हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(ई-अभिव्यक्ति- में ‘पूर्णिका’ जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’का स्वागत.)

संक्षिप्त परिचय 

सम्प्रति : आयुध निर्माणी खमरिया से सेवा निवृत्ति के पश्चात मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत।

कृतियाँ: अनुराग (कहानी संग्रह) फरवरी 2009, धरती की धरोहर (कहानी संग्रह) नवंबर २०११। किलकारी (बाल काव्य-संग्रह) जनवरी 2014 विचार (काव्य-संग्रह) 2017. बुंदेली भोजपुरी गीत समागम 2020. गांव की बेटी (उपन्यास) जनवरी 2021, आह (पूर्णिका संग्रह) 2021, घर संसार (गीत संग्रह) 2023, सुखानुभूति (पूर्णिका संग्रह). का मओ…बिन्ना (बुन्देली पूर्णिका संग्रह) 2025, पूर्णिका विद्या पर विमर्श के साथ ही ‘बधाई हो बघाई’ (पूर्णिका संकलन) आपके जन्म दिवस को समर्पित 93 पूर्णिका-कारों ने केवल एक विद्या विशेष ‘पूर्णिका’ पर अपनी पूर्णिकाएं समर्पित की, इसके साथ ही नगर, प्रदेश, देश से प्रकाशित होने वाले करीब 130 संकलनों में आपकी रचनाएँ यथा प्रकाशित हुई हैं। अभी आप कई पत्र पत्रिकाओं के साथ साहित्य परिवार पत्रिका नदियाद गुजरात के सह संपादक, काव्यामृत पत्रिका पीलीभीत के क्षेत्रीय संपादक भी है। ‘माई’ उपन्यास प्रकाशाधीन है आप आकाशवाणी जबलपुर से निरंतर कहानी पाठ करते हैं।

सहभागिता : आपने विभिन्न विभागीय और अविभागीय अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा त्वरित – भाषण, निबंध-लेखन, कविता-लेखन, बाद-विवाद और कविता पाठ में विजय श्री प्राप्त की है।

सम्बध्दता : आप विभिन्न सामाजिक, साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़े हैं। जैसे पूर्व नगर महासचिव स.पा. अध्यक्ष विधिक साक्षरता समिति पंजीकृत जबलपुर हैं।

संयोजक / संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आमा साहित्य संघ जबलपुर मप्र, उपाध्यक्ष यादव महासभा, उपाध्यक्ष त्रिपुर वरिष्ठ नागरिक महासंघ जबलपुर मप्र, इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन – विधिक सलाहकार मप्र … आदि।

सम्मान : अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय साहित्यिक, सामजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं मानद उपाधियों से अलंकृत / विभूषित।

विशेष : विक्रम शिला हिन्दी विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) भागलपुर बिहार से पूर्णिका- जनक की उपाधि से सम्मानित (2022)

 

आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

(डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ जी को हिंदी साहित्य की विधा पूर्णिका का जनक होने का श्रेय है. आपकी पुस्तक सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह) के आत्मकथ्य के माध्यम से आपने पूर्णिका के इतिहास पर प्रकाश डाला है जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके पूर्व हमने इसी प्रकार गद्य क्षणिका के जनक श्री रामदेव धुरंधर जी, मारीशस के आलेख को भी प्रकाशित किया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं. – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))

👉 हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ # 30 – मारिशस से ~ गद्य – क्षणिका : मेरे लेखन का एक सबल पक्ष ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

“सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह को पुस्तक रूप तक लाने में मुझे भी बहुत कुछ नये नये अनुभव प्राप्त हुए है। जब से हमने सन् 2017 से पूर्णिका पर काम करना प्रारम्भ किया है।

अनुभव यह हुआ कि यदि कोई भी चीज या चलन सदियों से चल रहा है तब भी उसे हमें बिना सोचे समझे आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिये हमें ईश्वर ज्ञान बुध्दि प्रदान किये हैं उसका धनात्मक, ऋणात्मक समझ बूझकर नुकसान फायदा सोच कर स्वीकार करना चाहिये मानना चाहिये और यदि हमें लगता है कि यह तो गलत है हमारे या जन हित में नहीं है तो उसे स्वीकार करने की जगह अस्वीकार करना चाहिये।

लेकिन हाँ यदि आप ने ऐसा किया तो उस प्रथा चलन को आँख बंद करके मानने वाले आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मेरे साथ पूर्णिका को लेकर ही नहीं बड़े बड़े वैज्ञानिको के साथ भी हुआ लेकिन वो अपने उद्देश्य से विरोध के पश्चात भी भटके नहीं तभी आज विश्व विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुका है कि आज वर्तमान में चाँद पर बस्ती बनाने की चर्चा जोरों पर है। यदि आज भी लोग चाँद को चन्दा मामा जानते रहते हमें बताते रहते और हम वही मानते रहते तो आज भी विकास से दूर होते।

एक महान होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति की खोज करने वाले जब डॉ. हैनीमन साहब ने कहा कि रोग जिस तत्व की कमी से हो जाये तब उसे ही पूरा कर दो रोग ठीक हो जायेगा।

