हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९४ ☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९४ ☆

☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆

‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/   ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/ ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त  पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।

रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।

‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।

भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’

सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।

दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा  जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।

महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों,  नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।

संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और  आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके  अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।

काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय  गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।

वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।

तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९४ ⇒ काग के भाग ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काग के भाग।)

?अभी अभी # ७९४ ⇒ आलेख – काग के भाग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अभी काग के भाव बढ़े हुए हैं! पीतल भले ही कभी सोने के भाव न बिके, पितृ-पक्ष में कोयल पीतल है, और कौआ सोना। भक्त और विभक्त में अंतर देखिये! यूँ तो कहने को दोनों ही कवि हैं। लेकिन एक कितना सकारात्मक और एक कितना नकारात्मक।

एक भक्त कवि रसखान हुए हैं, जो कहते हैं –

काग के भाग बड़े सजनी,

हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी!

और अब एक कलयुगी कवि को देखिये –

कौआ कोयल दोनों काले

पर दोनों के काम निराले।

कांव कांव कौआ करता है

गंदी जगह पेट भरता है

कोयल कू कू बहुत सुहाती

डाल डाल पर वह है गाती।।

सौ दिन कोयल के! लेकिन एक दिन काग का भी होता है, जब हमें डाल पर कोयल की नहीं, काग की तलाश होती है। रसखान की भी उस काग में वही श्रद्धा है, जो हमारी श्राद्ध पक्ष में कौए के लिए होती है। एक का काग हरि के हाथ की रोटी ले जाता है, और दूसरे का काग खीर पूड़ी पर हाथ साफ करता है।

श्रद्धा और भक्ति दोनों में तर्क नहीं चलता! इनके अलावा एक अंध-विश्वास भी होता है ;

भोर होते कागा पुकारे काहे राम!

कौन परदेसी आएगा मोरे धाम।

और देखिये ;

मोरी अटरिया पे कागा बोले

मोरा जीया डोले

कोई आ रहा है।

उधर डाल पर कोई कौआ बोला, इधर किसी मेहमान के आने का अंदेशा हुआ। यानी जब डाकिया और एसएमएस नहीं था, तब कबूतर संदेश ले जाते थे, और कौआ मैसेज पढ़कर सुनाता था।

काँव काँव! Somebody is coming at your place.

लो जी रसखान और हमने तो काग को गुणों की खान साबित कर दिया। अब एक दो अवगुण तो सबमें होते ही हैं जी। फिर भी जब देखो तब कोयल का गुणगान। आप अगर काक-भुशुण्डि की कथा और पढ़ लें, तो रसखान से पूरी तरह सहमत होंगे कि वाकई काग के बड़े भाग हैं।

जब शंकर जी पार्वती जी को राम कथा सुनाते हैं, तो एक काग महाराज वह कथा सुन लेते हैं, और उनका ही जन्म काक-भुशुण्डि के नाम से होता है। अब सुबह -सुबह पूरा शिव-पुराण तो नहीं बाँचा जाता न! आपके भी बड़े भाग, जो आज काग-महात्म्य आपके कानों तक पड़ा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५९ ☆ आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५९ ☆ आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व…

*

मातु स्वरूप लगे मनभावन, ज्योति जले जग ज्योतित जंगम।

सिंह विराजत आप कृपामय, दिव्य सुहावन आगम संगम।।

रूप अलौकिक पावन मंगल, फैल रही मन मोह तरंगम।

भक्त खड़े दरबार निहारत, अष्टभुजा वरदान विहंगम।।

(किरीट सवैया)

*

मैया का अष्टभुजा स्वरूप, लाल चुनरिया, सिंह सवारी मनमोहक लगता है। हर त्योहार की तरह इसमें भी पर्यावरण की रक्षा का संदेश जौ बोने और उसे 9 दिनों तक उगते हुए देखना।

जौ को प्रथम अन्न मानते हैं, इसे मिट्टी के बर्तन में नवरात्रि के दिन मैया का स्वरूप मानकर बोया जाता है। दो- तीन दिनों में इसमें अंकुरण होता है और हरे रंग की पत्तियों के शुभ दर्शन होते हैं।

*

पूरी तरह हरा- सुख समृद्धि

आधा हरा आधा पीला- मिलाजुला असर

ऊँचाई तक स्वस्थ्य पौध- विजय/ जीत का प्रतीक है।

*

मंदिर में पुजारी जी और घरों में बड़े बुजुर्ग इसे विधि विधान के साथ बोते हैं। नवमीं के दिन कलश विसर्जन के बाद इन जवारों को भक्त अपने शुभ स्थानों में रखते हैं। इसे सुख शांति, वैभव का प्रतीक माना जाता है।

आस्थावान बनने के साथ ही पर्यावरण के हितैषी भी बनें, श्रद्धा और विश्वास के साथ जो भी कार्य होगा वो फलदायक होता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ “स्वास्थ्य आधी आबादी का…” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे ☆

डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे

परिचय 

शिक्षा – एम.एस.सी. होम साइंस, पी- एच.डी.

पद : प्राचार्य,सी.पी.गर्ल्स (चंचलबाई महिला) कॉलेज, जबलपुर, म. प्र. 

