हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९६ ☆ अनुभव और निर्णय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुभव और निर्णय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९६ ☆

☆ अनुभव और निर्णय… ☆

अगर आप सही अनुभव नहीं करते, तो निश्चित् है कि आप ग़लत निर्णय लेंगे–हेज़लिट की यह उक्ति अपने भीतर गहन अर्थ समेटे है। अनुभव व निर्णय का अन्योन्याश्रित संबंध है। यदि विषम परिस्थितियों में हमारा अनुभव अच्छा नहीं है, तो हम उसे शाश्वत् सत्य स्वीकार उसी के अनुकूल निर्णय लेते रहेंगे। उस स्थिति में हमारे हृदय में एक ही भाव होता है कि हम आँखिन देखी पर विश्वास रखते हैं और यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव है–सो! यह ग़लत कैसे हो सकता है? निर्णय लेते हुए न हम चिन्तन-मनन करना चाहते हैं; ना ही पुनरावलोकन, क्योंकि हम आत्मानुभव को नहीं नकार सकते हैं?

मानव मस्तिष्क ठीक एक पैराशूट की भांति है, जब तक खुला रहता है, कार्यशील रहता है–लार्ड डेवन का यह कथन मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर प्रकाश डालता है और उसके अधिकाधिक प्रयोग करने का संदेश देता है। कबीरदास जी भी ‘दान देत धन न घटै, कह गये भक्त कबीर’ संदेश प्रेषित करते हैं कि दान देते ने से धन घटता नहीं और विद्या रूपी धन बाँटने से सदैव बढ़ता है। महात्मा बुद्ध भी जो हम देते हैं; उसका कई गुणा लौटकर हमारे पास आता है–संदेश प्रेषित करते हैं। भगवान महाबीर भी त्याग करने का संदेश देते हैं और प्रकृति का भी यही चिरंतन व शाश्वत् सत्य है।

मनुष्य तभी तक सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम, सर्वगुण-सम्पन्न व सर्वपूज्य बना रहता है, जब तक वह दूसरों से याचना नहीं करता–ब्रह्मपुराण का भाव, कबीर की वाणी में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है ‘मांगन मरण एक समान।’ मानव को उसके सम्मुख हाथ पसारने चाहिए, जो सृष्टि-नियंता व जगपालक है और दान देते हुए उसकी नज़रें सदैव झुकी रहनी चाहिए, क्योंकि देने वाला तो कोई और…वह तो केवल मात्र माध्यम है। संसार में अपना कुछ भी नहीं है। यह नश्वर मानव देह भी पंचतत्वों से निर्मित है और अंतकाल उसे उनमें विलीन हो जाना है। मेरी स्वरचित पंक्तियाँ उक्त भाव को व्यक्त करती हैं…’यह किराये का मकान है/ जाने कौन कब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘प्रभु नाम तू जप ले रे बंदे!/ वही तेरे साथ जाएगा’ यही है जीवन का शाश्वत् सत्य।

मानव अहंनिष्ठता के कारण निर्णय लेने से पूर्व औचित्य- अनौचित्य व लाभ-हानि पर सोच-विचार नहीं करता और उसके पश्चात् उसे पत्थर की लकीर मान बैठता है, जबकि  उसके विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना आवश्यक होता है। अंततः यह उसके जीवन की त्रासदी बन जाती है। अक्सर निर्णय हमारी मन:स्थिति से प्रभावित होते है, क्योंकि प्रसन्नता में हमें ओस की बूंदें मोतियों सम भासती हैं और अवसाद में आँसुओं सम प्रतिभासित होती हैं। सौंदर्य वस्तु में नहीं, दृष्टा के नेत्रों में होता है। इसलिए कहा जाता है ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।’ सो! चेहरे पर हमारे मनोभाव प्रकट होते हैं। इसलिए ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ गीत की पंक्तियाँ आज भी सार्थक हैं।

दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है, क्योंकि हम स्वयं को बुद्धिमान व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। परिणामत: हम सत्यान्वेषण नहीं कर पाते। ‘बहुत कमियाँ निकालते हैं/ हम दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात/ ज़रा आईने से भी कर लें।’ परंतु मानव अपने अंतर्मन में झाँकना ही नहीं चाहता, क्योंकि वह आश्वस्त होता है कि वह गुणों की खान है और कोई ग़लती कर ही नहीं सकता। परंतु अपने ही अपने बनकर अपनों को प्रताड़ित करते हैं। इतना ही नहीं, ‘ज़िन्दगी कहाँ रुलाती है/ रुलाते तो वे लोग हैं/ जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी समझ बैठते हैं’ और हमारे सबसे प्रिय लोग ही सर्वाधिक कष्ट देते हैं। ढूंढो तो सुक़ून ख़ुद में है/ दूसरों में तो बस उलझनें मिलेंगी। आनंद तो हमारे मन में है। यदि वह मन में नहीं है, तो दुनिया में कहीं नहीं है, क्योंकि दूसरों से अपेक्षा करने से तो उलझनें प्राप्त होती हैं। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/ बेवजह ही न किसी से ग़िला कीजिए’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ उलझनों को शीघ्र सुलझाने व शिक़ायत न करने की सीख देती हैं।

उत्तम काम के दो सूत्र हैं…जो मुझे आता है कर लूंगा/ जो मुझे नहीं आता सीख लूंगा। यह है स्वीकार्यता भाव, जो सत्य है और यथार्थ है उसे स्वीकार लेना। जो व्यक्ति अपनी ग़लती को स्वीकार लेता है, उसके जीवन पथ में कोई अवरोध नहीं आता और वह निरंतर सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है। ‘दो पल की है ज़िन्दगी/ इसे जीने के दो उसूल बनाओ/ महको तो फूलों की तरह/ बिखरो तो सुगंध की तरह ‘ मानव को सिद्धांतवादी होने के साथ-साथ हर स्थिति में खुशी से जीना बेहतर विकल्प व सर्वोत्तम उपाय  है।

