हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८५ ☆ आलेख – “राजस्थान में हिंदी : एक सांस्कृतिक और भाषाई अध्ययन” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८५ ☆

?  आलेख – राजस्थान में हिंदी : एक सांस्कृतिक और भाषाई अध्ययन ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

राजस्थान, जिसे ‘राजाओं की भूमि’ के नाम से जाना जाता है, न केवल अपने वैभवशाली इतिहास, दुर्गों और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह एक समृद्ध भाषाई परंपरा का भी क्षेत्र रहा है। यहाँ की हिंदी भाषा ने सदियों से विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों को आत्मसात करते हुए एक विशिष्ट पहचान बनाई है। राजस्थान में हिंदी के विविध स्वरूप, बोलचाल में क्षेत्रीय अपभ्रंश, साहित्यिक हिंदी का विकास और सरकारी प्रयासों ने मिलकर एक ऐसी विविधता से भरी भाषाई संस्कृति को जन्म दिया है जो अतीत और वर्तमान के बीच  सशक्त सेतु का कार्य करती है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य …

राजस्थान में हिंदी का सतत  विकास एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। अरावली पर्वतमाला के भौगोलिक विभाजन ने यहाँ की भाषा को दो प्रमुख भागों , उत्तर-पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़ या मरूदेश) और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान (मेरवाड़ा) में विभाजित किया। यहाँ की आदिभाषा ‘मरूभाषा’ या ‘मरुवाणी’ रही है, जो समूचे राज्य की साहित्यिक भाषा भी बनी। भाषाविदों के अनुसार, राजस्थानी भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ, जिसके साहित्यिक रूप को ‘डिंगळ’ के नाम से जाना गया।

राजस्थान के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि यह क्षेत्र सदैव से विदेशी आक्रमणों का केन्द्र रहा है, परंतु इन आक्रमणों ने यहाँ की भाषा और संस्कृति को समृद्ध ही किया। विभिन्न आक्रांताओं के साथ आए सांस्कृतिक प्रभावों ने स्थानीय बोलचाल की भाषा में नए शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्तियाँ जोड़ीं, जिससे हिंदी के स्थानीय स्वरूप में निरंतर परिवर्तन और विकास होता रहा।

राजस्थान में हिंदी के विभिन्न स्वरूप और क्षेत्रीय अपभ्रंश …

राजस्थान में हिंदी ने अनेक क्षेत्रीय रूप धारण किए हैं, जो स्थानीय बोलियों और भाषाई परंपराओं से गहराई से प्रभावित हैं। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से राजस्थानी भाषा हिंदी की एक महत्वपूर्ण बोली मानी जाती है, जिसमें डिंगल और पिंगल जैसी साहित्यिक परंपराएँ विकसित हुई हैं। राजस्थानी भाषा में डिंगल के सरस दोहे, नाथों की बानियों के गूढ़ साक्षात्कार, ढोला-मरवण की विरहोक्तियाँ और वीरदर्पोचित चैतावणी  शामिल हैं।

बोलचाल की हिंदी में राजस्थानी के प्रभाव स्पष्ट घुल मिल चुके हैं। स्थानीय बोलियों जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी आदि ने हिंदी के स्थानीय स्वरूप को आकार दिया है। इन बोलियों में प्रयुक्त होने वाले शब्द, मुहावरे और वाक्य संरचनाएँ हिंदी में समाहित होकर उसे एक विशिष्ट राजस्थानी अंदाज़ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘छानो’ (अच्छा), ‘बिगो’ (जल्दी करो) जैसे शब्द स्थानीय हिंदी का हिस्सा बन गए हैं।

साहित्यिक हिंदी और राजस्थानी लेखक…

हिंदी साहित्य के विकास में राजस्थानी लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। राजस्थानी साहित्य अपनी समृद्धता, व्यापकता एवं लोकप्रियता के कारण हिन्दी साहित्य की धरोहर है तथा विवेचनीय है। हिंदी साहित्य के ‘आदिकाल’ के परिसीमन में आने वाली ‘पुरानी हिन्दी’ की बहुत सी रचनाएँ राजस्थानी भाषा में ही मिलती हैं।

राजस्थानी साहित्य मुख्यतः वीर-रस प्रधान है, जिसमें युद्ध, बलिदान तथा स्वधर्म के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग कर देने की भावना प्रमुखता से व्यक्त हुई है। चारण साहित्य में वीरस्तुति काव्य (प्रशस्ति) की समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें शौर्य और बलिदान की गाथाएँ वर्णित हैं। विरह में भी शौर्य भरे  भावना प्रधान वृत्तांत राजस्थानी हिंदी साहित्य को विशिष्ट बनाते हैं।

हिंदी साहित्य में राजस्थान के योगदान की बात करें तो कबीर की साखियों की भाषा खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य ‘सधुक्कड़ी’ भाषा है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी के विकास में राजस्थानी भाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

हिंदी के लिए राजस्थान सरकार के प्रयास..