विशेष – 

  • 39 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव। *अनेक महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के अध्ययन मंडल में सदस्य ।
  • लगभग 62 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण।
  • इंडियन साइंस कांग्रेस मैसूर सन 2016 में प्रस्तुत शोध-पत्र को सम्मानित किया गया।
  • अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान शोध केंद्र इटली में 1999 में शोध से संबंधित मार्गदर्शन प्राप्त किया। 
  • अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एनकरेज’ ‘अलास्का’ अमेरिका 2010 में प्रस्तुत शोध पत्र अत्यंत सराहा गया।
  • एन.एस.एस.में लगभग 12 वर्षों तक प्रमुख के रूप में कार्य किया।
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक काउंसलर ।
  • आकाशवाणी से चिंतन एवं वार्ताओं का प्रसारण।
  • लगभग 110 से अधिक आलेख, संस्मरण एवं कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

 प्रकाशित पुस्तकें- 1.दृष्टिकोण (सम्पादन) 2 माँ फिट तो बच्चे हिट 3.संचार ज्ञान (पाठ्य पुस्तक-स्नातक स्तर)

☆ “स्वास्थ्य आधी आबादी का…” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे 

(सेवा पखवाड़ा पर विशेष)

इस समय देशभर में 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक “सेवा पखवाड़ा” मनाने का सरकारी ऐलान हुआ है, जिसमें आधी आबादी को ध्यान रखकर ‘स्वस्थ नारी : सशक्त परिवार’ अभियान चलाया जा रहा हैl इस पुनीत यज्ञ में शैक्षणिक संस्था के साथ साथ अन्य सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं को जोड़ने का प्रयास किया गया हैl

आज आजादी के 78 वर्ष पूर्ण होने के बाबजूद स्त्री शिक्षा पर निरंतर बल देने एवं महिला सशक्तिकरण का नारा गुंजायमान करने के बावजूद भी आधी आबादी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैl वस्तुतः ‘स्वास्थ्य’ शब्द का तात्पर्य स्वास्थ्य के विभिन्न आयाम से होता है जिसके अंतर्गत शारीरिक स्वास्थ्य के अतिरिक्त मानसिक, सामाजिक बौद्धिक आदि क्षेत्र आते हैं किंतु सभी प्रकार का स्वास्थ्य का आधार कहीं न कहीं से शारीरिक स्वास्थ्य से आकर जुड़ता हैl कहा भी जाता है “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता हैl “

किसी भी राष्ट्र का स्वास्थ्य स्तर जहां पारिवारिक स्वास्थ्य स्तर पर निर्भर करता है वहीं परिवार का स्वास्थ्य काफी हद तक महिलाओं के स्वास्थ्य पर निर्भर करता हैl यह अत्यंत आश्चर्यजनकऔर पीड़ादायक पहलू है कि जिस देश में नारी को देवी स्वरूपा माना जाता है जहाँ “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” की बात कही जाती है वहीं बालिकाओं और महिलाओं का स्वास्थ्य अत्यंत चिंतनीय हैl एन.एफ.एच.एस.5 के 2019 से 21 के के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष के बीच की 57.3% महिलाएं एनीमिक (खून की कमी ) हैंl 24% मोटापे से एवं बड़ी संख्या में उच्च रक्त चाप, डायबिटिज़, थॉयराइड से संबंधित समस्या से ग्रसित हैंl दुखद बात यह है कि 2015-16 के बाद कुपोषण से जूझती महिलाओं की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ हैl हालांकि कि संस्थागत प्रसव  से मातृ- शिशु मृत्यु दर में कुछ कमी आई हैl

एशिया में भारतीय महिलाओं में स्तन और सर्वाइकल (गर्भाशय ग्रीवा) कैंसर के मामले सर्वाधिक हैंl दुनिया भर में सर्वाइकल कैंसर से जिन 40% महिलाओं की मृत्यु होती है उनमें से 20 से 23 प्रतिशत भारतीय महिलाएं हैंl मीनूपाज़ के बाद ओस्टियोपोरोसिस होना भी सामान्य रूप से देखा जाता हैl

ज्वलंत प्रश्न यह है कि विश्व में खाद्यान्न उत्पादन में दूसरा स्थान रखने वाला भारतवर्ष जहाँ 81.35 करोड़ जनता को 5 किलो मुफ्त अनाज बांटा जा रहा है, वहां 2023 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत वर्ष 125 देश में 111वें स्थान पर क्यों और कैसे खड़ा है? आंकड़ों के अनुसार 74% आबादी स्वस्थ आहार खरीदने में असमर्थ हैंl बड़ी संख्या में बालिकाएँ और महिलाएं कुपोषण की शिकार हैंl कुपोषित माताएं कुपोषित शिशुओं को जन्म देती हैं और परिणामस्वरूप पीड़ियों तक कुपोषण का चक्र चलता रहता हैl

राष्ट्र का स्वास्थ्य स्तर सुधारने  परिवार की धुरी में स्थित स्त्री के उच्च स्वास्थ्य स्तर पर ध्यान देना आवश्यक हैl महिला स्वास्थ्य स्तर को सुधारने संतुलित आहार स्वच्छता व्यक्तिगत आरोग्य पर ध्यान देना होगाl बालिकाओं एवं  महिलाओं में मासिक धर्म में होने वाले खून एवं पोषक तत्वों जैसे आयरन, केलशियम, प्रोटीन आदि की कमी दूर करने विशेष आहार का प्रबंध कर आवश्यकता की पूर्ति करना आवश्यक हैl महिला सशक्तिकरण के इस दौर में महिलाओं को इस हेतु शिक्षित और जागृत करना जरूरी है साथ ही बदलते परिवेश में अवांछित रूढ़िवादी धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से भी उन्हें मुक्त कराना होगाl जिससे सृष्टि के सृजन को गोद में पालने वाली महिला सशक्त होकर राष्ट्र विकास में अपना योगदान दे सकेl