बहुत क़रीब से अंजान बनके निकला है/ जो कभी दूर से पहचान लिया करता था–गुलज़ार का यह कथन जीवन की त्रासदी को इंगित करता है। इस संसार म़े हर व्यक्ति स्वार्थी है और उसकी फ़ितरत को समझना अत्यंत कठिन है। ज़िन्दगी समझ में आ गयी तो अकेले में मेला/ न समझ में आयी तो भीड़ में अकेला…यही जीवन का शाश्वत्  सत्य व सार है। हम अपनी मनस्थिति के अनुकूल ही व्यथित होते हैं और यथासमय भरपूर सुक़ून पाते हैं।

तराशिए ख़ुद को इस क़दर जहान में/ पाने वालों को नाज़ व खोने वाले को अफ़सोस रहे। वजूद ऐसा बनाएं कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके, पर भुला न सके। परंतु यह तभी संभव है, जब आप इस तथ्य से अवगत हों कि रिश्ते एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए होते हैं, इस्तेमाल करने के लिए नहीं। हमें त्याग व समर्पण भाव से इनका निर्वहन करना चाहिए। सो! श्रेष्ठ वही है, जिसमें दृढ़ता हो; ज़िद्द नहीं, दया हो; कमज़ोरी नहीं, ज्ञान हो; अहंकार नहीं। जिसमें इन गुणों का समुच्चय होता है, सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। समय और समझ दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलती है, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल जाता है। प्राय: जिनमें समझ होती है, वे अहंनिष्ठता के कारण दूसरों को हेय समझते हैं और उनके अस्तित्व को नकार देते हैं। उन्हें किसी का साथ ग़वारा नहीं होता और एक अंतराल के पश्चात् वे स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। न कोई उनके साथ रहना पसंद करता है और न ही किसी को उनकी दरक़ार होती है।

वैसे दो तरह से चीज़ें नज़र आती हैं, एक दूर से; दूसरा ग़ुरूर से। ग़ुरूर से दूरियां बढ़ती जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं–प्रथम दूसरों के अनुभव से सीखते हैं, द्वितीय अपने अनुभव से और तृतीय अपने ग़ुरूर के कारण सीखते ही नहीं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। बुद्धिमान लोगो में जन्मजात प्रतिभा होती है, कुछ लोग शास्त्राध्ययन से तथा अन्य अभ्यास अर्थात् अपने अनुभव से सीखते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ कबीरदास जी भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि हमारा अनुभव ही हमारा निर्णय होता है। इनका चोली-दामन का साथ है और ये अन्योन्याश्रित है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०५ ⇒ कंडक्टर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंडक्टर ।)

?अभी अभी # ८०५ ⇒ आलेख – कंडक्टर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वैसे तो कंडक्टर का कंडक्ट से कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन इसमें भी दो मत नहीं कि कंडक्टर शब्द कंडक्ट से ही बना है। फिजिक्स में गुड कंडक्टर भी होते हैं और बेड-कंडक्टर भी। मैं अपने कड़वे अतीत को भूल जाना चाहता हूँ, इसलिए फिजिक्स का पन्ना यहीं बंद करता हूँ।

कंडक्टर को हिंदी में परिचालक कहते हैं। बिना चालक के परिचालक का कोई अस्तित्व नहीं। चालक सिर्फ़ बस चलाता है, परिचालक सवारियों को भी चलाता है।।

न जाने क्यों, जहाज के पंछी की तरह बार बार कांग्रेस काल में प्रवेश करना पड़ता है। हमारे प्रदेश के राज्य परिवहन निगम का इंतकाल हुए अर्सा गुज़र गया ! वे लाल डिब्बे के दिन थे। 3 x 2 की बड़ी-बड़ी बसें, जिनकी सीटों का फोम अकसर निकाला जा चुका होता था, लकड़ी के बचे हुए पटियों पर बिना काँच की खिड़कियों में सफर करने का मज़ा कुछ और ही था। हॉर्न को छोड़ सब कुछ बजने के मुहावरे पर रोडवेज का ही अधिकार था।

जब किसी मंत्री का, चुनाव में अनियमितता के कारण हाईकोर्ट के निर्णय पर, मंत्री-पद से इस्तीफा ले लिया जाता था, तो उन्हें तुरंत पुरस्कार-स्वरूप किसी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया जाता था। परिवहन निगम भी ऐसे ही किसी काबिल अध्य्क्ष की भेंट चढ़ जाता था।।

वह कम तनख्वाह और अधिक काम का ज़माना था। बसों में चालक और परिचालक को छोड़ अन्य के लिए धूम्रपान वर्जित था। ईश्वर आपकी यात्रा सुरक्षित सम्पन्न करे, जेबकतरों से सावधान, और यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करे के अलावा बिना टिकट यात्रा करना अपराध है, जैसी चेतावनियां, यथासंभव शुद्ध हिंदी में, बसों में लिखी, देखीं जा सकती थी।

पुलिस की पसंद खाकी वर्दी, चालक-परिचालक को पोशाक के रूप में प्रदान की जाती थी, जिसे वे शॉल की तरह एक तरह से ओढ़े रहते थे। बस में थूकना मना रहता था, इसलिए लोग खिड़की वाली सीट अधिक पसंद करते थे।।

कंडक्टर का खाकी लबादा किसी सांता-क्लास के परिवेश से कम नहीं रहता था। सुविधा के लिए लोग इसे खाकी-कोट भी कहते थे। एक कोट की ही तरह इसमें एक जेब सीने से लगी होती थी, तो दो बड़ी जेब नीचे, जिन्हें बीच के खुले बटन कभी आपस में मिलने नहीं देते थे। वह मोबाइल का ज़माना नहीं था। इसलिए बस जहाँ भी खराब होती थी, बस वहीं अंगद के पाँव की तरह पड़ी रहती थी, और यात्री अपनी ग्यारह नम्बर की बस के भरोसे, अर्थात पैदल ही किसी दूसरे विकल्प की तलाश में निकल पड़ते थे।