लेकिन उनकी इस बात का उस समय पुरजोर विरोध हुआ फिर भी वो अपने काम में विरोध को दर किनारे कर के लगे रहे और आज होमियो पैथी चिकित्सा पद्यति से रोगियों का इलाज कर उन्हें खुशहाल किया जा रहा है रोग मुक्त किया जा रहा है।

यदि आज सारे के सारे लोग दुनियाँ की उन्हीं पुरानी विचार धाराओं प्रथाओं को मान कर चल रहे होते तो ऐसा विकास जो हम देख रहे हैं किसी भी क्षेत्र में न हुआ होता वह चाहे दूर संचार, सुरक्षा अथवा किसी भी क्षेत्र में अकल्पनीय, विकास न हो पाया होता।

हाँ किसी खोज का विरोध यदि तर्क संगत हो तो होना भी चाहिये किन्तु तर्क हीन नई खोज का विरोध तो नहीं होना चाहिये किन्तु कुछ लोग तर्क संगत खोज का तर्क हीन विरोध करते हैं।

कुछ लोग उस तर्क हीन विरोध करने वाले व्यक्ति को अपने पाले में करने के लिये उस व्यक्ति जिसने तर्क हीन विरोध उस नई खोज का किया बिना उसकी योग्यता का उचित अध्ययन मूल्यांकन किये पावर या क्षमता न होते हुए भी किसी उपाधि विशेष से अलंकृत कर देते हैं जो न तो अलंकृत होने वाले को और न ही अलंकृत करने वाले को कोई लाभ पहुँचा पाती है बस इतना ही होता है अपने मुँह मियां मिट्ठू बने रहिये खुश होते रहिये।

हम लोग यह भी जान लें कि जब कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक, साहित्यकार नई बात उठाता है तब भी जो लोग स्थापित नहीं होते हैं वो विरोध इसलिये करते हैं कि हमने तो इतने बड़े बड़े काम किये हैं लेकिन नया कुछ भी नहीं कर पाये है जो सदियों से चल रहा है वही किये हैं लेकिन यह व्यक्ति नया कुछ कर के अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है हम ऐसे ही रह गये।

लेकिन आगे चलकर जो विरोध होता है वह यह साबित करता है कि अब वह व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो रहा तभी यह विरोध हो रहा है। यही हाल पूर्णिका जनक और पूर्णिका के साथ भी है।

साहित्य हो विज्ञान हो या अविष्कार का कोई नया क्षेत्र हो। विरोधियों के अलावा एक समय ऐसा आता है कि उस व्यक्ति (जो नया काम कर रहा है) के साथ उसकी विचार धारा से सहमत हो कर अनेकानेक लोग, अनुयायी साहित्यकार वैज्ञानिक उस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं

जिससे वह खोज दुनिया स्वीकार कर लेती है और विरोधियों कि जुबान बंद हो जाती है उन्हें विवश हो कर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है या मुँह छुपाना पड़ता है।

यही हाल पूर्णिका और पूर्णिका जनक के साथ हुआ आज पूर्णिका हिन्दी साहित्य की जानी मानी एक सशक्त विधा है जिसे हिन्दी साहित्य में एक सम्मान जनक स्थान प्राप्त हो जिसके लिखने पढ़ने वाले पूर्णिकाकारों की एक लंबी सूची बन गई है जिसमें सर्व प्रथम डॉ. प्रो. खेदू भारती ‘सत्येश’ जी धमतरी छत्तीसगढ़ का नाम आता है जिनकी पूर्णिका की पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में हैं।

जबलपुर के पूर्णिका पुरोधा कदम जबलपुरी जी नों सौ दिन से निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं इनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिव अलग जी जिनकी तीन पूर्णिका संग्रह के साथ पूर्णिका में एक महाकाव्य प्रकाशित हो रहा है जो लगभग तीन हजार पृष्ठों का होगा। मारीशस से भाई गोवर्धन सिंह फौदार सच्चिदानंद जी निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ जी जिन्होंने बुन्देली बोली में पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित करा दी है। रजनी कटारे जी जिनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीन दयाल यादव जी जिनकी पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी। भाई श्री ओम प्रकाश खरे और रमेश सेठ तथा चन्द्रभान चन्द्र और डॉ ललित कुमार सिंह ‘ललित’ अलीगढ़ उत्तरप्रदेश के साथ ही देश के अनेकानेक पूर्णिका कारों की पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें कुंज बिहारी यादव नरसिंहपुर मप्र, नीलम यादव एहसास प्रयाग राज उप्र, किरत सिंह यादव भिण्ड मप्र, गायत्री सिंह ठाकुर ‘सक्षम’ नरसिंहपुर मप्र, सतीश तिवारी भी शामिल हैं। और अभी दिसम्बर 2024 में एक साथ पैतालिस पूर्णिका की पुस्तकों का विमोचन हुआ जो ऐतिहासिक है। अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक समय में एक मंच से किसी एक विधा विशेष की इतनी पुस्तकों का विमोचन हुआ हो।