इस सेवा-पखवाड़ा में ‘विकसित भारत और महिला स्वास्थ्य‘ अभियान में प्रयास का दायित्व हमारा भी होना ही चाहिएl

© डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे 

प्राचार्य, चंचलाबाई पटेल महिला महाविद्यालय, जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९३ ⇒ सुदामा चरित्र ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुदामा चरित्र।)

?अभी अभी # ७९३ ⇒ आलेख – सुदामा चरित्र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुदामा भगवान कृष्ण के बचपन के सखा थे। वे श्री कृष्ण के अनन्य भक्त तो थे ही लेकिन कुछ कथा वाचकों और भजन गायकों ने उनके साथ गरीब ब्राह्मण का विशेषण भी लगा दिया। कृष्ण और सुदामा की कहानी सिर्फ एक अमीर और गरीब मित्र की दास्तान बनकर रह गई। आज भी हर सुदामा यही चाहता है उसे भी जीवन में कोई श्री कृष्ण जैसा सखा, मित्र अथवा दोस्त मिले।

सांसारिक मित्रता में दोस्ती तक तो ठीक है लेकिन किसी अमीर मित्र के प्रति सुदामा की तरह भक्ति भाव अथवा अनन्य भाव का होना बड़ा मुश्किल है। हमने तो मित्रता की एक ही परिभाषा बना रखी है सच्चा दोस्त वही जो मुसीबत में काम आए।।

सुदामा चरित, कवि नरोत्तमदास द्वारा ब्रज भाषा में लिखा गया एक काव्य ग्रंथ है. इसमें निर्धन ब्राह्मण सुदामा की कहानी है, जो भगवान कृष्ण के बचपन के मित्र थे. सुदामा की कहानी श्रीमद् भागवत महापुराण में भी मिलती है।

आज की सांसारिक परिभाषा में सुदामा दीनता, निर्धनता, साधुता और सरलता का प्रतीक है। सुदामा के सखा श्रीकृष्ण की ऊंचाइयों तक तो खैर यह इंसान कभी पहुंच ही नहीं सकता, केवल उनके

गुणगान कर, भक्ति भाव में आकंठ डूब, शरणागत हो सकता है।।

मेरे शहर में शिक्षक कल्याण संघ ने पहले एक गृह निर्माण संस्था बनाई और फिर शिक्षकों के लिए सुदामा नगर का निर्माण शुरू हो गया। सरकार भी इन शिक्षकों पर मेहरबान हुई और सस्ते दर पर इन्हें जमीन उपलब्ध करा दी गई और जल्द ही इस सुदामा नगर का नाम एशिया की सबसे बड़ी अवैध कॉलोनी के रूप में विख्यात हो गया।

वैसे तो हर भक्त पर द्वारकाधीश मेहरबान होते हैं, लेकिन जब उनके मित्र सुदामा की बारी आती है तब तो वे कुछ खास ही मेहरबान हो ही जाते हैं। आज की तारीख में सुदामा नगर एक सुव्यवस्थित, सुविधा संपन्न कॉलोनी है, जहां किसी तरह का अभाव नहीं। आपको लगेगा आप मानो कृष्ण की द्वारिका में ही आ गए हैं। सुदामा नगर के बढ़ते प्रभाव के कारण पास की फूटी कोठी के भी भाग जाग गए, वह पुखराज कोठी हो गई।

और हमारे ठाकुर जी अपने परम मित्र सुदामा को तो महल में रखते हैं और खुद बालस्वरूप में मथुरा, वृंदावन गोकुल, नंदगांव और मथुरा में बाल लीलाएं करते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं, और बांसुरी बजाते हैं।

आज के कलयुग में भी अगर आपको कृष्ण और सुदामा की लीला देखना हो तो कभी सुदामा नगर चले जाएं, वहां आपको दिव्यता और भव्यता के ही दर्शन होंगे। उसी सुदामा नगर के आसपास एक द्वारकापुरी कॉलोनी भी है, जो सुदामानगर की तुलना में बहुत छोटी है। उस कृपानिधान की लीला ही कुछ ऐसी है। उसका बस चले तो अपने भक्त पर तीनों लोक वार दे। सुदामा नगर बनाना आसान है, सुदामा बनना नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३६ ☆ आलेख – राजभाषा – केंद्र, राज्य व देश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “राजभाषा – केंद्र, राज्य व देश“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३६ ☆