कंडक्टर के बैग में यात्रियों के लिए टिकट घर की भी व्यवस्था रहती थी। जो यात्री किसी कारणवश टिकट खिड़की से टिकट नहीं खरीद पाते थे, उन्हें त्वरित सेवा के तहत वहीं टिकट प्रदान कर दिया जाता था। एक कार्बन बिछाकर कान में लगी पेंसिल से भीड़ में खड़े-खड़े कोई कंडक्टर ही टिकट काट सकता है। हमारे सरकारी बाबू तो कुर्सी मेज पर पंखे-कूलर में बैठकर भी कभी कलम खोलने की तकलीफ नहीं करते। कंडक्टर, तुम्हें सलाम।।

ऐसा नहीं कि कंडक्टर को फुर्सत नहीं मिलती थी। फुर्सत के क्षणों में वह एक शीट भरा करता था, जिसमें सवारियों का ब्यौरा होता था। कोई भी फ्लाइंग स्क्वाड कहीं भी, कभी भी, किसी आतंकवादी की तरह, बस को रोक सकती थी। सवारियों को पहले गिना जाता था। फिर कंडक्टर को दूर झाड़ की आड़ में खड़ी जीप के पास ले जाया जाता था और कुछ ले-देकर बस की रवानगी डाल दी जाती थी।

पुलिस के थानों की तरह ही, बस के रूट भी कंडक्टरों के ऊपरी कमाई के साधन थे। जिन रूटों पर अधिक कमाई होती थी, वहाँ कर्मचारी छुट्टी भी कम ही लेते थे। बिना मेहनत-मजदूरी के भी कहीं पापी पेट, और परिवार का हिंदुस्तान में पालन-पोषण हुआ है। यात्रियों से दिन-रात की मगजमारी, यात्रा के सभी जोखिमों से जूझना कंडक्टर के लिए किसी यातना से कम नहीं होता। आप क्या समझोगे, केवल टिकट लेकर सीट के लिए लड़ने वाले यात्रियों ..!।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०४ ⇒ मीठे की हद-शहद ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मीठे की हद-शहद ।)

?अभी अभी # ८०४ ⇒ आलेख – मीठे की हद-शहद ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निदा फ़ाज़ली इस दुनिया को जादू का खिलौना कहते हैं। कोई कहता है, दुनिया है सराय, रहने को हम आए तो उधर शैलेंद्र शिकायत करते हैं, दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई ! जगत कहें अथवा कुदरत, लेकिन इसे इंसान ने तो नहीं बनाया।

किसान खेत में गन्ना उगाता है, हम घर में बैठे बैठे शर्बत बनाते हैं। शर्बत में चीनी होती है, हम कम ज्यादा कर सकते हैं। किसान गन्ना उगा सकता है, शकर नहीं। वह खेत की मिट्टी में सिर्फ खाद पानी डालता है, कोई शर्बत नहीं, फिर भी गन्ना मीठा पैदा होता है। यह कुदरत का करिश्मा भी किसी जादू से कम नहीं। लेकिन इंसान कर्ता बन इसका भी श्रेय ले लेता है।।

कुदरत में केवल मिठास ही नहीं, सभी रंग भी व्याप्त हैं और खुशबू भी। सागर में मोती भी है और पृथ्वी के गर्भ में खनिज का भंडार भी। पांच तत्वों से बना यह शरीर भी कुदरत की ही देन है और अंत में इसे भी मिट्टी में ही मिल जाना है। किसी के लिए यह मनुष्य जीवन माया है, मिट्टी की काया है, तो किसी के लिए सोने से भी अधिक अनमोल, ईश्वर की दया माया है, उसी की छत्र छाया है ;

माटी के पुतले,

इतना न तू कर गुमान।

पल भर का तू मेहमान ;

यह बुद्धिमान मनुष्य प्रकृति का दोहन कर कभी यहां का राजा बन बैठता है तो कभी मालिक। ईश्वर की तरह उसकी भी सत्ता है, उसके भी नौकर चाकर दास और गुलाम हैं। उसका बस चले, तो स्वर्ग धरती पर ही उतार ले। वैसे भी जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान ही माना गया है और देवता भी इस धरती पर जन्म लेने के लिए कतारबद्ध बैठे रहते हैं।

देव भी यहीं दानव भी यहीं, यहीं कोई मानव तो कोई महामानव।

मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी यहां अकर्त्ता बनकर कर्म करते हैं।

हमारी मां सिर्फ इंसान के बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन हम तो गाय, भैंस और बकरी का भी दूध पी जाते हैं। दूध, मलाई, मक्खन और मावा भी पका पकाया।

कपास के पौधे से रुई और जंगल की लकड़ी से हमने कपड़ा और मकान बना लिए और खेत में अनाज बो, अपनी रोटी का प्रबंध भी कर लिया। हमारे आलीशान महल और बंगले , सोना, चांदी और हीरे जवाहरात भी हमें इस पृथ्वी की गोद से ही मिले हैं, हम कोई दहेज में नहीं लाए। हां लेकिन इतना दिमाग पृथ्वी के अन्य प्राणियों के पास कहां।।

जीव: जीवस्य भोजनम् से ही प्रकृति का संतुलन है।

क्या आपको नहीं लगता ईश्वर ने मुर्गी का अंडा और जल बिन मछली सिर्फ इस इंसान के लिए ही बनाई है। जंगल में तो खैर जंगल राज है लेकिन हम तो जंगल भी बर्बाद करने पर तुले हैं। आज हर पहाड़ की चोटी और सभ्यता की चोटी पर भी यह मानव ही विराजमान है। चंद्रमा के बाद बस अब शीघ्र ही मंगल पर भी प्रवेश है।

नदियां न पीयें कभी अपना जल, वृक्ष ना खाए कभी अपना फल। एक मधुमक्खी बड़े जतन से फूलों से गंध और पराग चुराती है और अपने छत्तों में शहद बनाती है। चतुर मनुष्य मधुमक्खी को भी पाल लेता है, शहद शहद चाट लेता है। मीठे की हद है शहद। क्या आपने कभी शहद में शकर घोली है ?