और यह बात सिध्द करती है कि “सफल हुआ अभियान” सत्य और सही है कि अभी पूर्णिका जनक के 3 फरवरी 2024 को जन्मदिन पर चार हिन्दी साहित्य अकादमी भारत सरकार उच्च शिक्षा विभाग की पत्रिका, दो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने पूर्णिका को अपनी मान्यता प्रदान कर इस बात पर और चाँद लगा दिये कि “सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह अद्वितीय पुस्तक है।

अंत में मै अपने समस्त पूर्णिकार मित्रों को नमन करता हूँ कि यह केवल और केवल पूर्णिका के प्रति आप के लगाव और अभियान” समर्पण के कारण हो पाया है। कि “सफल हुआ अभियान’ (पूर्णिका संग्रह) अब आप और समस्त पूर्णिका कारों और पूर्णिका पाठको के हाथों में यह पुस्तक “सफल हुआ अभियान’ पूर्णिका पहुँच पा रही है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०० ⇒ रवि, कवि और सीसी टीवी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रवि, कवि और सीसी टीवी।)

?अभी अभी # ८०० ⇒ आलेख – रवि, कवि और सीसी टीवी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रवि और कवि की होड़ कोई नयी नहीं। जब रवि अस्त होता है, तब कवि मस्त होता है, चांद पर कविता लिखता है, रात में ही कवि सम्मेलन जवां होता है और संगीतकार रवि ही फिर उसकी धुन बनाते हैं, चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो। रविशंकर का सितार हो या श्रीश्री रविशंकर की सुदर्शन क्रिया, चित्त और मन को आलोकित करती है, कानों में मिश्री घोलती है।

विज्ञान मंगल तक पहुंच जाए, चांद पर चहलकदमी कर आए, लेकिन सूरज पर पांव नहीं धर सकता। इसीलिए कवि भी रवि से पंगा नहीं लेता, सूरज पर नहीं चांद पर ही कविता लिखता है। कवि प्रदीप भी सूरज के बारे में इतना ही कह पाए ;

जगत भर की रोशनी के लिए

करोड़ों की ज़िंदगी के लिए

सूरज रे जलते रहना …

सूरज की रोशनी में, दिनदहाड़े अगर कोई अपराध हो, तो भी सूरज गवाही के लिए नहीं आ सकता। कानून आंख वाला गवाह मांगता है जिसे अंग्रेजी में eye witness कहते हैं। एक कवि जहां उस पर केवल कविता लिखकर दाद बटोर सकता है केवल एक कैमरे की आंख ही उसकी गवाही बन सकती है अगर किसी ने उस घटना को अपने कैमरे में उतार लिया हो।

साइबर क्राइम के चलते तस्वीरें भी आजकल सुरक्षित नहीं रही। तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ के चलते अदालत इन्हें पुख्ता साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। ऐसे में जहां आज तक न कवि पहुंच पाया न रवि, वहां सीसी टीवी ज़रूर पहुंच गया है। हर चौराहे, बगीचे, मकान, बैंक दफ्तर और दुकान में आजकल सीसी टीवी कैमरे लगे है। बेचारे चोरों और अपराधियों की शामत आ गई है।।

पहले लोग कहते थे, भगवान से डरो ! अब भगवान का डर खत्म हो गया। भगवान के सामने अपराध होता है, और वह चुपचाप देखा करता है। वैसे अगर भगवान गवाही देने आ भी जाए तो बिना आधार कार्ड के उसकी नागरिकता तो गई दीये का घी लेने, अदालत कहीं उसे कोई एलियन ही ना समझ बैठे। ऐसी परिस्थिति में केवल सीसी टीवी फुटेज ही एकमात्र गवाही होती है, जो अदालत में मान्य होती है। और अदालत उस फुटेज को बिना गीता की शपथ दिलाए सच मान लेती है।

कवि और रवि की अपनी विवशताएं हैं, मजबूरियां हैं।

कवि कोई समाज सुधारक नहीं। वह सिर्फ तुकबंदी कर सकता है नोटबंदी नहीं। सूरज बेचारा सुबह समय पर आता है, दिन भर ड्यूटी बजाता है, शाम को अस्ताचल में चला जाता है। वह एक ऐसा गवाह है, जिसकी आंखों के सामने, अच्छा बुरा, सब कुछ घटता रहता है, और वह मजबूर, अपनी ही आग में जलता रहता है। वह जगत के कल्याण के लिए प्रकाशित होता है, सबको जीवन देता है, लेकिन उसकी ही रोशनी में जब कु – कृत्य होते हैं, तो वह गुस्से से जल भुन जाता है। ऐसे में केवल सीसी टीवी फुटेज एक आशा की किरण बनकर आता है। लेकिन जब मान्यताएं ही ध्वस्त हो जाएं, तो क्या प्रत्यक्ष और क्या प्रमाण ! कानून की आंख है, कोई संजय की दिव्य दृष्टि नहीं। क्या पता किसको दण्डित कर दे, किसको बरी कर दे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार 

वृक्ष को प्रत्यक्ष देव मानते हुए भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, प्रकृति से जोड़कर अपने सभी पर्व मनाता है। चाहे, होली, नवरात्रि, दशहरा, सावन, कजरी आदि।

