हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३८ ☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(शिक्षक दिवस पर ” संभवम् ” संस्था द्वारा डॉ मुक्ता जी का सम्मान – 16 September 2026)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३८ ☆

☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। परंतु जब आप संवाद अर्थात् वार्तालाप करना बंद कर देते हैं, तो आप अपने अनमोल संबंध खो देते हैं।’ यह वाक्य गहन-गूढ़ अर्थ को परिलक्षित करता है। जैसे संवाद अथवा कथोपथन कहानी या नाटक को गति प्रदान करते हैं; वैसे ही संवाद हमारे जीवन को ऊर्जा व जीवंतता प्रदान करते हैं… हमारे अंतर्मन में जीने की उमंग जाग्रत करते हैं। जैसाकि सर्वविदित है– मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेला रहने में स्वयं को असमर्थ पाता है। इसलिए ही वह जन्म- जात संबंधों के रहते भी अन्य संबंध स्थापित करता है, क्योंकि वह अपने सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति किए बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। वह अपने हृदय के भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर सुक़ून पाता है तथा स्वयं को अकेला, असहाय व विवश अनुभव नहीं करता।

यदि आप वार्तालाप/ संवाद करना बंद कर देते हैं, तो अनमोल संबंधों को खो देते हैं। संवादहीनता मान-दशा तक तो  वाज़िब है, परंतु उसके बाद यह सज़ा बनकर रह जाती है और एक अंतराल के पश्चात् मानव स्वयं को  नितांत अकेला अनुभव करता है। प्रश्न उठता है– क्या संबंध बनाए रखने के लिए मानव को दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए अपने आत्म-सम्मान को दाँव पर लगा देना चाहिए? नहीं…यह तो चाटुकारिता कहलायेगी। यदि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहती है, तो मानव तनाव, चिंता व अवसाद से घिर जाता है और अंततः उस व्यूह को भेदना मानव के वश से बाहर हो जाता है। तनाव संबंधों की ताज़गी व पारस्परिक स्नेह-सौहार्द को लील जाता है और ऐसे व्यक्ति के साथ रहने से दूसरे पक्ष के लोग भी गुरेज़ करना प्रारंभ कर देते हैं। सो! उसे जीवन में अकेले विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

लंबे समय तक तनाव की यह स्थिति मानव को चिंता के अथाह सागर में धकेल देती है। चिंता चिता समान है, जो दीमक की भांति मानव के उत्साह, साहस, धैर्य आदि को लील कर, शरीर रूपी इमारत की चूलों को हिला कर खोखला कर देती है। चिंताग्रस्त मानव सदैव ख़ुद से बेखबर स्वनिर्मित लोक में विचरण करता रहता है। वह बेसिर-पैर की कल्पनाओं में खोया, अनगिनत शंकाओं में घिरा स्वयं को अपाहिज-सा अनुभव करता है। यदि ऐसा-वैसा हो गया, तो उसका क्या होगा? उसके परिवार की क्या दशा होगी? उन विषम परिस्थितियों से वे कैसे निज़ात पा सकेगे? चिंताग्रस्त मानव को चारों ओर अंधकार ही अंधकार नज़र आता है। जीवन में उसे आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती और न ही कोई उम्मीद की झलक दिखाई पड़ती है…उसे जीवन मरु-सम भासता है। उसकी दशा रेगिस्तान के उस हिरण-सी हो जाती है, जो प्यास से आकुल-व्याकुल सूर्य की किरणों को जल समझ उनके पीछे दौड़ा चला जाता है और अंत में अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। यही होती है अवसाद-ग्रस्त मानव की मन:स्थिति… जिसके जीवन में न कोई उमंग रहती है; न ही कोई तरंग; न प्रसन्नता; न ही उल्लास…वह तो नितांत अकेला, तन्हा-सा अपना जीवन बसर करता है अर्थात् ढोता है।

संवादहीनता मानव को उस कग़ार पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वह हरदम तन्हाई के दंश झेलता है; जो नासूर बन उसे आजीवन सालते हैं। संवादहीनता आजकल सभी रिश्ते-नातों में सेंध लगाकर जीवन के सुक़ून व सुखों पर डाका डाल रही है। सुक़ून मन की वह निर्विकार अवस्था है, जहां मानव राग-द्वेष व स्व-पर की निकृष्टतम वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है और अंतर्मन रूपी सागर के शांत जल में निरंतर अवगाहन करता रहता है और वहां पहुचने के पश्चात् सभी इच्छाओं का शमन हो जाता है। परंतु उस स्थिति तक पहुंचने में मानव को वर्षों तक साधना-तपस्या करनी पड़ती है।