✍ आलेख – राजभाषा – केंद्र, राज्य व देश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हमने हाल ही में वर्ष 2025 का हिंदी दिवस मनाया है अर्थात् 14 सितंबर। वैसे तो पूरे सितंबार माह में केंद्र सरकार के कार्यालयों में राजभाषा सप्ताह, राजभाषा माह मनाए जाते हैं, चाहे वे कार्यालय किसी भी राज्य में स्थित हों। यह सब जानते हैं कि भारत के आजाद होने पर संविधान बना और संविधान में हिंदी को भारत संघ की राजभाषा बनाया गया यानी केंद्र सरकार के कामकाज को हिंदी में करने का निर्णय लिया गया लेकिन यह भी निर्णय लिया गया कि संविधान लागू होने के बाद पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी में ही कामकाज किया जाता रहेगा और पंद्रह वर्ष बाद संसद अंग्रंजी भाषा को जारी रखने, न रखने या अंकों के स्वरूप के इस्तेमाल में परिवर्तन करने के बारे में कानून बनाएगी। कानून बना भी 1963 में यानी पंद्रह साल की अवधि समाप्त होने से पहले ही और यह निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार के कामकाज के हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी का प्रयोग अनिश्चित काल तक होता रहेगा। लेकिन राजभाषा तो हिंदी ही रही, अंग्रेजी नहीं। इन सब बातों को बहुत बार दोहराया जा चुका है और सभी जानते भी हैं। संभवतः यह भी समझते हैं कि संविधान में हिंदी भले ही राजभाषा हो परंतु काम अंग्रेजी में ही करना है।

परंतु, मैं आज कुछ और कहना चाहता हूँ, जिसके बारे में कभी कोई बात नहीं होती जबकि होनी चाहिए, क्योंकि भारत संघ का भौगोलिक  अस्तित्व भारत के राज्य हैं, जिनकी अपनी राजभाषा और अपने-अपने राजभाषा अधिनियम भी हैं। कारण यह है कि संविधान के अनुच्छेद 345 में प्रत्येक राज्य सरकार को अपने राज्य की एक या अनेक या हिंदी को राज्य की राजभाषा के रूप में अंगीकार करना होगा और जब तक राज्य का विधान मंडल अपनी भाषा के बारे में कानून पारित नहीं करता तब तक अंग्रेजी प्रयोग की जाती रहेगी। संविधान के अनुच्छेद 346 में यह कहा गया कि केंद्र सरकार के कामकाज के लिए तत्समय जो भाषा प्राधिकृत होगी, वह भाषा केंद्र व राज्य सरकारों के बीच, एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच पत्राचार की भाषा होगी। (अर्थात राजभाष हिंदी रहेगी परंतु अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा।) इसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि यदि एक या दो से अधिक राज्य यह करार करते हैं कि उन राज्यों के बीच पत्राचार के लिए राजभाषा हिंदी रहेगी तो हिंदी का प्रयोग किया जाएगा। 

अब देखते हैं कि किस राज्य सरकार ने इस दिशा में क्या किया। उत्तर प्रदेश सरकार का राजभाषा अधिनियम 1951 पारित हुआ और 1969 में उसका संशोधन। इस अधिनियम में देवनागरी लिपि व हिंदी को राजभाषा माना गया और उर्दू को सह-राजभाषा। उत्तराखंड राजभाषा अधिनियम 2009 में देवनागरी लिपि में हिंदी को राजभाषा और संस्कृत भाषा को द्वितीय राजभाषा बनाया गया। राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान राजभाषा अधिनियम पारित किया गया और देवनागरी लिपि व हिंदी को अपनी राजभाषा बनाया गया। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित मध्य प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1957में हिंदी को राजभाषा बनाया गया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पारित छत्तीसगढ राजभाषा अधिनियम 2007 में हिंदी और छत्तीसगढी को राजभाषा बनाया गया है सन 2010 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग अधिनियम पारित किया गया परंतु उसमें भी करार का कोई जिक्र नहीं है। बिहार सरकार द्वारा पारित बिहार राजभाषा अधिनियम 1950 में  हिंदी को राजभाषा बनाया गया। हरयाणा सरकार द्वारा पारित हरयाणा राजभाषा अधिनियम 1969 में हिंदी को राजभाषा बनाया गया और  हरयाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 2004 में भी हिंदी को राजभाषा माना गया । हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पारित  हिमाचल प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1975 में हिंदी को राजभाषा बनाया गया ।  गुजरात सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1960 में हिंदी और गुजराती को राजभाषा बनाया गया । महाराष्ट्र सरकार द्वारा महाराष्ट्र राजभाषा अधिनियम 1964 में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली मराठी भाषा को राजभाषा बनाया गया और धारा 3 में संविधान के अनुच्छेद 210 का उल्लेख करते हुए यह भी कहा गया कि 15 वर्ष की अवधि के बाद राज्य के विधान मंडल की कार्यवाही के संव्यवहारार्थ हिंदी तथा मराठी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का उपयोग जारी रह सकेगा। इसी प्रकार धारा 4 में संविधान के अनुच्छेद 345 में निर्दिष्ट समस्त राजकीय प्रयोजनों के लिए मराठी भाषा का उपयोग किया जाएगा तथा ऐसे अपवादित प्रयोजनों के लिए राजभाषा के रूप में हिंदी का उपयोग किया जा सकेगा। ऐसा उल्लेख किसी अन्य राज्य सरकार के राजभाषा अधिनियम में नहीं है। 