रेशम का कीड़ा हमारे लिए रेशम तैयार करता है। कीड़े मकोड़े इतना काम करते हैं, फिर भी कहलाते हैं मक्खी और कीड़े मकोड़े ही। अजब तेरी कारीगरी रे करतार।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६१ ☆ कार्तिक मास में तुलसी पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना कार्तिक मास में तुलसी पूजन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६१ – कार्तिक मास में तुलसी पूजन

(आध्यात्मिक, पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक चेतना)

कार्तिक मास और तुलसी पूजन का धार्मिक महत्व है। यह मास भगवान विष्णु के जागरण देव उठनी एकादशी को समर्पित है। भक्त पूरे महीने पवित्र नदी में प्रातः स्नान करके कृष्ण जी व तुलसी की पूजा, दीपदान करते हैं। इस महीने में तुलसी माता का विशेष पूजन करने से विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

तुलसी विवाह (देवउठनी एकादशी) पर तुलसी का पूजन और भगवान शालिग्राम से विवाह कराया जाता है। यह धर्म, परिवारिक समृद्धि और जीवन में मंगल का प्रतीक माना जाता है। तुलसी माता को लक्ष्मी का अवतार कहा गया है, इसलिए इस मास में उनका पूजन सुख, सौभाग्यवर्द्धक होता है ।

छप्पन भोग छत्तीसों  व्यंजन बिन तुलसी प्रभु एक न मानी…

तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु भोजन स्वीकार नहीं करते हैं। इसकी टहनियों से  माला, इसकी पत्तियों को जल में डालकर  उपयोग किया जाता है। तुलसी का पौधा सात्त्विकता का प्रतीक है। इसके समीप ध्यान करने से मन में एकाग्रता और शांति का अनुभव होता है।

तुलसी पौधा वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। इसकी खास सुगंध घर और आस-पास के वातावरण कीटाणु रहित करती है। तुलसी लगाने और पूजन की परंपरा हमारे प्रकृति संरक्षण के वैदिक ज्ञान को दर्शाती है। यह केवल आस्था नहीं, पर्यावरणीय संतुलन का केंद्र भी है। तुलसी विवाह में गन्ने का मंडप, हल्दी की पूजा, जैसे अनुष्ठान धार्मिक सामंजस्य और जीवन के नैतिक मूल्यों का संदेश देते हैं।

अतः ये कहा जा सकता है कि कार्तिक मास में तुलसी पौधे की विशेष पूजा आध्यत्मिकता के साथ – साथ पर्यावरणीय व सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करती है ।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०३ ⇒ लिखावट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखावट।)

?अभी अभी # ८०३ ⇒ आलेख – लिखावट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिखावट को बोलचाल की हिंदी में हैंडराइटिंग कहते हैं ! अगर इस उम्र में कोई आपसे कहे कि आप अपनी लिखावट सुधारो, बहुत खराब है, तो आपको कितना बुरा लगेगा । लेकिन जब बुरा समय आता है, तो ऐसा ही होता है ।

आपकी हैंडराइटिंग कितनी भी खराब होगी, पढ़ने में तो आ ही जाती होगी ! लेकिन इन डॉक्टरों की लिखावट का तो बस मरीज़ ही मालिक है । उधर केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत योजना की घोषणा की, इधर मेडिकल कॉलेज ने डॉक्टरों की लिखावट सुधारने के लिए वर्कशॉप आयोजित करने का निर्णय ले लिया । जग-जाहिर हो गया, डॉक्टरों का इलाज कितना भी लाजवाब हो,उनकी हैंडराइटिंग तो माशा-अल्लाह ही है ।।

हम छोटे थे, तो स्कूल में सुन्दर-लेखन प्रतियोगिता होती थी ! सुंदर लेखन पर पुरस्कार दिया जाता था । अगर लिखावट खराब हो, तो किसी सुंदर लिखावट वाले लड़के से प्रेमपत्र लिखवाना एक आवश्यक मज़बूरी हो जाती थी । लड़कियों की लिखावट तो उनके चेहरे की सुंदरता से ही टपकती नज़र आती थी ।

हम भी आज डॉक्टर ही होते,अगर हमारा बचपन सुंदर लेखन में स्वाहा न हो गया होता ! पहले हिंदी अंग्रेज़ी का अक्षर-ज्ञान,उँगलियों पर गिनती-पहाड़ा, पट्टी-पेम के बाद कॉपी पर पेंसिल से लिखाई । हिंदी अंग्रेज़ी लेखन की अलग कॉपी,अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़ी,छोटी ही नहीं,इटैलिक भी ! हर अक्षर की पूँछ और मूँछ दोनों रहती थी ।।

स्याही-दवात और होल्डर ही हमारे नसीब में था तब ! पार्कर पेन का तो बस नाम ही सुना था । क्रोसिन की गोल गोली जैसी स्याही की टिकली आती थी,जिसे पानी की दवात में घोल दिया जाता था, और स्याही तैयार ! होल्डर की निब भी टूटने पर बदलनी पड़ती थी । पिताजी की जेब में लगे फाउन्टेन पेन को बड़ी हसरत की निगाह से देखा करते थे ।

हमारे भी दिन फिरे ! हमें भी पेन नसीब हुआ । तब पेन भी स्याही वाले ही आते थे । पेट्रोल की तरह पेन का मुँह खोल स्याही ड्रॉपर से टपकायी जाती थी,और स्याही भी camel की ही होती थी । कितनी बार बस्ता खराब हुआ,ज़ेब ख़राब हुई,कागज़ खराब हुए,तब जाकर लिखावट रंग लाई ।।

परीक्षा में कितने पन्ने रंगे होंगे,

जीवन के कितने पृष्ठ अनलिखे रह गए होंगे,इसका कोई दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं । आज इंसान बच्चे से गया बीता हो गया है, जो कभी दोस्तों को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था,डायरियां लिखा करता था, अचानक लिखना छोड़ फेसबुक पर चला गया है । बरसों पुरानी चिट्ठियों को सहेजकर रखने वाला,फ़ोन पर मैसेज पढ़ते ही डिलीट कर देता है । कागज़ बचाने के चक्कर में,दुनिया डिजिटल हो रही है । हैंडराइटिंग नहीं,पर्यावरण सुधारिये ।