आइए! हम संबंध-निर्वाह के विषय पर चर्चा कर लें। संबंध विश्वास के आधार पर स्थापित तो हो जाते हैं, परंतु उनका निबाह करने के लिए आवश्यकता होती है बर्दाश्त करने की…यदि हममें सहनशीलता का मादा है, तो संबंध स्थायी व स्थिर रह सकते हैं, अन्यथा वे पानी के बुलबुले की भांति पल-भर में विलीन हो जाते हैं। संबंध कभी भी दूसरों से जीतकर नहीं निभाए जा सकते; उन्हें बनाए रखने के लिए तो जीतकर भी हारना पड़ता है। उनकी भावनाओं को महत्व देते हुए, प्रियजनों की प्रसन्नता के लिए पराजय को स्वीकारना पड़ता है। इसके विपरीत यदि आप वार्तालाप बंद कर देते हैं, तो संबंध टूट जाते हैं;  समाप्त हो जाते हैं और उन विषम परिस्थितियों में आप अकेले रह जाते हैं और कोई पल-भर के लिए भी आपके साथ समय व्यतीत करना पसंद नहीं करता।

यदि हम संबंधों को चिरस्थाई व शाश्वत् रूप प्रदान करना चाहते हैं, तो हमारे लिए यथासमय झुकना व दूसरों को सहन करना कारग़र होगा। दूसरे शब्दों में हमें परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना होगा। झुकना, सहना व समझौता करने की एक ही मांग होती है…अहं का विसर्जन। यह ही एक ऐसा उपादान है; जिसके द्वारा आप दूसरों का हृदय परिवर्तित कर सकते हैं…अपने प्रति दूसरों के मन में विश्वास जाग्रत कर सकते हैं। वैसे भी जीवन केवल संघर्ष ही नहीं; समझौता है। संघर्ष की स्थिति हमारे अंतर्मन की आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करती है; प्रेरित करती है; हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचाती है। दूसरे शब्दों में समझौता हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन कर, संबंधों को शाश्वत रूप प्रदान कर हमें सुक़ून देता है; जीने की प्रेरणा देता है। सो! संबंधों को सार्थकता प्रदान करने हेतु जहां संवादों की दरक़ार है; वहीं समझौता भी वह संजीवनी है, जिसमें प्राणदायिनी शक्ति निहित है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि जीवन में कभी संवादहीनता की स्थिति न पनपने दें, क्योंकि यह वह सुनामी है; जो संबंधों को लील जाता है और जीवन को शून्यता से भर देता है। यह स्थिति मानव के लिए अत्यंत घातक है, विस्फोटक है। सो! हम सबको अपने दायित्व का वहन करना चाहिए और समाज में स्नेह, सौहार्द, समन्वय, सामंजस्यता व समरसता की स्थिति बनाए रखने के लिए अपने अहम् का विसर्जन कर, संबंधों को सार्थक बनाने का भरसक प्रयास करना चाहिए …यही समय की मांग है और मानव-मात्र से अपेक्षित है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९६ ⇒ फुटपाथ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ…“।)

?अभी अभी # १०९६ ⇒ आलेख – फुटपाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।

हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ (फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।

फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है।।

एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।

जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी। शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो।।

बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?

आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। हर महानगर में धड़ल्ले से फुटपाथ खाली कराए जा रहे हैं, और अवैध कब्जों को नेस्तानबूद किया जा रहा है। बुलडोज़र अब जेसीबी की शक्ल ले रहे हैं और दबंग और सिंघम की जगह गुरूग्राम में डीटीपी आर एस बाठ अवतार ले रहे हैं, और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।

वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २५ ☆ आलेख – परशुराम जी – १ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – १‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २५ ☆

? आलेख – परशुराम जी – १ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

जिस हिन्दु धर्म, संस्कृति में हमने जन्म लिया है वह सभी दृष्टि से कृतार्थ धन्य है l इस धर्म ने इस संस्कृति ने जो- जो भी देखा, जिस -जिस का उच्चारण किया, जिस -जिस का अनुभव किया, जो बताया गया उसका वैसा ही प्रचार किया वो विश्व कल्याण हेतु किया l

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”l

ये मेरा वो तेरा कहने की जगह हम कहते हैं ये पूरा विश्व ही हमारे लिये एक परिवार के समान है और हमारा भारत देश उस विश्वरूपी परिवार का भगवान घर है l सम्पूर्ण विश्व को जिन्होंने मांगल्य और पवित्रता प्रदान की वही तो हमारी संस्कृति है, वही हमारा सनातन धर्म है l हमारे देश की भूमि पुण्याई की भूमि है l हमारे देश को पवित्र स्थली बनाने के लिये प्रधानता उन सभी सगुण अवतारों की है l इसमें आचार्य, संत, महापुरुष और उस ईश्वरीय सत्ता के सभी अवतार आते हैं l ये सभी एक ही बात कहते हैं, एक ही बात समझाते हैं कि ये सारी वसुंधरा, ये सारा विश्व एक कुटुंब की तरह है l