पंजाब सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1967 में गुरुमुखी में लिखी पंजाबी को राजभाषा बनाया गया । जम्मू और काश्मीर राजभाषा अधिनियम 2020 में काश्मीरी, डोगरी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं को राजभाषा बनाया गया है। केरल सरकार द्वारा पारित केरल  राजभाषा अधिनियम 1969 में मलयालम को राजभाषा बनाया गया, परंतु सामान्य आदेश, नियम उप नियम आदि अंग्रेजी में भी रहेंगे। तेलंगाना सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1966 में तेलुगु को  प्रथम और उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाया गया। कर्नाटक सरकार द्वारा पारित कर्नाटक राजभाषा अधिनियम  1963 में कन्नड़ को राजभाषा बनाया गया। उसमें  यह भी लिखा गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद राज्य का विधान मंडल कन्नड़ व हिंदी के अलावा अंग्रेजी को राज्य विधान मंडल के कार्य के लिए जारी रखने के लिए कानून बना सकेगा। आंध्र प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1966 में तेलुगु भाषा को राज्य की राजभाषा बनाया गया और कुछ जिलों में उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाया गया। तमिलनाडु राजभाषा अधिनियम 1956 में तमिल भाषा को राजभाषा बनाया गया। पश्चिम बंगाल राजभाषा अधिनियम 1961 में  दार्जिलिंग, कलिमपोंग और कुरसियोंग जैसै पहाडी इलाकों में बंगाली और नेपाली राजभाषा होंगीं और शेष पूरे पश्चिम बंगाल में बंगाली राजभाषा रहेगी।  आसाम राजभाषा अधिनियम 1961 में आसामी को राजभाषा बनाया गया परंतु कछार के कुछ हिस्से में बंगाली के प्रयोग की अनुमति दी गई। त्रिपुरा राजभाषा अधिनियम 1964 में बंगाली और कॉक-बोरक भाषा को राजभाषा बनाया गया। उड़ीसा राजभाषा अधिनियम 1954 में उड़िया भाषा को राजभाषा बनाया गया। मेघालय राजभाषा अधिनियम 2005 में मेघालय स्टेट लेजिसलेचर (कंटीनियुएंस ऑफ द इंग्लिश लैंगुएज) अधिनियम 1980 को मान्य करते हुए अंग्रेजी को ही मेघालय की राजभाषा बनाया गया परंतु पूर्वी खासी हिल, पश्चिमी खासी हिल, दक्षिण पूर्व खासी हिल, पूर्वी जैंतिया हिल, पश्चिमी जैंतिया हिल और री-भोई में क्षेत्र में खासी को एसोशिएट राजभाषा बनाया गया।   गारो भाषा को पूर्वी गारो हिल, पश्चिमी गारो हिल, दक्षिणी गारो हिल, उत्तरी गारो हिल और दक्षिण पश्चिमी गारो हिल क्षेत्र के लिए राजभाषा बनाया गया।  मिजोरम में मिजो लैंग्वेज डेवलेपमेंट बोर्ड एक्ट 2022   मिजो भाषा के विकास, प्रसार आदि के लिए बनाया गया। नागालैंड  में नागालैंड स्टेट लेजिसलेचर (कंटीन्युएंस ऑफ इंगलिश लैंग्वेज) एक्ट 1964 बनाया गया जिसमें संविधान लागू होने के पंद्रह वर्ष बाद भी अंग्रजी को बनाए रखने के लिए लिखा गया। 

उल्लेखनीय है कि किसी भी राज्य सरकार ने अपने राजभाषा अधिनियम में यह प्रस्ताव पारित नहीं किया गया कि वे केंद्र सरकार के साथ किस भाषा में पत्राचार करेंगे और न ही किसी दूसरे राज्य के साथ यह करार किया गया कि वे आपस में किस भाषा में पत्राचार करने के लिए सहमत हैं। 

सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियम की व्याप्ति यानी कार्यक्षेत्र संपूर्ण राज्य है, परंतु यह किसी ने स्पष्ट नहीं किया है कि उनके राज्यक्षेत्र में स्थित केंद्र सरकार के अधीनस्थ व विभागीय कार्यालयों को अपने राज्य की राजभाषा में कार्य न करने की छूट प्रदान की गई है क्योंकि उन पर केंद्र सरकार का राजभाषा अधिनियम पहले से हीलागू है। इन कार्यालयों में कार्य करने वाले अधिकारी कर्मचारी क्या केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियमों का अनुपालन करेंगे।

सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियमों में अंग्रेजी को बरकरार रखने के लिए अवश्य प्रस्ताव पारित किए गए हैं,परंतु हिंदी को बनाए रखने या उसके प्रचार प्रसार के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया हुआ दिखाई नहीं देता। और, कोई करे भी क्यों, हिंदी किसी की मातृभाषा नहीं है न, उत्तर भारत के प्रदेशों में जहां हिंदी को राजभाषा बनाया गया है उनकी अपनी अपनी भाषा बोलियां हैं, जो हिंदी से पहले की हैं और वे उन्हीं के विकास में लगे हैं। हिंदी को तो भारत की एकता व अखंडता के लिए विकसित किया गया है। फिर भी हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा होने के नाते सम्मान मिलना चाहिए न कि उसे किसी प्रदेश की भाषा मानकर उसकी अवहेलना करना चाहिए। स्थिति आपके सामने है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९२ ⇒ कार निषेध दिवस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कार निषेध दिवस।)

?अभी अभी # ७९२ ⇒ आलेख – कार निषेध दिवस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

NO CAR DAY •

आज हमारी स्थिति ऐसी हो गई है कि हम एक दिन बिना प्यार के तो रह सकते हैं, लेकिन बिना कार के नहीं रह सकते। एक समय था जब पैसा या प्यार जैसी फिल्में बनती थी, आज अगर कार और प्यार में से किसी एक को चुनना पड़े, तो इंसान को दस बार सोचना पड़ेगा। हमने तो आजकल, दे दे प्यार दे की तर्ज पर, लोगों को आपस में, दे दे कार दे, कार दे, कार दे, कार दे कहते हुए, कार मांगते भी देखा है।