मुझे डॉक्टरों से सहानुभूति है । ज़ल्दी का काम डॉक्टर का ! ज़ल्दी में लिखावट ऐसी ही हो जाती है । याद है जब क्लास में डिक्टेशन लेते थे,हम पैसेंजर और हमारे सर,फ्रंटियर मेल । घर जाकर फेयर ना करो,तो बिल्कुल डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन नज़र आता था ।।

बहुत कम शुभचिंतक मिलते हैं इस ज़माने में ! खुद को सुधारिये,कहने वाले कई समाज सुधारक मिल जाएँगे । आपका सही शुभचिंतक वही,जो आपसे कहे, कृपया अपनी हैंडराइटिंग

यानी लिखावट सुधारिये ।

मोती जैसे दाँत हों,

मोती जैसे शब्द ।

जो भी पढ़े लिखावट आपकी

हो जाए निःशब्द ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०३ ⇒ गं ज हा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गं ज हा ।)

?अभी अभी # ८०३ ⇒ आलेख – गं ज हा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह शब्द पहली बार मैंने राग दरबारी में पढ़ा। चूंकि राग दरबारी शिवपाल गंज की दास्तान है, गंजहा शब्द यकीनन गंज से ही बना है। गंज कहां नहीं। गांव, कस्बा तो ठीक, आपको नगर नगर में कितने ही गंज मिल जाएंगे। लेकिन गंजहों की बात निराली ही है।

कुछ शब्द किताबों से निकलकर बोलचाल में प्रवेश कर जाते हैं तो कुछ बोलचाल के शब्द किताबों में प्रवेश कर जाते हैं। शब्द, शब्दकोश में जन्म नहीं लेते, बोलचाल की भाषा से, शब्दकोश में प्रवेश कर जाते हैं। धांसू, टेपा, टपोरी, फीटम फाट, झकास, झन्नाट और बिंदास कुछ ऐसे ही शब्द हैं, जिन्होंने केवल लोकप्रियता के आधार पर शब्दकोश की बिनाका गीत माला में स्थान पाया है लेकिन खेद है, गंजहा शब्द अभी तक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाया है।।

मेरे महानगर में, जो कभी होलकरों की स्टेट था, मल्हारगंज, तुकोगंज, उषागंज, सियागंज, मल्हारगंज, स्नेहलता गंज और गोकुलगंज भी मिल जाएंगे। गंजी, घास को भी कहते हैं, जानवरों के लिए उगाई घास को जहां रखा जाता था, उसे भी गंजी कंपाउंड कहते थे। घोड़े पालना सिर्फ अंग्रेजों का ही शौक नहीं था, हर राजा घोड़े पर सवारी करता था तथा ऐसी कोई फिल्म नहीं जिसमें राजकुमारी को किसी साधारण से नायक ने घुड़सवारी सिखाई न हो, अथवा उसके बिगड़ैल घोड़े से, बिगड़ैल राजकुमारी की जान बचाई न हो।

जो भाग्यशाली और मालदार होते हैं, उनके सर पर बालों के स्थान पर एक खाली मैदान होता है, जिसे गंजी कम्पाउन्ड भी कह सकते हैं। भगवान गंजे को वैसे ही नाखून नहीं देता और अगर देता भी है, तो बाबा रामदेव के कहने पर अलादीन के चिराग की तरह वह नाखून घिसा करता है, घिसा करता है लेकिन बंजर ज़मीन पर भी कभी खेती हुई है।।

केवल शिवपालगंज ही क्यों, हमारे देश में क्या कम गंज हैं। हमारे मध्यप्रदेश के भोपाल के आसपास ही बिलकिसगंज, बेगमगंज और नसरुल्लागंज हैं। उधर झारखंड में डाल्टनगंज भी है। पूरे यू पी बिहार में, गंज ही गंज भरे पड़े हैं कासगंज, गौरीगंज और महाराजगंज अगर उत्तर प्रदेश में है तो बिहार में गोपालगंज और किशनगंज दोनों हैं, लेकिन यहां कहीं भी गंजहों का नामोनिशान तक नहीं है।

एक प्रश्न बार बार मन में कौंधता है, कहीं श्रीलाल शुक्ल ने गंवार के लिए गंजहे शब्द का प्रयोग तो नहीं किया। क्या किसी गंजहे के व्यक्तित्व में गंजापन और गमछा भी शामिल है क्योंकि इन दोनों के बिना बद्री पहलवान का व्यक्तित्व निखर नहीं पाता।।

अगर रंगनाथ रिसर्च के नाम पर शिवपाल गंज में घास छील सकता है तो शिवपाल गंज के गंजहों पर भी रिसर्च की जा सकती है और हर गंज में गंजहों के अस्तित्व से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हर शब्द अनमोल होता है। अगर वह प्रयोग से बाहर हो जाता है तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। कहीं गंजहे शब्द की उपेक्षा से हम गंजहा संस्कृति से ही हाथ ना धो बैठें। शब्दों को बचाएं। गंजहा संस्कृति को बचाएं। जिन विद्वानों ने राग दरबारी पर शोध किया है, वे भी गंजहों पर तनिक प्रकाश डालें तो गंजहे धन्य हो जाएं ..!!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०७ – को जागर्ति? ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०७ को जागर्ति?… ?

इसी सप्ताह शरद पूर्णिमा सम्पन्न हुई। इसे कौमुदी पूर्णिमा अथवा कोजागरी के नाम से भी जाना जाता है।

अश्विन मास की पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा कहलाती है। शरद पूर्णिमा अर्थात द्वापर में रासरचैया द्वारा राधारानी एवं गोपिकाओं सहित महारास की रात्रि, जिसे देखकर आनंद विभोर चांद ने धरती पर अमृतवर्षा की थी।

चंद्रमा की कला की तरह घटता-बढ़ता-बदलता रहता है मनुष्य का मन भी। यही कारण है कि कहा गया, ‘चंद्रमा मनसो जात:।

यह समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी के प्रकट होने की रात्रि भी है। समुद्र को मथना कोई साधारण कार्य नहीं था। मदरांचल पर्वत की मथानी और नागराज वासुकि की रस्सी या नेती, कल्पनातीत है। सार यह कि लक्ष्मी के अर्जन के लिए कठोर परिश्रम के अलावा कोई विकल्प नहीं।

लोकमान्यता है कि कोजागरी की रात्रि लक्ष्मी जी धरती का विचरण करती हैं और पूछती हैं, ‘को जागर्ति?’.. कौन जग रहा है?..जगना याने ध्येयनिष्ठ और विवेकजनित कर्म।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का उवाच है,

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

                                               (2.69)

सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयोंमें सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।

सब प्राणियों के लिए रात क्या है? मद में चूर होकर अपने उद्गम को बिसराना,अपनी यात्रा के उद्देश्य को भूलना ही रात है। इस अंधेरी भूल-भुलैया में बिरले ही सजग होते हैं, जाग्रत होते हैं। वे निरंतर स्मरण रखते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, हर क्षण परमात्म तत्व को समर्पित करना ही लक्ष्य है। इन्हें ही स्थितप्रज्ञ कहा गया है।

साधारण प्राणियों का जागना क्या है? उनका जागना भोग और लोभ में लिप्त रहना है।  मुनियों के लिए दैहिकता कर्तव्य है। वह पर कर्तव्यपरायण तो होता है पर अति से अर्थात भोग और लोभ से दूर रहता है। साधारण प्राणियों का दिन, मुनियों की रात है।

अब प्रश्न उठता है कि सर्वसाधारण मनुष्य क्या सब त्यागकर मुनि हो जाए? इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।

मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

                                            (10.22)

श्रीमद्भगवद्गीता में ही भगवान कहते हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।

जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। ‘को जागर्ति’ के सर्वेक्षण में ऐसे साधक सदैव दिव्य स्थितप्रज्ञों की सूची में रखे गए।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०२ ⇒ मेरी सूरत तेरी आँखें ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरी सूरत तेरी आँखें।)

?अभी अभी # ८०२ ⇒ आलेख – मेरी सूरत तेरी आँखें ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अज़ीब अंधेरगर्दी है! हमें अपनी आँखों से ही अपनी सूरत दिखाई नहीं देती। हमें या तो दूसरों की आँखों का सहारा लेना पड़ता है, या फिर किसी आईने का!

‌आईने के सामने घण्टों सजने-संवरने के बाद जब सजनी अपने साजन से पूछती है, मैं कैसी लग रही हूँ ? तो, किसी किताब में गड़ी आँखों को बिना उठाए, वह जवाब दे देते हैं, ठीक है! और वह पाँव पटकती हुई किचन में चली जाती है। थोड़ी ही देर में चाय का प्याला लेकर वापस आती है। मिस्टर साजन चाय की पहली चुस्की लेते हुए जवाब देते हैं, हाँ, अब ठीक लग रही हो।।

‌जिन आँखों से आप पूरी दुनिया देख चुके हो, उन आँखों से अपनी ही सूरत नहीं देख पाना तो उस कस्तूरी मृग जैसा ही हुआ, जो उस कस्तूरी की गंध की तलाश में है, जो उसकी देह में ही व्याप्त है। अगर आईना नहीं होता, तो कौन यक़ीन करता कि, मैं सुंदर हूँ।

‌इंसान से कई गुना सुंदर पशु-पक्षी इस प्रकृति पर मौजूद है, जिनके बदन पर कोई अलंकारिक वस्त्र-आभूषण मौजूद नहीं, लेकिन इसका उन्हें कोई भान-गुमान नहीं। उनके पास प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुंदरता को निहारने का कोई आईना ही नहीं! जब किसी सुंदर पक्षी के सामने आईना रख दिया जाता है, तो वह उसे कोई अन्य पक्षी समझ आईने पर चोंच मारता है। उसे अपनी ‌सुंदरता का कोई बोध ही नहीं। जब कि उसने कई बार अपनी परछाई पानी में अवश्य देखी होगी।।

‌अगर आईना नहीं होता, तो क्या सुंदरता नहीं होती! आईना सुंदर नहीं! आईने का अपना कोई अक्स नहीं। क्या आपने ऐसा कोई आइना देखा है, जिसमें कुछ भी नज़र नहीं आता ? जब भी आप ऐसा आईना देखने जाएँगे, अपने आप को उसमें पहले से ही मौजूद पाएँगे।

‌केवल शायर ही नहीं, ऐसे कई इंसान हैं जो किसी की आँखों में खो जाते हैं, उन आँखों पर मर-मिटने को तैयार हो जाते हैं। तेरी आँखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है। तीर आँखों के, जिगर से पार कर दो यार तुम। क्या करें! तेरे नैना हैं जादू भरे।

‌यही हाल किसी मासूम सी सूरत का है! हर सूरत कितनी मशहूर है। तेरी सूरत से नहीं मिलती, किसी की सूरत! हम जहां में तेरी तस्वीर लिये फिरते हैं। सूरत तो सूरत, तस्वीर तक को सीने से लगाकर रखने वाले कई आशिक मौजूद हैं, इस दुनिया में।।

‌अगर इस खूबसूरत से चेहरे पर आँखें ही न होती तो क्या होता! आँखें ही रौशनी हैं, आँखें ही नूर हैं। आँखों में परख है, इसीलिए तो हीरा कोहिनूर है। सूरत और आँखों को आप एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते।

‌ऐसा नहीं! चेहरे बदसूरत भी होते हैं, आँखें कातिल ही नहीं डरावनी भी होती हैं। क्यों कोई हमें फूटी आँखों नहीं सुहाता, क्यों हम किसी की सूरत भी नहीं देखना चाहते ? अरे! कोई कारण होगा।

‌हमारी इन दो खूबसूरत आँखों के पीछे भी आँखें हैं, जो हमें इन आँखों से दिखाई नहीं देती, वे मन की आँखें हैं। ‌वे मन की आँखें सूरत को नहीं सीरत को पहचानती हैं। ‌मन की आँखों ही की तरह हर सूरत में एक सीरत छुपी रहती है। वही अच्छाई है, आप चाहें तो उसे ईश्वरीय गुण कहें या ख़ुदा का नूर।।

‌संसार ऐसी कई विभूतियों से भरा पड़ा है, जो जन्म से ही दृष्टि-विहीन थे। भक्त सूरदास से लगाकर रवींद्र जैन तक कई जाने-अनजाने नेत्रहीनों का सहारा रही हैं, ये मन की आँखें! इस दिव्य-दृष्टि के स्वामी को कोई अक्ल का अंधा ही अंधा कहेगा।

‌यारों, सूरत हमारी पे मत जाओ! मन की आँखों से हमें परखो। हम दिल के इतने बुरे भी नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०१ ⇒ लंगोट और कंठ लंगोट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिलंगोट और कंठ लंगोट।)

?अभी अभी # ८०१ ⇒ आलेख – लंगोट और कंठ लंगोट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Loin cloth & neck tie)

अंजनी के लाल रामभक्त हनुमान हों, अथवा चंदन चाचा के अखाड़े के पहलवान, केवल एक लंगोट ही उनका आभूषण भी होती है और परिधान भी। वैसे इसे आप पुरुषों का सनातन अंतर्वस्त्र भी कह सकते हैं। इसे धारण करने वाले लंगोट के पक्के कहलाते थे।

वैसे सनातन परिधान और आधुनिक फैशन में कोई खास फर्क नहीं है। आज के युवा मॉडल आपको लंगोट की जगह, और अधिक वीभत्स और अश्लील नजर आने वाली, अमेजन की कॉटन ब्रीफ्स पहने कैट वॉक करते नज़र आ जाएंगे।

आवश्यकता अगर आविष्कार की जननी है, तो अश्लीलता का अंधानुकरण आधुनिक फैशन का बाप। ।

हम जब छोटे थे, तो लंगोट पहनते थे। समय के साथ पहले पट्टे वाली बंबइया चड्डी और तदनंतर वीआईपी और लक्स अंडरवियर पर आ गए।

हां हमारे घर के नवजात शिशुओं के हमने भी पोतड़े बदले हैं। हर दस मिनिट में एक लंगोट गीली। आज की भाषा में इन्हें डायपर बदलना कहते हैं। शुक्र है, हगीज ने आजकल की माताओं को, फर्स्ट क्राय के सौजन्य से, इस परेशानी से निजात दिलवा दी है। हगीज हैं जहां, ममता भरा हग है वहां।

लंगोट की जब, बात निकलेगी, तो कंठ लंगोट तलक, जाएगी। आज का सभ्य पुरुष, भले ही लंगोट से करे इंकार, लेकिन वह कंठ लंगोट से करे प्यार।

हम भी, भले ही लंगोट से मुक्त हो गए हों, लेकिन शादी के समय, सबसे पहले, हमारे गले, कंठ लंगोट ही पड़ी। ।

झूठ क्यूं बोलें, हमें तो ठीक से टाई बांधते तक नहीं आती थी, लेकिन हमारे यार दोस्त, हमसे अधिक आधुनिक थे, उन्होंने विवाह के गठबंधन से पहले ही, गले में गांठ बांधना सिखला दिया। आप कह सकते हैं, पहले टाई हमारे गले पड़ी, और उसके बाद, सात जन्मों का अटूट बंधन।

ईश्वर जानता है, आज हम लंगोट और कंठ लंगोट, यानी loin cloth और neck tie से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, लेकिन एक ऐसे नेक बंधन में बंध चुके हैं, जिससे छूटना हमारे लिए नामुमकिन और असंभव है। हम जानते हैं, कोई हमारे गले नहीं पड़ सकता, ना लंगोट और ना ही कंठ लंगोट, लेकिन हमारी धर्मपत्नी के गले में हमारे नाम का मंगलसूत्र है, जिसमें हमारा मंगल ही मंगल है।।

काश, आज हमारे गले में भी, धर्मपत्नी के मंगलसूत्र की तरह, कोई एक नेक टाई, अर्थात् पवित्र बंधन होता। वैसे देखा जाए तो लंगोट और कंठ लंगोट भी एक तरह की गांठ ही है।

लंगोट और टाई दोनों बांधी जाती हैं। जो हमारी गांठ है, वही टाई की क्नॉट है। जो बंधा है, वह अनुशासित और संयमित है। टाई को भद्र पुरुषों यानी gentlemen का आभूषण कहा गया है।

वकील, अफसर, प्रोफेसर तो ठीक, हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक और विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल को भी, तस्वीरों में हमेशा आप, सूट बूट और टाई में ही देखेंगे।

हो सकता हो, लंगोट आपके लिए अंदर की बात हो, लेकिन एक पहलवान को सिर्फ लंगोट ही शोभा देती है। लेकिन टाई यूनिवर्सल है। मद्रास के विद्वान तो धोती पर भी कोट और टाई पहनते हैं।

हमने तो कई महंगी होटलों में वेटर्स को सूट और टाई में देखा है और ग्राहक को धोती कुर्ते में। अगर आज कबीर होते तो शायद यही कहते ;

टाई कहो या कंठ लंगोट

सुन सुन आए हांसी।

थोड़ी टाइट तो खांसी

और अगर किसी ने

जोर से कस दी

तो सीधे फांसी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९५ ☆ शिक्षा और संस्कार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिक्षा और संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९५ ☆

शिक्षा और संस्कार… ☆

गूगल पूरी दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, परंतु मनुष्य बनने का रास्ता धर्म शिक्षा व  संस्कार ही दिखा सकते हैं– शाश्वत सत्य है। आज की पूरी दुनिया बहुत छोटी हो गई है। हम तत्क्षण किसी से बात कर सकते हैं; अपने भाव में विचार पूरे विश्व में प्रेषित कर सकते हैं; वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। विभिन्न संसाधनों की बचत करके उनमें इजाफा कर अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते हैं। हम दूर-दराज़ में हो गई संगोष्ठियों में प्रतिभागिता कर सकते हैं। है ना यह कमाल! यदि इसे कोरोना का उपहार या वरदान कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस रूप में हम इस वरदान कह सकते हैं। इतना ही नहीं एक लंबे अंतराल के पश्चात् बच्चों को पारिवारिक संस्था का महत्व समझ में आया और लोग अपनी संस्कृति की ओर लौटे। भले ही हमें इस समय बहुत सी आपदाओं ने चहुँओर से मानव पर निशाना साधा और बहुत से लोगों को अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा।