साहित्य सदैव राजश्रायी रहा है, और राजस्थान तो अनेकानेक राज्यों , राजाओं का समुच्चय बना रहा है, जहां पुरस्कारों , राज दरबारो में साहित्य पनपता रहा है। इन दिनों राजस्थान सरकार ने हिंदी के विकास और प्रसार के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की हैं।  डिजिटल युग में हिंदी को और अधिक बढ़ावा देने तथा इसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों से एकीकृत करने की आवश्यकता भी समझी गई है।

राजस्थान में प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के उपयोग को बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिससे सरकारी विभागों में हिंदी के मानकीकृत उपयोग को सुनिश्चित किया जा रहा है । राज्य सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी को महत्व दिया है।  अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अब अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी माध्यम में भी पढ़ाई का विकल्प दिया गया है। यह निर्णय उन गाँवों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है , जहाँ हिंदी माध्यम के उच्च माध्यमिक स्तर के सरकारी विद्यालय उपलब्ध नहीं है।

भाषाई विवाद और राजस्थानी को मान्यता ..

राजस्थान में भाषाई विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्ष 1944 से चल रही है, ठाकुर राम सिंह तंवर के नेतृत्व में दिनाजपुर में राजस्थानी भाषा का पहला अधिवेशन हुआ था।  25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था, लेकिन यह विधेयक अभी भी लंबित है। क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से   राष्ट्रभाषा हिन्दी का  स्वतः पोषण ,   यह दृष्टिकोण हिंदी और राजस्थानी के पारस्परिक संबंध को प्रतिबिंबित करता है।

राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता देने का मुद्दा रोजगार से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि संवैधानिक मान्यता मिलने पर राजस्थान लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं स्थानीय भाषा में भी आयोजित हो सकेंगी ।

राजस्थान में हिंदी का उज्ज्वल भविष्य …

राजस्थान में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल प्रतीत होता है, लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियों का समाधान करना भी आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 2020 ने शिक्षा में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग पर जोर दिया है.  इस नीति के तहत प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई पर जोर दिया जाएगा, जिससे बच्चों की  भाषाई नींव मजबूत हो सकेगी और वे अपने आसपास के समाज और संस्कृति से बेहतर तरीके से जुड़ सकेंगे।

भविष्य में हिंदी और राजस्थानी के समन्वित विकास की आवश्यकता है। “राजस्थानी की मान्यता से हिन्दी कमजोर नहीं होगी वरन उसे बल मिलेगा”।  इस सत्य को समझना चाहिए।

राजस्थान के भाषा संस्थान, सम्मान और विश्वविद्यालय …

राजस्थान में हिंदी शिक्षण, शोध और प्रचार-प्रसार के लिए अनेक संस्थान सक्रिय हैं। राजस्थान में हिंदी सेवा के लिए अनेक शासकीय एवं निजी संस्थाओं द्वारा पुरस्कार और सम्मान भी प्रदान किए जाते हैं। हिंदी और राजस्थानी साहित्य के विकास में विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थानों की पत्रिकाएं छपती हैं।  हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसके उत्थान के लिए कार्यक्रमों के निरंतर आयोजन होते हैं । कवि सम्मेलनों में जन भागीदारी साहित्य के प्रति लोगों की अभिरुचि बताती है।

राजस्थान में हिंदी का इतिहास और विकास एक गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया रही है। विभिन्न  सांस्कृतिक प्रभावों , पर्यटन और स्थानीय भाषाई परंपराओं ने मिलकर हिंदी के एक ऐसे स्वरूप को जन्म दिया है जो राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। राजस्थानी भाषा और हिंदी का पारस्परिक संबंध इस बात का उदाहरण है कि कैसे क्षेत्रीय भाषाएँ राष्ट्रभाषा को समृद्ध कर सकती हैं। भविष्य में शिक्षा नीतियों, तकनीकी एकीकरण और सांस्कृतिक जागरूकता के माध्यम से राजस्थान में हिंदी का विकास जारी रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी और राजस्थानी के बीच सहअस्तित्व और पारस्परिक समृद्धि के मार्ग को और अधिक सशक्त बनाया जाए, ताकि राजस्थान की भाषाई विरासत भावी पीढ़ियों तक संरक्षित रह सके। डिजिटल युग ने प्रकाशन , त्वरित वैश्विक  पहुंच के नए मार्ग बनाए हैं, जिनका उपयोग हिंदी के विस्तार को बहुआयामी आकाश दे रहा है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३४ ⇒ परिंदे और दरिंदे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परिंदे और दरिंदे।)

?अभी अभी # ८३४ ⇒ आलेख – परिंदे और दरिंदे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

परिंदों के लिए खुला आसमान है, लेकिन दरिंदों पर भी कहां लगाम है। इस पृथ्वी पर किसका राज है, राम राज में राक्षसराज भी रहे, जंगलराज में अगर वनराज है तो पक्षियों का सरताज भी पक्षीराज ही रहा है। महाभारत क्या है, पहले अशांति, फिर युद्ध और अंत में शांति पर्व। क्या कभी शांति शाश्वत रही है। पहले सम्राट अशोक, फिर कलिंग युद्ध और अंत में फिर वही शांति बुद्धं शरणं गच्छामि।

क्या देवासुर संग्राम का अंत हो गया। क्या दरिंदों ने परिंदों पर रहम करना शुरू कर दिया। क्या रिंद ने इबादत शुरू कर दी, मैखाने से मुंह मोड़ लिया। क्या विदुर नीति चाणक्य नीति और युद्ध की रणनीति में दबकर नहीं रह गई। क्या विदुर नीति पलायन और गीता का ज्ञान ही सर्वोपरि है। धर्म की रक्षा के लिए क्या युद्ध ही जरूरी है। बिना हिंसा के भी कहीं शांति स्थापना हो पाई है। दुष्टों का संहार और अन्याय का प्रतिकार ही धर्म है, पुरुषार्थ है। जिसके लिए गिद्ध दृष्टि और बाज जैसी फुर्ती बहुत जरूरी है।।