ट्रैफिक जाम और प्रदूषण का हाल ये देखा कि, एक दिन के लिए कार छोड़ दी मैने। एक समय था, जब हर तरफ आदमी ही आदमी नजर आता था, और आज यह नौबत आ गई कि हर तरफ कार ही कार। हर चौराहे पर बत्तियां बदलती रहती हैं और ट्रैफिक केंचुए की तरह रेंगता रहता हैं। चारों ओर से हॉर्न की कर्कश आवाज यही दर्शाती है कि हमने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है।।

अंततोगत्वा, ये तो होना ही था ! नो व्हीकल जोन की तरह आप इसे नो व्हीकल डे भी कह सकते हैं। लेकिन वाहन बिन सब सून ! बड़ी ज्यादती हो जाती है। वाहन में तो दो पहिया, तीन पहिया, सिटी बस, स्कूल बस, सभी आते हैं। चलिए, इसे कार तक ही सीमित करते हैं। एक दिन बिना कार का। अब आपको, नो कार डे, से ही समझौता करना पड़ेगा। इसके हिंदी में अनुवाद के चक्कर में मत पड़िए, इंडिया भारत हो गया, यही क्या कम है।

आज की स्थिति में आखिर कार क्यूं, जैसा प्रश्न पूछना ही बेमानी है। जो अपने परिवार से करे प्यार, वो कार से कैसे करे इंकार। जब हम दो थे, तो आराम से, आसानी से वेस्पा, लैंब्रेटा, राजदूत और हीरो होंडा मोटर साइकिल से काम चला लेते थे। हमने भी देखे हैं, चल मेरी लूना के दिन।।

फिर हम दो से, हमारे दो हुए। पहिए भी दो से चार हुए। बाल बच्चों वाला घर, कार का क्या, बेचारी घर के बाहर ही सो जाती है रात को। ठंड, गर्मी, बरसात, कोई शिकायत नहीं, बस सुबह कपड़ा मार दो, चमक जाती है। इंसान होती तो चाय पानी करवा देते, पर उसकी खुराक तो डीजल पेट्रोल है। सबको पेट काट काटकर पालना पड़ता है।

क्या जिनके पास कार नहीं, उनका परिवार नहीं, या वे बेकार हैं। अपनी अपनी हैसियत है, जरूरत है, मेहनत करते हैं, पसीना बहाते हैं, हर महीने कार की किश्त चुकाते हैं, तब कार का शौक पालते हैं।

अपना अपना नसीब है। आप क्यों हमसे जलते हैं।।

नो कार डे को आप बेकार डे नहीं कह सकते। हफ्ते पंद्रह दिन में, कुछ लोग उपवास रखते हैं, अन्न की जगह कुछ और खा लेते हैं। एक पंथ दो काज ! थोड़ा धरम करम, थोड़ा व्रत उपवास, पिज़्ज़ा बर्गर पास्ता की छुट्टी। क्या कहते हैं उसे, संयम। कुछ लोगों से तो कंट्रोल ही नहीं होता।

महीने पंद्रह दिन में अगर कार से भी परहेज किया जाए तो कोई बुरा नहीं। अन्य साधन उपलब्ध तो हैं ही। बस अगर सामूहिक इच्छा शक्ति हो, तो हमारी बहुत ही समस्याओं का निदान तो हम ही कर लें।

जिस तरह बूंद बूंद से घड़ा भरता है, आपके एक दिन कार नहीं चलाने से भी बहुत फर्क पड़ सकता है।

बिना कार कहें, बहिष्कार कहें, आप चाहें तो इसे नो कार डे भी कहें, सब चलता है।।

बढ़ती कारों की संख्या आप रोक नहीं सकते। नए वाहनों के क्रय पर भी आप बंदिश भी नहीं लगा सकते। गैरेज का पता नहीं, कार सड़कों पर रखी जा रही हैं। कार पार्किंग की समस्या भी आज की सबसे बड़ी समस्या है।

जहां सामान खरीदना है, वहीं कार खड़ी कर दी। दो कदम पैदल चल नहीं सकते। पूरी सड़कें गलत पार्किंग से भरी रहती हैं, ट्रैफिक तो बाधित होता ही है। प्रशासन चालान काट काट कर हार गया। भगवान भरोसे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था है। फिर भी हम खुश हैं, क्योंकि हमारे पास तो कोई कार ही नहीं है। एवरी डे इज अ, “नो कार डे”।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ नवरात्रि विशेष – नौ संकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

? नवरात्रि विशेष – नौ संकल्प  ?