हम सनातनी इतने सौभाग्यशाली हैं कि हमारी भारत भूमि ने हमारी संस्कृति ने हमारे हिन्दू धर्म ने इस जगत को इतना भर भर के दिया है जिसे किसी तराजू में तोला नहीं जा सकता क्यूंकि वह बेमोल है l

हमारे सनातन में लिखा है कि यदि मानव जीवन को कृतार्थ करना हो तो इन तीन प्रस्थानत्रयी का अभ्यास होना जरूरी होता है

1- वैदिक प्रस्थानत्रयी

2 – पुराणिक प्रस्थानत्रयी

3 – संतो की प्रस्थानत्रयी

1 – वैदिक प्रस्थानत्रयी- इसमें ब्रम्ह सूत्र, दशोपनिषद और भगवदगीता आते हैं l ब्रम्ह सूत्र को न्याय प्रस्थान, दशोपनिषदको श्रुति प्रस्थान एवं भगवदगीता को स्मृति प्रस्थान भी कहा जाता है l ये तीनों ग्रंथ वैदिक प्रस्थानत्रयी के मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं l

2 – पुराणिक प्रस्थानत्रयी-  इसमें रामायण, महाभारत एवं श्रीमदभागवत आते हैं l

3 – संतो की प्रस्थानत्रयी- उत्तर भारत में कबीर, सूर और तुलसी इनकी प्रस्थानत्रयी है l महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर माउली, एकनाथ, तुकोबा एवं समर्थ रामदास जी की प्रस्थानत्रयी है l दक्षिण में आलवार, नयनार, आचार्य रामानुज, निम्बार्क, वल्लभचार्य आदि l

धर्म जिसके कारण मनुष्य को भौतिक समृद्धि मिलती है साथ में अर्थ का भी लाभ होता है l हिन्दू धर्म है इसीलिये मानव में मनुष्यता बची है l

सगुण अवतार हमारी हिन्दू संस्कृति का महत्वपूर्ण लक्षण है l

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते

मद्वयं = मत्स्य पुराण, मारकंडेयपुराण

भद्वयं = भागवत पुराण, भविष्य पुराण

ब्रत्रयं = ब्रम्ह पुराण, ब्रम्हवैवर्त पुराण, ब्रम्हाड पुराण

वचतुष्टयम् = वराह पुराण, वायु पुराण, वामन पुराण, विष्णु पुराण

अनापलिङ्गकूस्कानि = अग्नि पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, लिंग पुराण, गरुड़ पुराण, कूर्म पुराण, स्कन्द पुराण l

ये सब मिलकर अठारह पुराण हैं l

 – क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # ३०१ ☆ गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०१ ☆

☆ गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

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मास भादों की चतुर्थी, शुक्ल का चंदा सजा।

मातु गौरी के गजानन, राग मंगलमय बजा।।

नाम लंबोदर कहाया, तात शिव शंकर कहे।

नाथ! पूजा आपकी हो, लाभ संगत शुभ रहे।।

☆

गणपति बप्पा को हम बुद्धि, विवेक और मंगल के देवता मानते हैं। दूर्वा उन्हें प्रिय है और दूर्वा स्वयं प्रकृति की उस सहज हरियाली का प्रतीक है, जो बिना किसी आडंबर के धरती को जीवन और सौंदर्य प्रदान करती है। फिर क्यों न इस बार गणेश आराधना के साथ प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संकल्प भी लिया जाए?

गणेश उत्सव केवल पूजा, आराधना और सजावट का पर्व नहीं, बल्कि नई शुरुआत का उत्सव भी है तो क्यों न इस नई शुरुआत में एक पौधा लगाया जाए, उसके संरक्षण का संकल्प लिया जाए और अपने आसपास की हरियाली को थोड़ा और बढ़ाया जाए?

एक गणेश जी के नाम एक पौधा…

एक पौधे के नाम एक जिम्मेदारी…

और हर घर के नाम थोड़ी-सी हरियाली।

गणेश जी की पूजा में दूर्वा अर्पित करते समय हम यह भी स्मरण करें कि प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। सजावट में फूल-पत्तियों और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करें तथा प्लास्टिक और अनावश्यक कचरे से बचें। गणेश प्रतिमा के विसर्जन में भी पर्यावरण की संवेदनशीलता का ध्यान रखें। संभव हो तो मिट्टी की प्रतिमा और घर पर सुरक्षित विसर्जन जैसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाएँ।

क्योंकि विघ्नहर्ता गणेश जी की आराधना करते हुए हम प्रकृति के लिए स्वयं कोई नया विघ्न क्यों उत्पन्न करें?