नदियों, पहाड़ों, पौधों सभी को जीवंत स्वरूप मानते हुए उन्हें पूजा जाता है। भाव -भक्ति, आस्था, विश्वास हमें पर्यावरण से जोड़ता है।

दशहरे में सोनपत्ता – (कचनार के पत्ते को)

दशहरे (विजयादशमी) पर सोन पत्ते का आदान-प्रदान, सोना बांटने का प्रतीक, यह सुख, वैभव, धन, सौभाग्य और मित्रता को दृढ़ करता है। मान्यता है कि ये पत्ते अक्षय धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

पर्यावरण की चेतना- इससे प्रकृति और पर्यावरण के मध्य समन्वय बनता है। इस दिन नीलकंठ के दर्शन, शिव पूजा जिसमें शमी के पत्ते को भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। यह पेड़ रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी हरा-भरा रहता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसे दशहरे पर पूजा कर संरक्षण की परंपरा है, जिससे लोग पेड़ों को बचाते हैं।

सोना के रूप में पत्तों का आदान-प्रदान प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को दर्शाता है। असली धन प्रकृति ही है। प्रकृति संग उत्सव मनाने से जीवन में उमंग आती है। दशहरा बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। रावण दहन करके हर बार यही संदेश दिया जाता है कि बुराई को मिलकर इसी तरह दहन करना चाहिए। साथ ही हमें ये जनचेतना फैलाना चाहिए कि प्रदूषण, अंधाधुंध वृक्षों को काटना रोकना होगा।

आइए हम संकल्प लें कि दशहरे को पूरे धूमधाम के साथ प्रकृति संरक्षण की ओर अग्रसर होंगे।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९९ ⇒ पैसे का पेड़ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैसे का पेड़।)

?अभी अभी # ७९९ ⇒ आलेख – पैसे का पेड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

|•MONEY PLANT•|

क्या पैसा भी उगाया जा सकता है, इस प्रश्न पर जब पुरुषार्थ और भाग्य में बहस होने लगी तो एक मनी प्लांट बीच बचाव और समझौते के लिए आ गया। पुरुषार्थ का कहना था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते और भाग्य का तर्क था कि घर में अगर मनी प्लांट की एक बेल लगा ली जाए तो घर में पैसा ही पैसा आने लगता है।

मैं पुरुषार्थ में विश्वास रखता हूं, भाग्य में नहीं। मैने अपने 2BHK फ्लैट में आजादी के अमृत महोत्सव एवं अपने ७५ वर्षों के पुरुषार्थ स्वरूप गमलों में कुछ पौधे लगाए, जिनमें एक मनी प्लांट भी शामिल था। अच्छी मिट्टी, हवा पानी के बावजूद बाकी पौधे तो पनप नहीं पाए लेकिन मनी प्लांट तो अमर बेल की तरह फलता फैलता पूरी तरह गैलरी में छा गया। मिलने जुलने वाले मेरी शिकायत पर ध्यान नहीं देते और ना ही बेचारे अन्य मुरझाए पौधे उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पाते। वे तो बस एक ही बात कहते हैं। आपके यहां मनी प्लांट अच्छा फैल रहा है। सुना है, पैसा ही पैसा आता है, जिनके घर मनी प्लांट होता है। ।

और मेरा ध्यान अचानक अखबार की खबरों की उन सुर्खियों पर चला जाता है, जहां कुछ विशिष्ट लोगों के घर से नोटों की फसल बरामद की जाती है। मनी, प्लांट मेरे यहां हो, और पैसा उनके यहां से बरामद हो। बताइए, किसका पुरुषार्थ और किसका भाग्य।

किशोर कुमार का पुरानी फिल्म मुसाफिर(1957) का एक बड़ा प्यारा गीत है, मुन्ना बड़ा प्यारा, जिसके अंतरे के बोल कुछ इस तरह हैं ;

क्यों न रोटियों का

पेड़ हम लगा लें !

आम तोड़ें, रोटी तोड़ें,

रोटी आम खा लें .. ;

बच्चा तो खैर अबोध होता है, फिर भी उसकी ख्वाहिश रोटी से आगे नहीं बढ़ पाती। बड़ा होकर वह भी समझ जाता है रोटियों के पेड़ नहीं लगा करते और हम पढ़े लिखे घरों में मनी प्लांट लगाकर खुश हैं जिनमें न कोई फूल है ना फल और ना ही खुशबू और ना ही कभी हमारे यहां छापा पड़ा और ना ही अखबार में हमारे मनी प्लांट की तस्वीर छपी। आखिर इंसान ऐसा कौन सा मनी घर में प्लांट करता है कि छापे में दो हजार की चिप वाली नोटों की गड्डियों का पहाड़ निकल आता है।

सुना है जिन आलीशान बंगलों के लंबे चौड़े बगीचे में कैप्टस गार्डन लगाया जाता है, वहीं उनकी अलमारियों, तिजोरियों और शयन कक्षों में पाप की कमाई के बीज पनप रहे होते हैं। असली मनी तो वहां प्लांट किया गया होता है। इससे तो अच्छा होता वहां रोटियां रखी होती। कम से कम छापे में बरामद रोटियां गरीबों में तो बांट दी जाती।।