सो! गूगल दुनिया को रास्ता तो दिखा सकता है, पथ-विचलित होने से बचा सकता है, सही दिशा में चलने को प्रेरित कर सकता है। परंतु वह मनुष्य बनने की राह नहीं दर्शा सकता, क्योंकि धर्म, शिक्षा और संस्कार ही मानव बनने की राह दिखाते हैं। संस्कृति हमें सुसंस्कारों से पल्लवित करती है। अतीत में प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों व जीने की राह की ओर इंगित करती हैं व शुभ-अशुभ का भान कराती हैं। सत्यम शिवम सुंदरम का महत्व समझा कर उसे जीवन में अपनाने का आग्रह करती हैं। हमारे अंतर्मन में निहित सुप्त भावनाओं व संस्कारों को जाग्रत करती हैं, जिस पर चलकर मानव उस असीम शक्ति से साक्षात्कार कर सकता है।

प्रार्थना करते समय व्यक्ति का मंदिर में होना आवश्यक नहीं, किंतु व्यक्ति के मन में ईश्वर का वास होना अत्यंत आवश्यक है–निर्गुण भक्ति की ओर अंकित करता है। उसे किसी पूजा-स्थल में ढूंढने की आवश्यकता नहीं, परंतु उसके अंतर्मन में ईश्वर का विद्यमान रहना आवश्यक है। मानव को कस्तूरी रूपी ईश्वर को तलाशने के निमित्त वन-वन अर्थात् संसार में भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह हमारे मन में रहता है तथा हम पल-भर में उसके दर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

संत और वसंत में एक ही समानता है। जब वसंत आता है तो प्रकृति सुधर जाती है और  जब संत आते हैं तो संस्कृति सुधर जाती है। जैसे वसंत के आगमन पर प्रकृति के विभिन्न उपादान फल-फूल जाते हैं, लहलहा उठते हैं, मलय वायु के झोंके मानव मन को आलोड़ित व आंदोलित करते हैं। उसी प्रकार संतजनों के अवतरण व मानव मात्र से संपर्क होने पर हमारे भीतर सुसंस्कार सृजित हो जाते हैं। संतजन हमें अपनी संस्कृति के दर्शन करते हैं। हमें कुमार्ग से सत्मार्गव की ओर प्रवृत्त करते हैं। उचित- अनुचित, ग्राह्य-त्याज्य व उपयोगी-अनुपयोगी का भेद समझाते हैं।

शिक्षा हमारे आचार-व्यवहार व सोच जीवन के दृष्टिकोण को प्रभावित करती है और मानवीय मूल्य हमें सत्य की राह दर्शाते हैं। शिक्षा हमें सुसंस्कारित करती है, बुराइयों से बचने का संदेश देती है। अधिकार व कर्त्तव्यों के अन्योन्याश्रित संबंध को दर्शाती है। अंतर्मन के भीतर निहित गुणों को विकसित करती है जो उसे सर्वांगीण मानव का दर्जा प्रदन करते हैं। यह हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है।

धर्म का मानव जीवन को विकसित करने में अहम् योगदान है। धर्म हमें प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, सहानुभूति, समर्पण, सहनशीलता आदि का संदेश प्रेषित करता है, जिस का अनुसरण कर हमारा जीवन सुचारु रूप से आगे बढ़ता है। धर्म हमें सहिष्णुता का मार्ग अपनाने का संदेश प्रेषित करता है। सभी धर्म समान हैं। इसलिए पारस्परिक द्वेष, हिंसा आदि को जीवन में पदार्पण नहीं करने देना चाहिए। इससे शत्रुता का भाग उपजता है तथा मतभेद मनभेद का रूप  ग्रहण कर लेते हैं। दरारें मन-आंगन में दीवारों का आकार ग्रहण कर लेती हैं और दुनिया इस क़दर बढ़ जाती है, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परिवार, समाज व देश में अराजकता व्याप जाती है और मानव कुछ निजी स्वार्थों से बंधा ग़लत काम करने पर उतारू हो जाता है। उसके हृदय में प्रज्ज्वलित प्रतिशोध की ज्वाला विशालकाय रूप धारण कर लेती है और निर्दोष बच्चे, महिलाएं व बुज़ुर्ग उस हिंसा का शिकार हो जाते हैं। वह खून के रिश्तों को नकार उन पर निशाना साधने में भी गुरेज़ नहीं करता। इससे पूरे समाज में खलबली मत जाती है और अजनबीपन का एहसास पाँव पसार लेता है। जिसके परिणाम-स्वरूप  समाज में विनाश ही विनाश दृष्टिगत होता है।

सो! संचार के साधनों ने भौगोलिक दुरियों को तो कम किया है और विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है। परंतु मानव-मानव के बीच की दुरियाँ बहुत बढ़ गई हैं। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए हैं। मोबाइल, इंस्टाग्राम, गूगल ने मानव को आत्म-केंद्रित कर दिया है। अब तो एक छत के नीचे निवास करने वाले लोग भी मोबाइल के मध्यम से अपने सुख-दु:ख सांझे करने लगे हैं तथा संवाद करने में व्यस्त रहते हैं। लोग दिन भर फेसबुक, टि्वटर आदि में व्यस्त रहते हैं। समान भी ऑनलाइन आ जाता है। सो!  किसी से दुआ सलाम की कल्पना भी बेमानी हो गई है और इससे समाज में एकांगिता का भाव व्याप रहा है। इंसान अपने अहं में लीन रहता है।

 

इस तथ्य को समझना अत्यंत अवशयक है कि धर्म, शिक्षा जहाँ हमारा सर्वांगीण विकास करती है, वहीं संस्कृति हमें जीने की राह दर्शाती है। वास्तव में धर्म, शिक्षा वसंस्कार हमें पूर्ण मानव बनाते हैं और उन्हें जीवन में अपनाकर हम स्वस्थ व सहज जीवन जी सकते हैं और स्वस्थ समाज की संरचना कर सकते हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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