आइए, इस गणेश उत्सव पर केवल गणपति को घर न लाएँ—

उनके साथ हरियाली का एक संकल्प भी घर लाएँ।

एक पौधा, एक भाव…

एक पौधा, एक जिम्मेदारी…

हर पौधा कुछ कहता है।

दूर्वा, गुड़हल, पुष्प सुहाएँ, मोदक भोग लगे।

नित्य जपें जो नाम तुम्हारा, उनके भाग्य जगे।।

तीर्थ सभी फलवान हों, भक्ति की गंगा बहे।

प्रेम से जयकार करें हम—

जय विघ्नहर्ता! जय गणेश कहे।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३१ ☆ लंदन डायरी – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३१ ☆

?  आलेख – #लंदन_डायरी – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन के Natural History Museum में आज एक ऐसी आकृति के सामने खड़ा था, जिसे देखकर विज्ञान कुछ और कहता है और मन कुछ और।

काँच के भीतर रखी सफेद, लहरदार संरचना को पहली नजर में देखा तो लगा, यह तो मेरे गणेश जी हैं! गोल-सा उदर, उभरती हुई मुखाकृति, सूँड़ जैसा आकार और दोनों ओर कानों का-सा विस्तार। किसी कुशल शिल्पकार ने मानो श्वेत पत्थर में गजानन को उतार दिया हो।

लेकिन यह किसी मूर्तिकार की बनाई प्रतिमा नहीं है। संग्रहालय इसे Gogotte कहता है, प्राकृतिक रूप से बनी एक विचित्र बलुआ-पत्थर संरचना। यह Lasting Impressions Gallery में प्रदर्शित है, जहाँ संग्रहालय पृथ्वी के अतीत की ऐसी प्राकृतिक वस्तुओं को प्रस्तुत करता है।

संग्रहालय स्वयं Gogotte को लगभग एक “solidified sandstone sculpture” जैसा बताता है। यह नमूना 2017 में संग्रहालय को सर डेविड एटनबरो के 90वें जन्मदिन के सम्मान में दिया गया था।

विज्ञान उसकी रचना की प्रक्रिया समझाता है। मेरी आँखें उसमें गणेश खोज लेती हैं।

यही भारतीय दृष्टि का सौंदर्य है। “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” गणेश को देखने के लिए हमेशा किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा की आवश्यकता नहीं। भारत में किसी वृक्ष के तने की आकृति में वे दिखाई दे जाते हैं, किसी अनगढ़ पत्थर में सूँड़ उभर आती है और किसी चट्टान का प्राकृतिक उभार गजानन का आभास देने लगता है।

गणेश स्वयं प्रकृति और कल्पना के बीच एक सहज सेतु बना देते हैं।

वे हमारे मन में बसते हैं।

मूर्तिकार मिट्टी से गणेश गढ़ता है।

भक्त पत्थर में गणेश देख लेता है।

और कभी-कभी प्रकृति ऐसी आकृति बना देती है कि दोनों के बीच का अंतर ही मिट जाता है।

लंदन में गणेश की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

कुछ दूरी पर British Museum के संग्रह में भारत से आई गणेश की अनेक प्राचीन प्रतिमाएँ हैं।

 ओडिशा की 12वीं शताब्दी की एक बलुआ-पत्थर प्रतिमा में गणेश चार भुजाओं के साथ कमल पर खड़े हैं और उनके पास उनका वाहन मूषक भी अंकित है। दूसरी, 13वीं शताब्दी की प्रतिमा में गणेश लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। यह पंचमुखी गणेश का अत्यंत विशिष्ट रूप है।

एक और 13वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा, जिसे British Museum ने Figure of Ganesha के रूप में दर्ज किया है, कभी लंदन के Horniman Museum और Brent Museum की Celebrating Ganesha प्रदर्शनियों में भी दिखाई गई थी। यानी लंदन में गणेश केवल किसी प्रवासी समुदाय की धार्मिक आस्था का हिस्सा मात्र नहीं हैं। भारतीय कला के इतिहास और वैश्विक संग्रहालय संस्कृति में भी उनकी अपनी जगह है।

Wimbledon में Shree Ghanapathy Temple है। इसकी कहानी तो जैसे लंदन में गणेश की जीवंत यात्रा है। 1979 में कुछ श्रीलंकाई हिंदू परिवार एक स्थानीय सभागार में गणेश की एक प्रतिमा के साथ नियमित पूजा के लिए जुटने लगे। वही प्रतिमा आज मंदिर की Utsavar Ghanapathy मानी जाती है। 1981 में पुराने Presbyterian Church भवन को रूपांतरित करके मंदिर का महाकुंभाभिषेक हुआ। मंदिर अपने इतिहास में इसे यूरोप का पहला पूर्णतः हिंदू मंदिर बताता है।

यह रोचक है कि पुराने चर्च में अब मंदिर है। इसी तरह पिछले दिनों मैने हैरो में आयोजित कवि गोष्ठी का उल्लेख अपनी डायरी में किया था , वह आयोजन स्थल भी मंदिर है, जो पहले चर्च ही था।