इन छापों से जो कथित काली कमाई बरामद होती है, वह कोई खैरात नहीं और ना ही बेचारे गरीबों की मेहनत के पसीने की खरी कमाई, जो मुफ्त में ही बांट दी जाए। उसकी भी कानूनी प्रक्रिया होती है, जो बड़ी पेचीदा होती है। कोर्ट में केस सालों चला करते हैं। जनता सब भूल जाती है।

मेरे आज तक के पुरुषार्थ का फल बस यही हरा भरा मनी प्लांट है जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं। मनी प्लांट में वह खुशबू कहां, जो इनकम टैक्स और ED वालों को अपनी ओर आकर्षित करे। मेहनत के पसीने से सींचा गया मनी प्लांट भले ही पैसा ना उगाए, दो वक्त की रोटी और चैन की नींद तो मयस्सर करा ही देता है।

मनी प्लांट पैसा नहीं उगाता, लेकिन सबसे बड़ा धन, संतोष धन, तो वह देता ही है और शायद इसीलिए उसे मनी प्लांट कहा जाता है।।

आज तक किसी अखबार में नहीं पढ़ा कि किसी वरिष्ठ नागरिक के घर से डेढ़ सौ मनी प्लांट बरामद हुए, जो नोटों से लदे हुए थे। पैसे पेड़ पर नहीं उगते और ना ही आम की तरह रोटियां किसी पेड़ की डालियों पर नज़र आती ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७५ ☆

?  आलेख – बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(1 अक्टूबर वरिष्ठ नागरिक दिवस पर विशेष)

पहली अक्टूबर का दिन पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन समाज की उस अनमोल धरोहर को समर्पित है, जिनके अनुभव और मार्गदर्शन के बिना हमारा वर्तमान और भविष्य अधूरा है अर्थात हमारे वरिष्ठ नागरिक। संयुक्त राष्ट्र द्वारा सन् 1991 में इस दिवस की शुरुआत का प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार, उपेक्षा और उनकी चुनौतियों के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाना था। प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाने वाला यह दिवस हमें याद दिलाता है कि वृद्धावस्था में गरिमामय जीवन हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।

इस वर्ष के थीम का भाव है.. निर्णय में बुजुर्गों का समावेश

आज हमारे वरिष्ठजन अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जैसे कि जोड़ों का दर्द, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और इनके उपचार का भारी खर्च,  चिंता का विषय है। सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा की भावना और बढ़ती महंगाई उनके जीवन को और कठिन बना देती है। इन सबसे बढ़कर, आधुनिक जीवनशैली में बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में पलायन और जीवनसाथी के निधन के बाद का अकेलापन सबसे गहरी पीड़ा का कारण बन गया है। इसके अलावा, डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रही तकनीकी खाई भी उनके लिए दैनिक कार्यों को चुनौतीपूर्ण बना देती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।

परिवार के सदस्यों का बुजुर्गों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनना और उनके अनुभवों का सम्मान करना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।

वरिष्ठ नागरिक क्लब, सामुदायिक केंद्र, योग शिविर, और हॉबी कक्षाएं ऐसे मंच हैं जहां वे अपने साथियों के साथ जुड़ सकते हैं। यह सामाजिक अलगाव को तोड़ने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकता है।

प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, अटल पेंशन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उनका लाभ उठाना बुजुर्गों की आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को कम करेगा।

एक रोचक पहलू बाजार की मानसिकता में आया बदलाव है। आजकल, चाय, दूध, बिस्कुट, दवाओं जैसे उत्पादों के विज्ञापनों में बुजुर्गों की छवि का बढ़ता उपयोग देखा जा सकता है। यह परिवर्तन इस ओर इशारा करता है कि विपणन जगत अब बुजुर्गों को विश्वसनीयता, पारंपरिक मूल्यों और ईमानदारी का प्रतीक मानने लगा है। उदाहरण के लिए, ‘फैमिलिंक’ जैसे उत्पाद, जो एक डिजिटल फोटो फ्रेम है, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है ताकि वे आसानी से अपने परिवार की तस्वीरें देख सकें। यह दर्शाता है कि अब उत्पाद डिजाइनिंग में भी बुजुर्गों की विशिष्ट आवश्यकताओं पर विचार किया जाने लगा है।

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला दिन है। यह दिन हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि क्या हम अपने समाज के बुजुर्ग सदस्यों को वह सम्मान, सुरक्षा और स्नेह दे पा रहे हैं जिसके वह हकदार हैं। एक जिम्मेदार नागरिक और समाज के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि हम उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को समृद्ध, सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। आखिरकार, उन्होंने ही वह नींव रखी है, जिस पर हमारा वर्तमान और भविष्य टिका है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९८ ⇒ भैंस के आगे बीन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भैंस के आगे बीन।)

