर मुग्ध हों, उससे पहले यह जरूरी है कि आप अपने आप पर मुग्ध हों। लता जी का एक खराब गाना है, शायद आपको अच्छा लगे, उसके बोल हैं ; आज मैं जवान हो गई हूं, गुल से गुलिस्तान हो गई हूं। ये दिन, ये साल ये महीना, ओ मिट्ठू मियाँ, भूलेगा मुझको कभी ना। नायिका आखिर क्या करे, किसी से तो अपने मन की बात शेयर करे। ये पपीहा भी बहुत काम आता है ऐसे वक्त।।

हमें यह तो पता है, हमारा निवास कहां है, लेकिन हमारे शरीर में स्थित आत्मा का निवास कहां है, कोई नहीं जानता। हम अक्सर आत्म संतोष, आत्म बल, आत्म निरीक्षण और आत्मा के दुखी होने की बात करते हैं, वह आत्मा जो नित्य है, शुद्ध है। लेकिन शरीर में रहकर वह भी सुखी दुखी होती रहती है। क्या हमें उसे संतुष्ट रखने का अधिकार नहीं। जब हम आत्म मुग्ध होते हैं, तो हमारी आत्मा कितनी प्रसन्न होती है, क्या कभी आपने सोचा है।

एक बच्चे में राग द्वेष नहीं होता। वह कितना आत्म मुग्ध होता है। मैं मम्मा का राजा बेटा हूं। मैं कितना सुंदर हूं। मैं दुनिया का सबसे बहादुर बच्चा हूं। अच्छे बच्चे कभी झूठ नहीं बोलते। अच्छाई का दूसरा नाम ही आत्म मुग्धता है। हम यही तो चाहते हैं कि हमारे बच्चे में अच्छाई कूट कूटकर भरी जाए। इससे उसके आत्म विश्वास में वृद्धि होती है। निराशा की भावना बच्चे को हतोत्साहित करती है, उसके विकास में बाधा बनती है।

आत्म मुग्धता, खुद की तारीफ़ है। अपने मुंह से अपनी तारीफ़ अच्छी नहीं लगती, लेकिन जब सभी गुण बाजार में बिकने लगे, तो उनकी भी मार्केटिंग जरूरी हो जाती है। आजकल आदमी भी एक उत्पाद की तरह हो गया है। उसकी भी मार्केट वैल्यू है। प्रचार, दिखावा और अतिशयोक्ति के बिना कहां किसी के गुणों की आजकल पहचान होती है। साक्षात्कार, जिसे हम इंटरव्यू कहते हैं, बिना तैयारी के नहीं दिए जाते। अपना एक बायोडाटा तैयार करना पड़ता है, खुद को श्रेष्ठ साबित करना पड़ता है।।

आत्म मुग्धता कहीं वरदान है तो कहीं अभिशाप, लेकिन अगर आपको अवसाद और नकारात्मकता से बचना है, तो आत्म मुग्ध बनें। एक राजनेता जितना आत्म मुग्ध होता है, वह उतना ही आगे बढ़ता है, लोकप्रिय होता जाता है। अपने गुणों का प्रचार करने का भी एक तरीका होता है। आपकी तारीफ आपके आगे आगे चले, और आप पीछे पीछे। और आपके पीछे आपके तरफदार।

अवसाद, हीन भावना और पराजय की काट है, आत्म मुग्धता। आप स्वयं ही अपने गुणों से संतुष्ट नहीं, तो लोग क्या खाक होंगे। पहले अपनी तारीफ के पुल बाधिये, फिर उस पर अपने गुणों की चादर बिछाइए, और मौका आने पर प्रायोजकों से उस पर रेड कार्पेट बिछवाइए और शान से चलिए। जो जितना आत्म मुग्ध होता है, दुनिया उस पर उतनी ही मुग्ध होती है। मायूस चेहरों पर तो मक्खी भी नहीं बैठती।

अपनी आत्मा की सुनें। अगर आपकी आत्मा को आलोचना पसंद नहीं, तो ऐसे लोगों से दूर रहें जो आपमें कमियां ढूँढते हैं। जो गुण के पारखी हैं, वे आपकी ओर खिंचे चले आएंगे। अपने व्यक्तित्व को विशाल बनाइए, यही आत्मोत्थान की निशानी है।।

जाने वालों, जरा होशियार, आगे पीछे हमारी सरकार, यहां के हम हैं राजकुमार। सारी दुनिया में अपनी जय जयकार, यहां के हम हैं राजकुमार। आत्म मुग्ध हैं हम फिर काहे का गम …!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७४ ⇒ सौन्दर्य बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सौन्दर्य बोध।)

?अभी अभी # १०७४ ⇒ आलेख – सौन्दर्य बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ASTHETIC SENSE

जब भी सुंदरता की बात होती है, चंदन सा बदन, चंचल चितवन, से आगे बात ही नहीं बढ़ती। नारी सौंदर्य की मूरत है, बस यही बोध पर्याप्त है। सारे कवि और शायर भी घूम फिरकर यही कहना चाहते हैं लेकिन सौंदर्य का एक कला पक्ष भी होता है, जो कहीं ना कहीं उसे व्यक्ति परक नहीं, वस्तुपरक बनाता है। वस्तु के इस कलात्मक पक्ष को ही asthetic sense, यानी सौंदर्य बोध का नाम दिया गया है।

कला, सौंदर्य और सुरुचि का नाम ही सौंदर्य बोध है। जब हम किसी ऐसे घर में प्रवेश करते हैं, जहाँ सब कुछ व्यवस्थित, ठिकाने पर हो, घर की हर वस्तु आपको आकर्षित करती हो, जिसमें घर में रहने वाले का व्यवहार और पहनावा भी शामिल हो, चलने का तरीका, बोलने का तरीका, हँसने से लेकर खाते समय मुंह चलाने तक का तरीका आकर्षित करता हो, तो आप कह सकते हैं कि उस व्यक्ति में एस्थेटिक सेंस यानी सौंदर्य बोध है।।

आप सौंदर्य को सभ्यता और संस्कृति से अलग नहीं कर सकते। जिसे हम तहज़ीब, manner अथवा एटिकेट कहते हैं, उसकी तह में बोलने अथवा बात करने का लहजा भी मायने रखता है। किसी का सुरुचिपूर्ण व्यवहार यानी polished behaviour आपको कभी कभी कृत्रिम भी लगे, लेकिन जो लोग इसमें ढल जाते हैं, उनकी सहजता और सरलता उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देती है।

आप मुझे अच्छे लगने लगे ! सौंदर्य बोध का इससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता। यहाँ अनुभूति का स्तर, देह से बहुत ऊपर उठ गया है, जिसमें अगर एक अबोध बच्चे की खुशी भी शामिल है तो एक आत्मा का दूसरी आत्मा के प्रति अपनापन, जो कहीं कहीं परमात्मा के करीब है। क्योंकि जो वाकई अच्छा है, वही सत्य है, शिव है और सुंदर है।।

आपको भगवान मंदिर में नहीं मिलेंगे, इंसानों में ही मिलेंगे। खेत, खलिहानों, बाग बगीचों, हरी भरी वादियों, पहाड़ों और झरनों में ही उस विराट की प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। संगीत, ध्यान, कला, नृत्य और अध्यात्म उसके विभिन्न अवयव हैं। यह गीता का वह ज्ञान है, कर्म की कुशलता जिसका पहला अध्याय है, तो निष्काम कर्म अंतिम।

अमीरी गरीबी से ऊपर, सुख दुःख के बीच, सरलता, सहजता, निष्पाप मन, निर्विकार चेष्टा, मानव मात्र के प्रति शुभ संकल्प का भाव, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना और प्रकृति और पर्यावरण से प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। अंदर और बाहर से व्यवस्थित होना ही व्यवस्था है। प्रकृति में जहाँ भी सौंदर्य है, वह व्यवस्थित और अनुशासित है। पक्षियों का उड़ना, शाम को अपने घर लौटना, फूल का खिलना, भौंरों का गुनगुनाना, नदियों का बहना, सभी इस व्यवस्था के अंग हैं, इसीलिए उनमें सौंदर्य बोध है। हमें कोई दूसरी दुनिया नहीं बसानी। इसी को व्यवस्थित करना है। हमारी दृष्टि बदलने से समष्टि बदल जाती है। दृष्टि में ही सौंदर्य बोध है। जब सृष्टि इतनी सुंदर है, तो इसका रचयिता कितना सुंदर होगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जीवनसूत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जीवनसूत्र ? ? 

पानी उथला हो तो उछाल मारता है, गहरा मंद-मंद बहता है। मनुष्य के शरीर में लगभग 60 प्रतिशत जल होता है।

जो पिंड में, वही बिरमांड में। मनुष्य और पानी का अंतर्सम्बंध समझ लो तो जीवन को जीने का सूत्र मिल जाता है।

जीवनसूत्र है पानी।

 आपका दिन पनीला हो।

?

© संजय भारद्वाज   

14 जून 2020, प्रात: 9:13 बजे।

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६४ – आलेख – बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६४ ☆

☆ आलेख ☆ ~ बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(क्रांतिकारियों की कहानी – श्रेयस की जुबानी)

१९ अगस्त बलिया बलिदान दिवस है। यानी १९ अगस्त १९४२ को जब पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का शासन था, यूँ कहे अपना बृहद भारत अंग्रेजी दासता के अधीन गुलाम था।

मैं कहानी कह रहा हूँ उस वक्त की, कि जब पूरे देश में क्रांति की ज्वाला जल उठी थी।

बलिया का अपना एक अलग इतिहास रहा है। पौराणिक काल से लेकर आज तक इस जनपद ने समय-समय पर कुछ नया कर दिखाया है। तभी तो हमारे जिले में आज भी युवाओं के मुंह से एक आवाज निकल जाती है।

“सब जिला जिला ह, हमार जिला बलिया ह”..

और इसके बाद एक नारा लगता है..”बोल बोल भृगु बाबा की जय”

आखिर सब जिला, जिला ह, त बलिया हमार जिला खास काहे ह..

इसका उत्तर मुझे जो समझ में आया वह यह कि-

जैसा कि पुराणो में विदित है कि बलिया भक्त प्रहलाद के पौत्र असुरराज बली की राजधानी हुआ करती थी। वही राजा बलि जिनके १०८ यज्ञॉ के प्रभाव ने देवराज इंद्र के भी सिंहासन को हिला कर रख दिया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को वामन स्वरूप में दानवीर बलि के यहाँ याचक के रूप में आना पड़ा था। चूँकि राजा बलि ने १०८ यज्ञ किए थे, जिसके चलते बलिया का नाम बलियाग फिर कालांतर में बलिया पड़ा। महर्षि भृगु और भगवान विष्णु की कहानी को तो हम सभी जानते हैं,। उसके बाद १९५७ में पंडित मंगल पाण्डेय का बाकी तेवर ने मेरठ छावनी में बगावत करते हुए अंग्रेज ऑफिसर को गोली मार दिया। बाद में उन्हें फांसी हुई और आजादी का यह ऐतिहासिक बलिदान बलिया के खाते में जुड़ गया, फिर आता है वर्ष १९४२,.. वर्ष १९४२ में बलिया आज ही के दिन 19 अगस्त को बलिया चार दिनों के लिए आजाद हो गया था। फिर आया इमरजेंसी कॉल जब बलिया के लोकनायक जयप्रकाश नारायण का बिगुल बजा था और तरुणाई जग गई। इसके बाद समय-समय पर कोई न कोई ऐसे महापुरुष हुए, और उन्होंने कुछ ऐसा किया कि उनका नाम इतिहास में जुड़ गया जैसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों को इस धरती ने जन्मा, जिन्होंने बलिया को अपनी अलग पहचान दी। यह पहचान का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ है।

आज १९ अगस्त है, अब भी अगस्त का महीना अपनी पहचान पर कायम। बलिया नित नवीन इतिहास और नवभारत का इतिहास लिख रहा। हम ऐसे महापुरुषों को हम नमन करते हैं।

बलिया में क्रांति का बिगुल कैसे बजा? इसके सार संक्षेप में कहते हुए यदि हम आगे बढ़ते हैं तो कहानी कुछ यूँ बनती है-

९ अगस्त को रेडियो की खबरों के द्वारा पता चला कि महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है, और पूरे देश में जरूर क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। इसमे बलिया पीछे नही था लेकिन बलिया की क्रांति कुछ हटकर हुई, क्योंकि… बात तो वही है कि –सब जिला जिला ह..

इस कहानी को बताने पहले मैं एक ऐसे एक दो जीवित क्रांतिकारी के मुंह से सुनी हुई कहानी से इसका प्रारंभ करना चाहता हूँ जिनके साथ मुझे कुछ वक्त बिताने का अवसर मिला और उनके मुंह से कही हुई बात, उनके पौत्र श्री रजनीश सिंह जी की जुबानी है इसे आपके बीच में रख रहा हूँ, यह हम सभी की जानकारी हेतु जरूर विशेष होगी।

मैं बात कर रहा हूं जनपद बलिया के तहसील बांसडीह के अंतर्गत आने वाले गांव कैथवली के बाबू रामदयाल सिंह की जुबानी। मैं उनके नजदीक इसलिए भी हूं कि उनकी नतिनी (बेटी की बेटी) की शादी मुझसे हुई थी। और जब कभी हम लोग एक पास बैठते थे वे अक्सर वे अपनी पुरानी यादों को साझा किया करते थे.

उस वक्त चंद परिवारों को छोड़कर अन्य सामान्य परिवार आर्थिक तंगी में रहता ही था। कुछ खेती बारी होने के बावजूद भी लोगों को अपनी आर्थिक जरूर पूरा करने के लिए बाहर जाना होता था। विशेष रूप से बलिया की यह विशेषता ही रही। गंगा,सरयू (घाघरा) और तमसा (टोंस) जैसी नदियों से घिरे हुए इस जनपद, के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए बार-बार बेघर हो जाया करते थे। हर बार जब घर लौट कर आते तो एक छप्पर डालते, एक छोटा सा नव सृजित फूस के घरों से बने का गाँव को बनाते तो कोई दुबे छपरा, दल छपरा, गोहिया छपरा बन जाता है। मैं प्रवास की बात इसलिए कर रहा हूँ कि यह प्रवास जहां एक तरफ यहाँ के लोगों के लिए अभिशाप होता था तो वहीं, यहां के लिए लोगों के लिए शैक्षिक,आर्थिक,सामाजिक उन्नति का कारण बनता रहा है। यह प्रवास सिर्फ भारत तक नहीं रहा बल्कि भारत के बाहर सुदूर मॉरीशस सहित अन्य करेबियन देशों तक पहुंचता है और वहाँ स्वयं को स्थापित करता था। मॉरीशस की कहानी मैंने अपने साहित्यिक गुरु श्री रामदेव धुरंधर से बार-बार सुनी है। उनके पूर्वज भी वर्ष 1838 में बलिया से ही मॉरीशस गए थे।

स्व.राम दयाल सिंह जी भी मिडिल पास करने के बाद आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों को लेकर कोलकाता नौकरी पर चले गए, अपने मातृभूमि से कई सो किलोमीटर दूर वे कलकत्ता अवश्य गए लेकिन उनके दिल से, उनके मन में मातृभूमि की यादें बनी रहतीं। ६ या ७ वर्ष नौकरी करने के बाद वे बनारस लौट आए, और वहां कहीं किसी सेठ साहूकार के रहकर मुंशी गिरी का काम करने लगे। वाराणसी में गांधी जी की सभा हुई और उन्होंने क्रांतिकारियों के भाषण को सुना उनके मन में क्रांति की आग जल गई और फिर क्या था, बनारस में उन्होंने सेठ की नौकरी को लात मारा और बलिया चले आए। बलिया आकर क्रांतिकारियों के आंदोलन में जमकर जुड़ गए।

श्री राम दयाल सिंह जी (नाना जी)बताते हैं कि उस जमाने में संचार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। पूरे देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हें मात्र रेडियो,वह भी किसी खास बीबीसी न्यूज़ से पता चलती थी। अब युवाओं में जोश कैसे जगे। हर रोज की जानकारी कैसे मिले युवा रामदायल सिंह उस समय एक रेडियो लेकर आते थे और अपने गाँव कैथोलिक में एक जगह बड़की दलान हुआ करती थी, वही बैठकर रेडियो खोलने और स सारे लोग समाचार सुनते थे और उन्हें पता चलता था कि पूरे देश में क्रांति और आजादी की लड़ाई किस ढंग से लड़ी जा रही है और क्या-क्या घटनाएं घट रही है.