Tejendra Sharma

इस समय तो लंदन में गणेशोत्सव का वातावरण भी है। London Ganesh Utsava Samithi ने 14 से 26 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन गणेश पूजा, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और 26 सितंबर को विसर्जन का कार्यक्रम घोषित किया है।

इस तरह एक ही शहर में गणेश के कितने रूप दिखाई देते हैं।

कहीं वे प्रकृति की अनायास रचना हैं।

कहीं सदियों पुराने भारतीय शिल्प में सुरक्षित हैं।

कहीं वे प्रवासी समुदाय की स्मृतियों और आस्था के साथ जीवित हैं।

और संग्रहालय में खड़े हुए मेरे भारतीय मन को अचानक फ्रांस से आए पत्थर में वे परिचित स्वरूप में दर्शन देते हैं।

मुझे आज Natural History Museum की इस Gogotte ने यही सोचने को विवश किया कि शायद आस्था केवल पूजा का विषय नहीं, दृष्टि का भी विषय है।

भूविज्ञानी उस आकृति में पृथ्वी का इतिहास पढ़ता है।कलाकार उसकी आकृतियों में सौंदर्य देखता है।

और भक्त उसमें गणेश दर्शन करता है।

कौन सही है?

शायद प्रश्न ही गलत है।

हर दृष्टि अपने अनुभव का अर्थ लेकर आती है। विज्ञान हमें बताता है कि यह आकृति कैसे बनी। आस्था हमें बताती है कि उसे देखकर हमारे भीतर क्या जागा।

फ्रांस की धरती पर करोड़ों वर्ष पहले बनी इस प्राकृतिक संरचना को लंदन में देखकर मेरे भीतर गणेश जागे।

और मन में यही आया—

गणेश शायद केवल मंदिर में विराजते देवता नहीं हैं। वे उस क्षण में भी हैं, जब हमारी दृष्टि किसी अनगढ़ वस्तु में अर्थ, सौंदर्य और मंगल का आकार पहचान लेती है।

आज मैंने गणेश जी को लंदन में खोजा नहीं।एक प्राकृतिक पत्थर ने मुझे उन्हें दिखा दिया।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९५ ⇒ पुरुषार्थ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पुरुषार्थ…“।)

?अभी अभी # १०९५ ⇒ आलेख – पुरुषार्थ  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा समाज पुरुष-प्रधान है!

पुरुषार्थ शब्द पुरुष से जोड़ा गया है। व्याकरण में एक कॉमन जेंडर होता है। आदमी, इंसान और व्यक्ति शब्द वैसे ही प्रयुक्त होता है जैसे जनता! जनता में स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े जैसे शामिल माने जाते हैं, आदमी, इंसान और व्यक्ति का भी प्रयोग स्त्री-पुरुष पर समान रूप से किया जा सकता है। ” जनता ” में मर्द भी होते हैं, और ” भीड़ ” पुरुषों की भी हो सकती है। इंसान को झूठ नहीं बोलना चाहिए, यह सभी पर लागू होता है। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि इन सब शब्दों से पुरुष की ही बू आती है।

मर्दाना की तुलना में अगर हमारे पास मर्दानी शब्द है, तो पुरुष के लिए महिला और नर के लिए नारी। यह भी सच है कि पत्नी के बिना पति शब्द की उत्पत्ति नहीं हो सकती और बच्चे के जन्म के बिना माँ शब्द भी अस्तित्व में नहीं आ पाता।।

हम जिसे हिंदी में प्रयत्न कहते हैं, अंग्रेज़ी में effort कहते हैं, संकल्प शक्ति अथवा determination कहते हैं, जी जान लगाना कहते हैं, अपना सब कुछ दाँव पर जब लग जाता है, और उसका प्रतिफल नज़र आने लगता है, तब जाकर पुरुषार्थ जैसा शब्द सार्थक होता है।

चींटी में भी पुरुषार्थ होता है, और हाथी में भी। जहाँ एक नाज़ुक सी चिड़िया अपने छोटे छोटे पंखों के सहारे आसमान नाप लेती है, वहीं एक हट्टा-कट्टा बलशाली ‘ पुरुष ‘ अगर अपने दोनों पाँव उठा ले, तो पाँवों तले ज़मीन खिसकती नज़र आए। बस यही अंतर है इंसान के पुरुषार्थ और एक पंछी की उड़ान में।।

आप उसे परम पिता, परमेश्वर, प्रभु, ईश्वर, रब, पुरूषोत्तम, ख़ुदा, रहबर, ऊपर वाला, निराकार, निरंजन कुछ भी समझें, वह भगवान अर्थात परम पुरुष ही है जिसे omnipotent, और omnipresent कहा जाता है। मतलब यह कि वह है कोई परम पुरुष ही।