श्री संजय भारद्वाज

 ☆ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ☆ 

इस नवरात्रि पर्व में शास्त्रोक्त एवं परंपरागत पद्धति से उपासना अवश्य करें। अनुरोध है कि साथ ही निम्नलिखित नौ संकल्पों की सिद्धि का व्रत भी ले सकें तो निश्चय ही दैवीय आनंद की प्राप्ति होगी। इस दृष्टि से नवरात्रि अर्थात शक्तिपर्व महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

  1. अपने बेटे में बचपन से ही स्त्री का सम्मान करने का संस्कार डालना देवी की उपासना है।
  2. घर में उपस्थित माँ, बहन, पत्नी, बेटी के प्रति आदरभाव देवी की उपासना है।
  3. दहेज की मांग रखनेवाले घर और वर तथा घरेलू हिंसा के अपराधी का सामाजिक बहिष्कार करना देवी की उपासना है।
  4. स्त्री-पुरुष, सृष्टि के लिए अनिवार्य पूरक तत्व हैं। पूरक न्यून या अधिक, छोटा या बड़ा नहीं अपितु समान होता है। पूरकता के सनातन तत्व को अंगीकार करना देवी की उपासना है।
  5. स्त्री को केवल देह मानने की मानसिकता वाले मनोरुग्णों की समुचित चिकित्सा करना / कराना भी देवी की उपासना है।
  6. हर बेटी किसीकी बहू और हर बहू किसीकी बेटी है। इस अद्वैत का दर्शन देवी की उपासना है।
  7. किसीके देहांत से कोई जीवित व्यक्ति शुभ या अशुभ नहीं होता। मंगल कामों में विधवा स्त्री को शामिल नहीं करना सबसे बड़ा अमंगल है। इस अमंगल को मंगल करना देवी की उपासना है।
  8. गृहिणी 24 x 7 अर्थात पूर्णकालिक सेवाकार्य है। इस अखंड सेवा का सम्मान करना तथा घर के कामकाज में स्त्री का बराबरी से या अपेक्षाकृत अधिक हाथ बँटाना, देवी की उपासना है।
  9. स्त्री प्रकृति के विभिन्न रंगों का समुच्चय है। इन रंगों की विविध छटाओं के विकास में स्त्री के सहयोगी की भूमिका का निर्वहन, देवी की उपासना है।

या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

💐 शारदीय नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ 💐 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९१ ⇒ कर्नाटक संगीत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कर्नाटक संगीत।)

?अभी अभी # ७९१ ⇒ आलेख – कर्नाटक संगीत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह शीर्षक कुछ कुछ राग दरबारी जैसा नहीं ! जब किसी ने मुझे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी तो पहले मुझे अपने आप पर हँसी आई, जिसे शास्त्रीय संगीत का सा रे ग म नहीं मालूम, उसे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी जा रही है। लेकिन जब राग दरबारी पढ़नी शुरू की, तो पता चला, व्यंग्य की भी सरगम होती है, कभी खुशी, कभी गम होती है।

कर्नाटक संगीत के साथ ऐसा नहीं ! यह किसी उपन्यास का नाम नहीं। सभी जानते हैं, कर्नाटक एक प्रदश है, जिसकी भाषा कन्नड़ है और जहां कावेरी नदी के जल को लेकर तमिलनाडु से अक्सर विवाद चलता रहता है। कर्नाटक की दो विधाएं महत्वपूर्ण हैं एक नाटक और संगीत। जहां शीर्षक ही कर्नाटक हो, वहां नाटक ना हो, यह संभव नहीं। संगीत की तरह नाटक भी एक विधा है जिसके लिए कर्नाटक जाना जाता है। फिर चाहे वह नाटक थियेटर का हो अथवा राजनीतिक। ।

जब भी देश में कहीं राजनीतिक उथल पुथल हुई है, दलबदल हुआ है, किसी प्रदेश के लोकतंत्र के सेवकों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी है, विधायकों को किसी सुदूर, गुप्त स्थान पर नजरबंद किया गया है। न जाने क्यों, इस सियासी नाटक के लिए बेंगलुरु एक सुरक्षित स्थान माना गया है। विश्वास अथवा अविश्वास के मत के दौरान ही देश के ये भावी कर्णधार अचानक अज्ञातवास से प्रकट हो जाते हैं, और लोकतंत्र की रक्षा कर उसे और मजबूत कर देते हैं।

एक कुशल अभिनेता और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड का नाम किसने नहीं सुना। वे कर्नाटक के ही नहीं, पूरे नाट्य जगत के गौरव रहे हैं। गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक का सभी भाषाओं में सफलतापूर्वक मंचन ही नहीं हुआ, इस नाटक पर उन्हें संगीत नाट्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। लोक नाट्य और लोक संगीत में हमारी सभ्यता और संस्कृति रची बसी है। नाटक और संगीत के बिना जीवन नीरस है। ।

कर्नाटक संगीत और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत समानता है, क्योंकि जहां सरगम है, वहीं संगीत है। संगीत गायन भी है और वादन भी। एक हिंदी फिल्म आई थी मोहरा। जिसका एक गीत बहुत मशहूर हुआ था। तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ! बोल कुछ अटपटे, फूहड़ से लगे थे लेकिन चूंकि यह गीत राग भीम पलासी पर आधारित था, इसलिए खूब चला। इसके बीच के आलाप में आपको कर्नाटक गायन शैली साफ नजर आती है। जो हमारे लिए राग यमन है वह कर्नाटक संगीत में कल्याणी है।

अगर आपने फिल्म पड़ोसन के गीत और संगीत पर ध्यान दिया होगा तो यह उत्तर और दक्षिण के संगीत का एक दुर्लभ फ्यूजन है।

लता का गीत शर्म आती है मगर, अभोगी की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति है। राग हंस ध्वनि कर्नाटक शैली का ही राग है।