?अभी अभी # ७९८ ⇒ आलेख – भैंस के आगे बीन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बीन एक वाद्य यंत्र है कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अगर दुधारू पशुओं को संगीत सुनाया जाए, तो वे अधिक दूध देते हैं। फिर भी विशेषज्ञ हमें भैंस के आगे बीन बजाने से रोकते हैं, कहते हैं, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। भैंस तो दूध देने से रही, कहीं बीन की धुन सुन कोई नागिन प्रकट ना हो जाए, क्योंकि कल्याणजी आनंद जी के बाद बीन पर केवल नागिन का ही तो कॉपीराइट हैं। वैसे भी मन डोले, मेरा तन डोले, पर भैंस का नागिन डांस, एक हास्यास्पद कल्पना ही हो सकती है, कोई रियलिटी शो नहीं।

भैंस के बारे में हमारे कई पूर्वाग्रह हैं। अगर कबीर ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाले को पंडित मानते हैं, तो हम निरक्षर के बारे में यह घोषणा कर देते हैं, कि उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। एक छोटा सा अक्षर जिसका कभी क्षरण नहीं होता, उसकी तुलना किसी विशालकाय भैंस से करना, क्या अक्षर का अपमान नहीं। बेचारी भैंस का क्या वह तो वैसे ही बदनाम है। उसके आगे आप चाहे बीन बजाओ अथवा राग भैरवी गाओ।।

मैंने केवल बचपन में मां का दूध पीया है, उसके बाद आज तारीख तक मेरा पालन पोषण भैंस के दूध पर ही हुआ है, फिर चाहे वह बंदी के दूधवाले का पानी मिला दूध हो अथवा अमूल और सांची का फैट युक्त गोल्डब्रांड भैंस का दूध। मुझे दूध पर भी भरोसा है, और अपनी अक्ल पर भी। लेकिन जब किसी को यह कहते सुनता हूं कि अक्ल बड़ी या भैंस, तो मुझे तो भैंस ही बड़ी लगती है, क्योंकि उसी के दूध से मुझमें बुद्धि और प्रज्ञा का विकास हुआ है। मैं अपना अपमान सह सकता हूं, लेकिन भैंस का नहीं।

आखिर भैंस के प्रति इतना दुराग्रह क्यों। द्वापर युग में गोवर्धन धारी भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन की कुंज गलियों में गोप गोपियों सहित रास रचाया, छोटी छोटी गैया और छोटे से गोपाल को कौन भूल सकता है। बालकृष्ण की बंसी की तान पर क्या गऊ और क्या ग्वाल, सब दौड़ पड़ते थे, लेकिन बस बेचारी भैंस का ही कहीं वर्णन देखने/सुनने में नहीं आया।।

गाय तो वैसे भी हमारी माता है, लेकिन भैंस को तो मौसी का दर्जा भी नहीं मिल पाया। धन्यभाग बिल्ली के, जो वह शेर की मौसी तो कहलाती है। आज भी रसोई में पहली रोटी गाय की ही होती है, भैंस की नहीं। कितना आदर सम्मान गाय को, उसके लिए गोशाला, और भैंस के लिए तबेला। पूर्वजों के निमित्त गऊ ग्रास और भैंस को सिर्फ घास।

कोई स्वर्गवासी, कोई परलोकवासी तो कोई गोलोकवासी और बेबस, बेचारी भैंस लेती रहती उबासी।

भैंस पर किसी को कोई यकीन नहीं, भरोसा नहीं। लो गई भैंस पानी में और जब भी भरोसा किया, भरोसे की भैंस ने हमेशा पाड़ा ही जना।

मैं अच्छी तरह से जानता हूं, भैंस की तारीफ में कितने भी कसीदे काढ़ लूं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना। लगता है मेरी बुद्धि ही घास चरने गई थी, जो मैं भैंस का गुणगान कर बैठा। किसी ने सच ही कहा है, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९७ ⇒ सपने अपने अपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने अपने अपने।)

?अभी अभी # ७९७ ⇒ आलेख – सपने अपने अपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सपने तो सपने, कब हुए अपने ! यह भी क्या बात हुई ? अपने ही सपने, अपने नहीं होंगे, तो किसके होंगे। अमीर आदमी के तो सभी सपने सच हो जाते हैं, उसकी आँखों की नींद गायब हो जाती है। अब सपने आएँ भी तो कैसे, और अगर आ भी गए तो वापस ग़रीबी के आने से तो रहे।

ग़रीब का सपनों पर जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे, कम से कम, सपने देखने से तो कोई नहीं रोक सकता। उसकी हालत तो यह है कि अगर वह आँखें खोल, जीवन की कड़वी सच्चाई से रूबरू होना चाहे, तो सियासत उसे फिर सपने दिखाना शुरू कर देती है। बहुत देख लिए उसने, खुली आँखों से, समाजवाद और गरीबी हटाओ के सपने। अब अच्छे दिनों के सपने देखने के लिए उसके पास वक्त नहीं।।

जिनका यथार्थ कड़वा होता है, वे मीठे सपनों से ही काम चला लेते हैं। जो व्यावहारिक, सकारात्मक सोच और पुरुषार्थी लोग होते हैं, वे सपने देखने में नहीं, सपनों को सच करने में यक़ीन रखते हैं। फिर चाहे वह ओलिंपिक में गोल्ड मेडल का सपना हो, या कौन बनेगा करोड़पति की हॉट सीट पर अमित जी से हाथ मिलाने का।