हमारे देवी देवता केवल गरुड़ और सिंह की सवारी ही नहीं करते, वे शस्त्रों से सुसज्जित भी रहते हैं। शास्त्र और शस्त्र का अनूठा मेल है हमारे दर्शन में। जब तक धर्म की पूरी तरह हानि नहीं होती, ईश्वर अवतार नहीं लेते और अधर्म से धर्म की रक्षा का भार हम पृथ्वीवासियों पर आ जाता हैं।

आजकल हम सभ्य और सुसंस्कृत हो चुके हैं। न्याय और कानून व्यवस्था पर यकीन करते हैं। फौज, पुलिस और अदालत, सब हमारे पास उपलब्ध है, लेकिन जिस तरह हम परिंदों को उड़ने से नहीं रोक सकते, दरिंदों को दरिंदगी से भी नहीं रोक सकते। दरिंदों से परिंदों में दहशत है, दरिंदों को किसी से डर नहीं।।

सूर्य हमें ही नहीं, हमारे अंतस को भी प्रकाशित करता है। हमारा गायत्री मंत्र भी ज्ञान और प्रकाश के प्रतीक सविता अर्थात् सूर्य की ही तो आराधना है। सूर्य के बारह बीज मंत्रों से हम सुबह सूर्य नमस्कार करते हैं। अगर सूर्य अपने तेज को नियंत्रित नहीं करे, तो इस पृथ्वी का ही पता नहीं चले।

हमारी पृथ्वी में जल तत्व भी है और अग्नि तत्व भी है। तीन चौथाई जल होते हुए भी इसके गर्भ में कई ज्वालामुखी हैं। पृथ्वी भी अगर धैर्य धारण नहीं करे, तो हमें जलजले से कोई नहीं बचा सकता।

हमारे कर्म, सृष्टि को कितने विचलित करते हैं, यह हम नहीं जानते। जब प्रकोप आता है, तब भागते फिरते हैं। यह सृष्टि ही कहीं बगलामुखी है तो कहीं ज्वालामुखी। हमारे कल्याण के लिए यह ज्वाला बनकर फिर भी हमें आशीर्वाद ही देती है।।

यह जानते हुए भी कि प्रकृति की निगाह में हमारा अस्तित्व किसी कीड़े मकोड़े से अधिक नहीं, हमारे अंदर का दरिंदा उछलकूद करने लगता है।

आप क्या समझते हैं, सूर्य आपका गुलाम है, पृथ्वी आपके काले कारनामों की मूक दर्शक बनी रहेगी। एक करेगा, और सब मरेंगे। जब किसी परिंदे की चीख निकलती है, तो धरती रोती है, आसमान रोता है, सूरज शर्म के मारे बादलों में अपना सर छुपा लेता है। सूर्य को ग्रहण यूं ही नहीं लगता। वह अपने क्रोध रूपी तेज पर रोक लगाने की कोशिश करता है। क्योंकि एक बार शिव के तांडव के बाद सृष्टि में प्रलय को कोई नहीं रोक सकता।

हमें प्रदूषण के साथ ही नकारात्मक ऊर्जा को भी कम करना पड़ेगा। क्या अपराध मनोविज्ञान का संबंध आज की बढ़ती स्वच्छंदता और आजादी है। क्या हमारी शिक्षा पद्धति में कोई खोट है। कहीं हमारे आदर्श ही तो खोखले नहीं। दंड विधान की प्रक्रिया कितनी कारगर है, क्या दोषियों को त्वरित दंड का प्रावधान है, जैसे कई ज्वलंत प्रश्न हैं, जो किसी दरिंदगी के साथ उठते हैं, और बंदगी के साथ ठंडे हो जाते हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५३ – देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५३ ☆ देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज के दिन को “विश्व सहनशीलता” दिवस के रूप में मनाए जाने का क्रम विगत कुछ दशकों से ज़ारी हैं। जब इस बावत जानकारी प्राप्त हुई, तो थोड़ा विस्मय भी हुआ। हम अभी तक ये ही समझते थे, कि असहनशीलता सिर्फ हमारे देश के नागरिकों में ही होती हैं, क्योंकि हम लोग तो बिना बात के भी असहनशील होने में देरी नहीं करते हैं। गुस्सा करना तो हम सबके दिलो दिमाग की प्राथमिकता में है।

छोटी छोटी बातों को लेकर नाराज़ होना हमारी परंपरा बन चुकी हैं। दिलों में आपसी भाई चारे की विरासत तो कब की दफ़न हो चुकी है। छोटे से लेकर उम्र दराज व्यक्ति लड़ने के बहाने खोजता रहता है। वो ज़माना लद गया, जब “जर, जोरू और जमीन” (धन, औरत और जमीन) के लिए ही झगड़े हुआ करते थे।

पश्चिम ने हमारी संस्कृति को अर्श से फर्श (आसमान से जमीन) पर पटक दिया हैं। पिता-पुत्र, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे पवित्र संबंधों को असहनशीलता ने विच्छेद कर तार तार कर दिया है।