शक्ति के बिना पुरुष अधूरा है, पुरुषार्थ अधूरा है। यह शक्ति का संतुलन ही शिव को शक्ति से जोड़ता है और सृष्टि की रचना होती है। शक्ति-रहित पुरुषार्थ नपुंसकता है। और यही प्रकृति और पुरुष का मेल सृष्टि के सृजन का कारण बनता है।।

पुरूष अगर अहंकार है तो स्त्री समर्पण! एक ओर ममता है तो दूसरी ओर कर्तव्य-पालन।

पुरुष अगर शासक है तो स्त्री प्रशासन। पुरुष घर बना सकता है, लेकिन बिना स्त्री के वह घर, घर नहीं कहला सकता।

एक अधूरापन पुरुष में है, एक अधूरापन स्त्री में। दोनों का मिलन ही पूर्णता है, perfection है। यह संसार स्त्री-पुरुष के पहिए पर ही चल रहा है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं। दोनों में समानता, एक दूसरे के प्रति सम्मान ही सच्चा पुरुषार्थ है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌺 जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… 🌺

(आदरणीय मित्र अ ल देशपांडे को अभी एक संदेश भेजा। उसे आपको भी भेज रहा हूं। आप सभी इसे पढ़कर आनंदित हों! 🙏)

 ˚⊱🪷⊰˚

🌺 जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… 🌺

(कुछ स्मृतियाँ मोदक की मिठास जैसी होती हैं—वर्षों बाद भी वैसी ही मीठी!)

आदरणीय अ. ल. जी, 🙏

आज गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर घर में जैसे ही “गणपति बप्पा मोरया!” का जयघोष गूँजा, दिल के किसी कोने से आपकी याद का उभर आना उतना ही स्वाभाविक था, जितना पूजा के बाद मोदक की थाली पर निगाह का जाना! 😊

सच्चाई तो यह है कि जीवन में गणपति जी की पहली विधिवत, भव्य और आत्मीय पूजा का अनुभव आपके ही आँगन में हुआ था। उस समय पूजा के पावन मंत्रों के बीच मेरी नज़रें भले ही गणपति जी पर टिकी हों, लेकिन मन की एकाग्रता बार-बार मोदक और लड्डुओं की थाली की ओर खिंच जाती थी! 😄

और सच मानिए, मैंने और राजू ने मिलकर आपके घर प्रसाद का जो “सफ़ाया अभियान” चलाया था, उसका रिकॉर्ड आज तक कोई नहीं तोड़ पाया! 😂

भाभी जी के हाथों से बने उस सुस्वादु और अनूठे भोजन का स्वाद आज भी जिह्वा ही नहीं, स्मृतियों में भी ताज़ा है। आपकी लाड़ली बच्चियों ने जिस आदर, अपनत्व और अपार स्नेह से वह सब परोसा था, वह केवल भोजन नहीं था—वह रिश्तों की मिठास थी। ❤️

तब हमारा राजू भी बहुत छोटा-सा था। आपकी बेटियों से मिले बहन के उस पावन अनुराग ने उसके बचपन को जो आत्मीयता दी, उसकी स्मृतियाँ आज भी हमारे हृदय में एक अनमोल धरोहर की तरह सुरक्षित हैं। कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं होते; वे समय के साथ और गहरे उतरते जाते हैं। 🌸

स्मृतियों के इस कारवाँ में वह लम्हा भी बार-बार याद आता है, जब मेरे स्थानांतरण के समय आपने मुझे गणेश जी की एक बेहद मोहक और सुंदर प्रतिमा भेंट की थी। 🙏

दुर्भाग्य से ट्रांसपोर्ट वालों की “अद्भुत मूर्तिकारी कला” के कारण वह प्रतिमा रास्ते में थोड़ी क्षतिग्रस्त हो गई थी और हमारा मन बहुत दुखी हुआ था।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—शायद बप्पा ने अपना एक छोटा-सा अंश उसी स्नेह-स्मृति के रूप में हमारे पास रोक लिया था! ❤️🙏

कल जब हम बाज़ार गए और दुकानों पर बप्पा के हज़ारों रूप देखे, तो मन आनंद से भर उठा। एक से बढ़कर एक सुंदर और मनमोहक प्रतिमाएँ सजी थीं। उस विहंगम दृश्य ने जैसे बरसों पुराना उत्साह फिर से जगा दिया।

इस वर्ष हमने भी पूरे भक्ति-भाव से अपने घर में इको-फ्रेंडली गणेश जी की स्थापना करने और विधि-विधान से पूजन का संकल्प लिया है। 🌿🐘🙏

यह जानकर आपको कितनी खुशी होगी, इसका अंदाज़ा हम सहज ही लगा सकते हैं।

इस पावन अवसर पर हमारी ओर से आपको और आपके पूरे परिवार को गणेश चतुर्थी की अनंत और हार्दिक मंगलकामनाएँ! 🌺

बप्पा आपके जीवन में सुख, शान्ति, समृद्धि और स्वास्थ्य के साथ-साथ वही पुरानी मिठास सदा बनाए रखें। 🙏✨

और हाँ…

हमारे घर बप्पा पधार चुके हैं—अब आपका इंतज़ार है! 😊

आप पूरे परिवार सहित सहर्ष सादर आमंत्रित हैं। पधारिए और वर्षों पुरानी इन मधुर स्मृतियों के रिश्ते को एक बार फिर नए मोदकों की मिठास दीजिए। 🪷🍘❤️

🙏 जय गणेश!