सपने देखना आपका, (सं)वैधानिक अधिकार है। आप जैसे चाहें सपने देखें, अच्छे-बुरे, शालीन -अशालीन, अहिंसावादी-आतंकवादी, कोई आपको नहीं रोक सकता। यह आपका निजी और अंदर का मामला है। लक्स अंडरवियर से सभी अधिक अंदरूनी।।

फिल्मों को सपनों से बहुत प्रेम है। बहारों के सपने, शहर और सपना तो ठीक, बेचारी स्वप्नसुंदरी पर भी फ़िल्म बना डाली, ड्रीमगर्ल ! आम आदमी को सिर्फ़ चार आने में सच्चाई से सपनों के संसार में ले जाने का दायित्व हमारी फिल्में पिछले कई सालों से बखूबी निभाती चली आ रही है। अब तो अपनी हथेलियों में, जहाँ कभी कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मूले सरस्वती का वास था, वहाँ आज एक स्मार्ट फ़ोन सभी सपनों को साकार कर रहा है। अब लोग सपने नहीं देखते, हर चीज़ लाइव देखते हैं, अपने घरों में, बैडरूम में, ड्रॉइंग रूम में, कभी अकेले में, तो कभी सपरिवार।

आप इसे आधी हक़ीक़त और आधा फसाना भी कह सकते हैं। हम खुश हैं, जो मिला उसमें भी, जी न मिला उसमें भी। सपने देखना हम नहीं छोड़ेंगे। अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ – आलेख – महाआरती ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख महाआरती ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ ☆

🌻आलेख🌻 🪔महाआरती 🪔

समय के साथ सब बदल जाता है। नही बदलता तो सिर्फ बड़े – छोटे, अमीरी – गरीबी, छल-छलावा, ऊँच- नीच, जात – पात।

मान सम्मान तो पलक झपकते ही बदल जाते हैं। ऊँचे भव्य पंडाल में महाआरती का आयोजन।

यदि कोई समान्य आमजन का पंडाल बना जिसमें मध्यमवर्गीय परिवार है। वो महाआरती के विशेष आयोजन को करने अपने से बड़ों को बुलाते हैं, परन्तु वही महाआरती जब कुछ उच्च वर्ग और अमीर पंडाल है तो  मध्यमवर्गीय को आरती दूर से देखने को मिलता है, परन्तु उतारा करके ग्रह दोष शांत कर भंडारा खिलाते उन्हें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को पंक्तियां बनवा देते हैं। और सभी लाईन लगकर भंडारा लेते भी है क्योंकि उन्हें वह बड़े आदमियों का प्रसाद वितरण लगता है।

माँ के आँचल में क्या अमीर क्या गरीब? पर हाय रे माया जीवन को सार्थक बनाने के लिए महाआरती करने के लिए पैसा और हैसियत दोनों का होना कितना जरुरी है।

जगजननी आज भी मोहनी रुप धारण करने का समय आ गया है। जहाँ पर पाप, बड़े अमीर, हैसियत, और बड़े रुदबे रुपी दानव से बचाकर संस्कार, सादगी, सहजता भावों को अमर करना होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४९ – देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४९ ☆ देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

नब्बे के दशक तक ” छाता बनवा लो” जैसे शब्द कान में सुनाई दिया करते थे। अब तो ये शब्द सुने हुए एक लंबा अंतराल हो चुका हैं। पहले पैदल चलते हुए कांधे पर बड़े से झोले में अपनी पूरी दुकान को समेट कर द्वार द्वार से कारीगर अपनी सेवाएं देते थे।

आश्चर्य तो तब होता था, भरी बरसात में ये लोग स्वयं छाता वहन नहीं कर पाते थे। हमारे यहां गरीबी का ये अलाम है, दूध विक्रेता स्वयं दूध नहीं पी पाता हैं।

बाद के वर्षों में ये छाता सुधारक पुरानी साइकिल से गली कूचे पहुंच कर सेवा देने लगे थे। समय ने करवट ली, लोगों का रहन सहन, सुविधा जनक हुआ, लोग छत वाली कार में घूमने लगें। छाते का उपयोग ही कम हो गया, बाइक और स्कूटर वाले भी छाते का उपयोग कर पाने में असहज हैं। गरीब लोग तो प्रिपोपलाइन के पुराने बोरे से वर्षा ऋतु में काम चला लेते हैं।

हमने तो बचपन से लेकर आजतक भी काले रंग का जेब्रा ब्रांड का छाता ही उपयोग किया हैं। दुनिया तो अब रंगीन छातों की हो चुकी हैं। हमारे पिताश्री वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छाते को धूप में अच्छे से सुखाकर और उसके अंदर लगी हुई धातु की डांडियों पर तेल लगाने के बाद ही रखते थे, ताकि उस में जंग आदि ना लगे। अब तो हर वर्ष नया खरीदने का रिवाज़ बन चुका हैं।