इन लोगों के लिए यह सिर्फ एक समाचार नहीं था, यह तो एक जलती हुई चिंगारी थी जो हर वक्त उनके भीतर जल रही थी आखिरकार यह चिंगारी शोले के शक्ल में बदल गई –

अब आगे बढ़ते हुए मैं बलिया के अंदर 1942 कि उसे क्रांति की तिथि वार घटना का वर्णन संछिप्त कर रहा हूं। इसका संदर्भ मैंने बलिया के इतिहास विद श्री शिव कुमार कौशिकेय जी की पुस्तक बलिया विरासत से लिया है –

9 अगस्त को बलिया में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आज की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर तत्कालीन नगर मंत्री श्री उमाशंकर सोनार अपने साथी सरजू प्रसाद के साथ मिलकर 10 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाले और सभी छात्रों और व्यापारियों ने उसमें भाग लिया।

11 अगस्त को इस जुलूस के बाद एक भाषण शहीद पार्क पर हुआ। इस भाषण के दौरान पंडित राम अनंत पांडे जी को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन की चिंगारी शहर से गांवों की तरफ बढ़ गई। 12 अगस्त को बलिया और बैरिया में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस और छात्रों के बीच का मार पीट और झड़प हुई। 30 छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया 13 अगस्त को बनारस से बलिया पहुंची ट्रेन को छात्रों ने चित्त बड़ा गांव रेलवे स्टेशन पर फूंक दिया और रेल की पटरी को उखाड़ कर प्रदर्शन किया . खेजूरी बेल्थरा रोड में जनसभाएं हुई 14 अगस्त को चितबड़ागांव ताजपुर में रेल की पटरिया उखाड़ दी गई। बेल्थरा रोड में भी आंदोलन तीव्र हो गया वहां पर भी यही सारी चीजे हुई। सिकंदरपुर में मिडिल स्कूल में जुलूस निकाला गया वहां क्या स्थानीय थानेदार ने क्रूरता दिखाते हुए बच्चों पर घोडों को दौड़ा दिया। सैकड़ो छात्र घायल हुए 15 अगस्त को बलिया जनपद के जहाज घाट, माल गोदाम डाकघर आदि पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लूट पाट करना शुरु किया। चितबड़ागांव में तमसा नदी पर लकड़ी के बने पिपरा घाट पुल को तोड़कर सेनानियों ने सारे रास्ते बंद कर दिए। जहां-जहां क्रांतिकारी आंदोलन करते धीरे-धीरे वहां वह एक सरकारी कार्यालय पर कब्जा करते और अपना शासन चलाने लगे। पंचायत की राज शासन व्यवस्था काम करने लगी बैरिया,नगरा ताखा आदि कई जगहों पर भी क्रांतिकारियों ने ऐसे ही कार्रवाई की। 16 अगस्त को जिला मुख्यालय पर अपनी हनक जमाने के लिए जिला प्रशासन ने धारा 144 का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया लेकिन सेनानियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इसका प्रतिरोध खोरी पाकर गांव के युवा दुखी कोइरी ने किया। पुलिस फायरिंग में दुखी कोईरी समेत 7 लोग शहीद हो गए। चिलकहर रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया, नौरंगा घाट पर खड़े माल भाग जहाज को बहा दिया गया। 17 अगस्त 1942 को हुए ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर क्रांतिकारियों ने रसड़ा तहसील को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था। इस संघर्ष में चार वीर सपूत अमर हो गए थे। तहसील और थाने पर सेनानियों ने बहुत आसानी से अधिकार जमा लिया। इसी दिन बांसडीह तहसील पर बगैर किसी प्रतिरोध के स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ब्रितानी पुलिस के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था। वह खूनी संघर्ष में बदल गया बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने और स्वराज सरकार के अधिकार को लेकर हुई जंग में 18 सेनानी शहीद हो गए।

अब आया 19 अगस्त 1942 का वह दिन जब बलिया के क्रांतिकारियों ने इतिहास रच दिया। ब्रिटानी दास्ताँ का दंश झेल रहे लोगों के लिए एक नजीर बनी लाखों की साथ-साथ भीड़ में जिला मुख्यालय को घेर लिया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश चंद्र निगम एवं पुलिस कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में बंद कांग्रेस के तात्कालिक जिला अध्यक्ष पंडित चित्तू पांडे, महानंदा मिश्रा, विश्वनाथ चौबे आदि सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से जेल का फाटक खोलकर रिहा कर दिया गया और बलिया आजाद हो गया।

मैं बात श्री राम दयाल सिंह जी की कर रहा था, बॉसडीह कचहरी पर कब्जे के दौरान आंदोलन का कर रहे रामदयाल सिंह और अन्य लोगों को आखिरकार गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी का रास्ता चुना पड़ा लेकिन यह बहुत ज्यादा दिन नहीं रही। श्री रामदयालु सिंह गिरफ्तार करके बनारस जेल भेज दिए गए .

श्री राम दयाल सिंह जी बताते हैं कि जेल में उन लोगों को जी बैरक में रखा गया था। पांच सोटा की सजा सुनाई गई। यानी प्रतिदिन इन क्रांतिकारियों को डंडे से पीटा जाता था, जिसे वे लोग हंसते-हंसते बर्दाश्त करते थे। स्वर्गीय श्री राम दयाल सिंह जी एक और बात बताते थे उसे समय उसे जेल में केवल एक अखबार आता था। वह सब लोग पढ़े लिखे नहीं थे क्योंकि वह पढ़े लिखे थे तो और जेल के साथी कैदी उनसे कहते थे कि ए रामदयाल के खबर पढ कर के सुनाओ। बाबू राम दयाल सिंह उसे पढ़ कर अपने कैदी साथियों को सुनाते थे इस तरह से उनके मुंह से कही हुई बातों को भी मैं यहां रखा।

देश आजाद हो गया,ये क्रांतिकारी रिहा हुए इनको तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत जी ने तराई में जंगलों के बीच कुछ जमीन इनके लिए जमीने आवंटित की और यह वर्तमान में इनका परिवार उधम सिंह जनपद के आनंदपुर नमक के गांव में रहता है

दूसरे बड़े क्रांतिकारी जो बलिया की आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्व कर रहे थे उनकी चर्चा भी करना चाहूंगा क्योंकि उनके साथ तो मैं अपने बचपन के बहुत समय बिताए हैं। मेरे गाँव को संवरा नहीं, बोलते हैं संवरा को,संवरा -गोपालपुर बोलते हैं। गोपालपुर और संवरा दोनों जुड़वा नाम के रूप में एक साथ लिया जाता था। इसी गोपालपुर में जन्मे हुए क्रांतिकारी पंडित विश्वनाथ चतुर्वेदी जी, श्री चित्तू पाण्डेय के साथ उस आंदोलन के हिस्सा थे। जिसका वर्णन मैंने पहले भी किया था। आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई बहुत सारी घटनाओं की जानकारी बहुत सारी बातें वे हमसे बताते थे। अत्यंत सरल और सहज प्रकृति के लेकिन अनैतिकता के घोर विरोधी विश्वनाथ चतुर्वेदी जी हमारे सबसे नजदीक के क्रांतिकारियों में से एक थे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी उनको बहुत आदर करते थे। जिसे मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। चंद्रशेखर जी जब हमारे गांव संवरा चट्टी पर आते थे तो वह चट्टी नहीं कहते थे,चौराहा कहते थे। यहां पहुंचते हुए बोलते थे कि चौबे जी (श्री विश्वनाथ चतुर्वेदी) को बुलाओ।

यह बात मेरे बचपन की है। मै एक और क्रांतिकारी की बात करके मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो गुमनाम क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी को मैं अपने पुस्तक काव्य कथा विथिका के द्वितीय खंड में स्थान दिया है। हमारे गांव के सिंहा मिसिर जो कि कभी जेल नहीं गए नहीं वह क्रांतिकारी घोषित किए गए उनके न पत्नी थी नाही उनके बच्चे थे। वे पूरे जीवन ऐसे ही रह गए वह हमसे कहा करते थे।

बाबू.. हमनी के रेल लाइन के काटी जा और आंदोलन करी जा, लेकिन पुलिस के डर से हम भाग जाईजा।

क्योंकि उनकी गिरफ्तारी नही हुई, उनका नाम डर से भाग जाने वाले क्रांतिकारियों के लिस्ट में था। सबको पेंशन मिलता रहा लेकिन स्व. सिघा मिसिर जी आज वह हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब हम 19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस में क्रांतिकारियों को याद कर रहे हैं तो मैं उन्हें भी याद करता हूँ ऐसे गुमनाम अनेकों क्रांतिवीरों को भी याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

जय हिंद, जय बलिया।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ ऑनलाइन योग या प्रत्यक्ष योग कक्षा? ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 ऑनलाइन योग या प्रत्यक्ष योग कक्षा?🪷 

दो तरीके, दो तरह के अनुभव 🍀

योग आज डिजिटल युग में भी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन योग कक्षाएँ सुविधा, समय की स्वतंत्रता और घर की निजता देती हैं, जबकि प्रत्यक्ष योग कक्षाएँ व्यक्तिगत मार्गदर्शन, मानवीय जुड़ाव और निकट से सीखने का अवसर देती हैं।

इनमें से कोई एक अपने-आप में सही या गलत नहीं है। चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि साधक योग से क्या प्राप्त करना चाहता है।

🏠 ऑनलाइन योग — सुविधा और लचीलापन

✔️ सुविधाजनक: अपनी सुविधा के अनुसार समय चुनकर घर के शांत और निजी वातावरण में अभ्यास किया जा सकता है।

✔️ आसानी से उपलब्ध: योग स्टूडियो तक आने-जाने की आवश्यकता नहीं होती। व्यस्त दिनचर्या या सीमित गतिशीलता वाले लोगों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।

व्यक्तिगत ध्यान सीमित: बड़ी ऑनलाइन कक्षा में योग प्रशिक्षक के लिए प्रत्येक साधक की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखना और गलत आसनों या गतिविधियों को ठीक करना कठिन होता है।

सबके लिए एक जैसा अभ्यास: प्रायः पूरी कक्षा के लिए एक ही क्रम और निर्देश होते हैं। अलग-अलग आयु, शारीरिक क्षमता और व्यक्तिगत आवश्यकताओं वाले सभी लोगों के लिए एक ही अभ्यास समान रूप से उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं।

व्यक्तिगत जुड़ाव कम: स्क्रीन निर्देश तो पहुँचा सकती है, लेकिन आमने-सामने मिलने से पैदा होने वाली आत्मीयता, संवाद, प्रोत्साहन और मानवीय संबंधों को पूरी तरह महसूस कराना उसके लिए कठिन है।

परम्परा का एक आयाम छूट जाता है: आभासी माध्यम में प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा का वह जीवंत अनुभव स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है, जिसमें शिक्षक को देखकर, उसके मार्गदर्शन में और उसके साथ रहकर सीखना शामिल है।

🧘 प्रत्यक्ष योग — व्यक्तिगत मार्गदर्शन और आत्मीयता

✔️ व्यक्तिगत ध्यान: छोटी कक्षा में योग शिक्षक या गुरु प्रत्येक साधक को अधिक ध्यान से देख सकते हैं, उसकी मुद्रा सुधार सकते हैं और आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन कर सकते हैं।

✔️ व्यक्ति के अनुरूप अभ्यास: शिक्षक जब साधक को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, तो उसकी आयु, शारीरिक स्थिति, सीमाओं और आवश्यकताओं के अनुसार अभ्यास में बदलाव कर सकते हैं।

✔️ अधिक सुरक्षित अभ्यास: सभी से एक जैसे आसन करवाने के बजाय शिक्षक किसी साधक को ऐसे आसन से बचने या उसे संशोधित करने की सलाह दे सकते हैं, जो उसके लिए उपयुक्त न हो।

✔️ मानवीय जुड़ाव: आमने-सामने मिलने से शिक्षक और साधकों के बीच आत्मीयता, प्रोत्साहन, मित्रता और सामूहिकता की भावना विकसित होती है।

✔️ जीवंत परम्परा: अनेक साधकों के लिए शिक्षक की प्रत्यक्ष उपस्थिति में सीखना प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा के उस महत्वपूर्ण पक्ष को जीवंत करता है, जिसमें केवल निर्देश सुनना ही नहीं, बल्कि देखकर सीखना, अभ्यास करना, गलती सुधरवाना और अनुभव के माध्यम से आगे बढ़ना भी शामिल है।

🌿 इसे एक सरल उदाहरण से समझें

ऑनलाइन कक्षा कभी-कभी ऐसी हो सकती है जैसे एक डॉक्टर हजारों मरीजों को एक ही दवा लिख दे—यह सुविधाजनक हो सकती है और बहुतों के लिए उपयोगी भी, लेकिन हर व्यक्ति की अलग आवश्यकता का ध्यान रखना सम्भव नहीं होता।

इसके विपरीत, एक अच्छा प्रत्यक्ष योग शिक्षक प्रत्येक साधक को देखकर, उसकी सीमाओं और आवश्यकताओं को समझकर उसके लिए अधिक उपयुक्त अभ्यास बता सकता है।

निष्कर्ष

  • ऑनलाइन योग सुविधा देता है।
  • प्रत्यक्ष योग आत्मीयता देता है।
  • ऑनलाइन योग पहुँच आसान बनाता है।
  • प्रत्यक्ष योग व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है।

जो व्यक्ति योग की मूल बातें अच्छी तरह समझता है, सुरक्षित अभ्यास करना जानता है और समय की सुविधा चाहता है, उसके लिए ऑनलाइन योग एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

लेकिन जो साधक निकट से मार्गदर्शन, व्यक्तिगत ध्यान, आसनों में सुधार, आत्मीय संगति और शिक्षक–शिष्य के गहरे अनुभव की तलाश में है, उसके लिए छोटी प्रत्यक्ष योग कक्षा वह अनुभव दे सकती है, जिसे एक स्क्रीन पूरी तरह नहीं दे सकती।

अंततः, सबसे अच्छी योग कक्षा वही है जो आपको नियमित, सुरक्षित, सजग और सार्थक अभ्यास के लिए प्रेरित करे। 🧘‍♀️🌿

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७३ ⇒ मलाई-नामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मलाई-नामा।)

?अभी अभी # १०७३ ⇒ आलेख – मलाई-नामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ व्यक्तित्व मलाई जैसे होते हैं, मसलन दलाई लामा ! मैं छुटपन से देखता आ रहा हूँ। मैंने मलाई के स्वाद में और दलाई लामा के स्वरूप व स्वभाव में कभी कोई अंतर नहीं पाया।

मलाई दूध का वाष्पीकृत, परिष्कृत स्वरूप है। दलाई लामा भी व्यक्ति, संस्कार, साधना, संयम और सहनशक्ति की पराकाष्ठा है। हमारे शंकराचार्य की तरह दलाई लामा अपने नाम के आगे पीठ और नाम नहीं लगाते। वे अपने व्यक्तित्व को भी एक ही पदवी में, अवस्था में विलीन कर लेते हैं।।

आम इंसान एक साधारण दूध है, जिसे तपाने पर कुछ गाढ़ापन आने लगता है। संघर्ष और तपिश को बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है। अगर तपन की आँच को कम न किया जाए तो व्यक्तित्व में क्रोध का उफान आने की संभावना रहती है, दूध या तो उफन जाता है, या जल जाता है। धैर्य और सहनशक्ति व्यक्ति में परिपक्वता और ठंडक लाता है।

यही दूध में मलाई है, इंसानों में विवेकवान, ज्ञानवान, लामाओं में दलाई लामा, और संतों में श्रेष्ठ महात्मा, शंकराचार्य अथवा सद्गुरु हैं।

हम कुछ सज्जनों को क्रीम ऑफ सोसयटी कहते हैं। जिस तरह खाद्य पदार्थों को क्रीम से गार्निश, अर्थात सजाया जाता है, यह आभिजात्य वर्ग देश के वैभव और सम्पदा को बढ़ाता है। देश की कीर्ति में चार चाँद लगाता है। ललित कला, साहित्य, संगीत और सामाजिक क्षेत्रों में विराजमान प्रतिभाओं को राष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा जाता है।।

सामाजिक असमानता का आलम यह है कि किसी वंचित के नसीब में दूध की एक बूँद नहीं, और कहीं देखो तो मलाई-पाक से नीचे बात नहीं। जो सम्पन्न लोग मलाई का संग्रह कर लेते हैं, उन्हें कालांतर में मलाई से नवनीत और घृत की प्राप्ति होती है, जो शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु रखता है। आम आदमी बची हुई छाछ से ही कढ़ी बना संतुष्ट हो जाता है और अपने प्रभु का गुणगान करता रहता है।

दलाई लामा बनना इतना आसान नहीं ! जप, तप, त्याग और संयम ही जीवन की मलाई है, निचोड़ है। सियासती नारे और चुनावी वादे भी एक तरह मलाई का ही प्रलोभन है। मेहनत की, पसीने की कमाई से आप सिर्फ़ दूध की ही आस रख सकते हैं, और कभी दूध से भी जल जाएँ, तो छाछ भी फूँक-फूँककर पी सकते हैं।।

आजकल तो मलाई का भी आरक्षण होने लग गया है। बिल्ली की तरह इंसानों में भी एक प्रजाति होती है, जिसे वीआईपी कहते हैं। जिस प्रकार सात तालों में रखी मलाई पर बिल्ली हाथ साफ़ कर सकती हैमलाई का उत्तम-भोग भी सबसे पहले वीआईपी द्वारा ही लगाया जाता है। हम तो खुरचन से ही संतुष्ट होने वाले लोग हैं …!!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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