शर्म और हया जैसे शब्दों को तो हिंदी के शब्द कोश से हटाने के प्रयास सफल रहें हैं। अंग्रेजी में “लेट गो” या पंजाबी भाषा में “ठंड रख” सुने हुए कई दशक हो गए हैं। नित जीवन में तो अब “जीरो टॉलरेंस” पूरी तरह अपना लिया है।

हमारे संतो ने मानव के हृदय में धीरज रखने के लिए, बहुत सारी रचनाएं, रची हैं। कबीर की वाणी भी ऐसा ही कुछ कह रही हैं।

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

अब लेखनी को विराम देता हूं कहीं प्रतिदिन लंबा लंबा पढ़ कर आप असहनशील ना हो जाएँ।☺️

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३३ ⇒ लिखकर रख लो ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखकर रख लो !।)

?अभी अभी # ८३३ ⇒ आलेख – लिखकर रख लो ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर पूर्वाग्रह और दुराग्रहों को परे रख दिया जाए, तो फेसबुक संवाद का एक उत्कृष्ट माध्यम है ! जो कवि-सहित्यकार-शायर नहीं, वे भी जब तकिया और कलाम को एक करते हैं, तो कोई तकिया कलाम बन ही जाता है। मसलन, लिखकर रख लो !

किसी के कहने से कोई कुछ भी लिखकर नहीं रखता ! लेकिन अपनी बात पर जोर डालने के लिए ऐसा कहा जाता है। इसे आप चाहें तो ” लगी शर्त ! ” का विकल्प भी मान सकते हैं। मर्दों के लिए मूँछ मुंडवाना भी ऐसा ही एक तकिया-कलाम है, जिसका प्रयोग क्लीन-शेव्ड भी बेशर्मी से करते देखे गए हैं।।

बच्चों को नाना-नानी के घर जाने में जितनी खुशी होती है, उतनी ही खुशी आजकल उन्हें नाना-नानी को अपने घर बुलाने में भी होती है। वे उसे मेरा घर कहते हैं। बड़े शहरों और महानगरों में व्यस्तता दूरियों को और भी बढ़ा देती है। वीक-एंड में मिलना हो जाए, तो बहुत है।

मेरा नाती अक्सर मुझसे नाराज़ रहता है, इस बात से, कि नाना-नानी हमारे घर नहीं आते ! जब पहली बार वह हमें आग्रहपूर्वक अपना नया घर दिखाने ले गया था, तो खुशी से फूला नहीं समा रहा था। आओ नाना ! मैं आपको अपना नया घर दिखाता हूँ। जिस तरह हम खुशी और उत्साह से आगंतुकों को अपना नया घर, गृह-प्रवेश के पश्चात दिखाते हैं, बिल्कुल वही अंदाज़। यह हमारा ड्रॉइंग रूम, सोफा, मेरी उँगली पकड़ किचन में ले जाते हुए, यह हमारा मॉड्यूलर किचन, फ्रिज, माइक्रोवेव, और वॉश एरिया में ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन ! कैसा लगा ?

आओ अब मैं आपको मेरे रूम में ले जाता हूँ। यह मेरी पढ़ाई की टेबल, पापा का लैपटॉप और मेरे खिलौने। जब बच्चों के खिलौनों का नंबर आता है, तो उसकी मम्मी की वार्डरोब में रखी साड़ियाँ शरमा जाती हैं। बच्चों की गृहस्थी बड़ो की गृहस्थी से बहुत बड़ी होती है।।

मुझे याद है, उसका आग्रह तीन-चार दिन से कम का नहीं होता ! एक समय था, सुदूर, गाँव में, नाना-नानी के घर हमारा मन नहीं भरता था, और आज नाना-नानी के बिना नाती का मन नहीं भरता। एक ही आग्रह, आप मेरे घर क्यों नहीं आते ! जब कि दोनों एक ही शहर में।

इस रविवार उसका आग्रह दुराग्रह में बदल गया ! उसने अपनी मम्मी से बोला, आप नाना नानी को आज अपने घर ले चलो, वे मेरी बात नहीं सुनते। बेटियाँ तो वैसे ही भरी रहती हैं। उसने उलाहना-स्वरूप कह दिया, ” लिख लो बेटा ! नाना-नानी आज अपने घर किसी हालत में नहीं चलने वाले ! ” बाल-सुलभ मन कुछ समझा नहीं। उसने अचानक उसके बैग में से कॉपी-किताब निकाल ली, और बोला, ” ठीक है मम्मी ! मैं लिख लेता हूँ कि आज नाना-नानी हमारे घर किसी भी हालत में नहीं चलने वाले ! और नीचे मेरी साइन भी कर देता हूँ “।।

उसके भोलेपन ने मुझे गंभीरतापूर्वक सोचने पर मजबूर कर दिया और वह अपने नाना-नानी को अपने घर ले जाने में कामयाब हो गया। अब जब भी कोई व्यक्ति जब किसी बात पर ज़ोर देकर कहता है, लिख लो ! मेरी बात अगर झूठ निकले तो ! अक़्सर या तो यह अति-आत्म विश्वास होता है तो कहीं महज़ दम्भोक्ति ! मन करता है, इस बार लिखकर रख ही लूँ। वह भी क्या याद करेगा ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३११ – संघे शक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३११ संघे शक्ति… ?

कुछ घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो नेत्रों को खारी बूँदों से भर देती हैं। उस सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ। कलेवर में छोटी पर प्रभाव में बड़ी घटना का साक्षी बना।

प्रात:कालीन भ्रमण से लौट रहा था। बस स्टॉप के पास वाले फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे दो-तीन वर्ष से एक फ़कीर का बसेरा है। फुटपाथ के एक ओर पार्क की दीवार है, दूसरी ओर सड़क और सड़क के उस पार चाय की छोटी-सी गुमटी। आते-जाते लोगों से फ़कीर की कभी चाय की मांग हो तो केवल पैसे देकर काम नहीं चलता। सड़क पार से एक प्याला चाय लाकर देना पड़ता है। शायद पैरों से लाचार से हैं यह वृद्ध क्योंकि उन्हें कभी चलते नहीं देखा।

सहसा दृष्टि पड़ी कि वृद्ध को घेरकर पास के उर्दू माध्यम के विद्यालय में पढ़नेवाली आठ-दस छात्राएँ खड़ी हैं। सिर पर स्कार्फ बाँधे, छठी-सातवीं में पढ़नेवाली बच्चियाँ। उत्सुकता के शमन के लिए अवलोकन किया तो नेत्र सजल हो उठे। भिक्षुक को पीने के लिए पानी चाहिए था और हर बच्ची अपनी वॉटर बॉटल में से थोड़ा-थोड़ा पानी फ़कीर के जलपात्र में डाल रही थी। अद्भुत, अलौकिक दृश्य! देखता ही रह गया मैं!

इच्छा हुई दौड़कर जाऊँ और इनके माथे पर हाथ रखकर कहूँ, “वेल डन बेटियो! सबाब का काम किया।” फिर लगा इस कच्ची उम्र को पाप-पुण्य के जटिल समीकरण से मुक्त ही रहने दूँ, रहने दूँ इन्हें सहज। सहजता जो जानती है कि प्यास है तो पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

फ़कीर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए एक साथ बढ़े इन नन्हे हाथों ने एक बात और सिखाई कि प्रयास सामूहिक हों तो पानी का पात्र ही नहीं, सूखी नदियाँ और रूठी बावड़ियाँ भी भरी जा सकती हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३२ ⇒ नून बिन सब सून ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नून बिन सब सून।)

?अभी अभी # ८३२ ⇒ आलेख – नून बिन सब सून ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज का कान्वेंटी ज्ञान, नून को गुड आफ्टरनून वाला नून और सून को कम सून वाला सून भले ही समझ ले, लेकिन जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद का नमक का दारोगा पढ़ा है, और जिन्हें गांधीजी के नमक सत्याग्रह की जानकारी है, वे नून तेल का महत्व अच्छी तरह से जानते हैं। सून भी सूना का ही अपभ्रंश है, नमक बिना भी कहीं इंदौर का नमकीन बना है।

कहने को हमारे शरीर में सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं, लेकिन ज़िंदा रहने और स्वस्थ रहने के लिए हमें नमक का सहारा लेना ही पड़ता है। अधिक नमक के हानिकारक परिणामों से पूरी तरह से परिचित होते हुए भी हमारे जीवन में नमक का एक अहम स्थान है।।

कल मेरा गला खराब हो गया था, मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। थोड़ा हल्दी नमक से गरारा किया, तो गला खुला। भोजन में अगर चुटकी भर नमक न हो, तो भोजन स्वादिष्ट नहीं बनता। जो पहले किसी का नमक खा लेते थे, वे नमक का कर्ज अदा करते थे। आजकल सिर्फ नमक की कीमत अदा करते हैं। सलीम जावेद पहले संवाद लेखक हुए हैं, जिन्होंने फिल्म शोले में गब्बर सिंह के मुख से एक स्वास्थ्य संबंधी संदेश इस तरह प्रसारित किया ;

सरदार ! मैंने आपका नमक खाया है।

तो ले, अब, बीपी की, गोली खा।।

इस धरती पर केवल इंसान ही ऐसा प्राणी है जो कपड़े पहनता है, और भोजन पकाकर खाता है। शेर जंगल का राजा है, फिर भी नंगा रहता है, और अपने हाथ से शिकार करता है, और बिना पकाए, नून तेल, पुष्प ब्रांड मसाले बिना ही खा लेता है। कैसी डायनिंग टेबल और शाही थाली। जब कि एक आम आदमी सूट बूट पहनकर जेब में एक 500 का नोट रख बढ़िया सी होटल में शाही पनीर और बिरयानी खाकर मूंछ और पेट पर हाथ फेर लेता है। शेर फिर भी शेर है, और आदमी, बेचारा आदमी।

आप चाहे किसी भी चीज का अचार डालो, अथवा ज़िन्दगी भर पापड़ बेलो, नून बिन सब सून। बिना तेल का, बिना मिर्ची का, अचार तो बन सकता है, लेकिन बिना नमक के नहीं। जिस तरह आज अखिलेश वल्द मुलायमसिंह की कहीं दाल नहीं गल रही, बिना नमक के कभी अचार भी नहीं गलता।।

नमक तो नमक होता है, फिर भी देश का नमक तो टाटा का नमक ही होता है। नमक से हड्डियां गलती भी हैं, और मजबूत भी होती है। आप किसी का भी नमक खाएं, कम ही खाएं। क्योंकि नमक का कर्ज भी अदा करना पड़ता है। आप मिर्ची तो खा भी सकते हो, और किसी को लगा भी सकते हो, लेकिन नमक किसी को नहीं लगाया जाता। जले पर नमक छिड़क ना हमें पसंद नहीं। हल्दी की रस्म तो सुनी है, कभी नमक की रस्म नहीं सुनी।

वैसे खाने में नमक मिर्ची की जोड़ी भाई बहन की जोड़ी लगती है। सिका हुआ भुट्टा हो तो नमक, नींबू से काम चल जाता है। जाम और जामुन पर अगर नमक मिर्ची नहीं बुरकी हो, तो मज़ा नहीं आता। दही बड़ा तो गार्निश ही नमक मिर्ची और भुने हुए जीरे के साथ होता है।।

नमक की महिमा जितनी मुंह में पानी लाती है, मात्रा बढ़ जाने पर आजकल बी पी भी उतना ही बढ़ाती है। स्वास्थ्य के रखवाले, नमक के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। आयोडीन गया भाड़ में, अगर स्वस्थ रहना हो, तो सेंधा नमक का ही सेवन करें।

मुझे याद है, खड़े नमक और खड़ी मिर्ची से मां मेरी नज़र उतारा करती थी। तब घरों में सिगड़ी हुआ करती थी। अंगारों पर जब नमक मिर्ची डाली जाती थी, तब अगर मिर्ची की धांस नहीं आई, मतलब नज़र लगी है, और अगर मिर्ची की धांस है, तो नज़र नहीं। जब से मां गई है, मुझे किसी की नजर ही नहीं लगी। मॉम बिन सब सून।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी / अंग्रेजी साहित्य – आलेख/Articles ☆ कैसे चुने अपने लिए परफ्यूम?: How to Choose the Right Perfume for Yourself? ☆ Dr. Anil Kumar Verma ☆

Dr. Anil Kumar Verma

(Director- askvastu.com, Vastu/ Geopathic Stress Consultant & Water Dowser.)

😎 कैसे चुने अपने लिए परफ्यूम? 😎

दरअसल परफ्यूम की खुशबू (फ्रेगरेंस) की durability समझने के लिए, परफ्यूम की बोतल पर लिखे हुए शब्दो EDC, EDT, RDP, PERFUM को समझना होगा जो परफ्यूम की सांद्रता और टिकाऊपन को दर्शाते हैं:

EDC (Eau de Cologne): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 2-5% होती है। यह बहुत हल्की खुशबू देता है, जो 1-3 घंटे रहती है। गर्मी या हल्की ताजगी के लिए उपयुक्त होता है।

EDT (Eau de Toilette): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 5-15% होती है। इस परफ्यूम की खुशबू 3-5 घंटे तक टिकती है। यह हल्की और ताजी खुशबू देता है, रोजाना इस्तेमाल और दिन में उपयुक्त होता है।

EDP (Eau de Parfum): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 15-20% होती है। यह सबसे मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली खुशबू देता है, जो 5-8 घंटे तक रहती है। खास मौकों के लिए बेहतर होता है।

PERFUM या PARFUM: इसका मतलब परफ्यूम यानी इत्र से होता है जिसमें फ्रेगरेंस ऑयल की सबसे ज्यादा मात्रा (20-30%) होती है, इसलिए इसकी खुशबू सबसे ज्यादा टिकाऊ और गहरी होती है।

RDP आमतौर पर प्रयोग नहीं होता या ब्रांड के अनुसार अलग हो सकता है, लेकिन कभी-कभी RDP का उपयोग परफ्यूम के किसी विशेष संस्करण या ब्रांडिश नाम के रूप में होता है।

सारांश में, ये शब्द परफ्यूम की तेल की मात्रा और खुशबू के टिकने का समय बताते हैं। जितनी ज्यादा सांद्रता, उतनी ज्यादा खुशबू की अवधि और तीव्रता होती है।यह जानकारी परफ्यूम खरीदते समय आपकी मदद करती है कि आप अपनी जरूरत के हिसाब से हल्का या तेज खुशबू वाला परफ्यूम चुन सकें।

😎 How to Choose the Right Perfume for Yourself? 😎

To understand the durability of a perfume’s fragrance, you need to know the terms EDC, EDT, EDP, and PERFUM written on the perfume bottle, which indicate the concentration and lasting power of the fragrance:

EDC (Eau de Cologne): Contains 2-5% fragrance oil. It provides a very light scent that lasts 1-3 hours. Suitable for hot weather or a light, refreshing feel.

EDT (Eau de Toilette): Contains 5-15% fragrance oil. The scent lasts 3-5 hours. It offers a light and fresh fragrance, ideal for daily use and daytime.

EDP (Eau de Parfum): Contains 15-20% fragrance oil. It provides the strongest and longest-lasting scent, lasting 5-8 hours. Perfect for special occasions.

PERFUM or PARFUM: Refers to pure perfume with the highest fragrance oil concentration (20-30%), making it the most long-lasting and intense.

RDP is not commonly used and may vary by brand, sometimes referring to a special edition or branded version of a perfume.

Summary: These terms indicate the oil concentration and duration of the fragrance. Higher concentration means longer-lasting and more intense fragrance. This information helps you choose a perfume—light or strong—based on your needs when shopping.

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© डॉ अनिल कुमार वर्मा 

कार्यालय-सह-आवास: बंगला नंबर B 27 चौहान टाउन, जुंनवानी, भिलाई, छत्तीसगढ़ मोबाइल: 9425028600 वेबसाइट: www.askvastu.com

यूट्यूब चैनल: askvastu.com  ईमेल: vermanilg@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३१ ⇒ न्यूसेंस वैल्यू ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न्यूसेंस वैल्यू।)

?अभी अभी # ८३१ ⇒ आलेख – न्यूसेंस वैल्यू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर परेशानी की हमें कीमत चुकानी पड़ती है। क्या परेशानी का कोई मूल्य नहीं होता। न्यूसेंस को आप आफ़त मुसीबत अथवा उपद्रव भी कह सकते हैं। इसे अनुभव तो किया जा सकता, लेकिन परिभाषित नहीं किया जा सकता।

अगर न्यूसेंस का जीवन में महत्व नहीं होता तो इसे यूं ही वैल्यू कहकर महिमामंडित नहीं किया जाता। रास्ते में चलते समय लगी ठोकर, और हर पांव में लगे कांटे की भी एक न्यूसेंस वैल्यू होती है।

वह हमें विचलित भी करती है और सतर्क भी। क्या बालहठ, बच्चों की मस्ती, शैतानी और धमा चौकड़ी एक तरह की न्यूसेंस वैल्यू नहीं। लेकिन कितनी प्यारी है यह न्यूसेंस वैल्यू।।

स्कूल कॉलेज के दिनों में क्या हम सिर्फ पढ़ाई ही करते थे। कॉलेज में क्लास से तड़ी मारकर फिल्में देखना, नकल, गुंडागर्दी और लड़कियों से छेड़छाड़ सबकी अपनी न्यूसेंस वैल्यू थी। मुझे अच्छी तरह याद है जो लड़के तब प्रोफेसर्स की नाक में दम कर देते थे, आगे चलकर वे जीवन में अच्छे और प्रतिष्ठित नागरिक भी बने, कोई पुलिस में, कोई आर्मी में, तो कोई सिविल सर्विसेज में।

कहीं कहीं अच्छाई की तो जीरो वैल्यू होती है और न्यूसेंस वैल्यू ही काम आती है। सीधी उंगली से जब घी नहीं निकलता, तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है।

कानून अपने हिसाब से काम करता है, अतिक्रमण और आतंक का तो बुलडोजर से ही हिसाब चुकता किया जा सकता है।।

अगर आप लोकतंत्र की दुहाई देते हो, तो विपक्ष की न्यूसेंस वैल्यू को भी बर्दाश्त करना ही होगा। अपनी सुरक्षा और स्वार्थ के लिए अगर आपने कोई स्वामिभक्त कुत्ता पाला है, तो उसके भौंकने के न्यूसेंस को भी आपको बर्दाश्त करना पड़ेगा। रात को कुत्ते के भौंकने से अधिक परेशान और विचलित करने वाली कोई न्यूसेंस वैल्यू नहीं।

नादां की दोस्ती जी का जंजाल। जो अवांछित है, उसकी भी कुछ तो न्यूसेंस वैल्यू है। स्वार्थ और खुदगर्जी की इस दुनिया में कब कौन किस गधे को अपना बाप बना ले, कुछ कहा नहीं जा सकता।।

अब खोटे सिक्के को ही ले लीजिए। नहीं मामा से काना मामा ही भला। विवाह के प्रसंग में कभी कभी तो बारातियों के नाम पर, सड़क पर, न्यूसेंस वैल्यू ही नजर आती है। जो अधिक लुंगाड़े टाइप व्यक्ति होता है, जब वह नशे में धुत्त होकर नागिन डांस करता है, तो नोटों की बरसात शुरू हो जाती है।

क्या कभी आपने कचरे के बारे में सोचा है। कभी कचरे की न्यूसेंस वैल्यू ने हमारा जीवन नर्क बना रखा था। हर सड़क चौराहे, गली कूचे में कचरे का ही राज था। जगह जगह गंदगी और बदबू ही बदबू और कचरे के ढेर में मुंह मारते आवारा ढोर! और हम कचरा फेंकने वाले, बदबू के मारे, नाक पर रूमाल रख वहां से निकल जाते थे। लेकिन देखिए स्वच्छ भारत के दौरान घूरे के दिन भी फिरे और हर नागरिक ने कचरे को इज्जत देना सीख लिया। जिस कचरे की कभी न्यूसेंस वैल्यू थी, आज वह कहां से कहां पहुंच गया। दृढ़ संकल्प से सब कुछ मुमकिन है।।

हर सरकारी दफ़्तर में भरमार होती है न्यूसेंस वैल्यू की। चपरासी और बाबू से लेकर अफसर तक। जो आदमी काम का है, बस उसकी ही वैल्यू है। कभी कभी लोग पूछ भी लेते हैं, किस निकम्मे को मुंह लगा रखा है। लेकिन ऐसे नल्ले, पिछलग्गू और न्यूसेंस वैल्यू वाले व्यक्ति ही वक्त ज़रूरत काम आते हैं और चुनाव की वैतरणी पार लगवाते हैं।

हम अच्छी तरह जानते हैं आज के अखबार, सोशल मीडिया, टीवी न्यूज और टीवी सीरियल की न्यूसेंस वैल्यू, लेकिन इनके साथ के बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। बहुत काम की है न्यूसेंस वैल्यू, इसे कभी कम नहीं आँकें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ चिनारों की चित्रकारी- लाल पीली सुनहरी ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ “चिनारों की चित्रकारी- लाल पीली सुनहरी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कभी मैंने पारिजात के लिये लिखा था—अवसान भी हो मधुरतम

यही पंक्तियां मैं लासानी चिनारों को अर्पित कर रही हूँ। शरद ऋतु का सिंगार करती, उसके मसृण स्वभाव से मेल खाती, चिनार से झरती हुई पत्तियां लाल पीली  सिन्दूरी, भूरी ,सुनहरी , सूर्य किरणों के झरने में नहाती,मिट्टी के परस से रोमांचित होती, नर्म कोमल हवाओं की बाँहों में बाँहें डाले सौंदर्य का स्वर्ग रचती हैं।

कितनी अजीब है प्रकृति बहारों में दीवाना बनाती है और पतझड़ में दार्शनिक रूप से मोह लेती है।

शाखों से झरने का, अलग होने का  दर्द इन पत्तियों के अलावा और कौन समझ सकता है।वे नहीं जानतीं कि लोग उनकी पीड़ा में भी आसक्ति ढूँढ लेते हैं।रूहानी सुकून महसूसते हैं।

जिन्दगी स्वयं को कभी नहीं दोहराती।दोहराव में भी नयापन होता है।जैसे इस खूबसूरत मंज़र को यादों में जिन्दगी मिलती है।जिसे मन की आँखें अपने एलबम में सहेज लेती हैं।

वन में रूप की ज्वाला केवल पलाश ही नहीं भड़काते, चिनारों को भी यह श्रेय दिया जाना चाहिए।

बेहद तकलीफ होती है यह देखकर कि जिन रंगीन पत्तों का राशिभूत सौंदर्य काबू में करने के लिए पर्यटकों के कैमरे निकल आते हैं उन्हीं पत्तों को कुछ कश्मीरी ठंड भगाने के लिए जला देते हैं।

बर्फानी ठंड के लिए रूपरेखा बनाती हुई  कश्मीर की वादी पत्तों की खामोशी का तर्जुमा कर नहीं पाती। ऐश्वर्य दिखाने के नाम पर मिट्टी को सौंप देती है। बेरहम ।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है—-

उदासी रूह से गुजरी है

इस तरह जैसे

उजाड़ दश्त में पतझड़ की

दोपहर तन्हा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

8/11/25

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश…

*

पौधे लगाएँ आप ढेरों, भावना मंगल करें।

फैली यहाँ हरियालि देखो, पीर मन की जो हरें।

सारे करेंगे अनुसरण तो, श्रेष्ठ होगी कल्पना।

द्वारे सजेंगे आम्र पत्ते, भव्य होगी अल्पना।।

*

आज जब दुनिया पेड़ों को खो रही है, अगहन का गुरुवार हमें अपनी जड़ें याद दिलाता है। यह दिन एक तरह से प्रकृति की पुकार है, जैसे धरती नरम आवाज में कहती हो: “मेरी देखभाल भी पूजा का हिस्सा है।”

इस वर्ष अगहन मास (मार्गशीर्ष मास) 6 नवंबर 2025 को आरंभ हुआ है।

  1. पौधरोपण की शुभ शुरुआत

लोग मानते हैं कि इस दिन लगाया गया पौधा घर में शांति और स्थिरता लाता है। आप इस अवसर पर अपने घर, मोहल्ले या खेत की किनारियों पर एक पौधा अवश्य लगाइए।

यह पौधा आने वाले समय में आपकी मेहनत, धैर्य और उम्मीदों का एक जीवित रूप बन जाता है।

  1. परिवार को ‘ग्रीन संकल्प’ दिलाएँ

एक छोटा-सा संकल्प बनाया जा सकता है—

  • हर महीने एक पौधा
  • पानी की बचत
  • किचन वेस्ट से खाद
  • प्लास्टिक का कम उपयोग

अगहन गुरुवार इस संकल्प को शुरू करने का शांत और पवित्र बनाइए।

  1. धान कटाई और कृतज्ञता का संदेश

किसानों के लिए यह महीना धरती द्वारा दिया गया उपहार है। ग्रीन मोटिवेशन यही कहता है कि उपहार को लौटाना भी जरूरी है—

थोड़ा पानी बचाकर, थोड़ी छाँव उगाकर, थोड़ा हरापन फैलाकर।

  1. सोशल मीडिया पर सकारात्मक हरियाली

डिजिटल प्रयास करें…

  • एक पौधा लगाने का छोटा वीडियो
  • अपने आँगन की हरियाली दिखाएँ
  • अगहन गुरुवार का ‘धीमा, शांत और हरा’ संदेश शेयर करें।

इससे यह पर्व केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन में ताजगी भरने का दिन बनेगा।

अगहन गुरुवार को परंपरा की पीली रोशनी और हरियाली की ठंडी छाया से सराबोर करते हुए आगे बढ़ें। इस दिन की सुंदरता यही है कि यह मन को शांत करता है और धरती से जोड़े रखता है। और जब मन और मिट्टी दोनों मुस्कुराएँ, तभी जीवन सच्चे अर्थों में समृद्ध होता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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