मुम्बई जैसे शहर जहां वर्षा तो अधिक होती ही है, लोग पैदल भी खूब चलते है, छाते अभी भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते हैं। वहां इसकी मरम्मत का कार्य अधिकतर मोची ही कर लेते हैं।

चीन देश से सस्ते और घटिया छातों ने इन कारीगरों की रोजी रोटी छीन ली हैं। “उपयोग और फेंको ” पद्धति ने कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ी ही है, साथ ही साथ रिपेयर जैसे छोटे काम करने वाली क़ौम का प्रायः खात्मा ही कर दिया हैं।

ये कारीगर भी सीजनल कार्य की कर पाते थे। जून के अंत से सितंबर माह की समाप्ति तक ही इनकी आवश्यकता रहती हैं। अब सितंबर माह भी समाप्त हो रहा है, हम भी अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९६ ⇒ दिल की नज़र से ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिल की नज़र से।)

?अभी अभी # ७९६  ⇒ आलेख – दिल की नज़र से ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिल तो हम सबका एक ही है, लेकिन अफसाने हजार !

आँखें तो सिर्फ दो ही हैं, लेकिन ये नज़र कहां नहीं जाती। आपने सुना नहीं, जाइए आप कहां जाएंगे, ये नजर लौट के फिर आएगी। आँखों का काम देखना है, और दिल का काम धड़कना। आँखों में जब नींद भर जाती हैं, वे देखना बंद कर देती हैं, और इंसान बंद आंखों से ही सपने देखना शुरू कर देता है, लेकिन बेचारे दिल को, चैन कहां आराम कहां, उसे तो हर पल, धक धक, धड़कना ही है।

ऐसा क्या है इस दिल में, और इन आँखों में, कि जब मरीज किसी डॉक्टर के पास जाता है, तो वह पहले कलाई थाम लेता है और बाद में उसके यंत्र से दिल की धड़कन भी जांच परख लेता है। और उसके बाद नंबर आता है, आंखों का। आंखों में नींद और ख्वाब के अलावा भी बहुत कुछ होता है। बुखार में आँखें जल सकती हैं, आँखों में कंजक्टिवाइटिस भी हो सकता है। शुभ शुभ बोलें। ।

दिल जिसे चाहता है, उसे अपनी आंखों में बसा लेता है, और फिर शिकायत करता है, मेरी आंखों में बस गया कोई रे, हाय मैं क्या करूं। अक्सर दिल के टूटने की शिकायत आती है, और दिल के घायल होने की भी। जब कोई नजरों के तीर कस कस कर मारेगा, तो दिल को घायल तो होना ही है।

ईश्वर ने हमारा हृदय बड़ा विशाल बनाया है शायद इसीलिए कुछ लोग दरियादिल होते हैं। आप दिल में चाहें तो एक मूरत बिठा लें, और अगर यह दिल पसीज जाए तो दुनिया के सभी दुख दर्द इसमें समा जाएं। ।

हमारी आंखों ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेलीं ! बसो मेरे नयनन में नंदलाल ! मोहिनी मूरत, सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल। किसी को आंखों में बसाने के लिए पहले आंखों को बंद करना होता है। बाहरी नजर तो खैर कमाल करती ही है, एक अंतर्दृष्टि भी होती है, जो नेत्रहीन, लेकिन प्रज्ञाचक्षु भक्त सूरदास के पास मौजूद थी। कितना विशाल है हमारी अंतर्दृष्टि का संसार।

लेकिन इस जगत के नजारे भी कम आकर्षक नहीं ! नजरों ने प्यार भेजा, दिल ने सलाम भेजा और नौबत यहां तक आ गई कि ;

मुझे दिल में बंद कर दो

दरिया में फेंक दो चाबी।

यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया। लेकिन यह तो कुछ भी नहीं, और देखिए ;

आँखों से जो उतरी है दिल में

तस्वीर है एक अन्जाने की।

खुद ढूंढ रही है शमा जिसे

क्या बात है उस परवाने की। ।

जरूर आँखों और दिल के बीच कोई हॉटलाइन है।

ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कोई चीज आपको पसंद आए, और उसके लिए आपका मन ना ललचाए। ये दिल का शब्द भंडार भी कम नहीं। जी, कहें, जिया कहें अथवा जिगर कहें। आपने सुना नहीं, नजर के सामने, जिगर के पास।

नज़ारे हम आँखों से देखते हैं, और खुश यह दिल होता है। गौर फरमाइए ;

समा है सुहाना, सुहाना

नशे में जहां है।

किसी को किसी की

खबर ही कहां है।

………..

नजर बोलती है

दिल बेजुबां है। ।

आजकल हम दिल की बात किसी को नहीं कहते। आप भी शायद हमसे असहमत हों, लेकिन नजर वो, जो दुश्मन पे भी मेहरबां हो। जिन आंखों में दर्द नहीं, दिल में रहम नहीं, तो हम क्यों बातें करें रहमत की, इंसानियत की।

शैलेंद्र ने सच ही कहा है ;

दिल की नजर से

नजरों के दिल से

ये बात क्या है

ये राज़ क्या है

कोई हमें बता दे। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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