🙏 गणपति बप्पा मोरया!

आपका

ज. सिं. बि.

˚⊱🪷⊰˚

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९४ ⇒ कांच और कैमरा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कांच और कैमरा…“।)

?अभी अभी # १०९४ ⇒ आलेख – कांच और कैमरा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिसे दुनिया आइना, शीशा अथवा दर्पण कहती है, हमारे घर में उसे कांच कहा जाता था। तब साधारण घरों में आईने वाली स्टील की आलमारी और दहेज वाली, कांच लगी, ड्रेसिंग टेबल भी नहीं होती थी, ना तो कोई अटैच बाथ होता था और ना ही कोई बैडरूम। हां घरों के आले में एक जगह कांच, कंघा और एक छोटी लोहे की डब्बी, अथवा कांच की शीशी में खोपरे का तेल रखा जाता था। ठंड में खोपरे का तेल ठरक जाता था, यानी जम जाता था। स्कूल जाने की जल्दी में उसे नहाने के गर्म पानी में डुबकी दी जाती थी, वह बेचारा, इस उपकार के फलस्वरूप, अंदर से पिघल जाता था। कभी कभी आपातकाल में सरसों का तेल ही बालों में चुपड़ लिया जाता था। कुछ संपन्न घरों में दीवारों पर फ्रेम में किसी तस्वीर की तरह टंगा, आइना भी नजर आ जाता था।

मुझे कैमरे का शौक ना तब था, न आज है। एक समय था, जब अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आते थे, जापानी कैमरा, वीपीपी डाक से मंगाइए, मात्र ५० रुपए में।

सत्तर और अस्सी के दशक में शादियों के एल्बम धड़ाधड़ बनते थे। जिसके घर भी मिलने जाओ, वह शादी का एल्बम जरूर चाव से दिखाता था। कुछ श्वेत श्याम तस्वीरें तो बाबा आदम के जमाने की लगती थी। लेकिन कितना रंगीन होता था न, शादी का एल्बम।।

गर्मी की छुट्टियां हों अथवा एलटीसी लिया हो, शिमला मसूरी के साथ साथ तीरथ भी ही जाता था। बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोता। बैडिंग अथवा होल्डाल के साथ साथ एक अदद कैमरे की व्यवस्था भी की जाती थी। बाद में तो कैमरे के रोल भी रंगीन मिलने लग गए थे। यात्रा के बाद कैमरे के रोल धुलवाने पड़ते थे, अच्छा खासा इंतजार हुआ करता था। आज की तरह नहीं कि, लिया मोबाइल और खचाखच बीस पच्चीस एक जैसी तस्वीर खींच डाली। कुछ प्रिंट खराब भी निकल जाती थी। यानी बड़ा महंगा शौक था, फोटोग्राफी का।

कुछ टूरिस्ट स्पॉट्स पर तो पेशेवर फोटोग्राफर घूमा करते थे, आपके फोटो खींचकर बाद में डाक से भिजवा दिया करते थे।

अब तो खुदखेंच का जमाना है, आप चाहो तो मोदी जी के साथ सेल्फी हो जाए।।

अगर दर्पण झूठ नहीं बोलता, तो कैमरा भी कड़वा सच नहीं छुपाता। कुछ दिनों से मुझे अपना चेहरा बदला बदला, और सिर के बाल उड़े उड़े, यानी

उजाड़ फसल, और बचे खुचे बाल, मानो धूप में सफेद किये हुए, नजर आने लगे हैं।

अपनों से तो आप नजर छुपा सकते हो, लेकिन अपने आपको कैसे छुपाओगे। कैमरा तो दर्पण का भी बाप है। अगर खुद की सूरत से इतना ही प्यार है, तो बालों को डाई करो, अमिताभ की तरह दाढ़ी रख लो, सफेदी वरदान बन जाएगी।।

यही तो फर्क है, सूरत और सीरत में। पुरानी मशहूर अभिनेत्रियों को ही देख लीजिए, कहां गया उन हूरों का नूर। लेकिन सब कितनी मशहूर। जीवन का

अध्यात्म अपने अंदर झांकने में है, आईने और कैमरे से शिकायत करने में नहीं। बाहर सब कांच ही कांच है, असली हीरा तो हमारे अंदर ही मौजूद है।

शैलेन्द्र ने शायद आज से तिहोत्तर वर्ष पूर्व यानी सन् १९५३ में ही मेरे लिए यह गीत लिखा होगा, फिल्म शिकस्त का, जो मुझे आज भी प्रेरणा दे रहा है, मेरी आंखें खोल रहा है ;

नई जिंदगी से प्यार करके देख।

रूप का सिंगार करके देख।।

इसपे जो भी है,

निसार करके देख।

नई ज़िंदगी से प्यार करके देख।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ स्वर्ण किरण के छूते ही…… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ स्वर्ण किरण के छूते ही… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाइबुन)

☆

हरसिंगार कहते ही सिन्दूरी वृन्त पर दूधिया कोमलांगी पाँखुरियाँ ही नहीं, भीनी भीनी महक का चित्र पल में बना लेती हैं आँखें।नेत्रों से झरने लगती है ओस।

समूची कायनात किरणों की प्रतीक्षा में घुप्प अंधेरों से जंग लड़ती है।प्रतीक्षा ही तो उत्स है उर्जा का।

पहली पहली स्वर्णकिरण,पहले पहले प्रेम पत्र सी जिसे मन जी भरकर देखना चाहे, छूना चाहे, एक अटूट भरोसे की आहट।जैसे ये किरण नहीं तरी है जो सारे दिन का दरिया पार कराएगी।

जिस उजाले की पहली रश्मिरेखा से जिन्दगी का फलसफा लिखा जाता है,आशा की परियां गुनगुन करने लगती हैं वही हरसिंगार से जिन्दगी छीन लेती है।जिन्दगी सिर्फ एक रात की।उफ़।जो हवा दीप जलाती है वही बुझा भी देती है।

एक रात का अतिथि हरसिंगार। भारतीय दर्शन सारा का सारा एक फूल से निवेदित होता है।जिन्दगी कितनी मिली इसके मानी ज्यादा नहीं, कैसे जी गई सारा तत्वदर्शन इसी में समाया है।रंगकोष लुटाकर,खुशबू उड़ेलकर।मकसद पूरा ऐसे होता है।फिर धरती को देह सौंप देती है प्रकृति।

अतिशय कोमल रूप की ऐसी परिणति !कोमलता भी ऐसी कि हल्का सा परस भी आहत कर जाए।

मिट्टी के अक्षय पात्र में सब कुछ एक रंग,एक रूप, एक प्राण हो जाता है।

  कितनी ही अनिंद्य रूपराशि, पराकोटि की महक क्यों न हो सभी को मिट जाना है एक दिन।

 समुद्र मंथन से निकला था हर सिंगार।मनोमंथन से भी यह अविष्कार संभव है।

मेरे देवतरु के फूल भी मेरे —- मेरा मेरा — कुछ नहीं होता। सारा निसर्ग का है।

दरअसल इस स्वर्गिक रूपराशि से आँखों को उनके होने का गर्व अनुभव करवाना होता है।

सत्यभामा के लिये स्वर्ग से लाये थे कृष्ण —- हरसिंगार। नियति — उसके फूल रुक्मिणी के आँगन में झरते थे।अपना अपना भाग्य।

हर फूल की नियति तै है। पूर्वलिखित है।

कंपाउंड वाॅल के बाहर की टहनियों से हरी हरी घास पर बारिश की बूँदों में लिपटे भीगे भीगे फूल, कार्पोरेशन के झाड़ूवाले बड़ी बेरहमी से डस्ट बिन में डाल देते हैं।कुछ उन्हें अनजाने में रौंदते हुये चलते हैं।

कुछ संवेदनशील मन के स्वामी, एक एक फूल हौले हौले चुनते हैं—-

माना कि तुम शाख से अलग हो चुके हो पर मन है कि मानता नहीं—निष्प्राण में प्राणों के स्पंदन सुनने की बेकली,कातर आशा— सब कुछ जानते हुये भी, निरीह मन को समझाने में नाकाम।

हरसिंगार के एक दिन का सफरनामा– तेरा तुझको अर्पण।।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उम्मीद से….! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उम्मीद से….! ? ?

……हिंदी की बात छोड़ दीजिए। कल्पनालोक से बाहर आइए। हिंदी कभी पढ़ाई-लिखाई, एडमिनिस्ट्रेशन, डिप्लोमेसी की भाषा नहीं हो सकती। हिंदी एंड इंग्लिश का अभी जो स्टेटस है, वही परमानेंट है…।

उसकी बात सुनकर मेरी आँखों में चमक आ गई। यह वही शख्स है जिसने कहा था,…जम्मू एंड कश्मीर की बात छोड़ दीजिए। जे एंड के का अभी जो स्टेटस है, वही परमानेंट है…।

देश उम्मीद से है।

(5 अगस्त 2019 को सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत किये जाने से एक दिन पहले, 4 अगस्त को प्रातः 5:20 पर जन्मी रचना।)

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© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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