जा तो से नहीं बोलूं कन्हैया।

राह चलत पकड़ी मोरी बैंया। ।

एक और कमाल।

कहते हैं, संगीत गंधर्व लोक की देन है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में जन्मे शिवपुत्र सिद्धारमय्या कोमकली मठ, जिन्हें हम कुमार गंधर्व के नाम से जानते हैं, इस कथन की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। कर्नाटक शैली के इस गायक ने देवास की माता चामुण्डा देवी की शरण में अपनी संगीत साधना की धूनी ऐसी जमाई कि फिर वापस कर्नाटक जाने का नाम नहीं लिया। भीमसेन जोशी के अभंग से हटकर कबीर के भजनों को मालवी लोकगीतों

की शैली में, अध्यात्म को अपने सुरों में पिरोने का को काम कुमार गंधर्व ने किया वह शास्त्रीय संगीत की अमूल्य धरोहर है। ।

कृष्णा कावेरी का जल जिस तरह कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु की ही नहीं, जन जन की प्यास बुझाती है। हमने देश, प्रदेश ही नहीं, नदी पहाड़ों को भी बांट दिया। कहीं हवा और पानी का भी बंटवारा किया जाता है। कर्नाटक, नाटक और संगीत ही नहीं, अब तो आई टी सेक्टर में भी कमाल दिखा रहा है। नाटक हो या संगीत, हम कैसे भूलें कर्नाटक और वहां के नाट्य पुरुष गिरीश कर्नाड और सवाई कुमार गंधर्व के संगीत और गायन के क्षेत्र में उनके योगदान को। कुमार जी के ही शब्दों में ;

अवधूता, गगन घटा गहराई ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७३ ☆ आलेख – “महात्मा गांधी और नवरात्रि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७३ ☆

?  आलेख – महात्मा गांधी और नवरात्रि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हमारी संस्कृति में वर्ष में दो बार नवरात्रि वह सुअवसर होता है जब हम अपना मन तन का कंप्यूटर रिफ्रेश और रिफ्रेगमेंट कर लेते हैं।

नवरात्र पर्व व्रत आत्मसंयम, पूजा साधना, और धार्मिक अनुष्ठान का पर्व होता है। दशहरे पर रावण दहन बुराइयों के अंत करने के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

समाज यह सत्य याद रखे इसलिए हर साल सार्वजनिक रूप से रावण जलाया जाता है। गुजरात में गरबा नृत्य के उत्सव होते हैं।

गांधीजी ने कभी “नवरात्रि व्रत” को धार्मिक पारंपरिक रूप से  नहीं किया, पर वे राजनीती में सदैव अनशन और उपवास की ताकत से ही विजय प्राप्त करते रहे।

उनके जीवन में व्रत, त्याग और त्योहारों के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रहा है।

गांधीजी ने अपने आत्मअनुशासन के प्रयोगों में व्रत को महत्वपूर्ण भूमिका दी। उनकी “आत्मकथा, सत्य के प्रयोग” (The Story of My Experiments with Truth) में वर्णन है कि किशोरावस्था में माँ से प्रेरणा लेकर वैष्णव और शिव व्रतों का पालन किया करते थे। ज्यों ज्यों उनकी समझ विकसित हुई व्रत उनके लिए सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का माध्यम बन गया।

उनके व्रतों की सूची बताती है कि उन्होंने राजनीतिक अथवा सामाजिक कारणों से अनेक लंबे अवधि के उपवास किए। चौरी चौरा घटना के बाद हिंसा की निंदा के लिए, हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक उथल-पुथल के समय शांति बहाल करने के लिए, अस्पृश्यता के खिलाफ व अन्य अनेक अवसरों पर गांधी जी ने उपवास को ही अपना अस्त्र बनाया। गांधी की विचारधारा में यह द्वंद्व नहीं कि व्रत धर्म से बाहर हो बल्कि उन्होंने व्रत के  धार्मिक और नैतिक आयाम को स्वीकार किया उसे महत्व दिया। ऐसा कोई इतिहास नहीं  कि गांधीजी ने विशेष रूप से नवरात्रि व्रत को राजनीतिक या सार्वजनिक रूप से मनाया हो। त्यौहारों में भाषण देना या धार्मिक आयोजनों का नेतृत्व करना उनकी फितरत में नहीं था।

इतिहास मिलता है कि लंदन में भारतीय समुदाय के एक दशहरा उत्सव आयोजन में, जहाँ गांधी जी और विनायक दामोदर सावरकर को “दशहरा समारोह” का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला, उस अवसर पर गांधी ने भगवान राम की अहिंसात्मक भूमिका की चर्चा की थी और उन्होंने यह शर्त रखी कि भाषणों में राजनीतिक प्रचार न हो। इस प्रकार दशहरा के धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में भी गांधी जी की उपस्थिति अधर्म पर धर्म की विजय के प्रवक्ता रूप में मिलती है।

उन्होंने  त्याग, सत्य, अहिंसा, आत्म नियंत्र के जो मूल्य दिए वे भारतीय संस्कृति से ही प्रेरित थे।

गांधी जी ने नवरात्रि व्रत या दशहरा उत्सव को पारम्परिक भक्तिपूर्ण तरीके से प्रमुखता नहीं दी, परन्तु उनके द्वारा स्वयं को  आत्म शुद्धि और सामाजिक लक्ष्य से जोड़ने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई उसमें यही नवरात्रि दशहरा जैसे पर्वों की पारंपरिक साधना है। यदि गांधी के सिद्धांतों का अनुकरण किया जाए तो त्याग, संयम, अहिंसा, सभी के लिए समान भाव से दशहरा, नवरात्रि पर्व मनाया जाए तो वह गांधी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares